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पिनराई विजयन : द लास्ट कॉमरेड ऑफ़ लेफ्ट मुक्त भारत!

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  पिनराई विजयन :  द लास्ट कॉमरेड ऑफ़ लेफ्ट मुक्त भारत!                              लेखक – अरुण कुणाल भारतीय राजनीति के लंबे और उतार-चढ़ाव भरे इतिहास में वामपंथ एक समय वैचारिक दृढ़ता, संगठनात्मक अनुशासन और जन-आंदोलनों की शक्ति का पर्याय हुआ करता था। लेकिन समय के साथ बदलते राजनीतिक समीकरणों, सामाजिक आकांक्षाओं और नेतृत्वगत निर्णयों ने इस धारा को सीमित कर दिया। आज जब हम केरल की राजनीति को देखते हैं, तो पिनराई विजयन एक ऐसे नेता के रूप में उभरते हैं, जो न केवल अपने राज्य में वामपंथ की अंतिम मज़बूत कड़ी हैं, बल्कि एक युग के समाप्त होने के प्रतीक भी बनते जा रहे हैं। केरल को लंबे समय तक वामपंथ का गढ़ माना जाता रहा है। यहां की राजनीतिक चेतना, शिक्षा का स्तर और सामाजिक विकास ने वामपंथी विचारधारा को गहराई से जड़ें जमाने का अवसर दिया। लेकिन हाल के वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति में जो बदलाव आया है, उसका प्रभाव केरल पर भी धीरे-धीरे दिखने लगा है। यदि यह कहा जाए कि केरल वामपंथ का आख़िरी किला है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं हो...

एग्जिट पोल बनाम ज़मीनी हकीकत: मोदी - शाह के लिए ममता का ‘अभेद्य किला’ दक्षिण बंगाल को भेद्य पाना मुश्किल!

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  एग्जिट पोल बनाम ज़मीनी हकीकत: मोदी - शाह के लिए ममता का  ‘अभेद्य किला’ दक्षिण बंगाल को भेद्य पाना मुश्किल!                             लेखक - अरुण कुणाल  पांचों चुनावी राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में रिकॉर्ड मतदान ने मुकाबले को और भी दिलचस्प बना दिया है। चार राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल का सट्टा बाजार ज्यादा गर्म नजर आ रहा है। अब तक जो रुझान सामने आ रहे हैं, वे बंगाल की जनता की असली बेचैनी को पूरी तरह बयां नहीं कर पा रहे हैं। जमीनी स्तर पर लोगों में बेचैनी जरूर महसूस की जा रही है, लेकिन यह साफ नहीं है कि यह बदलाव की चाहत है या फिर SIR को लेकर नाराजगी का असर है? पीपुल्स पल्स को छोड़कर अधिकांश एग्जिट पोल्स का अनुमान है कि 1975 में जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर चढ़कर नारे लगाने वाली और 1977 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को कोलकाता में काला झंडा दिखाने वाली ममता बनर्जी चुनाव हार रही हैं! वहीं, पीपुल्स पल्स का सर्वे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है, जिसके मुताबिक ममता बनर्...

डिलिमिटेशन बिल पर नार्थ फर्स्ट बनाम साउथ फर्स्ट : क्या महिला आरक्षण की बोतल से निकलेगा परिसीमन का जिन्न?

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डिलिमिटेशन बिल पर नार्थ फर्स्ट बनाम साउथ फर्स्ट : क्या महिला आरक्षण की बोतल से निकलेगा परिसीमन का जिन्न?                              लेखक- अरुण कुणाल  भारतीय राजनीति में कई बार बड़े सुधार वन प्लस वन पैकेज के रूप में सामने आते हैं, जहां एक लोकप्रिय और व्यापक समर्थन वाले मुद्दे के साथ एक जटिल और विवादित विषय भी जोड़ दिया जाता है। आज महिला आरक्षण और डिलिमिटेशन का समीकरण कुछ ऐसा ही संकेत दे रहा है। महिला आरक्षण बिल के साथ डिलिमिटेशन ऑफर आधी आबादी के की राह में रोड़ा बन गया है! संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र के दौरान तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए जाने प्रस्तावित हैं, जो महिला आरक्षण के साथ -साथ भारत के प्रतिनिधित्व तंत्र को नया रूप दे सकते हैं। इन विधेयकों में संविधान (131वां संशोधन) बिल, परिसीमन बिल 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल शामिल हैं। महिला आरक्षण बिल , जिसे औपचारिक रूप से ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ कहा जाता है, लंबे समय से लंबित एक ऐतिहासिक सुधार माना जा रहा है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओ...

वेस्ट बंगाल चुनाव से पहले महिला आरक्षण पर संसद का विशेष सत्र: बंगाल की 'आधी आबादी' पर TMC और बीजेपी का ‘चुनावी ममता’!

