धर्मेंद्र देओल : द मैन, द मिथ, द लीजेंड ऑफ़ बॉलीवुड

 



धर्मेंद्र देओल : द मैन, द मिथ, द लीजेंड ऑफ़ बॉलीवुड


                               ले o- अरुण कुणाल 


धर्मेन्द्र जी के साथ भारतीय सिनेमा का एक स्वर्णिम अध्याय जैसे धीमे से किताब में समा गया। सोशल मीडिया पर उन्हें लेकर असंख्य स्मृतियाँ तैरती दिखीं, तो आज उनके जन्मदिन के बहाने मेरे मन में भी वही पुरानी उजली रोशनी लौट आई! वे संवाद, वह सादगी, वह अपनापन…धर्मेंद्र सिर्फ़ अभिनेता नहीं थे, एक युग थे। आज उन्हें याद करना, मानो अपने ही किसी बीते पल को छू लेना हो।


देओल परिवार को मैंने बहुत करीब से देखा है। लगभग तीन साल तक उनके साथ काम किया और उस दौरान मैं सनी देओल के ज़्यादा करीब रहा। यह वह समय था जब देओल फैमिली लगभग फिल्मों से बाहर मान ली गई थी। होम प्रोडक्शन के अलावा किसी निर्माता-निर्देशक का फोन नहीं आता था। धरम जी इक्का-दुक्का फिल्मों में कैरेक्टर रोल करते थे,पर सनी और बॉबी—दोनों के पास काम का गहरा सूनापन था। इसी दौर में उन्होंने फिल्म ‘अपने’ और ‘यमला पागल दीवाना’ बनाई और हिट भी हुईं, लेकिन सफलता के बावजूद परिस्थितियाँ नहीं बदलीं। तभी सनी देओल को एहसास हुआ कि अब मीडिया–फ्रेंडली होना पड़ेगा। अक्सर मीडिया से दूरी बनाए रखने वाला देओल परिवार पहली बार मीडिया मैनेजमेंट की अहमियत समझने लगा। वह संघर्ष, वह विनम्रता, वह चुप्पी, आज भी याद है।


जो देओल परिवार कभी फिल्म प्रमोशन पर ध्यान नहीं देता था, जो मानता था कि अच्छी फिल्म अपनी राह खुद बना लेती है, वही परिवार धीरे-धीरे मीडिया के महत्व को समझने लगा। यह बदलाव मैंने अपनी आँखों से देखा। स्थिति यहाँ तक आ गई थी कि बिना किसी फिल्म के भी धरम जी और सनी देओल इंटरव्यू देने को तैयार रहते थे! सिर्फ इसलिए कि उनकी मौजूदगी दर्शकों के बीच बनी रहे।


सनी देओल जब किसी निजी काम से भी पंजाब या दिल्ली आते थे, तो मेरे फोन पर कॉल ज़रूर आता था कि ‘कुछ इंटरव्यू लाइनअप कर दो।’ एक दौर था जब देओल परिवार स्क्रीन पर छाया रहता था, और फिर एक दौर आया जब उन्हें स्क्रीन पर लौटने के लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ा। उस यात्रा के उतार-चढ़ाव मैंने बहुत करीब से महसूस किए हैं।


उस दौर का एक किस्सा आज भी मेरे ज़ेहन में जस का तस है। मैंने अभी-अभी देओल परिवार का काम संभालना शुरू ही किया था कि ‘सिर मुंडाते ही ओले पड़ गए।’ चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर एक फोटो जर्नलिस्ट ने सनी देओल और डिंपल कपाड़िया की तस्वीर क्लिक कर ली। उसी शाम सनी के मीडिया मैनेजर बीना आहूजा का फोन आया! आवाज़ में घबराहट साफ झलक रही थी- ‘वह फोटो किसी भी अखबार में नहीं छपनी चाहिए! किसी भी हाल में रोकवाना होगा… वरना काम हाथ से गया समझो।’


मेरे पास तब सीमित अनुभव था और उतना बड़ा गुडविल भी नहीं।फिर भी मैंने चंडीगढ़ के कई मीडिया हाउस को फोन करके रिक्वेस्ट की, समझाया, मनाया—जितना हो सकता था, उतना किया। उधर सनी देओल साइड से लगातार कॉल आते रहे—‘किससे बात की? क्या कहा? सब ठीक रहेगा न?’ दो दिन तक तनाव बना रहा। और जब अगले दो दिनों में किसी भी अखबार में सनी–डिंपल की वह फोटो नहीं छपी, तब जाकर राहत की साँस ली। तभी एहसास हुआ कि शायद भरोसा और मेहनत—यहीं से शुरू होते हैं।


