एपस्टीन फाइल्स और भारत: आरोप और अफ़वाहों के बीच 19 दिसंबर को सियासी सुनामी के संकेत!
एपस्टीन फाइल्स और भारत : आरोप और अफ़वाहों के बीच 19 दिसंबर को सियासी सुनामी के संकेत!
ले o- अरुण कुणाल
जेफरी एपस्टीन मामला मूलतः अमेरिका का एक आपराधिक प्रकरण था, लेकिन समय के साथ यह वैश्विक सत्ता, रसूख़ और नैतिकता की परीक्षा बन गया। यह जो 19 दिसंबर, 2025 की डेटलाइन सुर्खियों में है, उसका कारण यह है कि अमेरिका में एक नया कानून (Epstein Files Transparency Act) पास हुआ है, और उसके तहत जेफरी एपस्टीन से जुड़ी सरकारी फाइलों को सर्वजनिक किया जाएगा! 19 दिसंबर को एपस्टीन केस से जुड़ी फाइलों के सार्वजनिक होने की चर्चा ने भारत में भी राजनीतिक और मीडिया हलकों में हलचल पैदा कर दी है। सवाल उठ रहे हैं! जब भारत का नाम किसी आधिकारिक आरोप में नहीं है, तो फिर यहाँ बेचैनी क्यों?
एपस्टीन फाइल्स का दायरा अब महज़ दस्तावेज़ों तक सीमित नहीं रह गया है। बताया जा रहा है कि लगभग 300 जीबी डेटा में शामिल करीब 80 हज़ार तस्वीरें सार्वजनिक होने वाली हैं। यह खुलासा अपने संभावित प्रभाव में पनामा पेपर्स और भारत में सामने आई बिड़ला–सहारा डायरी जैसी घटनाओं की याद दिलाता है, जिन्होंने सत्ता, पूंजी और गोपनीय सौदों के गठजोड़ को उजागर कर राजनीतिक हलकों में भूचाल ला दिया था।
अब तक सामने आए बड़े नामों में ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रयू (ड्यूक ऑफ़ यॉर्क), अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, डोनाल्ड ट्रम्प, न्यू मैक्सिको के पूर्व गवर्नर बिल रिचर्डसन, दिवंगत और माइकल जैक्सन शामिल हैं। उम्मीद की जा रही है कि आने वाली सूचियों में किसी भारतीय नेता, राजनयिक या उद्योगपति का नाम उजागर न हो। क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो चाहे वह नाम मात्र संदर्भ के तौर पर ही क्यों न हो, एक संकेत भी सियासी तूफान का रूप ले सकता है, जहाँ तथ्य से पहले नैरेटिव हावी हो जाता है।
अमेरिका में डेमोक्रेट सांसदों ने जेफरी एपस्टीन के एस्टेट से बरामद लगभग 80 हज़ार तस्वीरों में से 19 नई तस्वीरें सार्वजनिक की हैं। इन तस्वीरों में डोनाल्ड ट्रम्प, पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और ब्रिटेन के पूर्व प्रिंस एंड्रू दिखाई देते हैं। जारी की गई तस्वीरों में एक तस्वीर विशेष रूप से चर्चा में है, जिसमें ट्रम्प के चेहरे वाला एक ‘नॉवेल्टी कंडोम’ नजर आता है, जिस पर इसकी कीमत साढ़े चार डॉलर लिखी हुई है।
हालांकि इन तस्वीरों को किसी भी प्रकार के कैप्शन, तारीख़ या संदर्भ के बिना जारी किया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि ये तस्वीरें कब, कहाँ और किन परिस्थितियों में ली गई थीं। संदर्भ के अभाव में इनका तथ्यात्मक और कानूनी महत्व तय करना फिलहाल मुश्किल है, लेकिन इनकी सार्वजनिकता ने एपस्टीन केस से जुड़े राजनीतिक विवाद को एक बार फिर तेज़ कर दिया है।
अब तक मिले जानकारी के अनुसार भारत के किसी उद्योगपति या नेता का नाम “एपस्टीन फाइल्स” में सीधे तौर पर आरोप या सबूत के तौर पर नहीं आया है। हालांकि इस बारे में बहुत सारी अफ़वाहें, सोशल मीडिया के दावे और आंशिक रिपोर्ट्स चल रही हैं, जिनमें नाम लिए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें विश्वसनीय स्रोतों द्वारा पुष्टि नहीं मिली है।
कुछ मीडिया और वेबसाइटों पर दावा हुआ है कि जेफरी एपस्टीन के दस्तावेज़ में भारत के एक बड़े नेता का नाम या उनके बारे में नोट्स हैं, लेकिन कोई आधिकारिक प्रकाशित रिकॉर्ड या भरोसेमंद समाचार एजेंसी ने इसे पुष्टि नहीं की है। ऐसे दावे अक्सर अनाधिकृत टैबलॉइड या ख़बर वेबसाइटों पर दिखाई देते हैं। इसी तरह कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि दस्तावेज़ों में भारतीय राजनयिक के ईमेल या बातचीत के संदर्भ का दावा किया जा रहा है।
अमेरिकी मीडिया में प्रकाशित कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, एपस्टीन फाइल्स में भारत के एक नेता की मुख्य भूमिका है। मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि एक ई-मेल में उस भारतीय नेता का नाम सामने आता है, जिसमें वह लिखता है—“गर्ल्स, सावधान, मैं फिर से अपनी पुरानी बुरी आदतें दोहराने वाला हूँ।”