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वेस्ट बंगाल चुनाव से पहले महिला आरक्षण पर संसद का विशेष सत्र: बंगाल की 'आधी आबादी' पर TMC और बीजेपी का ‘चुनावी ममता’!                           लेखक – अरुण कुणाल 16 अप्रैल से संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाया गया है, जिसमें महिला आरक्षण बिल और डिलिमिटेशन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा प्रस्तावित है। यह समय-चयन अपने आप में राजनीतिक संकेतों से भरा हुआ है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया अपने निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है, क्या यह सत्र वास्तव में नीतिगत सुधार के लिए है, या फिर चुनावी रणनीति का एक सुनियोजित हिस्सा? विपक्ष की मांग थी कि यह विशेष सत्र पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद आयोजित किया जाए, ताकि इसे चुनावी प्रभाव से अलग रखा जा सके, लेकिन सत्ता पक्ष इस पर अड़ा रहा। जब देश की राजनीति में लगभग हर बड़ा निर्णय चुनावी गणित से प्रभावित होता है, तो बंगाल चुनाव के पहले चरण के मतदान से ठीक पहले महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे को संसद में लाना महज संयोग नहीं माना जा सकता। गौरतलब है ...

होर्मुज़ संकट पर इस्लामाबाद टॉक: अस्थायी राहत या स्थायी अनिश्चितता?

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  होर्मुज़ संकट पर इस्लामाबाद टॉक: अस्थायी राहत या स्थायी अनिश्चितता?                           लेखक - अरुण कुणाल पश्चिम एशिया में बीते 40 दिनों से जारी तनाव के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मोड़ आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा की है, जिस पर ईरान और इज़राइल दोनों ने सहमति जताई है। 10-11 अप्रैल को इस्लामाबाद में दोनों पक्षों की बैठक होगी, जिसकी मध्यस्थता पाकिस्तान कर रहा है! यह सीज़फायर ऐसे समय में आया है जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया था। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन को लेकर 40 दिनों तक जारी राष्ट्रीय शोक के आखिरी दिन सीज़फायर की घोषणा, यानी 40 दिन का युद्ध और 40 दिन का शोक, महज़ संयोग है या प्रयोग? गौरतलब है कि 28 फरवरी 2026 को अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद ईरान में 40 दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था। डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ संघर्ष विरा...

असम चुनाव में 'ज़ुबीन गर्ग फैक्टर' : बीजेपी का विजय रथ डिरेल होगा या जीत का लगेगा हैट्रिक?

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असम चुनाव में 'ज़ुबीन गर्ग फैक्टर' : बीजेपी का वि जय रथ डिरेल होगा या जीत का लगेगा हैट्रिक?                           लेखक – अरुण कुणाल असम विधानसभा चुनाव कई मायनों में दिलचस्प और बहुस्तरीय होता जा रहा है। एक ओर जहां हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी तीसरी बार सत्ता में वापसी की ओर बढ़ती दिख रही है! वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दों का ऐसा मिश्रण तैयार किया है, जो चुनावी समीकरणों को उलट भी सकता है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा ट्रम्प कार्ड ‘ज़ुबीन गर्ग फैक्टर’ है, जो पारंपरिक चुनावी गणित को चुनौती देता नजर आ रहा है। असम के तमाम चुनावी सर्वे के अनुसार मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी न केवल मजबूत स्थिति में है, बल्कि हैट्रिक लगाने जा रही है। सर्वे में बीजेपी और उसके सहयोगियों को विधानसभा की 126 सीटों में लगभग 90–98 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। तमाम सर्वे को गलत ठहराते हुए कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को असम की जिम्मेदारी देकर अपना सबकुछ झोंक दिया है। माना जा रहा है क...

डोनाल्ड ट्रम्प का एकतरफा सीजफायर, पीएम मोदी का "टीम इंडिया" का नारा : खाड़ी संकट को बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का इंतज़ार!

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डोनाल्ड ट्रम्प का एकतरफा सीजफायर, पीएम मोदी का "टीम इंडिया" का नारा  : खाड़ी संकट को बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का इंतज़ार!                              लेखक - अरुण कुणाल  पिछले एक माह से जारी ईरान–इज़राइल संघर्ष ने केवल क्षेत्रीय स्थिरता को ही नहीं हिलाया, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाज़ार और कूटनीतिक समीकरणों को भी उलट-पुलट कर दिया है। इस उथल-पुथल के बीच भारत एक दिलचस्प स्थिति में खड़ा दिखाई देता है, जहां आपदा अवसर में बदलता हुआ नज़र आ रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि अमेरिका और भारत सहित होर्मुज़ स्ट्रेट संकट से प्रभावित तमाम देश “बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने” का इंतज़ार कर रहे हैं। एक ओर डोनाल्ड ट्रंप के सीजफायर प्रस्ताव और शांति प्रयासों की चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी सेना अपनी सबसे प्रभावशाली और तेज प्रतिक्रिया देने वाली यूनिट्स में से एक 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के करीब 1,000 सैनिकों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भेजने की योजना बना रही है। यह कूटनीति और सैन्य तैयारी के उस दोहरे संतुलन को दर...