मेरी दूसरी परीक्षा फिल्म यमला पगला दीवाना -2 के समय दिल्ली में हुईं थी! आज भी नोएडा के GIP मॉल में फिल्म प्रमोशन का वह हंगामा याद है। भीड़ पूरी तरह काबू से बाहर हो गई थी। सनी देओल ने इशारा किया कि पहले धर्मेंद्र जी को बाहर निकालो। जैसे ही मैं उन्हें बाहर लेकर गया, लोग बैरिकेड तोड़कर अंदर घुस आए। भीड़ के बीचों-बीच धर्मेंद्र जी थे, उनके पीछे सनी देओल, बॉबी देओल और फिल्म की हीरोइन। लोग उन्हें छूने, उनका हाथ पकड़ने की कोशिश कर रहे थे — पूरा माहौल पागलपन जैसा था। बड़ी मुश्किल से हम उन्हें सुरक्षित बाहर ले जा पाए। उस वक़्त उनके बिल्कुल पास, एक ढाल की तरह चलते हुए — यह दृश्य आज भी मेरी यादों में ताज़ा है।


काम तो मैंने बॉलीवुड के लगभग सभी बड़े फिल्म सितारों के साथ किया है, लेकिन देओल परिवार के साथ मेरा लगाव हमेशा कुछ अलग ही रहा। इसका सबसे बड़ा कारण था—धरम जी में मुझे हमेशा अपने पिता की छवि नजर आती थी। उनकी चाल, उनका व्यवहार, उनकी मुस्कान, सबमें मुझे अपने पापा की झलक दिखती थी।


मुझे आज भी याद है, पहली बार जब मैंने धरम जी के साथ अपनी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की, तो मेरी बहन ने मज़ाक में कहा—‘तूने पापा के साथ फोटो डाल दी और उसे धर्मेंद्र की बता रहे हो!’ यह बात सुनकर मैं हँसा भी… और भीतर कहीं भावुक भी हो गया। शायद यही वजह थी कि देओल परिवार मेरे लिए सिर्फ फिल्म स्टार्स नहीं बल्कि एक अपनापन, एक पारिवार सम्बन्ध सा लगता था।


हमारे परिवार और रिश्तेदारों में एक किस्सा बड़ा मशहूर है—मेरे पिता और धर्मेंद्र जी के बीच अद्भुत समानता को लेकर। एक बार मेरी बुआ की सास, धर्मेंद्र जी की फिल्म देखकर लौटीं और हँसते हुए बोलीं—‘तुम्हारा भाई तो डबल कमाता है, डॉक्टर भी है और एक्टर भी!’ जब इस बात का जिक्र होता पूरा घर ठहाकों से भर जाता था। शायद इसी वजह से, जब पहली बार मैंने धर्मेंद्र जी को अपने सामने खड़ा देखा, तो मैं उनसे अपनी नज़रें हटा ही नहीं पाया। चेहरे की बनावट, आँखों का भाव, यहाँ तक कि मुस्कराने का अंदाज़, सबमें मुझे अपने पिता की परछाई दिखती थी।


धरम जी अक्सर अपने गाँव साहनेवाल के रेलवे पुल पर खड़े होकर ‘फ्रंटियर मेल’ को गुजरते देखते थे—उसी धुएँ, उसी गड़गड़ाहट में उन्होंने मुंबई जाने का सपना बुना था। कभी-कभी सोचता हूँ, काश मेरे पापा के गाँव से भी कोई ‘फ्रंटियर मेल’ गुजरती। अगर गुजरती भी, तो भी शायद पापा मुंबई नहीं जा पाते। क्योंकि दादाजी की असमय मृत्यु के बाद सिर्फ 19 साल की उम्र में परिवार का पूरा बोझ उनके कंधों पर आ गिरा था। दो सगी बहनें, छह चचेरी बहनें और तीन छोटे भाई की जिम्मेदारी—एक पूरा घर, एक पूरा कुटुंब, उनके साहस और त्याग पर टिक गया था।


धरम जी ने सपनों की तरफ दौड़ लगाने का मौका पाया, मेरे पापा ने जिम्मेदारियों की तरफ। एक ‘फ्रंटियर मेल’ मुंबई ले गई, दूसरी को शायद लेना ही नहीं था। पापा पहले परिवार के हो गए और फिर वामपंथी आंदोलन के। जब धरम जी को देखता हूँ, तो सिर्फ स्टार नहीं दिखते—अपने पापा का वो चेहरा दिखता है जो सपने तो देख सकता था …लेकिन जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता था! 


मेरे पापा डॉ. मृणाल का असली नाम ‘देव चंद्र’ है। छात्र जीवन से ही लेफ़्ट आंदोलन से जुड़े होने के कारण वे अपना उपनाम बदलकर लेख लिखा करते थे। जनवादी लेखक संघ से जुड़े मोहम्मद इसराइल ने ही उनका नाम ‘मृणाल’ रखा था और फिर वही नाम उनकी पहचान बन गया। पापा से जुड़ी बचपन की कई यादें आज भी ताजा हैं। वे अक्सर हफ्ते-दो हफ्ते के लिए अचानक गायब हो जाते थे। घर में बेचैनी रहती, लेकिन सवाल पूछने की उम्र भी कहाँ थी। माँ जब मुझे साथ लेकर किसी ज्योतिष के पास जातीं, तो वह अक्सर एक ही बात कहता—‘उत्तर दिशा में गए हैं… कुछ दिनों में लौट आएंगे।’ और भरोसे की बात यह कि पापा सचमुच लौट भी आते थे। मगर लौटकर कभी कुछ बताते नहीं थे—बस वही शांत मुस्कान, वही गूढ़ चुप्पी। 


