Gulabo Sitabo

गुलाबो सिताबो की लखनवी तहजीब "पहले मैं, पहले मैं"

                                                    -ए॰ एम॰ कुणाल

गुलाबो सिताबो फ़िल्म देखने के बाद एक बार फिर कहना पड़ेगा कि बुड्ढ़ा होगा तेरा बाप। शूजित सरकार की गुलाबो सिताबो की कहानी का मुख्य किरदार लखनऊ की फ़ातिमा हवेली है। लखनवी तहज़ीब के बजाय वहाँ की कला एवं संस्कृति में रची-बची गुलाबो-सिताबो कठपुतली के झगड़ों की रोचक कहानी को आधार बनाया गया है। इसलिए  'पहले आप-पहले आप' की लखनवी तहजीब का एक भी उदाहरण इस फ़िल्म में देखने को नहीं मिलेगा !

फ़िल्म की कहानी 78 साल के लालची और चिड़चिड़े स्वभाव के मिर्ज़ा के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी जान उस हवेली में बसती है। मिर्ज़ा की बेगम फातिमा की पुश्तैनी हवेली है। मिर्ज़ा पैसों के लिए हवेली की पुरानी चीज़ों को चोरी से बेचता रहता है। मिर्ज़ा को अपने से 17 साल बड़ी फातिमा के मरने का इंतज़ार है।

इस हवेली में बहुत से किराएदार भी रहते हैं, इन्हीं में से एक हैं बांके रस्तोगी (आयुष्मान खुराना)। बांके अपनी मां और तीन बहनों के साथ रहता है। बांके एक आटा चक्की की कमाई से अपना घर किसी तरह चलाता है। तीस रुपय घर का किराया तक देने के लिए बहाना करता है। ऊपर से मिर्ज़ा किराया बढ़ाने की बात करता है। जिसके कारण मिर्जा आए दिन बांके को परेशान करता रहता है।

कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब मिर्ज़ा एक वकील के साथ मिलकर हवेली बेचना चाहता है और बांके पुरातत्व विभाग के अधिकारी के साथ मिलकर अपनी चाल चलता है।


अंत में दो बिल्ली की लड़ाई में रोटी कोई और खा लेता है। बेगम अपने आशिक़ के साथ भाग जाती है। मिर्ज़ा के हाथ कुछ नहीं आता। बाद में बेगम 95 बर्थडे पार्टी हवेली में धूम धाम से मनाती है और मिर्ज़ा साहब हवेली के गेट बाहर खड़े नज़र आते है।

मिर्ज़ा के हाथ एक कुर्सी आती है, जिसे वह 250 रुपय में बेच देता है। उस कुर्सी की भी क़िस्मत बदल जाती है। कबाड़ी वाले से एक एक बड़े शो रूम में वह कुर्सी पहुँच जाती है, जिस पर Rs 1,35,000 का सेल प्राइज़ टैग लगा है और उसके क्लोज़ उप के साथ फ़िल्म का दी एंड होता है।


 फिल्म में तीसरा मुख्य किरदार फातिमा बेगम (फारुख जाफर) का है, हालांकि इस फिल्म में बच्चन साहब के साथ फारुख का सीन काफी कम हैं पर वे अपना छाप छोड़ने में सफल रही है।उनके अलावा आर्कियोलॉजिकल विभाग के अधिकारी मिस्टर गणेश मिश्रा (विजय राज) और वकील सीक्रेट पाशा (ब्रिजेन्द्र काला) की अहम भूमिका है।

अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की जोड़ी को एक साथ स्क्रीन पर देखने का लोगों को लंबे समय से इंतजार था। बड़े पर्दे पर न सही, छोटे पर्दे पर उनको साथ देखने का सपना पूरा हो गया। महानायक के सामने आयुष्मान खुराना के अभिनय को देख कर एक बात तो कहना पड़ेगा कि बड़े मियां तो बड़े मियां छोटे मियां सुभान अल्लाह !


शूजित सिरकार का कसा हुआ निर्देशन फिल्म की खासियत है. लेखिका जूही चतुर्वेदी की कहानी के साथ शूजित सरकार ने पूरा न्याय किया है। फिल्म की कहानी अमिताभ और आयुष्मान के इर्द-गिर्द घूमती है पर फारुख ज़फर, विजय राज़, बृजेंद्र काला और सृष्टि श्रीवास्तव ने अपने किरदार में बिल्कुल फ़िट नज़र आते है।

लखनवी तहजीब के अलावा इस फ़िल्म में कोई थी तो वह थी अमिताभ बच्चन का मिर्ज़ा वाला मेकअप। उनके किरदार के साथ कुछ जमा नहीं। लगता है शूजित सिरकार को बच्चन साहब के अभिनय से ज़्यादा अपने मेकअप आर्टिस्ट पर भरोसा था। मिर्ज़ा का मेकअप उनके अभिनय को उभारने के बजाय ढकने का काम कर रहा था।

लॉकडाउन के कारण बॉक्स ऑफिस का रिपोर्ट मिलना तो मुश्किल है लेकिन एमाज़ॉन प्राइम के बॉक्स ऑफिस पर ये फ़िल्म धमाल ज़रूर करेगी। कम-से-कम एक दिन के लिए बच्चन साहब के फ़ैन  'कोरोना' को भूल कर 'गुलाबो सिताबो' की चर्चा करेंगे।

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