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एपस्टीन की क्राइम पार्टनर मैक्सवेल की अमेरिकी संसद में गवाही: अमेरिका से भारत तक फिंगर क्रॉस!

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एपस्टीन की क्राइम पार्टनर मैक्सवेल की अमेरिकी संसद में गवाही:  अमेरिका से भारत तक फिंगर क्रॉस!                             लेखक: अरुण कुणाल जेफरी एपस्टीन की पूर्व सहयोगी और कुख्यात यौन तस्करी नेटवर्क की मुख्य किरदार गिलेन मैक्सवेल 9 फरवरी को अमेरिकी संसद के सामने गवाही देने वाली हैं। यह गवाही ऐसे समय में हो रही है जब  एपस्टीन से जुड़े फाइलों और दस्तावेज़ों का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक किया जा रहा है। सत्ता के गलियारों में हलचल तेज़ है, क्योंकि यह सिर्फ़ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि वैश्विक सत्ता-संरचना, प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत और वर्षों से दबाए गए सच का सवाल बन चुका है। यह गवाही बंद कमरे में, वर्चुअल माध्यम से होगी। हाउस ओवरसाइट कमेटी ने इसके लिए औपचारिक समन जारी किया है। अमेरिकी संसद यह जांच कर रही है कि संघीय जांच एजेंसियों ने एपस्टीन मामले को कैसे हैंडल किया, किन स्तरों पर लापरवाही हुई, और क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति को जानबूझकर बचाया गया। मैक्सवेल के वकीलों ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि वह गवाह...

वॉर रुकवाने वाला 'एप्सटीन फाइल्स' पर बेबस : ताक़त, चुप्पी और भारतीय सत्ता का असहज सच!

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वॉर रुकवाने वाला 'एप्सटीन फाइल्स' पर बेबस :  ताक़त, चुप्पी और भारतीय सत्ता का असहज सच!                             लेखक: अरुण कुणाल एप्सटीन कांड के तहत सार्वजनिक हुए कुछ अमेरिकी न्यायिक दस्तावेज़ों और मीडिया रिपोर्ट्स में भारत से जुड़े नामों के उल्लेख ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। इन दस्तावेज़ों में केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी और उद्योगपति अनिल अंबानी के अलावा पहली बार पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नामों का संदर्भ सामने आने का दावा किया गया है। नरेंद्र मोदी के बाद क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर का नाम भी एप्सटीन फाइल्स  में सामने आया है, जिससे असहजता स्वाभाविक है। सचिन तेंदुलकर के अलावा लियोनेल मेस्सी, डेविड बेकहम, माइकल जॉर्डन और टाइगर वुड्स जैसे खेल जगत के अन्य दिग्गज के नाम भी शामिल हैं। हालांकि, सचिन के बारे में कोई नकारात्मक बात नहीं लिखी है लेकिन उनका नाम आना एक चर्चा का विषय बना हुआ है। ऐसे में, सवाल यह नहीं है कि ये नाम किस भूमिका में थे, बल्कि यह है कि एक सजाया...

ट्रम्प की ट्रेड डील और अकबर–बीरबल का बैंगन: एकदम से वक्त बदल दिए, जज्बात बदल दिए, बैंगन का ताज बदल दिए!

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      अथ श्री ट्रम्प डील कथा भारत -अमेरिका ट्रेड डील और अकबर–बीरबल का बैंगन:  एकदम से वक्त बदल दिए, जज्बात बदल दिए, बैंगन का ताज बदल दिए....!                      (व्यंग्य)                           लेखक- अरुण कुणाल डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत–अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा के बाद जिस तरह के सवाल, शंकाएँ और विरोधाभास सामने आए हैं, वे भारतीय राजनीति और कूटनीति की उस पुरानी परंपरा की याद दिलाते हैं जहाँ घोषणा पहले होती है और शर्तें बाद में समझ आती हैं। इस पूरे घटनाक्रम पर अकबर–बीरबल का वह मशहूर किस्सा सटीक बैठता है, जिसमें बैंगन पहले “सब्जियों का राजा” बनता है और कुछ ही दिनों में “बेकार और बेस्वाद” घोषित कर दिया जाता है। किस्से में अकबर की इच्छा मात्र से बैंगन महान हो जाता है। बीरबल उसके सिर पर ताज देखता है, उसमें विटामिन खोज लेता है और उसे स्वास्थ्य का खजाना बता देता है। एक हफ्ते तक वही बैंगन रोज़ परोसा जाता है। अंततः अकबर ऊब जाता है और सवाल करता है- “इसम...

विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का 'संस्कारी बजट': एको अहं, द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति?

