खाड़ी युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट संकट : बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का इंतज़ार!
खाड़ी युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट संकट : बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने का इंतज़ार!
ईरान–इज़राइल संघर्ष के 23 दिन बाद संसद में पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा यह स्वीकार करना कि खाड़ी संकट भविष्य में कोविड जैसी चुनौती बन सकता है, और उसके बाद सर्वदलीय बैठक करना, एक महत्वपूर्ण संकेत देता है। यह दर्शाता है कि सरकार इस खतरे को केवल सैन्य संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक बहुआयामी आर्थिक-सामाजिक संकट के रूप में देख रही है। अगर खाड़ी संकट सच में कोविड जैसी व्यापक चुनौती बनता है, तो भारत के लिए असली परीक्षा तब होगी जब उसे ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और कूटनीति के बीच संतुलन बनाना मुश्किल पड़ेगा।
पश्चिम एशिया में जारी ईरान–इज़राइल संघर्ष ने केवल क्षेत्रीय स्थिरता को ही नहीं हिलाया, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाज़ार और कूटनीतिक समीकरणों को भी उलट-पुलट कर दिया है। इस उथल-पुथल के बीच भारत एक दिलचस्प स्थिति में खड़ा दिखाई देता है, जहां संकट, अवसर में बदलता हुआ नजर आ रहा है।
बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रम्प को लग रहा था ईरान संकट का समाधान 2-4 दिन में निकल जाएगा। लेकिन ईरान उनकी उम्मीदों पर पानी के साथ -साथ तेल भी फेर रहा है। अगर यह युद्ध लंबा खींचा तो इजराइल और अमेरिका अकेले पड़ जाएंगे। ट्रम्प की धमकी के बावजूद नाटो देश वेट एंड वॉच की नीति अपना रहे है! ट्रम्प को अपने धुर विरोधी चाइना तक से मदद की गुहार लगानी पड़ रही है। कल अगर घरेलू राजनीति के दबाव में ट्रम्प पीछे हट गए तो इजराइल का हाल उक्रेन जैसा हो सकता है!
ऐसे में, अमेरिका द्वारा इतने संवेदनशील और व्यापक प्रभाव वाले संघर्ष में मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान को प्राथमिकता देना पहली नज़र में चौंकाने वाला लग सकता है! कूटनीति केवल रिश्तों की गर्माहट से नहीं, बल्कि “ग्राउंड एक्सेस” से तय होती है। अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया और इस्लामिक दुनिया में पाकिस्तान की ऐतिहासिक और सामरिक पकड़ अमेरिका के लिए अब भी उपयोगी है। यही कारण है कि जब तत्काल जरूरत है, तो वॉशिंगटन आदर्श साझेदार नहीं, बल्कि प्रभावी माध्यम का चुनाव किया है।
ट्रम्प का पाकिस्तान के प्रति झुकाव ने स्वाभाविक रूप से भारत की विदेश नीति पर सवाल खड़े करता हैं। ऑपरेशन सिंदूर, जिसे भारत की एक रणनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया गया था, के बाद अपेक्षा थी कि पाकिस्तान और अधिक हाशिए पर जाएगा। लेकिन इसके उलट, उसे एक बार फिर वैश्विक मंच पर “मध्यस्थ” की अहम भूमिका मिलती दिख रही है।
ब्रिक्स का अध्यक्ष होने के बावजूद भारत को मध्यस्थता प्रक्रिया से बाहर रखना केवल कूटनीतिक “इग्नोर” भर नहीं है, बल्कि यह व्यापक रणनीतिक संकेत भी देता है! इसके असर सिर्फ इंडिया तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे वेस्ट एशिया पर पड़ सकता हैं। ब्रिक्स का अध्यक्ष देश होने का मतलब था कि भारत उभरती अर्थव्यवस्थाओं और “ग्लोबल साउथ” की आवाज़ को आगे बढ़ा सकता है।
भारत की भूमिका वेस्ट एशिया में केवल एक “बाहरी खिलाड़ी” की नहीं है। ऊर्जा निर्भरता, प्रवासी भारतीयों की बड़ी संख्या के अलावा ईरान, इज़राइल, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के साथ संतुलित संबंध, उसे महत्वपूर्ण बनाता है! इन सभी कारणों से भारत एक ऐसा दुर्लभ देश है, जो सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रख सकता है। इसके बावजूद अगर भारत को मध्यस्थता में शामिल नहीं किया जाता, तो वेस्ट एशिया एक ऐसे “न्यूट्रल बैलेंसर” से वंचित हो सकता है, जो बिना वैचारिक या सैन्य एजेंडे के बातचीत को आगे बढ़ा सकता था।
