ब्रिक्स पर डोनाल्ड ट्रंप का साया : तस्वीर और बयानों में जो दिखा, दिल्ली डिक्लेरेशन में गायब! लेखक – अरुण कुणाल नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का मंच सजा तो दुनिया की निगाहें भारत पर टिक गईं। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने वैश्विक राजनीति को नई तस्वीर दी, तो दूसरी तरफ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की मौजूदगी ने इस मंच को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया। लेकिन इस पूरी तस्वीर में एक ऐसा चेहरा मौजूद नहीं था, जिसकी परछाईं पूरे सम्मेलन पर साफ दिखाई दे रही थी! जी हा हम बात कर रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की। दिल्ली में ब्रिक्स नेताओं की तस्वीरों और बयानों में भले ही ट्रंप का नाम बार-बार न आया हो, लेकिन उनकी नीतियों का असर सम्मेलन की बातचीत और अंततः नई दिल्ली घोषणा-पत्र की भाषा में महसूस किया जा सकता है। खास तौर पर व्यापार, एकतरफा प्रतिबंध, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के सवाल पर अमेरिका की मौजूदा नीति ब्रिक्स के लिए एक ऐसी पृष्ठभूमि बन चुकी है, जिसे नजरअंदाज करना आस...
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दिशा सालियान केस 6 साल बाद सीबीआई के हवाले : क्या सुशांत सिंह राजपूत की सुलझेगी मौत की गुत्थी?
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दिशा सालियान केस 6 साल बाद सीबीआई के हवाले : क्या सुशांत सिंह राजपूत की सुलझेगी मौत की गुत्थी? लेखक — अरुण कुणाल दिशा सालियान की मौत को छह साल बीत चुके हैं, लेकिन अब एक बार फिर यह मामला सुर्खियों में है। दिशा की मौत 8 जून 2020 को मुंबई के मलाड स्थित एक इमारत की 14वीं मंजिल से गिरने के बाद हुई थी। इसके ठीक छह दिन बाद, 14 जून को अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत मुंबई के बांद्रा स्थित उनके अपार्टमेंट में हुई। दोनों घटनाओं के बीच महज छह दिनों का अंतर था। दोनों मामलों को आत्महत्या से जोड़कर देखा गया और जांच के बाद मामले लगभग शांत हो गए। अब दिशा सालियान मामले में मुंबई हाई कोर्ट के आदेश के बाद छह साल पुरानी कहानी फिर से खुलती दिखाई दे रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दिशा सालियान की मौत की नए सिरे से जांच के साथ सुशांत सिंह राजपूत की मौत की गुत्थी भी दोबारा जांच के दायरे में आएगी? दिशा के पिता सतीश सालियान लंबे समय से अपनी बेटी की मौत की नए सिरे से जांच की मांग करते रहे हैं। उनका आरोप है कि दिशा के साथ ...
जीडीपी के अच्छे दिन :आंकड़ों की बाजीगरी या अडानी -अंबानी की ग्रोथ ही देश की ग्रोथ है?
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जीडीपी के अच्छे दिन :आंकड़ों की बाजीगरी या अडानी -अंबानी की ग्रोथ ही देश की ग्रोथ है? लेखक – अरुण कुणाल भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर्ज की है। सरकार के लिए यह निश्चित रूप से जश्न मनाने का मौका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे असाधारण उपलब्धि बताते हुए कहा है कि वैश्विक अनिश्चितताओं, तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और सप्लाई चेन की चुनौतियों के बावजूद भारत ने यह रफ्तार हासिल की है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि GDP 7.8 प्रतिशत बढ़ी या नहीं। सवाल यह है कि इस 7.8 प्रतिशत की वृद्धि का फायदा आम भारतीय की जिंदगी में कितना पहुंचा? जीडीपी देश की अर्थव्यवस्था का तापमान बताती है, लेकिन आम आदमी की आर्थिक हालत जानने के लिए सिर्फ थर्मामीटर देखना काफी नहीं है। इसलिए सवाल अडानी-अंबानी के बढ़ने पर आपत्ति का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत की आर्थिक विकास यात्रा में अडानी-अंबानी के साथ वह करोड़ों भारतीय भी आगे बढ़ रहे हैं, जिनके नाम किसी कॉरपो...
अमेरिका में मोहन भागवत का ‘मोहब्बत की दुकान’: लव जिहाद से यू-टर्न, विदेशी दबाव या नया प्रयोग?
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अमेरिका में मोहन भागवत का ‘मोहब्बत की दुकान’: लव जिहाद से यू-टर्न, विदेशी दबाव या नया प्रयोग? लेखक – अरुण कुणाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का अमेरिका दौरा इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है। मुस्लिम विरोध की खाद से जिस संस्था को सौ साल तक सींचा गया, उसके प्रमुख मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में कहना कि, “सच्चा हिंदुत्व भारत से मुसलमानों को बाहर नहीं करता। जो हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है, वह हिंदू नहीं रह जाता।” आरएसएस के शताब्दी वर्ष में संघ प्रमुख का बयान भले ही बाहरी दिखावा हो, लेकिन इसके मायने बहुत हैं! मोहन भागवत का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस समय आया है जब RSS अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर रहा है और संगठन अपनी विचारधारा को वैश्विक स्तर पर सामने रखने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ संघ की पुरानी विचारधारा की अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुति है, या फिर बदलते राजनीतिक और सामाजिक माहौल के बीच संघ अपनी भाषा में भी बदलाव कर रहा है? स...
