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लोकतंत्र के ढहते स्तंभों के बीच सत्याग्रह की बदलती गूंज: अन्ना हज़ारे से सोनम वांगचुक तक गांधीवादी सत्याग्रह की प्रासंगिकता!

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  लोकतंत्र के ढहते स्तंभों के बीच सत्याग्रह की बदलती गूंज: अन्ना हज़ारे से सोनम वांगचुक तक गांधीवादी सत्याग्रह की प्रासंगिकता!                            लेखक - अरुण कुणाल  सोनम वांगचुक को अधिकांश लोग "3 इडियट्स" फिल्म के प्रेरणा स्रोत के रूप में जानते हैं, लेकिन उनका वास्तविक परिचय लद्दाख के पर्यावरण, संस्कृति और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में है। इस संघर्ष के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आज वे लद्दाख से दिल्ली आकर युवाओं के राष्ट्रीय आंदोलन का न केवल अन्ना हज़ारे की तरह प्रमुख चेहरा हैं, बल्कि गांधीवादी सत्याग्रह की एक चलती-फिरती प्रयोगशाला भी बन चुके हैं। भारतीय लोकतंत्र में अनशन केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति का प्रतीक रहा है। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और उपवास को सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का ऐसा हथियार बनाया, जिसमें हिंसा नहीं, बल्कि आत्मबल और जनमत की ताकत होती है। स्वतंत्र भारत में यदि किसी अनशन ने राष्ट्रीय राजनीति को सबसे अधिक प्रभ...

बूंद-बूंद टपकती इमरजेंसी : मीनाक्षी नटराजन और ममता बनर्जी के साथ खेला, डिलिमिटेशन बिल का नंबर गेम कनेक्शन?

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बूंद-बूंद टपकती इमरजेंसी : मीनाक्षी नटराजन और ममता बनर्जी के साथ खेला, डिलिमिटेशन बिल का नंबर गेम कनेक्शन?                             लेखक : अरुण कुणाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं पर जनता का विश्वास रहा है। लेकिन जब चुनाव, उम्मीदवारों की पात्रता, विपक्षी दलों की राजनीतिक स्वतंत्रता और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर लगातार विवाद सामने आने लगें, तब सवाल केवल किसी एक चुनाव या एक नेता का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की विश्वसनीयता का बन जाता है। हाल के घटनाक्रमों ने यही चिंता पैदा की है कि कहीं देश में औपचारिक रूप से नहीं, लेकिन "बूंद-बूंद टपकती इमरजेंसी" जैसी स्थिति तो नहीं बन रही। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर उठे सवालों के जवाब अभी पूरी तरह सामने भी नहीं आए थे कि कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन को लेकर पैदा हुआ विवाद नई बहस छेड़ गया। यदि किसी उम्मीदवार का नामांकन तकनीकी या कानूनी आधार पर खारिज होता है और अदालत में मामला लंबित रहते हुए ...

मानसून के साथ दिल्ली में ‘कॉकरोच’ की दस्तक: 6 जून को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की अग्निपरीक्षा!

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मानसून के साथ दिल्ली में ‘कॉकरोच’ की दस्तक:  6 जून को जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की अग्निपरीक्षा!                              लेखक - अरुण कुणाल  दिल्ली की राजनीति में 6 जून का दिन दिलचस्प और संभावित रूप से महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। एक तरफ सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी कॉकरोच जनता पार्टी जंतर-मंतर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू करने की घोषणा कर रही है, तो दूसरी तरफ दो दिन बाद विपक्षी दलों की एक महत्वपूर्ण बैठक भी प्रस्तावित है, जिसमें 'खेला होबे' की राजनीति के लिए चर्चित ममता बनर्जी स्वयं भाग लेने दिल्ली आ रही हैं। इन दोनों घटनाओं का होना राजनीतिक पर्यवेक्षकों के लिए कई सवाल खड़े करता है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में यह स्पष्ट रूप से देखा गया है कि सोशल मीडिया अब केवल विचार व्यक्त करने का मंच नहीं रह गया है, बल्कि वह राजनीतिक लामबंदी और जनमत निर्माण का एक प्रभावी माध्यम बन चुका है। ऐसे समय में कॉकरोच जनता पार्टी का अचानक चर्चा में आना और उसक...

दो पाटन के बीच भारत का Gen-Z : क्या सोशल मीडिया बनेगा रामलीला मैदान?

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  दो पाटन के बीच भारत का Gen-Z :  क्या सोशल मीडिया बनेगा रामलीला मैदान?                                ले. अरुण कुणाल पश्चिम एशिया में अशांति और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच राहुल गांधी का यह कहना कि मोदी सत्ता एक साल की मेहमान है और कॉकरोच जनता पार्टी का सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर धूम मचाने के बाद सरकार भले ही कहे कि सब ठीक चल रहा है पर जिस तरह से राहुल गांधी और युवाओं को सरकार टारगेट कर रही है, उसे देखकर आने वाले समय में किसी बड़े आंदोलन से इंकार नहीं किया जा सकता है। जबकि दूसरी तरफ सरकार लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सब कुछ नियंत्रण में है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से राहुल गांधी, विपक्षी आवाज़ों और खासकर युवाओं को लेकर सरकार की आक्रामकता दिखाई दे रही है, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या देश किसी बड़े राजनीतिक या जनआंदोलन की ओर बढ़ रहा है। इतिहास गवाह है कि जब आर्थिक दबाव, बेरोजगारी, महंगाई और राजनीतिक असंतोष एक साथ मिलते हैं, तब सत्ता की स्थिरता के दावे अचानक कमजोर पड़ने लगते ह...