अगर भारत वाकई “ग्लोबल साउथ” की आवाज़ बनना चाहता है, तो उसे केवल संतुलन बनाए रखने से आगे बढ़कर, समय-समय पर पहल भी करनी होगी। अगर भारत अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता का उपयोग करते हुए एक वैकल्पिक शांति मंच प्रस्तावित करता है तो वह न केवल अपनी वैश्विक छवि को मजबूत कर सकता था, बल्कि वेस्ट एशिया में एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभर सकता था।
ट्रम्प प्रशासन की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह एक साथ दो विरोधाभासी लक्ष्यों को साधने की कोशिश कर रहा है! एक ओर तेल संकट को नियंत्रित करना, और दूसरी ओर ईरान को कमजोर रखना। ईरान पर से प्रतिबंध हटाने से वैश्विक तेल आपूर्ति बढ़ सकती है, जिससे कीमतें नियंत्रित होंगी, लेकिन इसके साथ ही ईरान की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। क्या अमेरिका अनजाने में उसी शक्ति को मजबूत कर रहा है, जिसे वह नियंत्रित करना चाहता है?
अमेरिका के इस संघर्ष में नाटो की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित दिख रही है। नाटो देश सीधे हस्तक्षेप से बचते नजर आ रहे हैं, जिससे यह युद्ध पारंपरिक सैन्य गठबंधनों से हटकर एक अलग तरह के शक्ति-संघर्ष में बदलता दिख रहा है। यह स्थिति वैश्विक राजनीति में एक नए ट्रेंड की ओर इशारा करती है, जहां देश सीधे युद्ध में उतरने की बजाय “रणनीतिक दूरी” बनाए रखते हैं और परोक्ष रूप से अपने हित साधते हैं।
अमेरिका के अंदर ट्रम्प की स्थिति भी आसान नहीं है। उनकी नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं और विपक्ष उन्हें इस युद्ध में उलझने के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है। मध्यावधि चुनाव ट्रम्प के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकते हैं। यदि उनकी विदेश नीति को असफल माना गया, तो इसका सीधा असर उनकी राजनीतिक लोकप्रियता पर पड़ेगा।इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजमीन नेतान्याहु के साथ उनकी नजदीकियां भी आलोचना का विषय बनी हुई हैं। विरोधियों का आरोप है कि ट्रम्प ने इज़राइल के हितों को प्राथमिकता देते हुए अमेरिका को एक अनावश्यक युद्ध में धकेल दिया।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने पारंपरिक संबंधों और आधुनिक रणनीतिक साझेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखे। एक ओर अमेरिका और इज़राइल के साथ बढ़ते व्यापारिक और सामरिक संबंध हैं, तो दूसरी ओर रूस और ईरान के साथ पुराने और भरोसेमंद रिश्ते का सवाल है।
28 फ़रवरी से पहले मोदी सरकार दोहरे दबाव में नज़र आ रही थी! एक ओर तथाकथित “एप्सटीन फाइल्स” से जुड़ी राजनीतिक बयानबाज़ी और अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव, तो दूसरी ओर भारत–अमेरिका ट्रेड डील की कठोर शर्तें। ट्रम्प प्रशासन की ओर से रखी गई शर्तें भारत के कृषि, मैन्युफैक्चरिंग और ऊर्जा हितों के लिहाज़ से असंतुलित मानी जा रही थीं, जिससे सरकार के सामने रणनीतिक दुविधा पैदा हो गई थी।
इसके साथ ही घरेलू राजनीति का दबाव भी कम नहीं है। आगामी राज्य चुनावों में राजनीतिक छवि बनाए रखना और विपक्ष के आरोपों का जवाब देना सरकार के लिए एक अतिरिक्त चुनौती है। विपक्ष इसे सरकार की कूटनीतिक कमजोरी के रूप में पेश कर रहा था, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दबाव था कि वह अमेरिका के साथ समझौता करे या अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए कड़ा रुख अपनाए।
कुछ समय पहले तक मोदी सरकार अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर दबाव में थी। डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से रखी गई शर्तें भारत के कृषि, उद्योग और ऊर्जा क्षेत्रों के लिए असहज मानी जा रही थीं। घरेलू स्तर पर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा था और यह धारणा बन रही थी कि भारत इस सौदे में कमजोर स्थिति में है। लेकिन भू-राजनीति का खेल अक्सर अप्रत्याशित मोड़ लेता है। ईरान–इज़राइल युद्ध आपदा में अवसर साबित हुआ और अमेरिका प्राथमिकताएं बदल गई!
