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असम चुनाव में 'ज़ुबीन गर्ग फैक्टर' : बीजेपी का विजय रथ डिरेल होगा या जीत का लगेगा हैट्रिक?

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असम चुनाव में 'ज़ुबीन गर्ग फैक्टर' : बीजेपी का वि जय रथ डिरेल होगा या जीत का लगेगा हैट्रिक?                           लेखक – अरुण कुणाल असम विधानसभा चुनाव कई मायनों में दिलचस्प और बहुस्तरीय होता जा रहा है। एक ओर जहां हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी तीसरी बार सत्ता में वापसी की ओर बढ़ती दिख रही है! वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दों का ऐसा मिश्रण तैयार किया है, जो चुनावी समीकरणों को उलट भी सकता है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा ट्रम्प कार्ड ‘ज़ुबीन गर्ग फैक्टर’ है, जो पारंपरिक चुनावी गणित को चुनौती देता नजर आ रहा है। असम के तमाम चुनावी सर्वे के अनुसार मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी न केवल मजबूत स्थिति में है, बल्कि हैट्रिक लगाने जा रही है। सर्वे में बीजेपी और उसके सहयोगियों को विधानसभा की 126 सीटों में लगभग 90–98 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। तमाम सर्वे को गलत ठहराते हुए कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को असम की जिम्मेदारी देकर अपना सबकुछ झोंक दिया है। माना जा रहा है क...

डोनाल्ड ट्रम्प का एकतरफा सीजफायर, पीएम मोदी का "टीम इंडिया" का नारा : खाड़ी संकट को बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का इंतज़ार!

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डोनाल्ड ट्रम्प का एकतरफा सीजफायर, पीएम मोदी का "टीम इंडिया" का नारा  : खाड़ी संकट को बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का इंतज़ार!                              लेखक - अरुण कुणाल  पिछले एक माह से जारी ईरान–इज़राइल संघर्ष ने केवल क्षेत्रीय स्थिरता को ही नहीं हिलाया, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाज़ार और कूटनीतिक समीकरणों को भी उलट-पुलट कर दिया है। इस उथल-पुथल के बीच भारत एक दिलचस्प स्थिति में खड़ा दिखाई देता है, जहां आपदा अवसर में बदलता हुआ नज़र आ रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि अमेरिका और भारत सहित होर्मुज़ स्ट्रेट संकट से प्रभावित तमाम देश “बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने” का इंतज़ार कर रहे हैं। एक ओर डोनाल्ड ट्रंप के सीजफायर प्रस्ताव और शांति प्रयासों की चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी सेना अपनी सबसे प्रभावशाली और तेज प्रतिक्रिया देने वाली यूनिट्स में से एक 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के करीब 1,000 सैनिकों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भेजने की योजना बना रही है। यह कूटनीति और सैन्य तैयारी के उस दोहरे संतुलन को दर...

धुरंधर: द रिवेंज — मैजिक में लॉजिक नहीं होता!

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            धुरंधर: द रिवेंज — मैजिक में लॉजिक नहीं होता!                           लेखक: अरुण कुणाल स्पाई-थ्रिलर धुरंधर-2 ने सिनेमाघरों में दस्तक के साथ ही बॉक्स ऑफिस और फिल्म मेकिंग के पुराने पैमानों को चुनौती दे रहा है। फिल्म की भारी सफलता के चलते मुंबई के प्रतिष्ठित मराठा मंदिर सिनेमाघर में शाहरुख खान और काजोल की 30 साल से चल रही आइकॉनिक रोमांटिक ड्रामा फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' के शो का पहली बार समय बदल दिया गया है! धुरंधर-2 ने ओपनिंग डे पर 145.55 करोड़ का शानदार कलेक्शन कर अबतक के सारे रिकार्ड्स तोड़ दिए है। करीब 3 घंटे 45 मिनट लंबी यह फिल्म दर्शकों को एक ऐसे सिनेमाई अनुभव में ले जाती है, जहां मनोरंजन और बहस दोनों साथ-साथ चलते हैं। दिलचस्प यह है कि इस फिल्म के लिए अब पारंपरिक फिल्म क्रिटिक्स की भूमिका सीमित होती दिख रही है! क्योंकि हर दर्शक खुद को एक समीक्षक मानकर थिएटर से बाहर निकल रहा है। फिल्म को लेकर सबसे बड़ा द्वंद्व “मैजिक बनाम लॉजिक” का है। एक वर्ग इसकी सिनेमैटिक भव्यता, ...

बीजेपी का महामहिम मुर्मू कार्ड और मिथुन का ममता को ICU की धमकी के बीच पश्चिम बंगाल चुनाव का शंखनाद : क्या ममता बनर्जी बचा पायेंगी अपना किला?