मेसी का सपना टूटा, स्पेन ने रचा इतिहास; लामिन यामाल बने विश्व फुटबॉल के नए पोस्टर बॉय!
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मेसी का सपना टूटा, स्पेन ने रचा इतिहास; लामिन यामाल बने विश्व फुटबॉल के नए पोस्टर बॉय! लेखक - अरुण कुणाल फीफा विश्व कप 2026 कई मायनों में इतिहास के सबसे भव्य, विस्तृत और रोमांचक संस्करणों में से एक साबित हुआ। 48 टीमों ने इस महाकुंभ में हिस्सा लिया और पहली बार ही इसका आयोजन तीन देशों (अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा) ने संयुक्त रूप से किया। नार्वे और इंग्लैंड की टीमों के चौंकाने वाले प्रदर्शन, रोमांचक नॉकआउट मुकाबलों, नेमार और क्रिस्टियानो रोनाल्डो जैसे दिग्गजों की भावुक विदाई और अर्जेंटीना–स्पेन के ऐतिहासिक फाइनल ने इस विश्व कप को लंबे समय तक यादगार बना दिया। भारत में फीफा विश्व कप की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अर्जेंटीना और स्पेन के बीच खेले गए फाइनल मुकाबले को देखने के लिए दिल्ली के कई रेस्टोरेंट, स्पोर्ट्स बार और कैफे सुबह चार बजे तक खुले रहे। देर रात से लेकर भोर तक फुटबॉल प्रेमियों का उत्साह देखते ही बनता था। भारत में लियोनेल मेसी के प्रशंसकों की बड़ी सं...
सोनम वांगचूक और राहुल गांधी: एक फूल दो माली! कॉकरोच का हाथी से टक्कर, 20 जुलाई को आंदोलन का हो सकता है निर्णायक मोड़!
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सोनम वांगचूक और राहुल गांधी: एक फूल दो माली! कॉकरोच का हाथी से टक्कर, 20 जुलाई को आंदोलन का हो सकता है निर्णायक मोड़! लेखक: अरुण कुणाल "हाथी से टकराना" मुहावरा सुनते ही मुझे जैन टीवी के दिनों की एक पुरानी याद ताज़ा हो जाती है। उस दौर में जैन टीवी के प्रमोटर डॉ. जे.के. जैन और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान सचिव एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा के बीच टकराव की चर्चा मीडिया जगत में खूब होती थी। इस संघर्ष का असर संस्थान की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ा। हालत इतनी खराब हो गई थी कि कर्मचारियों को समय पर वेतन तक नहीं मिल पाता था। एक समय जैन टीवी पत्रकारिता की सबसे बड़ी पाठशालाओं में गिना जाता था। आज देश के कई बड़े पत्रकार वहीं से निकले हैं। उन दिनों सुशांत सिन्हा, रमेश भट्ट और मैं संस्थान के "युवा तुर्क" माने जाते थे। प्रबंधन के खिलाफ वरिष्ठों के आंदोलन में हमें भी आगे कर दिया गया था। अंततः डॉ. जे.के. जैन के साथ एक निर्णायक बैठक हुई। उसी बैठक में उन्होंने कहा था—"मर...
लोकतंत्र के ढहते स्तंभों के बीच सत्याग्रह की बदलती गूंज: अन्ना हज़ारे से सोनम वांगचुक तक गांधीवादी सत्याग्रह की प्रासंगिकता!
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लोकतंत्र के ढहते स्तंभों के बीच सत्याग्रह की बदलती गूंज: अन्ना हज़ारे से सोनम वांगचुक तक गांधीवादी सत्याग्रह की प्रासंगिकता! लेखक - अरुण कुणाल सोनम वांगचुक को अधिकांश लोग "3 इडियट्स" फिल्म के प्रेरणा स्रोत के रूप में जानते हैं, लेकिन उनका वास्तविक परिचय लद्दाख के पर्यावरण, संस्कृति और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में है। इस संघर्ष के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आज वे लद्दाख से दिल्ली आकर युवाओं के राष्ट्रीय आंदोलन का न केवल अन्ना हज़ारे की तरह प्रमुख चेहरा हैं, बल्कि गांधीवादी सत्याग्रह की एक चलती-फिरती प्रयोगशाला भी बन चुके हैं। भारतीय लोकतंत्र में अनशन केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति का प्रतीक रहा है। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और उपवास को सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का ऐसा हथियार बनाया, जिसमें हिंसा नहीं, बल्कि आत्मबल और जनमत की ताकत होती है। स्वतंत्र भारत में यदि किसी अनशन ने राष्ट्रीय राजनीति को सबसे अधिक प्रभ...