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अथ श्री बिहार कथा : नीतीश का शिंदेकरण, बीजेपी का मगध फतह और निशांत की सियासी एंट्री!

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  अथ श्री बिहार कथा : नीतीश का शिंदेकरण, बीजेपी का मगध फतह और निशांत की सियासी एंट्री!                              लेखक – अरुण कुणाल भारतीय राजनीति में सत्ता परिवर्तन कभी भी केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होता, वह रणनीति, समय-निर्धारण और शक्ति-संतुलन का परिणाम होता है। बिहार की मौजूदा सियासत भी इसी तरह के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। यदि हाल के घटनाक्रमों को जोड़कर देखा जाए तो ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी का वर्षों पुराना ‘मगध फतह’ का सपना अब साकार होने की दिशा में बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी है और इस संभावना को मजबूत कर दिया है कि राज्य में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बन सकता है। नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने तीन दशकों से अधिक समय तक सत्ता और विपक्ष दोनों में रहकर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखी। लेकिन राजनीति का स्वभाव ही ऐसा है कि समय के साथ समीकरण बदलते रहते हैं। यदि वास्तव में उन्हे...

खाड़ी क्षेत्र का संकट : जियो-पॉलिटिक्स, तेल का खेल और भारत की मौन कूटनीति की दुविधा!

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  खाड़ी क्षेत्र का संकट : जियो-पॉलिटिक्स, तेल का खेल और भारत की मौन कूटनीति की दुविधा!                             लेखक - अरुण कुणाल  पश्चिम एशिया एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठा है। ईरान, इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तेज़ी से बढ़ते सैन्य टकराव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ता तनाव अब सिर्फ दो देशों के बीच का झगड़ा नहीं रहा। ईरान, इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच टकराव ने पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है। इस समूचे परिदृश्य में भारत एक जटिल कूटनीतिक दुविधा के केंद्र में खड़ा है। युद्ध की आग अब भारत के दरवाज़े तक पहुँच चुकी है। हिन्द महासागर में ईरानी युद्धपोत के डूबने को सिर्फ़ युद्ध जनित कार्रवाई कहकर टाल देना भारत की रणनीतिक भूल होगी। अमेरिका ने भारत के इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में भाग लेकर लौटते हुए सिर्फ़ एक ईरानी जहाज़ को नहीं, भारत की प्रतिष्ठा को निशाना बनाया है। इस मुद्दे पर भारत की ख़ामोशी कूटनीति नहीं, बल्कि मौन सहमति मानी जाएगी। ईरान–इज़रायल–अमेरिक...

धनबाद का चुनावी T-20 मुकाबले में बागी गुट का दबदबा : मेयर की कुर्सी पर संजीव सिंह का कब्जा!

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धनबाद का चुनावी T-20 मुकाबले में बागी गुट का दबदबा : मेयर की कुर्सी पर संजीव सिंह का कब्जा!                              ले 0- अरुण कुणाल  लगता है धनबाद की जनता ने फिल्म 'मकबूल' का मशहूर संवाद—"शक्ति का संतुलन ज़रूरी है, आग के लिए पानी का डर बने रहना चाहिए", को सचमुच आत्मसात कर लिया है। मेयर चुनाव में संजीव सिंह की शानदार जीत, खासकर ढुलू महतो के गढ़ में बढ़त हासिल करना, इसी “संतुलन” की राजनीतिक अभिव्यक्ति प्रतीत होती है। यह परिणाम संकेत देता है कि लोकतंत्र में एकतरफा वर्चस्व के बजाय संतुलित शक्ति-समीकरण को मतदाता अधिक सुरक्षित मानते हैं। अर्थात लोकतंत्र में “आग” कितनी भी प्रचंड क्यों न हो, “पानी” का भय बना रहना ही उसकी असली गारंटी है। कोयला नगरी में यह जीत केवल एक पद पर कब्ज़ा नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक वापसी के रूप में भी देखी जा रही है, जहाँ “सिंह मेंशन” का पुराना प्रभाव पुनः चर्चा में है। धनबाद में अब सिर्फ कोयले की आग नहीं, राजनीति की तपिश भी बढ़ने वाली है। संकेत साफ हैं, संजीव सिंह अब केवल नगर राजनीति तक स...

धनबाद मेयर चुनाव राजनीतिक का नया प्रयोगशाला: झरिया और बाघमारा के बीच शक्ति -संतुलन की निर्णायक जंग!

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धनबाद मेयर चुनाव राजनीतिक का नया प्रयोगशाला:  झरिया और बाघमारा के बीच शक्ति -संतुलन की निर्णायक जंग!                          लेखक - अरुण कुणाल  झारखण्ड निकाय चुनाव का शोर थम चुका है, पर सियासत की सरगर्मी अभी बाकी है। प्रचार का औपचारिक दौर खत्म हो गया है और मुकाबला अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। धनबाद की फिज़ा में भाषणों और नारों की गूंज भले ही शांत हो गई हो, लेकिन सत्ता की असली जंग अब परदे के पीछे लड़ी जा रही है। जनसंपर्क की जगह धनबल की खामोश हलचल आज देर रात तक जारी रहने की संभावना है और उसकी फुसफुसाहट बूथ स्तर तक साफ़ सुनाई दे रही है। एक दौर था जब ‘मिनी बम्बई’ कहलाने वाला धनबाद सचमुच दौलत की रफ़्तार से पहचाना जाता था! कहा जाता था, यहाँ पैसा हवा में उड़ता है। वक्त बदला, कोयले की चमक फीकी पड़ी, धंधा-पानी पहले जैसा नहीं रहा। आज ‘धंधे’ के नाम पर अवैध कोयला व्यापार फल-फूल रहा है, और बाजार BCCL के मजदूरों को मिलने वाले दिवाली–दुर्गापूजा बोनस पर टीका हुआ हैं। लेकिन विडंबना देखिए, चुनावी मौसम आते ही ‘उड़ता हुआ पैसा...