गैंग्स ऑफ वासेपुर का सोप ओपेरा: किसके संरक्षण में चल रही है प्रिंस खान की पैरलल सरकार?

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                         गैंग्स ऑफ वासेपुर रिटर्न्स गैंग्स ऑफ वासेपुर का सोप ओपेरा: किसके संरक्षण में चल रही है प्रिंस खान की पैरलल सरकार? लेखक - अरुण कुणाल जब बात धनबाद के डॉन प्रिंस खान की हो, तो उसके मामा फहीम खान का फ़िल्मी किरदार निभाने वाले नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ धनबाद को लेकर हुई बातचीत का यहां ज़िक्र करना लाज़िमी हो जाता है। फ़िल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के रिलीज़ होने के ठीक बाद मेरी उनसे पहली मुलाक़ात हुई थी। ये उन दिनों की बात है, जब एक फ़िल्म की वजह से वासेपुर काफ़ी चर्चा में था। उसके बाद नवाजुद्दीन से मेरी मुलाक़ात उनकी भाभी के केस को लेकर हुई, जिसकी दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस मैंने कराई थी। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के मैनेजर ने मुझे PR के लिए पैसे देने की बात कही थी, लेकिन वह उनका निजी मामला था, इसलिए मैंने कोई फीस नहीं ली। आज भी शायद वे मुझे इस बात से ज़्यादा इसलिए जानते हैं कि मैं उस शहर धनबाद से हूं, जिस पर बनी उनकी फ़िल्म ने पूरे देश में उसे एक अलग पहचान दी थी! नवाजुद्दीन सिद्दीकी और बिपाशा बसु की फिल्म 'आत्मा...

पिनराई विजयन : द लास्ट कॉमरेड ऑफ़ लेफ्ट मुक्त भारत!

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  पिनराई विजयन :  द लास्ट कॉमरेड ऑफ़ लेफ्ट मुक्त भारत!                              लेखक – अरुण कुणाल भारतीय राजनीति के लंबे और उतार-चढ़ाव भरे इतिहास में वामपंथ एक समय वैचारिक दृढ़ता, संगठनात्मक अनुशासन और जन-आंदोलनों की शक्ति का पर्याय हुआ करता था। लेकिन समय के साथ बदलते राजनीतिक समीकरणों, सामाजिक आकांक्षाओं और नेतृत्वगत निर्णयों ने इस धारा को सीमित कर दिया। आज जब हम केरल की राजनीति को देखते हैं, तो पिनराई विजयन एक ऐसे नेता के रूप में उभरते हैं, जो न केवल अपने राज्य में वामपंथ की अंतिम मज़बूत कड़ी हैं, बल्कि एक युग के समाप्त होने के प्रतीक भी बनते जा रहे हैं। केरल को लंबे समय तक वामपंथ का गढ़ माना जाता रहा है। यहां की राजनीतिक चेतना, शिक्षा का स्तर और सामाजिक विकास ने वामपंथी विचारधारा को गहराई से जड़ें जमाने का अवसर दिया। लेकिन हाल के वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति में जो बदलाव आया है, उसका प्रभाव केरल पर भी धीरे-धीरे दिखने लगा है। यदि यह कहा जाए कि केरल वामपंथ का आख़िरी किला है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं हो...

एग्जिट पोल बनाम ज़मीनी हकीकत: मोदी - शाह के लिए ममता का ‘अभेद्य किला’ दक्षिण बंगाल को भेद्य पाना मुश्किल!

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  एग्जिट पोल बनाम ज़मीनी हकीकत: मोदी - शाह के लिए ममता का  ‘अभेद्य किला’ दक्षिण बंगाल को भेद्य पाना मुश्किल!                             लेखक - अरुण कुणाल  पांचों चुनावी राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में रिकॉर्ड मतदान ने मुकाबले को और भी दिलचस्प बना दिया है। चार राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल का सट्टा बाजार ज्यादा गर्म नजर आ रहा है। अब तक जो रुझान सामने आ रहे हैं, वे बंगाल की जनता की असली बेचैनी को पूरी तरह बयां नहीं कर पा रहे हैं। जमीनी स्तर पर लोगों में बेचैनी जरूर महसूस की जा रही है, लेकिन यह साफ नहीं है कि यह बदलाव की चाहत है या फिर SIR को लेकर नाराजगी का असर है? पीपुल्स पल्स को छोड़कर अधिकांश एग्जिट पोल्स का अनुमान है कि 1975 में जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर चढ़कर नारे लगाने वाली और 1977 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को कोलकाता में काला झंडा दिखाने वाली ममता बनर्जी चुनाव हार रही हैं! वहीं, पीपुल्स पल्स का सर्वे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है, जिसके मुताबिक ममता बनर्...