धनबाद में किसकी सरकार : हेमंत सरकार या प्रिंस खान की पैरलल सरकार ?
गैंग्स ऑफ वासेपुर
धनबाद में किसकी सरकार : हेमंत सरकार या प्रिंस खान की पैरलल सरकार ?
लेखक - अरुण कुणाल
जब बात धनबाद के डॉन प्रिंस खान की हो तो उसके मामा फहीम खान का फ़िल्मी किरदार निभाने वाले नवाजुद्दीन सिद्दीकी को याद करना लाज़िमी हो जाता है। फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के रिलीज़ होने के ठीक बाद मेरी उनसे पहली मुलाक़ात हुई थी। ये उन दिनों की बात है, जब एक फिल्म की वजह से वासेपुर काफी चर्चा में था। उसके बाद नवाजुद्दीन से मेरी मुलाक़ात उनकी भाभी के केस को लेकर हुई, जिसकी दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस मैंने कराई थी। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के मैनेजर ने मुझे PR के लिए पैसे देने की बात कही थी, लेकिन वह उनका निजी मामला था, इसलिए मैंने कोई फीस नहीं ली। आज भी शायद वे मुझे इस बात से ज़्यादा इसलिए जानते हैं कि मैं उस शहर धनबाद से हूं, जिस पर बनी उनकी फिल्म ने पूरे देश में एक अलग पहचान दी थी!
नवाजुद्दीन सिद्दीकी और बिपाशा बसु की फिल्म 'आत्मा' के प्रमोशन के दौरान गैंग्स ऑफ वासेपुर के हीरो फैजल खान उर्फ नवाजुद्दीन सिद्दीकी से मिलने का मौका मिला था। गुड़गांव के एक होटल में उनका नो-स्मोकिंग रूम बुक था। जब उन्हें लगा कि स्मोकिंग में उन्हें दिक्कत होगी, तो उन्होंने रूम चेंज करने की रिक्वेस्ट की। रूम चेंज करने में 10-15 मिनट लगे और वह समय मेरे लिए यादगार बनने वाला था। नवाजुद्दीन को सिगरेट पीनी थी, इसलिए हम होटल की बालकनी में चले गए। बातचीत के दौरान जब मैंने बताया कि मैं धनबाद से हूं, तो वे काफी खुश हुए। उनका पहला सवाल यही था—क्या हम पहले मिल चुके हैं? फिर उसके बाद सवालों की झड़ी लग गई—क्या धनबाद सच में इतना खतरनाक है? वहां के लोग रहते कैसे हैं....?
नवाजुद्दीन सिद्दीकी के सवालों ने मुझे हैरान नहीं किया। दिल्ली आने के बाद मैंने भी महसूस किया था कि लोगों के दिमाग में धनबाद और बिहार की पहचान कोयला, माफिया और बम -पिस्टल तक सीमित होकर रह गई है। फर्क सिर्फ इतना था कि पहले लोग सूर्यदेव सिंह, शाहाबुद्दीन या साधु यादव के बारे में पूछते थे, जबकि फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के बाद सरदार खान और फैजल खान जैसे किरदारों ने उस जगह को एक नए सिनेमाई मिथक में बदल दिया।
जब मैंने नवाजुद्दीन को बताया कि जिस फहीम खान के किरदार को उन्होंने पर्दे पर निभाया, वह असल जिंदगी में मौजूद व्यक्ति है और जेल में सजा काट रहा है, तो वे चौंक गए। उन्होंने स्वीकार किया कि फिल्म की शूटिंग और रिसर्च के दौरान वे धनबाद केवल एक-दो बार ही गए थे। धनबाद के बारे में उनकी समझ फिल्म की कहानी से आगे नहीं थी। मैं नवाजुद्दीन सिद्दीकी के बारे में जानने को उत्सुक था और वे सारा टाइम धनबाद और उनके निभाए किरदार के बारे में बात करते रहे। उनसे बात करके कुछ पल के लिए मुझे अपने ही शहर से डर लगने लगा था।
उन चंद मिनटों की बातचीत के बाद पहली बार मुझे खुद यह सोचकर अजीब लगा कि आखिर मैं इतने वर्षों तक उस शहर में कैसे रहा? मैंने धनबाद का वह दौर देखा है जब सूर्यदेव सिंह, शफी खान, फहीम खान और विनोद सिंह जैसे नाम सत्ता, भय और प्रभाव के प्रतीक हुआ करते थे। आज धनबाद छोड़े पच्चीस साल से अधिक हो चुके हैं, लेकिन जब भी उस शहर को याद करता हूं, उसके विकास से ज्यादा उसके डॉन कल्चर की छवि सामने आती है।
ऐसे में जब धनबाद को प्रिंस खान जैसे डॉन के बहाने याद करता हूं, तो दुःख होता है। आज भी धनबाद की पहचान कोयला माफिया और डॉन संस्कृति से जुड़ी हुई है। विकास की यात्रा में धनबाद कहां पीछे छूट गया, इसका एहसास हमेशा होता है। दुख इस बात का है कि कोयले की राजधानी कहलाने वाला शहर आज भी विकास से ज्यादा अपराध के कारण पहचाना जाता है।
इन दिनों धनबाद में एक नया नाम चर्चा के केंद्र में है- छोटे सरकार के नाम से कुख्यात प्रिंस खान। वर्तमान में कोयलांचल में अपराध और रंगदारी का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका प्रिंस खान 2021 से फरार है और कथित तौर पर दुबई से हत्या, रंगदारी और अवैध कारोबार का नेटवर्क चला रहा है। उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस तक जारी हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद धनबाद में उसका खौफ कायम है। यही वजह है कि लोग सवाल पूछने लगे हैं कि धनबाद में सरकार किसकी चल रही है? हेमंत सोरेन की या छोटे सरकार की?
