बीजेपी का महामहिम मुर्मू कार्ड और मिथुन का ममता को ICU की धमकी के बीच पश्चिम बंगाल चुनाव का शंखनाद : क्या ममता बनर्जी बचा पायेंगी अपना किला?



बीजेपी का महामहिम मुर्मू कार्ड और मिथुन का ममता को ICU की धमकी के बीच पश्चिम बंगाल चुनाव का शंखनाद: 

   क्या ममता बनर्जी बचा पायेंगी अपना किला?

                         लेo - अरुण कुणाल 


पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनाव से पहले “खेला” शब्द महज एक नारा नहीं, बल्कि रणनीति, प्रतीक और मनोविज्ञान का हिस्सा बन चुका है। पिछले विधानसभा चुनाव में “खेला होबे” के नारे ने जिस तरह सियासी माहौल को गर्म किया था, उसी तरह एक बार फिर चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही बंगाल की राजनीति में बयान, प्रतीक और पहचान की राजनीति तेज हो गई है। 

बंगाल में चुनावी राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां चुनाव से काफी पहले ही माहौल गर्म हो जाता है। बयानबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और प्रतीकों की राजनीति इस प्रक्रिया का हिस्सा बन जाती है। इस बार सियासी बहस के केंद्र में घुसपैठ, SIR का मुद्दा, बीजेपी का “महामहिम मुर्मू कार्ड” और मिथुन चक्रवर्ती का ममता बनर्जी को लेकर दिया गया “ICU” वाला विवादित बयान जैसे बड़े मुद्दे हैं, जिन पर तृणमूल कांग्रेस हमलावर रुख अपनाती नजर आ रही है।

बीजेपी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को एक बड़े राजनीतिक प्रतीक के रूप में सामने रखने की रणनीति अपनाई है। चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का पश्चिम बंगाल में कार्यक्रम आयोजित कराए जाने और उसमें ममता बनर्जी के शामिल न होने के मुद्दे को प्रमुखता से उठाकर बीजेपी आदिवासी वोट बैंक से इसे जोड़ने और राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश करती दिख रही है।

दरअसल, यह पूरा मामला पिछले सप्ताह सिलीगुड़ी में आयोजित एक आदिवासी सम्मेलन से जुड़ा है, जहां कथित प्रोटोकॉल उल्लंघन को लेकर राष्ट्रपति और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच टकराव की स्थिति बन गई थी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बागडोगरा एयरपोर्ट पर उनके स्वागत के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी या राज्य सरकार के किसी वरिष्ठ मंत्री की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए थे। इसके अलावा कार्यक्रम स्थल में अंतिम समय पर किए गए बदलाव को लेकर भी उन्होंने नाराजगी जताई थी।

पश्चिम बंगाल में आदिवासी आबादी लगभग 6 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है, लेकिन कई विधानसभा सीटों पर यह वोट निर्णायक भूमिका निभाता है। झारग्राम, पुरुलिया, बांकुरा और पश्चिम मेदिनीपुर जैसे जिलों में आदिवासी मतदाताओं का प्रभाव काफी मजबूत है। 2021 के चुनाव में भी इन इलाकों में बीजेपी को उल्लेखनीय बढ़त मिली थी। अब बीजेपी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि केंद्र की राजनीति में आदिवासी समाज को जो सम्मान मिला है, वह उसी की पहल का परिणाम है।

इसी बीच बीजेपी के स्टार प्रचारक मिथुन चक्रवर्ती के एक बयान से बीजेपी को बैकफुट पर ला दिया है । दरअसल, एक चुनावी कार्यक्रम के दौरान मिथुन चक्रवर्ती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंच से ममता बनर्जी पर तीखा हमला करते हुए कहा - “मैं तुम्हें पहले से ही आगाह कर रहा हूं। एक बार हाथ टूटा है, तो एक बार पैर, लेकिन इस बार हो सकता है कुछ और ही टूट जाए। इसलिए उसके लिए तैयार रहना। हो सकता है तुम्हें ICU में भी भर्ती होना पड़ जाए और ज़रा सोचो अगर तुम ICU से ही भाषण देने लगो तो वह नज़ारा कैसा होगा।”

