रेहान - अवीवा का 'कोडक मोमेंट' : गांधी परिवार के प्यार का पंचनामा!
रेहान - अवीवा का 'कोडक मोमेंट' : गांधी परिवार के प्यार का पंचनामा!
ले o - अरुण कुणाल
राजस्थान के रणथंभौर से आ रही रेहान वाड्रा और अवीवा बेग की सगाई की ख़बर ने दिल्ली की सियासी फिज़ा में हलचल पैदा कर दी है। दिलचस्प यह है कि गांधी परिवार से जुड़े रेहान वाड्रा, राजनीति में सक्रिय न होने के बावजूद, अपने मामा राहुल गांधी से एक क़दम आगे निकलते दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी की प्रेम कहानी को लेकर वर्षों से अटकलें लगती रही हैं। कभी महाराष्ट्र चुनाव से पहले शादी की संभावनाएँ जताई गईं, तो कभी उनकी कथित कोलंबियाई गर्लफ्रेंड को लेकर चर्चाएँ हुईं लेकिन बात कभी अंजाम तक नहीं पहुँची।
रेहान–अवीवा के मामले में एक सकारात्मक बात यह रही कि इसे हिंदू–मुस्लिम रंग देने की कोई संगठित कोशिश नहीं हुई। संभव है कि फिलहाल कहीं चुनाव न हों, इसलिए नफ़रती आवाज़ें खामोश रहीं हो। जो भी वजह हो, इस चुप्पी को अच्छा ही कहा जाएगा! क्योंकि किसी के प्रेम को ‘लव जिहाद’ का लेबल देना न केवल ग़लत है, बल्कि समाज को बाँटने वाली मानसिकता को भी उजागर करता है, वह चाहे मामला राजनीतिक परिवार का हो या फ़िल्मी दुनिया का!
रेहान वाड्रा भले ही राजनीति में न हों, लेकिन सियासत उन्हें विरासत में मिली है। गांधी परिवार से ताल्लुक़ रखने वाले किसी भी व्यक्ति की निजी ज़िंदगी को राजनीति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यही वजह है कि रेहान की प्रेम कहानी भी स्वतः ही राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गई है। प्रियंका गांधी को भी सक्रिय राजनीति में आने में काफ़ी समय लगा था! यह परिवार फैसले जल्दबाज़ी में नहीं करता।
अवीवा बेग और रेहान पिछले 7 सालों से रिलेशनशिप में हैं। दोनों पेश से फोटोग्राफर हैं और लाइमलाइट से दूर रहना पसंद करते हैं।रेहान की मंगेतर अवीवा बेग, दिल्ली के व्यवसायी इमरान बेग और जानी-मानी इंटीरियर डिज़ाइनर नंदिता बेग की बेटी हैं। संयोग नहीं कि नंदिता बेग ने ही कांग्रेस मुख्यालय ‘इंदिरा भवन’ का इंटीरियर डिज़ाइन किया है। सूत्रों के मुताबिक प्रियंका गांधी और नंदिता बेग पुरानी दोस्त हैं। इस तरह निजी रिश्ते और सत्ता की डोर एक-दूसरे में उलझी नज़र आती है।
एक दौर था जब लड़कियाँ फ़िल्मी सितारों और खेल जगत के नायकों को अपना आदर्श मानती थीं, उनकी तस्वीर तकिये के नीचे रखकर सोती थीं। लेकिन समय के साथ सोच बदली है। आज ग्लैमर के साथ-साथ पावर भी आकर्षण का केंद्र बन चुकी है। अगर आज किसी युवती के पर्स में किसी राजनेता की तस्वीर मिल जाए, तो इसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।
राजनीति और प्रेम का रिश्ता नया नहीं है। अमेरिका में जॉन एफ. कैनेडी और मर्लिन मुनरो, बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की, फ्रांस में निकोलस सरकोज़ी और कार्ला ब्रूनी, ये सभी किस्से अपने समय में सुर्खियों में रहे। भारत में पंडित नेहरू और एडविना माउंटबेटन के संबंधों की चर्चा दशकों से होती रही है। सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे राजनेताओं के अधिकतर प्रेम प्रसंग कहानी बनते-बनते रह जाते हैं, क्योंकि अंततः राजधर्म सर्वोपरि हो जाता है।
राजनीतिक जीवन में प्रेम की क़ीमत अक्सर चुकानी पड़ती है। राजनीतिक कारणों से ही राजीव गांधी और सोनिया गांधी की शादी से इंदिरा गांधी नाराज़ थीं। यदि संजय गांधी का आकस्मिक निधन न हुआ होता, तो शायद राजीव राजनीति में आते ही नहीं। संजय गांधी का नाम मेनका गांधी से पहले रुख़्साना सुल्ताना के साथ काफ़ी चर्चा में रहा। प्यार था या नहीं, यह कहना मुश्किल है, लेकिन उस दौर में पार्टी के भीतर रुख़्साना का प्रभाव स्पष्ट था।