प्रिंस खान ने अपराध की दुनिया में कदम फहीम खान के गिरोह से रखा था। बाद में वर्चस्व की लड़ाई में दोनों के रास्ते अलग हो गए। फहीम खान के जेल जाने के बाद प्रिंस ने गिरोह की कमान संभाली और धीरे-धीरे खुद को धनबाद के सबसे प्रभावशाली गैंगस्टर के रूप में स्थापित कर लिया। उसने अपराध को केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे तकनीक, सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों के सहारे एक नए रूप में बदल दिया।
धनबाद पुलिस की हालिया कार्रवाई के बाद प्रिंस खान के नेटवर्क को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। पुलिस के हाथ लगे डिजिटल साक्ष्यों और सैकड़ों पन्नों की चैट से अपराध, राजनीति और सफेदपोश दुनिया के रिश्तों की परतें खुलती दिखाई दे रही हैं। यही वह बिंदु है जहां अपराध केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक विफलता का आईना बन जाता है।
प्रिंस खान के सहयोगी सैफी उर्फ मेजर की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने दावा किया कि गिरोह का नेटवर्क मीडिया, कारोबार और राजनीति तक फैला हुआ है। इसके तुरंत बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें प्रिंस खान कथित तौर पर धनबाद के एसएसपी प्रभात कुमार को धमकी देता नजर आया। जवाब में पुलिस ने वासेपुर स्थित उसके घर पर कुर्की-जप्ती की कार्रवाई की। यह सिर्फ एक कानूनी कार्रवाई नहीं थी, बल्कि राज्य की ओर से दिया गया एक प्रतीकात्मक संदेश भी था कि सत्ता का केंद्र अभी भी प्रशासन ही है।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि प्रिंस खान दुबई छोड़कर पाकिस्तान में शरण ले चुका है और वहां उसका संपर्क प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ा हुआ है। अगर यह सच है, तो यह मामला केवल धनबाद के अपराध तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ जाता है। हालांकि प्रिंस खान की तुलना दाऊद इब्राहिम जैसे अपराधियों से करना अतिशयोक्ति होगी, लेकिन यह भी सच है कि अपराध और आतंक के गठजोड़ का इतिहास भारत पहले भी देख चुका है।
धनबाद में आज जिस तरह अवैध कोयले का कारोबार फल-फूल रहा है, वह आने वाले समय में नए अपराधियों को जन्म देने की जमीन तैयार कर रहा है। कोयले की कालाबाजारी, रंगदारी और राजनीतिक संरक्षण का यह गठजोड़ नया नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले यह सब स्थानीय दायरों तक सीमित था, अब इसका नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय हो चुका है।
मुझे सूर्यदेव सिंह का दौर याद आता है, जब स्थानीय नेताओं से लेकर प्रशासन तक की आवाज दब जाया करती थी। उस समय बिहार के मुख्यमंत्री भगवत झा आजाद की पहल पर आईएएस अधिकारी मदन मोहन झा ने सूर्यदेव सिंह की गिरफ्तारी का साहस दिखाया था। वह कार्रवाई आज भी लोगों को याद है। उस घटना का जिक्र इसलिए जरूरी है क्योंकि वह यह साबित करती है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक दृढ़ता हो, तो सबसे मजबूत अपराधी तंत्र को भी तोड़ा जा सकता है।
आज धनबाद के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन प्रिंस खान जैसे अपराधियों पर स्थायी अंकुश लगाने की इच्छाशक्ति रखता है, या फिर हर दशक में एक नया 'छोटे सरकार' पैदा होता रहेगा? एसएसपी प्रभात कुमार की कार्रवाई ने उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन असली चुनौती केवल एक गैंगस्टर को पकड़ना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को खत्म करना है जो ऐसे अपराधियों को जन्म देती है।
प्रिंस गैंग्स की रंगदारी के अलावा धनबाद में इन दिनों अवैध कोयला का व्यापार चरम पर है, जो आने वाले समय में अपराध को बढ़ावा दें सकता है। धनबाद में जिस तरह से अवैध कोयला का कारोबार फल- फुल रहा है और प्रशासन के वरदान से रोज नए -नए भस्मासुर पैदा हो रहे है। अगर उसपर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया तो प्रिंस खान जैसे सिरदर्दी पुलिस -प्रशासन के लिए बढ़ सकता है।
धनबाद की पहचान कला, साहित्य, कोयला, उद्योग और मेहनतकश लोगों की होनी चाहिए थी। लेकिन अफसोस, वह आज भी गैंगवार, रंगदारी और माफिया संस्कृति के बोझ तले दबा हुआ है। अगर अवैध कोयला कारोबार और अपराधियों के राजनीतिक संरक्षण पर समय रहते लगाम नहीं लगी, तो आने वाले वर्षों में प्रिंस खान जैसे कई 'छोटे सरकार' पैदा होंगे, और तब सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रहेगा, बल्कि राज्य सरकार की विश्वसनीयता का होगा।

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