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  विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का 'संस्कारी बजट': एको अहं, द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ?                             लेखक : अरुण कुणाल केंद्रीय बजट ऐसे समय में प्रस्तुत हुआ है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। एक ओर दुनिया में ट्रेड टेंशन बढ़ रहा है, दूसरी ओर अमेरिकी टैरिफ और भू-राजनीतिक तनाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में भारत जैसे उभरते हुए बड़े देश से यह उम्मीद स्वाभाविक थी कि सरकार बजट के जरिए ऐसे ठोस कदम उठाएगी, जिससे वैश्विक दबावों का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर न्यूनतम पड़े और आम नागरिक को कुछ राहत मिले। आम बजट से मध्यम वर्ग को सबसे अधिक उम्मीदें थीं- आयकर में अतिरिक्त छूट, महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन। इसके उलट बजट का झुकाव उपभोग बढ़ाने के बजाय राजकोषीय अनुशासन और दीर्घकालिक निवेश की ओर अधिक दिखा। इसके साथ ही बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश बढ़ाने की मांग लंबे समय से उठती रही है। घर खरीदने वालों को सस्ते हो...

अमेरिकी अदालत का अडानी को समन: 14 महीने की लुका-छुपी का अंत!

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  अमेरिकी अदालत का अडानी को समन: 14 महीने की लुका-छुपी का अंत!                            लेखक-अरुण कुणाल “लुका-छुपी बहुत हुई, सामने आ जा ना…”अगर गाने की यह पंक्ति तारीख़ पे तारीख़ वाली भारतीय अदालतों के गलियारों में गूंजे, तो शायद किसी को हैरानी न हो। लेकिन जब वही ‘लुका-छुपी’ की गूंज अमेरिकी अदालत में हो, तो वह सिर्फ़ कानूनी घटना नहीं रहती, वह वैश्विक चर्चा का विषय बन जाती है। अमेरिकी समन को लेकर पिछले 14 महीनों से चली आ रही कानूनी और कूटनीतिक लुका-छुपी अब समाप्त हो चुकी है। समन स्वीकार करते ही अडानी का मामला टालमटोल से निकलकर औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में आ गया है। अब यह खेल देरी और तकनीकी आपत्तियों का नहीं, बल्कि सबूतों, दस्तावेज़ों और जवाबदेही का है, वह भी ऐसी अदालत में, जहां “तारीख़ पे तारीख़” नहीं होती हैं। गौतम अडानी और सागर अडानी द्वारा अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के समन को स्वीकार करना केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उस लंबे राजनीतिक–कॉरपोरेट अध्याय का निर्णायक मोड़ ...

सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी एक्ट-26 की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’: दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय!

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सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी एक्ट-26 की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’: दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय!                            लेखक – अरुण कुणाल यूजीसी द्वारा लाए गए ‘इक्विटी रेगुलेशन 2026’ पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक महज़ एक कानूनी हस्तक्षेप नहीं है, बल्कि यह सरकार की राजनीतिक रणनीति पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने न केवल नियमों की अस्पष्टता की ओर इशारा किया, बल्कि केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की असामान्य चुप्पी भी कई संकेत छोड़ गई। अगर मंशा सचमुच नीतिगत सुधार की होती, तो यूजीसी एक्ट के संदर्भ में भी अध्यादेश का रास्ता अपनाया जा सकता था, जैसा कि पहले कई बार किया गया है। ट्रिब्यूनल अध्यादेश, 2021 और दिल्ली सेवा अध्यादेश, 2023 इसके ठोस उदाहरण हैं, जहाँ सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट फैसलों के बावजूद कार्यपालिका ने अध्यादेश के ज़रिए स्थिति को पलटने की कोशिश की थी। अगर सरकार यूजीसी एक्ट पर अध्यादेश नहीं लाई, तो सवाल यह नहीं है कि कर सकती थी या नहीं? सवाल यह है कि उसने ऐसा ...

यूजीसी बिल 2026 बना गले की फांस : जो बनना था ढाल, उसे तलवार बना कर क्या पाया?

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यूजीसी बिल 2026 बना गले की फांस :  जो बनना था ढाल, उसे तलवार बना कर क्या पाया?                            लेखक: अरुण कुणाल यूजीसी बिल काग़ज़ों पर जितना गुलाबी दिखाई देता है, ज़मीनी हक़ीक़त में उतना सरल नहीं है। इस विधेयक के संभावित दुरुपयोग के परिणामों पर न तो पर्याप्त विमर्श हुआ है और न ही कोई ठोस सुरक्षा-प्रबंध नज़र आते हैं। देश के कॉलेज और विश्वविद्यालय पहले ही छात्र राजनीति के अखाड़े बने हुए हैं, जहाँ वैचारिक मतभेद अक्सर व्यक्तिगत और राजनीतिक द्वेष में बदल जाते हैं। ऐसे माहौल में यह आशंका स्वाभाविक है कि कोई भी छात्र संगठन या गुट इस कानून का इस्तेमाल अपने विरोधी छात्र या शिक्षक को फँसाने के औज़ार के रूप में कर सकता है। संसद के बजट सत्र के बीच लाया गया 'यूजीसी बिल-2026' सरकार के लिए सिर्फ़ एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सड़क से संसद तक फैलता हुआ एक संवेदनशील सामाजिक प्रश्न बन चुका है। आमतौर पर नए कानून किसी एक वर्ग या क्षेत्र को प्रभावित करते हैं, लेकिन यह बिल देश के हर उस छात्र, शिक्षक और कर्मचारी से जुड़ा ह...