मिथुन के इस बयान ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। तृणमूल कांग्रेस इसे राजनीतिक मर्यादा के खिलाफ बताते हुए बीजेपी पर हमला बोल रही है। टीएमसी नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री के मंच से इस तरह की भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करता है और इसे बंगाल की राजनीतिक संस्कृति पर हमला करार दिया है ।

यहां यह भी याद रखना चाहिए कि बिहार में वोटर्स अधिकार यात्रा के दौरान कांग्रेस के मंच से एक छोटे कार्यकर्त्ता द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां को लेकर की गई अभद्र टिप्पणी का मुद्दा काफी उछला था। उस समय बीजेपी ने इसे बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था और उस विवाद का नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ा। इसी वजह से माना जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस भी मिथुन के बयान को आसानी से हाथ से जाने नहीं देगी, वह भी तब, जब यह बयान बीजेपी के एक बड़े चेहरे द्वारा प्रधानमंत्री के मंच से दिया गया हो।

ममता की राजनीति की खासियत यह रही है कि वह किसी भी विवाद को तुरंत राजनीतिक मुद्दे में बदल देती हैं। ममता बनर्जी का पलटवार केवल मिथुन दा के बयान का जवाब नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक नैरेटिव की लड़ाई का हिस्सा है, जो बंगाल की राजनीति में लगातार चल रही है। उनका कहना है कि बंगाल की जनता ऐसी राजनीति को स्वीकार नहीं करेगी, जिसमें धमकी और डर का माहौल बनाने की कोशिश हो। ममता ने यह भी आरोप लगाया कि बीजेपी बंगाल में ध्रुवीकरण और टकराव की राजनीति को बढ़ावा दे रही है।

पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों पर दो चरणों में मतदान होना है। पहले चरण में 152 सीटों पर 23 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे, जबकि दूसरे चरण में 142 सीटों पर 29 अप्रैल को मतदान होगा। चुनाव के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। सरकार बनाने के लिए 148 सीटों के जादुई आंकड़े की जरूरत होती है। पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 213 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। बीजेपी 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी थी। वहीं कांग्रेस और वाम दल एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हो पाए थे।

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। पार्टी 294 में से 291 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि 3 सीटें अपने सहयोगी भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (BGPM) को दी गई हैं। ममता बनर्जी एक बार फिर भवानीपुर सीट से चुनाव लड़ेंगी। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम और भवानीपुर, दोनों सीटों से चुनाव लड़ा था, जिसमें नंदीग्राम से उन्हें भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा, जबकि भवानीपुर से उन्होंने जीत हासिल की थी।

दिलचस्प बात यह है कि इस बार शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम के साथ-साथ भवानीपुर सीट से भी चुनावी मैदान में उतरकर मुकाबले को और सीधे तौर पर ममता बनर्जी बनाम शुभेंदु अधिकारी की लड़ाई बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं ममता दीदी का केवल एक सीट से मैदान में उतरना उनकी बदली हुई चुनावी रणनीति और अधिक केंद्रित राजनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।

दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी भी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतर चुकी है। पार्टी जानती है कि बंगाल में टीएमसी को चुनौती देना आसान नहीं है। इसलिए वह अलग-अलग स्तरों पर रणनीति बना रही है! एक तरफ आदिवासी पहचान के जरिए समर्थन जुटाने की कोशिश, दूसरी तरफ ममता सरकार पर भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर हमला कर रही हैं।

पिछले 15 वर्षों से सत्ता में रहने के कारण ममता बनर्जी की सरकार के खिलाफ स्वाभाविक रूप से कुछ हद तक एंटी-इनकंबेंसी की चर्चा भी हो रही है। बीजेपी इसी विरोधी लहर को भुनाने की कोशिश में लगी हुई है। पिछले चुनाव में जो कमी रह गई थी, उसे इस बार SIR के जरिए पूरा किया जा सकता है।

चुनाव आयोग द्वारा की गई “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” (SIR)  के तहत करीब 63 लाख मतदाताओं के नाम वोटर सूची से हटाए जाने की बात सामने आई है। इस मुद्दे ने भी सियासी बहस को तेज कर दिया है। बीजेपी का दावा है कि यह प्रक्रिया चुनावी पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है, जबकि विपक्षी दलों का आरोप है कि इसके जरिए मतदाता सूची को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

