धनबाद मेयर चुनाव: भाजपा की बगावत, इंडिया गठबंधन में दरार, ढुलू महतो और संजीव सिंह के बीच सत्ता-संतुलन की जंग!
धनबाद मेयर चुनाव: भाजपा की बगावत, इंडिया गठबंधन में दरार
*ढुलू महतो और संजीव सिंह के बीच सत्ता-संतुलन की जंग*
लेखक - अरुण कुणाल
कोयला नगरी धनबाद इन दिनों सिर्फ धुएँ से नहीं, सियासी चिंगारियों से भी भरी हुई है। झारखंड का सबसे बड़ा नगर निकाय, धनबाद नगर निगम इस समय एक स्थानीय चुनाव का केंद्र नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक शक्ति-परीक्षण का मैदान बन चुका है। कोयला नगरी धनबाद में मेयर चुनाव ने सियासी तापमान को इस हद तक बढ़ा दिया है कि यह मुकाबला अब विकास बनाम विकास का नहीं, बल्कि गुट बनाम गुट का संघर्ष प्रतीत हो रहा है। कोयला नगरी के नाम से मशहूर धनबाद में सियासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं!
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि झारखंड में निकाय चुनाव औपचारिक रूप से दलीय आधार पर नहीं हो रहे, फिर भी हर प्रमुख दल ने इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है। विशेषकर भाजपा के लिए यह चुनाव अपने ही गढ़ में संगठनात्मक एकता की परीक्षा बन गया है। भाजपा ने मेयर पद के लिए प्रदेश कार्यसमिति सदस्य संजीव कुमार अग्रवाल को अधिकृत प्रत्याशी बनाया है। लेकिन पार्टी के ही वरिष्ठ नेता और झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह के बागी उम्मीदवार के तौर पर खड़ा होने से सारा समीकरण बदल गया है!
संजीव सिंह दिवंगत विधायक सूरजदेव सिंह के पुत्र और वर्तमान झरिया की विधायक रागिनी सिंह के पति हैं। संजीव सिंह के अलावा भाजयुमो के पूर्व जिलाध्यक्ष मुकेश पांडेय और भाजपा नेता भृगुनाथ भगत भी चुनाव लड़ रहे हैं। राज्य के पार्टी नेतृत्व द्वारा मनाने की कोशिश नाकाम रहने पर तीनों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। भाजपा समर्थित उम्मीदवार को विपक्ष से कम, अपने ही असंतुष्ट नेताओं से ज्यादा चुनौती मिल रही है।
इस सियासी भूचाल की शुरुआत पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल से हुई, जिन्होंने नामांकन के बाद भाजपा छोड़कर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का दामन थाम लिया। अब वे झामुमो के समर्थन से चुनावी मैदान में हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान भी वे भाजपा उम्मीदवार ढुलू महतो के खिलाफ कांग्रेस से टिकट चाहते थे, पर तब बात नहीं बनी। इस बार उन्होंने सीधी सियासी बाजी खेलने का निर्णय लिया है।
धनबाद मेयर चुनाव में “जयराम फैक्टर” की चर्चा चरम पर है! पिछले झारखंड विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर समीकरण बदलने वाले जयराम महतो अब इस मुकाबले में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। ढुलू महतो के धुर विरोधी समझे जाने वाले जयराम ने पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल के विकास कार्यों की सराहना कर सियासी पारा बढ़ा दिया है।
दिलचस्प यह कि उनकी पार्टी झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) ने मेयर पद के लिए प्रकाश महतो को उम्मीदवार बनाया है। इसके बावजूद जयराम का झुकाव या परोक्ष समर्थन अग्रवाल की ओर जाता है, तो मुकाबला त्रिकोणीय से सीधे निर्णायक लड़ाई में बदल सकता है।
धनबाद की यह जंग सतह पर भले ही भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी संजीव कुमार अग्रवाल और बागी उम्मीदवार संजीव सिंह के बीच दिखाई देती हो, पर असली दांव कहीं और लगा है। इस चुनाव में केवल मेयर की कुर्सी तय नहीं होगी, बल्कि स्थानीय सत्ता-संतुलन का भविष्य भी तय होगा और सांसद ढुलू महतो इसके केंद्र में हैं!