पहले रूस से तेल खरीदने पर भारत को अप्रत्यक्ष छूट मिली, और अब ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने की स्थिति बन रही है। यह बदलाव केवल आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि अमेरिका की रणनीतिक विवशता भी है। भारत के लिए यह एक अप्रत्याशित राहत की तरह है। जहां पहले उसे पश्चिमी दबाव झेलना पड़ रहा था, वहीं अब वही पश्चिम अपनी नीतियों में बदलाव कर भारत के लिए रास्ते खोल रहा है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सब भारत की सोची-समझी रणनीति का परिणाम है, या फिर वैश्विक परिस्थितियों का ऐसा संयोग जिसमें भारत को स्वतः लाभ मिल रहा है? “बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना” वाली कहावत इसी संदर्भ में प्रासंगिक लगती है। भारत ने कोई आक्रामक कूटनीतिक पहल नहीं की, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उसे फायदा मिलने लगा।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अब एक नए संदर्भ में देखा जा रहा है। पहले जहां अमेरिका मजबूत स्थिति में था, वहीं अब उसे अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए लचीलापन दिखाना पड़ सकता है। युद्ध के कारण तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आया, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया।
अमेरिका, जो खुद को ऊर्जा स्थिरता का संरक्षक मानता है, अब उसी संकट को नियंत्रित करने के लिए अपनी नीतियों में लचीलापन दिखाने को मजबूर है। ट्रम्प का यह कदम उनके पहले कार्यकाल की नीतियों के बिल्कुल विपरीत है, जब उन्होंने ईरान पर “मैक्सिमम प्रेशर” की नीति अपनाई थी। यहां सवाल उठता है कि क्या ट्रम्प ने अपनी पुरानी नीति को विफल मान लिया है, या फिर यह सिर्फ एक अस्थायी रणनीतिक मोड़ है?
यदि युद्ध लंबा खिंचता है और तेल संकट गहराता है, तो अमेरिका के लिए भारत जैसे बड़े बाजार और साझेदार को नाराज़ करना आसान नहीं होगा। ऐसे में यह संभावना बनती है कि व्यापार समझौते की शर्तों में नरमी आए। भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक जीत हो सकती है! भले ही यह जीत सीधे प्रयासों से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के बदलने से मिली हो।
ऊर्जा क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव अमेरिका के लिए एक बड़ी चिंता है। ईरान के साथ चीन के संबंध पहले से ही मजबूत रहे हैं। ऐसे में अमेरिका नहीं चाहता कि ईरान पूरी तरह चीन के प्रभाव क्षेत्र में चला जाए। यही कारण है कि भारत को एक “संतुलनकारी शक्ति” के रूप में देखा जा रहा है। भारत, जो न तो पूरी तरह पश्चिमी गुट में है और न ही चीन-रूस धुरी का हिस्सा, एक मध्य मार्ग प्रस्तुत करता है।
भारत की विदेश नीति को “बिल्ली के भाग्य” कहकर खारिज करना आसान है, लेकिन यह भी सच है कि हर देश ऐसी परिस्थितियों का लाभ उठाने में सक्षम नहीं होता। भारत ने कम से कम इतना तो किया है कि उसने अपने विकल्प खुले रखे, किसी एक गुट में खुद को सीमित नहीं किया और समय आने पर अवसर का लाभ उठाने की स्थिति बनाए रखी।
कभी मनमोहन सिंह को “मौन मोहन” कहकर आलोचना किया जाता था! विडंबना यह है कि आज उसी तरह की संयमित और कम बोलने वाली कूटनीति का फायदा मोदी सरकार को मिलता दिख रहा है। आज जो स्थिति भारत के पक्ष में दिख रही है, वह आंशिक रूप से वैश्विक संयोग का परिणाम जरूर है, लेकिन इसके पीछे वर्षों की संतुलित कूटनीति भी है। अंततः सवाल यह नहीं है कि छींका भाग्य से टूटेगा या नहीं? सवाल यह है कि जब छींका टूटेगा, तो क्या भारत उसे संभालने के लिए तैयार हैं ?
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