जब बड़े हुए, तब जाकर समझ आया कि उत्तर दिशा में नेपाल है। और पापा वहाँ कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग देने जाया करते थे। यह जानकर बचपन के उन ‘गायब हो जाने’ वाले दिनों को नई रोशनी मिली—और पापा एक साधारण पिता से बढ़कर एक विचार, एक संघर्ष, एक प्रतिबद्धता के रूप में दिखाई देने लगे। आज जब धर्मेंद्र जी की सादगी और मेरे पापा की त्यागमयी छवि कभी-कभी एक-दूसरे से मिलती है, तो महसूस होता है कि हीरो सिर्फ पर्दे पर नहीं होते बल्कि कई बार वे साधारण घरों की उस खामोश जिम्मेदारी में भी जन्म लेते हैं।


बॉलीवुड के ही-मेन धर्मेंद्र जी से फिल्म ‘यमला पगला दीवाना’ और ‘टेल मी ओ खुदा’ के दौरान मुझे करीब से मिलने और काम करने का सौभाग्य मिला। उनका अपनापन, उनकी सादगी, उनकी गर्मजोशी—स्टारडम के उस मोहक आवरण से कहीं ज़्यादा कीमती थी। उन पलों को आज भी याद करता हूँ तो महसूस होता है कि कभी-कभी ज़िंदगी सिर्फ अवसर ही नहीं देती—स्मृतियों के रूप में आशीर्वाद भी देती है।


जब वीरू की बातें हों और जय का ज़िक्र न आए—यह भला कैसे हो सकता है! धरम जी से मुलाक़ात से बहुत पहले, मेरी यादगार पल अमिताभ बच्चन से जुड़ी है! फ़िल्म ‘तीन पत्ती’ का दौर तो बाद में आया, उससे पहले 1984 की एक याद है, जो आज भी मेरे भीतर ज्यों की त्यों बसी हुई है। उस समय मैं तोपचांची में जूनियर स्कूल में पढ़ता था। धनबाद में चुनाव प्रचार के लिए राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन के आने की खबर फैल गई थी। मैं दो दोस्तों के साथ एक ट्रक में बैठकर रैली में पहुँच गया। दिल में केवल एक ही ख्वाहिश—‘अमिताभ को सामने से देख लूँ!’ भीड़ में धक्कामुक्की करते हुए मैं स्टेज के बिल्कुल पास तक पहुँच गया, लेकिन वहां पहुँचकर पता चला कि बच्चन साहब तो आए ही नहीं। भीड़ जुटाने के लिए उनका नाम सिर्फ एक अफवाह की तरह उछाला गया था। 


उस दिन मैं बहुत उदास मन से घर वापस आया था! लेकिन किस्मत को कुछ और मंज़ूर था। लगभग 26 साल बाद, फ़िल्म तीन पत्ती के दौरान गुड़गाँव के होटल लीला में मैं पहली बार बच्चन साहब के सामने खड़ा था। उनका वह रौब, वह शालीनता—सब कुछ सामने था। और मैं… बिल्कुल ठगा-सा, सन्न-सा। समझ ही नहीं आया कि क्या कहूँ, क्या करूँ। तभी उन्होंने खुद आगे बढ़कर हाथ बढ़ाया—वह गर्माहट, वह सम्मान…मेरे बचपन की टूटी हुई उम्मीद पर जैसे किसी ने फिर से सुनहरी पट्टी चिपका दी हो।


होटल की लॉबी से लेकर ग्रीन रूम तक हम लगभग सौ कदम साथ चले होंगे। सौ कदम तो याद हैं—पर क्या बातें हुईं, वह आज तक ठीक से याद नहीं। शायद उस पल की चमक ने शब्दों को धुंधला कर दिया था। कभी-कभी ज़िंदगी इतनी फिल्मी हो जाती है कि लगता है जैसे दर्शक हम नहीं, कहानी हमें देख रही हो।


वापस वीरू पर आते है! धर्मेंद्र जी का सपना था कि शोले पार्ट-2 बने, और उन्होंने कई इंटरव्यू में इसका ज़िक्र भी किया था। अफसोस, शोले जैसी फिल्म फिर बन ही नहीं सकती — धर्मेंद्र जी के बिना शोले की कल्पना भी असंभव है।


धरम जी की मुस्कान, उनकी शालीनता और उनका मानवीय स्पर्श हमेशा मेरे दिल में जिंदा रहेंगे। आज भी मुझे उनके हाथ का अपने कंधे पर रखा हुआ एहसास होता है। उनके साथ बिताया हर पल मेरे लिए एक अनमोल खज़ाना है।


हैप्पी बर्थडे धर्म जी — द मैन, द मिथ, द लीजेंड ऑफ़ बॉलीवुड 🙏


#HappyBdayDharmji

#Dharmendra

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