इस कथन की प्रामाणिकता पर फिलहाल कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है और यह कहना मुश्किल है कि इसमें कितनी सच्चाई है। लेकिन इतना तय है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का हालिया ‘धमकी भरा’ बयान—जिसमें उन्होंने इशारों-इशारों में कहा कि फाइलें खुलीं तो कई बड़े नाम बेनकाब होंगे, इन अफवाहों को और हवा दे रहा है।ऐसे में सवाल यह नहीं है कि नाम किसका है, सवाल यह है कि क्या एपस्टीन फाइलें सत्ता के उन चेहरों को बेनकाब करेंगी, जो अब तक गोपनीयता और प्रभाव की आड़ में बचे रहे।
एक मीडिया रिपोर्ट में भरोसेमंद स्रोतों के हवाले से दावा किया गया है कि भारतीय मूल के लेखक का नाम ईमेल एक्सचेंज में देखा गया है, जिसमें उसने एपस्टीन को एक समाचार लिंक भेजा था लेकिन उसके खिलाफ कोई क्रिमिनल आरोप नहीं हैं, और बातचीत में केवल जानकारी या सूचना का आदान-प्रदान था। इससे कोई ग़लत काम का सबूत नहीं मिलता है। इसके बावजूद, कुछ अमेरिकी रिपोर्ट्स, सोशल मीडिया पोस्ट्स और कथित ई-मेल्स के हवाले से “भारत के एक बड़े नेता” का नाम उछाले जाने लगे हैं। यहीं से तथ्य और अफ़वाह की रेखा धुंधली होती दिखती है।
एपस्टीन की असली ताक़त उसकी अंतरराष्ट्रीय पहुँच थी। वह केवल एक अपराधी नहीं, बल्कि फाइनेंस, राजनीति और ग्लैमर के वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा था। अमेरिका, यूरोप और कैरेबियन तक फैले उसके संपर्कों में प्रभावशाली लोग शामिल रहे। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि जब “फाइल्स खुलने” की बात आती है, तो दुनिया के हर बड़े लोकतंत्र में चिंता पैदा होती है और भारत भी इसका अपवाद नहीं।
जेफरी एपस्टीन पर मुख्य रूप से नाबालिगों की यौन तस्करी और यौन शोषण से जुड़े गंभीर आरोप थे। वह एक दोषी ठहराया गया यौन अपराधी था, जिसकी अगस्त 2019 में न्यूयॉर्क की मैनहट्टन जेल में रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई। लेकिन एपस्टीन की मौत के साथ कहानी खत्म नहीं हुई। आज भी उसका ‘भूत’ उसके चाहने वालों और सत्ता के गलियारों का पीछा नहीं छोड़ रहा है।
इस विवाद को और हवा तब मिली जब ट्रम्प से दोस्ती टूटने के बाद एलन मस्क ने सार्वजनिक मंच पर यह आरोप लगाया कि डोनाल्ड ट्रम्प का नाम एपस्टीन फाइलों में है और इसी वजह से फाइलें रोकी गईं। मस्क ने कोई सबूत पेश नहीं किया, लेकिन उनके बयान ने ट्रम्प और एपस्टीन के पुराने सामाजिक संबंधों की याद दिला दी।
ट्रम्प ने 2002 में न्यूयॉर्क मैगज़ीन को दिए साक्षात्कार में एपस्टीन को “शानदार व्यक्ति” कहा था और यह भी बताया था कि वे उसे 15 वर्षों से जानते हैं। बाद के वर्षों में ट्रम्प ने एपस्टीन से दूरी बनाने की बात कही, और आज तक ऐसा कोई सार्वजनिक साक्ष्य सामने नहीं आया है जो ट्रम्प की किसी अवैध गतिविधि में संलिप्तता सिद्ध करे।
भारत के संदर्भ में यही पैटर्न दोहराया जा रहा है। कुछ रिपोर्ट्स में कथित ई-मेल का ज़िक्र किया गया है, जिसमें “गर्ल्स, सावधान…” जैसे मेल का दावा किया जा रहा है। इन दावों की न तो आधिकारिक पुष्टि है और न ही स्वतंत्र सत्यापन। बावजूद इसके, कई बार यह केवल सामाजिक संपर्क, औपचारिक मुलाक़ात या तीसरे पक्ष के बयान का हिस्सा होता है। लेकिन भारतीय राजनीति में, जहाँ नैरेटिव तेज़ी से बनते और टूटते हैं, वहाँ “संकेत” भी सुर्ख़ी बन जाता है।
यहाँ मीडिया और पाठकों दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि कानूनी सावधानी बरती जाए। आरोप लगाना आसान है, लेकिन बिना प्रमाण किसी व्यक्ति या देश को जोड़ देना न केवल अनुचित है, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श को भी नुकसान पहुँचाता है। एपस्टीन फाइल्स का उद्देश्य पारदर्शिता हो सकता है, लेकिन पारदर्शिता का अर्थ अधूरी जानकारी से निष्कर्ष निकालना नहीं होता।

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