भारत–अमेरिका ट्रेड डील : भारत फर्स्ट, अमेरिका फर्स्ट या “एप्सटीन फाइल्स” फर्स्ट?

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  भारत–अमेरिका ट्रेड डील : भारत फर्स्ट, अमेरिका फर्स्ट या “एप्सटीन फाइल्स” फर्स्ट? लेखक -अरुण कुणाल  भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर बहस केवल टैरिफ़ और टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं रही। सवाल अब यह भी है कि इस सौदेबाज़ी की असली प्राथमिकता क्या है? वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के इस उथल-पुथल भरे दौर में भारत–अमेरिका व्यापार संबंध सिर्फ़ आयात–निर्यात का मामला नहीं रहे, वे रणनीतिक संतुलन, तकनीकी वर्चस्व और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का आईना बन चुके हैं। एक ओर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यूनाइटेड स्टेट्स है, तो दूसरी ओर सबसे तेज़ी से उभरती हुई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल इंडिया है! ऐसे में जब “ट्रेड डील” की बात होती है, तो सवाल उठता है कि इस समझौते में किसका गर्दन किसके हाथ में है? भारत -अमेरिका ट्रेड डील को लेकर असमंजस तब ज्यादा बढ़ जाता है जब विदेश मंत्री एस जय शंकर और वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल सवाल का जवाब देने की बजाय पासिंग द बॉल गेम खेलते नज़र आते है! ट्रेड डील को लेकर ट्रम्प सरकार का हर रोज जिस तरह से बयान आ रहे है, उससे भारत के उद्योग जगत और किसानों के बीच निराशा...

राहुल गांधी के “ग्रिप, चोक और टैप” वाला राजनीतिक दांव के खिलाफ बीजेपी का सब्सटेंटिव मोशन!

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राहुल गांधी के “ग्रिप, चोक और टैप” वाला राजनीतिक दांव  के खिलाफ बीजेपी का सब्सटेंटिव मोशन!                             लेखक- अरुण कुणाल जिस तरह मोबाइल कंपनियाँ अपने नए मॉडल “Pro” और “Plus” वर्ज़न में लाती हैं, उसी तरह मोदी सत्ता भी अब “अपग्रेडेड” संसदीय रणनीति पर दिख रही है। राहुल गांधी के खिलाफ प्रिविलेज मोशन की जगह सब्सटेंटिव मोशन की तैयारी, यह बताता है कि सत्ता पक्ष सीधा मुकाबला चाहता है। संसद में राहुल गांधी का “ग्रिप, चोक और टैप” वाला राजनीतिक दांव चर्चा में रहा, और अब बीजेपी उसका काट खोज रही है। प्रिविलेज मोशन में कमेटी बनती, जाँच होती और रिपोर्ट के बाद जवाब का मौका मिलता, जिससे मामला पलट भी सकता था, लेकिन सब्सटेंटिव मोशन में सीधी बहस और वोटिंग होने से सत्ता पक्ष के लिए “अपर हैंड” रहेगा। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे न सिर्फ सब्सटेंटिव मोशन की बात कर रहे हैं, बल्कि एक कदम आगे बढ़कर राहुल गांधी पर चुनाव लड़ने की पाबंदी की मांग भी उठा रहे हैं। अब गेंद स्पीकर के पाले में है और सत्ता के “चाणक्य” राजनीतिक लाभ-हानि ...

एपस्टीन जांच कंप्रोमाइज्ड : मैक्सवेल की खामोशी और लोकतांत्रिक भरोसे का संकट!

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एपस्टीन जांच कंप्रोमाइज्ड: मैक्सवेल की खामोशी और लोकतांत्रिक भरोसे का संकट!                              ले o- अरुण कुणाल एपस्टीन की पूर्व प्रेमिका और सबसे करीबी सहयोगी रहीं घिसलेन मैक्सवेल ने अमेरिकी कांग्रेस (हाउस ओवरसाइट कमेटी) के सामने गवाही देने से इनकार कर दिया। करीब साढ़े तीन मिनट का जो वीडियो सार्वजनिक किया गया, उसने अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में निराशा पैदा की। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों दलों के सांसदों ने इसे जांच में रुकावट बताया। मैक्सवेल जैसी मुख्य आरोपी से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह एपस्टीन नेटवर्क के उन अंधे कोनों पर रोशनी डालेंगी, जिन तक अब तक कानून नहीं पहुंच पाया है। मैक्सवेल ने अपने पांचवें संशोधन (Fifth Amendment) के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कहा कि वह ऐसे किसी भी सवाल का जवाब नहीं देंगी, जिससे उन्हें खुद को अपराधी ठहराने का खतरा हो। समिति टेक्सास की संघीय जेल से वीडियो कॉन्फ़्रेंस के ज़रिए उनकी गवाही लेना चाहती थी, लेकिन हर सवाल पर उन्हें एक ही जवाब मिला-खामोशी! मैक्सवेल के इस र...