सच यह है कि यह मुकाबला ‘अग्रवाल बनाम सिंह’ से अधिक ‘महतो बनाम सिंह’ की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है। धनबाद की राजनीति में वर्षों तक प्रभावशाली रहा ‘सिंह मेंशन’, जिसकी पहचान दिवंगत नेता सूरजदेव सिंह के दौर से जुड़ी रही है, एक बार फिर निर्णायक भूमिका में लौटने की कोशिश कर रहा है। संजीव सिंह की जीत केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं होगी, बल्कि उस राजनीतिक विरासत की वापसी मानी जाएगी जिसने दशकों तक कोयला नगरी की सत्ता संरचना को प्रभावित किया।
ढुलू महतो पिछले दो चुनावों से अपनी पत्नी सावित्री देवी को मेयर बनाने की कोशिश करते रहे। लेकिन इस बार “परिवारवाद” के आरोप और बाघमारा से उनके भाई को विधायक बनाए जाने को लेकर उठे विवाद ने उनकी रणनीति को कमजोर कर दिया। ऐसे माहौल में पीछे हटना एक तरह से राजनीतिक दबाव का परिणाम भी माना जा सकता है।
अब सवाल यह है कि “मेरी पत्नी नहीं तो रागिनी सिंह के पति भी नहीं” जैसी ढुलू महतो की शर्त व्यक्ति-हित की दृष्टि से देखें तो यह एक प्रकार का राजनीतिक या प्रतिशोधात्मक संतुलन है। लेकिन पार्टी-हित के स्तर पर यह रणनीति जोखिमभरी है, क्योंकि इससे संदेश जाता है कि संगठनात्मक निर्णय व्यक्तिगत समीकरणों के आधार पर प्रभावित हो रहे हैं।
स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी की एकजुटता और स्पष्ट रणनीति अधिक महत्वपूर्ण होती है। यदि निर्णय “व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता” के चश्मे से लिए जाते हैं, तो विपक्ष को नैरेटिव गढ़ने का अवसर मिल जाता है, खासकर तब जब परिवारवाद पहले से ही सार्वजनिक विमर्श का विषय हो।
बाघमारा को ढुलू महतो का गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन इस बार संजीव सिंह बागी समर्थकों के दम पर सेंध लगाते दिख रहे हैं। अगर 1–8 वार्ड में से 4 पर भी बढ़त मिल गई, तो यह संजीव सिंह की बड़ी जीत होगी। बाघमारा के अलावा झरिया–धनबाद में बढ़त, सिंदरी में कांटे की टक्कर के साथ संजीव सिंह राजनीति में वापसी करते नज़र आ रहे है! झरिया में परंपरागत राजनीतिक ध्रुवीकरण और धनबाद के अधिकांश वार्डों में यदि संजीव सिंह बेहतर स्थिति में हैं, तो यह शहरी वोटरों में उनकी स्वीकार्यता दर्शाता है।
यही कारण है कि ढुलू महतो के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। लोकसभा में जीत दर्ज कर वे क्षेत्रीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत कर चुके हैं, पर नगर निगम का नियंत्रण अलग किस्म की ताकत देता है, यह सीधे स्थानीय प्रशासन, संसाधनों और जनसंपर्क की धुरी से जुड़ा होता है। यदि मेयर पद ‘सिंह मेंशन’ के हाथों में चला जाता है, तो शक्ति-संतुलन बदल सकता है और महतो खेमे का प्रभाव सीमित हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महतो खेमे की रणनीति स्पष्ट है, संजीव सिंह को हर हाल में मेयर की कुर्सी से दूर रखना। इसके लिए संगठनात्मक अनुशासन, अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में लामबंदी और पर्दे के पीछे सक्रिय राजनीतिक प्रबंधन, सभी उपाय अपनाए जा सकते हैं। चुनाव में धनबल - बाहुबल हर पैतरा आजमाया जा रहा है! क्योंकि आने वाले परिणाम यह तय करेंगे कि कोयला नगरी की कमान किसके हाथ में रहेगी!