राजनीति में कुर्बानी की परंपरा पुरानी है। सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन यह तय है कि सत्ता के लिए लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं। प्यार अगर बंद कमरे तक सीमित रहे तो ठीक, लेकिन जब वह राजनीति पर हावी होने लगे, तो उसे कुर्बान करने में भी नेताओं को कोई हिचक नहीं होती।
पंडित नेहरू और एडविना माउंटबेटन के संबंधों पर बहुत कुछ लिखा गया है। इसकी प्रमाणिकता पर बहस होती रही, लेकिन माउंटबेटन की बेटी पामेला ने अपनी पुस्तक इंडिया रिमेम्बर्ड में इन रिश्तों को स्वीकार कर धुंधली तस्वीर को साफ़ किया। पामेला के अनुसार, दोनों आत्मिक रूप से जुड़े थे। उन्होंने शारीरिक संबंधों से इंकार किया, लेकिन इस प्रेम कहानी को अमर बना दिया।
इस कड़ी में अगला नाम आता है भाजपा के भीष्म पितामह अटल बिहारी वाजपेयी का। उनका नाम कॉलेज के दिनों की मित्र राजकुमारी कौल से जोड़ा जाता रहा। विवाह न करने के सवाल पर वाजपेयी का प्रसिद्ध उत्तर—“मैं अविवाहित हूँ, कुंवारा नहीं”, यह भारतीय राजनीति की सबसे मार्मिक स्वीकारोक्तियों में से एक है।
जब प्रेम कथाओं की बात हो रही हो, तो भारतीय राजनीति के ‘मोस्ट एलिजिबल बैचलर’ राहुल गांधी का ज़िक्र न हो, यह कैसे संभव है। कॉलेज के दिनों की दोस्ती, विदेशी प्रेमिका और राजनीतिक मजबूरियाँ, राहुल की प्रेम कहानी सार्वजनिक होकर भी अधूरी है। राजनीति के जानकार मानते हैं कि सोनिया गांधी की स्वीकृति इस राह की सबसे बड़ी बाधा रही है।
राजनीति के लिए सोनिया ने प्रधानमंत्री की कुर्सी त्याग दी, कहीं राहुल को अपनी गर्लफ्रेंड से हाथ न धोना पड़े। हालांकि कांग्रेसी नेता इस तरह की खबरों को महज़ अफवाह बता रहे है लेकिन राहुल आखिर किस लड़की के इंतजार में बैठे हैं, इसका जवाब किसी के पास नही है ?
रणथंभौर की इस प्रेम कथा के बहाने सचिन पायलट और सारा अब्दुल्ला की कहानी भी याद आती है। लंदन में शुरू हुआ प्रेम, परिवारों की सियासी आपत्तियों से टकराया और अंततः शादी तक पहुँचा। राजनीति ने पहले उन्हें अलग करने की कोशिश की और बाद में उसी राजनीति ने उनके रिश्ते पर भारी क़ीमत वसूली।
कश्मीर की राजनीति के लिए फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला ने इस शादी से साफ इंकार कर दिया था। जब सहमति के सारे दरवाजे बंद हो गए तो सचिन और सारा ने दुनिया की परवाह न करते हुए शादी कर ली। उनकी शादी में अब्दुल्ला परिवार की तरफ से कोई शामिल नहीं हुआ था। काफ़ी समय बाद अब्दुल्ला परिवार सचिन पाइलट को स्वीकार किया।
ये अलग बात है कि जिस राजनीति वजह से उमर अब्दुल्ला अपनी बहन सारा और सचिन के प्रेम कहानी का विलेन बन गए थे, आज उसी सियासत के कारण उमर अपने प्यार से महरूम है। उमर अब्दुल्ला का नाम एक टीवी जर्नलिस्ट के साथ जोड़ा जाता है। उमर की प्रेम कहानी सबको पता है पर सियासी मजबूरी के कारण वे शादी नहीं कर पा रहे है।
सार्वजनिक जीवन को “खुली किताब” बताने वाले राजनेता अपनी लव लाइन हमेशा छुपाकर रखते हैं। राहुल गांधी इसका बड़ा उदाहरण हैं। ऐसे में रेहान वाड्रा का अपने रिश्ते को खुले तौर पर स्वीकार करना न केवल अलग है, बल्कि काफ़ी हद तक सराहनीय भी। शायद यही वजह है कि यह सगाई सिर्फ़ एक पारिवारिक ख़बर नहीं, बल्कि राजनीति में प्यार के पंचनामे की एक नई इबारत बन गई है।


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