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बीजेपी का महामहिम मुर्मू कार्ड और मिथुन का ममता को ICU की धमकी के बीच पश्चिम बंगाल चुनाव का शंखनाद:     क्या ममता बनर्जी बचा पायेंगी अपना किला?                          लेo - अरुण कुणाल   पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनाव से पहले “खेला” शब्द महज एक नारा नहीं, बल्कि रणनीति, प्रतीक और मनोविज्ञान का हिस्सा बन चुका है। पिछले विधानसभा चुनाव में “खेला होबे” के नारे ने जिस तरह सियासी माहौल को गर्म किया था, उसी तरह एक बार फिर चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही बंगाल की राजनीति में बयान, प्रतीक और पहचान की राजनीति तेज हो गई है।  बंगाल में चुनावी राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां चुनाव से काफी पहले ही माहौल गर्म हो जाता है। बयानबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और प्रतीकों की राजनीति इस प्रक्रिया का हिस्सा बन जाती है। इस बार सियासी बहस के केंद्र में घुसपैठ, SIR का मुद्दा, बीजेपी का “महामहिम मुर्मू कार्ड” और मिथुन चक्रवर्ती का ममता बनर्जी को लेकर दिया गया “ICU” वाला विवादित बयान जैसे बड़े मुद्दे हैं, जिन पर तृणमूल कांग्...

बीजेपी का "मगध" फतह : नीतीश का "शिंदेकरण" या "धनखड़ीकरण"?

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बीजेपी का "मगध" फतह :   नीतीश का "शिंदेकरण" या "धनखड़ीकरण"?                             लेखक – अरुण कुणाल कभी नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए कहा था कि नीतीश ने उनके आगे से खाने की थाली छीन ली थी। उस थाली की कीमत मुख्यमंत्री की कुर्सी होगी, यह तो नीतीश बाबू ने सपने में भी नहीं सोचा होगा। बिहार चुनाव के बाद नीतीश कुमार आईना साफ करते रह गए और जिस चेहरे पर मगध की लड़ाई लड़ी गई थी, उसी चेहरे को ‘मो’शा’ ने बदल दिया। बिहार चुनाव के समय नारा लगा था — “25 से 30 फिर से नीतीश।” लेकिन तीन महीने बाद ही बहादुर शाह ज़फ़र का मशहूर शेर याद आ गया! कल कहीं "बिहार के ज़फ़र" न कह दें —कितना है बद-नसीब ‘नीतीश’ राज करने के लिए, दो साल भी न मिली कू-ए-बिहार में… भारतीय राजनीति में सत्ता परिवर्तन कभी भी केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होता, वह रणनीति, समय-निर्धारण और शक्ति-संतुलन का परिणाम होता है। बिहार की मौजूदा सियासत भी इसी तरह के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। यदि हाल के घटनाक्रमों को जोड़कर देखा ज...

ईरान–इज़रायल–अमेरिका टकराव: तीसरे विश्व युद्ध की आहट, तेल का खेल और भारत की मौन-नीति की दुविधा!

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  ईरान–इज़रायल–अमेरिका टकराव: तीसरे विश्व युद्ध की आहट, तेल का खेल और  भारत की मौन-नीति की दुविधा!                             लेखक - अरुण कुणाल  पश्चिम एशिया एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठा है। ईरान, इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तेज़ी से बढ़ते सैन्य टकराव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ता तनाव अब सिर्फ दो देशों के बीच का झगड़ा नहीं रहा। ईरान, इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच टकराव ने पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है। इस समूचे परिदृश्य में भारत एक जटिल कूटनीतिक दुविधा के केंद्र में खड़ा है। युद्ध की आग अब भारत के दरवाज़े तक पहुँच चुकी है। हिन्द महासागर में ईरानी युद्धपोत के डूबने को सिर्फ़ युद्ध जनित कार्रवाई कहकर टाल देना भारत की रणनीतिक भूल होगी। अमेरिका ने भारत के इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में भाग लेकर लौटते हुए सिर्फ़ एक ईरानी जहाज़ को नहीं, भारत की प्रतिष्ठा को निशाना बनाया है। इस मुद्दे पर भारत की ख़ामोशी कूटनीति नहीं, बल्कि मौन सहमति मानी जाएगी। चा...

धनबाद का चुनावी T-20 मुकाबले में बागी गुट का दबदबा : मेयर की कुर्सी पर संजीव सिंह का कब्जा!

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धनबाद का चुनावी T-20 मुकाबले में बागी गुट का दबदबा : मेयर की कुर्सी पर संजीव सिंह का कब्जा!                              ले 0- अरुण कुणाल  लगता है धनबाद की जनता ने फिल्म 'मकबूल' का मशहूर संवाद—"शक्ति का संतुलन ज़रूरी है, आग के लिए पानी का डर बने रहना चाहिए", को सचमुच आत्मसात कर लिया है। मेयर चुनाव में संजीव सिंह की शानदार जीत, खासकर ढुलू महतो के गढ़ में बढ़त हासिल करना, इसी “संतुलन” की राजनीतिक अभिव्यक्ति प्रतीत होती है। यह परिणाम संकेत देता है कि लोकतंत्र में एकतरफा वर्चस्व के बजाय संतुलित शक्ति-समीकरण को मतदाता अधिक सुरक्षित मानते हैं। अर्थात लोकतंत्र में “आग” कितनी भी प्रचंड क्यों न हो, “पानी” का भय बना रहना ही उसकी असली गारंटी है। कोयला नगरी में यह जीत केवल एक पद पर कब्ज़ा नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक वापसी के रूप में भी देखी जा रही है, जहाँ “सिंह मेंशन” का पुराना प्रभाव पुनः चर्चा में है। धनबाद में अब सिर्फ कोयले की आग नहीं, राजनीति की तपिश भी बढ़ने वाली है। संकेत साफ हैं, संजीव सिंह अब केवल नगर राजनीति तक स...