दूसरी ओर, संजीव सिंह इस चुनाव को अपनी राजनीतिक पुनर्स्थापना के अवसर के रूप में देख रहे हैं। झरिया की राजनीति से निकलकर धनबाद नगर निगम की सत्ता पर दावा करना दरअसल एक व्यापक संदेश है कि ‘सिंह मेंशन’ अब भी प्रासंगिक है और प्रभावहीन नहीं हुआ है। इस प्रकार धनबाद की यह जंग केवल दो उम्मीदवारों का चुनाव नहीं, बल्कि दो सत्ता-केंद्रों की प्रतिष्ठा का टकराव है। यदि संजीव सिंह जीतते हैं तो इसे ‘वापसी’ के रूप में देखा जाएगा; यदि वे हारते हैं तो यह संकेत होगा कि स्थानीय राजनीति की धुरी बदल चुकी है।
हालाँकि पूर्व मेयर इंदु देवी भी मैदान में हैं, पर असली मुकाबला संजीव सिंह, संजीव कुमार अग्रवाल और चंद्रशेखर अग्रवाल के बीच त्रिकोणीय होता दिख रहा है। अगर भाजपा में भीतरघात सीमित रहा, तो अधिकृत प्रत्याशी संजीव कुमार अग्रवाल को लाभ मिल सकता है। लेकिन भाजपा की आंतरिक गुटबाज़ी और स्थानीय समीकरणों को देखते हुए संजीव सिंह की संभावनाएँ भी कमतर नहीं आंकी जा रहीं है।
झामुमो समर्थित चंद्रशेखर अग्रवाल को भाजपा के भीतर वोटों के बंटवारे का सीधा फायदा मिल सकता है। लेफ्ट का समर्थन पहले से है, और अगर कांग्रेस भी साथ आ गई तो समीकरण पलट सकता है। अगर इंडिया गठबंधन का पुरा सहयोग मिला तो मुकाबला त्रिकोणीय नहीं, सीधा संजीव सिंह बनाम चंद्रशेखर हो जाएगा।
धनबाद का मुकाबला अब “बेस्ट-ऑफ-थ्री” की तर्ज पर दिलचस्प होता जा रहा है। ऊपर से त्रिकोणीय जंग दिख रही है, लेकिन राजनीतिक संदेश साफ है, जिसे जीतना है, उसे संजीव सिंह को हराना होगा। झामुमो समर्थित चंद्रशेखर अग्रवाल पूरी कोशिश में हैं कि मुकाबला त्रिकोणीय न रहकर सीधा आर-पार का हो जाए। क्योंकि अगर “बेस्ट-ऑफ-थ्री” की लड़ाई बनी रही, तो नंबर तीन पर फिसलने का खतरा उन्हीं पर मंडरा सकता है।
गौरतलब है कि धनबाद नगर निगम में 55 वार्ड पार्षद पदों में से 27 महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। कुल 230 महिला प्रत्याशी मैदान में हैं। मेयर पद के लिए 29 उम्मीदवारों में चार महिलाएँ शामिल हैं। पूर्व मेयर इंदु देवी भी चुनाव लड़ रही हैं। महिला मतदाताओं की संख्या और सक्रियता को देखते हुए यह चुनाव पारंपरिक जातीय या गुटीय समीकरणों से आगे बढ़कर सामाजिक प्रतिनिधित्व का संकेत भी दे सकता है।
अगर दांव पर धनबाद का सत्ता-संतुलन हो, तो चुनावी शुचिता अक्सर कठोर परीक्षा से गुजरती है। नगर निगम की बागडोर जिसके हाथ में होगी, वह न केवल विकास योजनाओं की दिशा तय करेगा बल्कि ठेका-प्रबंधन, शहरी संसाधनों और प्रशासनिक निर्णयों की धुरी भी नियंत्रित करेगा।
चुनाव जैसे-जैसे निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है, धनबाद की फिज़ा में सिर्फ़ भाषणों और नारों की गूंज नहीं है, बल्कि रणनीति, संसाधन और शक्ति-प्रदर्शन की आहट भी साफ़ सुनाई दे रही है। कोयला नगरी धनबाद में इस बार मेयर की कुर्सी महज़ एक प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व का प्रतीक बन चुकी है। यह मुकाबला विचारधारा से अधिक प्रभाव और पकड़ की परीक्षा बनता जा रहा है।
इसलिए यह संघर्ष केवल दो या तीन उम्मीदवारों के बीच नहीं है, यह उस प्रश्न का उत्तर खोज रहा है कि धनबाद की सत्ता संरचना किस खेमे के इर्द-गिर्द केंद्रित होगी। परिणाम तय करेंगे कि कोयला नगरी में आने वाले वर्षों तक किसका प्रभाव निर्णायक रहेगा और किसकी सियासी जमीन खिसक जाएगी।
एक समय ‘मिनी बम्बई’ के नाम से मशहूर धनबाद का मेयर चुनाव अब राजनीतिक प्रयोगशाला बन चुका है। ऊपर से यह स्थानीय निकाय की जंग दिखती है, लेकिन भीतर ही भीतर बड़े राजनीतिक समीकरणों की आहट साफ़ सुनाई दे रही है।
महाराष्ट्र के निकाय चुनावों की तरह यहाँ दिल्ली खुलकर मैदान में नहीं दिख रही, पर डोर अब भी दिल्ली के हाथ में ही मानी जा रही है। धनबाद का यह चुनाव इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि यहाँ परिणाम केवल मेयर तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी संकेत देगा कि राष्ट्रीय नेतृत्व का स्थानीय राजनीति पर कितना प्रभाव शेष है और ज़मीनी क्षत्रप कितनी स्वतंत्रता के साथ अपनी बिसात बिछा पा रहे हैं।


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