वोट शेयर के आंकड़े भी इस मुकाबले को बेहद दिलचस्प बनाते हैं। पश्चिम बंगाल में बीजेपी का वोट शेयर लगभग 38 प्रतिशत और तृणमूल कांग्रेस का करीब 45 प्रतिशत माना जाता है। पिछले लोकसभा चुनाव में सीटों का अंतर जरूर था, लेकिन वोटों का अंतर केवल सात प्रतिशत का था। कई सीटों पर जीत और हार का अंतर बेहद कम रहा था, इसलिए 63 लाख मतदाताओं का नाम कटने के बाद इस बार हर वोट की अहमियत और बढ़ गई है।

बंगाल में चुनाव की घोषणा के साथ ही प्रशासनिक स्तर पर बड़ा कदम उठाते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी और कोलकाता पुलिस कमिश्नर समेत कई शीर्ष अधिकारियों का तबादला कर दिया। यह कार्रवाई आदर्श आचार संहिता लागू होने के कुछ ही घंटों के भीतर की गई, जिसे आयोग ने निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जरूरी बताया है।

इस फैसले पर ममता बनर्जी ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर इन तबादलों को “एकतरफा, मनमाना और आश्चर्यजनक” बताया। उनका कहना है कि इतने अहम प्रशासनिक फैसले से पहले राज्य सरकार से कोई परामर्श नहीं किया गया और न ही अधिकारियों का पैनल मांगा गया। ममता बनर्जी ने इसे संघीय ढांचे और स्थापित प्रशासनिक परंपराओं का उल्लंघन बताते हुए संकेत दिया है कि इस मुद्दे पर केंद्र और राज्य के बीच टकराव बढ़ सकता है।

एक समय बंगाल की राजनीति पर राज करने वाला वाम मोर्चा आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक सत्ता में रहने वाला वाम मोर्चा पिछले दशक में लगभग राजनीतिक हाशिए पर पहुंच चुका है। 2011 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे को करीब 39 प्रतिशत वोट मिले थे। लेकिन पिछले चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद उसका वोट शेयर घटकर लगभग 4.73 प्रतिशत रह गया। यह गिरावट बंगाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत देती है।

कांग्रेस की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। ज्योति बसु के उदय से पहले दशकों तक बंगाल पर शासन करने वाली कांग्रेस अब राज्य में अपना राजनीतिक आधार फिर से खड़ा करने के लिए संघर्ष कर रही है। इस बार पार्टी ने वाम मोर्चे से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। हालांकि मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया जैसे जिलों में कांग्रेस का कुछ पारंपरिक प्रभाव अभी भी बना हुआ है, लेकिन पूरे राज्य में उसे एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करना आसान नहीं होगा।

जहां तक राहुल गांधी का सवाल है, तो पिछली बार की तरह इस बार भी उनके पश्चिम बंगाल चुनाव से दूरी बनाए रखने और असम व केरल जैसे राज्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की संभावना जताई जा रही है। राहुल गांधी की अनुपस्थिति में कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व इतना प्रभावी नजर नहीं आता कि वह अपने दम पर पार्टी के लिए सम्मानजनक वोट हासिल कर सके।

कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल में चुनावी खेला नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी के बीच है। एक तरफ बीजेपी प्रतीकों, बयानों और रणनीतिक मुद्दों के जरिए ममता बनर्जी को चुनौती देने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस इन मुद्दों को ही पलटवार का हथियार बनाकर बीजेपी को घेरने में जुटी है। मिथुन चक्रवर्ती का बयान, महामहिम मुर्मू के नाम पर आदिवासी कार्ड, SIR विवाद और एंटी-इनकंबेंसी, ये सभी कारक इस चुनाव को बेहद दिलचस्प बना रहे हैं।

आखिरकार यह सियासी खेल जनता के बीच ही तय होगा। बंगाल के मतदाता हमेशा से राजनीतिक रूप से जागरूक माने जाते हैं और वे अक्सर अंतिम समय में ऐसा फैसला करते हैं, जो तमाम राजनीतिक समीकरणों को बदल देता है। पिछले चुनाव का “दीदी ओ दीदी” वाला बयान हो या इस बार "दीदी को ICU" में भेजने की बात, बंगाल की जनता भली-भांति समझती है कि यह सब उस बड़े चुनावी मुकाबले की झलक भर है, जिसकी असली तस्वीर 4 मई को नतीजों के साथ साफ हो जाएगी।

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