राहुल गांधी के “ग्रिप, चोक और टैप” वाला राजनीतिक दांव के खिलाफ बीजेपी का सब्सटेंटिव मोशन!



राहुल गांधी के “ग्रिप, चोक और टैप” वाला राजनीतिक दांव के खिलाफ बीजेपी का सब्सटेंटिव मोशन!

                            लेखक- अरुण कुणाल

जिस तरह मोबाइल कंपनियाँ अपने नए मॉडल “Pro” और “Plus” वर्ज़न में लाती हैं, उसी तरह मोदी सत्ता भी अब “अपग्रेडेड” संसदीय रणनीति पर दिख रही है। राहुल गांधी के खिलाफ प्रिविलेज मोशन की जगह सब्सटेंटिव मोशन की तैयारी, यह बताता है कि सत्ता पक्ष सीधा मुकाबला चाहता है। संसद में राहुल गांधी का “ग्रिप, चोक और टैप” वाला राजनीतिक दांव चर्चा में रहा, और अब बीजेपी उसका काट खोज रही है।

प्रिविलेज मोशन में कमेटी बनती, जाँच होती और रिपोर्ट के बाद जवाब का मौका मिलता, जिससे मामला पलट भी सकता था, लेकिन सब्सटेंटिव मोशन में सीधी बहस और वोटिंग होने से सत्ता पक्ष के लिए “अपर हैंड” रहेगा। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे न सिर्फ सब्सटेंटिव मोशन की बात कर रहे हैं, बल्कि एक कदम आगे बढ़कर राहुल गांधी पर चुनाव लड़ने की पाबंदी की मांग भी उठा रहे हैं। अब गेंद स्पीकर के पाले में है और सत्ता के “चाणक्य” राजनीतिक लाभ-हानि का हिसाब लगा रहे हैं!

इसे स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के जवाबी कार्यवाई के तौर पर भी देखा जा रहा है! सत्ता पक्ष और विपक्ष में से कोई झुकने को तैयार नहीं है! ऐसे में राजनीतिक टकराव अपने चरम की ओर बढ़ता दिख रहा है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री की छवि पर लगातार हो रहे हमलों के बीच सत्ता पक्ष इस बार अधिक आक्रामक रुख में दिख रहा है। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव स्वाभाविक है, किंतु संस्थागत संतुलन बनाए रखना समान रूप से आवश्यक है।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को जनरल नरवणे की पुस्तक के मुद्दे पर बोलने का अवसर न देकर बैकफुट पर दिख रही मोदी सरकार ने जब उन्हें बजट पर बोलने का समय दिया, तो शायद अनुमान नहीं था कि वही मंच राजनीतिक पलटवार का केंद्र बन जाएगा। राहुल गांधी से इस तरह के आक्रामक अंदाज़ की उम्मीद सत्ता पक्ष को नहीं थी!  एप्सटीन फाइल्स और भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर सत्ता पक्ष की असहजता साफ झलक रही थी।

राहुल गांधी ने बजट पर बोलते हुए सरकार को जिस आक्रामक अंदाज़ में घेरा, उसके बाद सत्ता पक्ष की बेचैनी अब खुलकर सामने आ रही है। उनके भाषण के ज्यादातर हिस्से को सदन की कार्रवाई से एक्सपंज कर दिया गया है। राहुल गांधी को जनरल नरवणे की किताब के मुद्दे पर पहले बोलने नहीं दिया गया, फिर दिल्ली पुलिस की एफआईआर, और अब प्रिविलेज मोशन के साथ-साथ सब्सटेंटिव मोशन की तैयारी हो रही है!

राहुल गांधी ने अपने भाषण में तथाकथित “एप्सटीन फाइल्स” और भारत-अमेरिका ट्रेड डील का मुद्दा उठाते हुए सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने बजट को “सरेंडर बजट” करार दिया और आरोप लगाया कि ट्रेड डील के माध्यम से भारत के रणनीतिक हितों से समझौता किया गया है। राहुल गांधी ने हरदीप पुरी, अडानी और अनिल अंबानी का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अप्रत्यक्ष निशाना साधा। भले ही उन्हें कुछ मुद्दों पर विस्तार से बोलने का अवसर नहीं मिला, किंतु जो वे चाहते थे, उसमें सफल रहे!

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में राहुल गांधी को एप्सटीन फाइल्स और अमेरिका-भारत ट्रेड डील से जुड़े आरोपों को ऑथेंटिकेट करने को कहा था, वह सब सदन की कार्रवाई से एक्सपंज कर दिया गया है। हालांकि राहुल गांधी प्रमाणित करने को तैयार थे, लेकिन पीठासीन जगदंबिका पाल ने बड़ी चतुराई से टाल दिया था! 

भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी का उदाहरण अक्सर संदर्भ बिंदु बनता है, जब विशेषाधिकार और सदस्यता के प्रश्नों ने बड़े राजनीतिक परिणाम पैदा किए थे। इतिहास गवाह है, किस तरह इंदिरा गांधी को भी सदन से बाहर किया गया था। क्या आज वही राजनीतिक पटकथा दोहराई जाएगी? राहुल गांधी की सदस्यता पहले जा चुकी है, सरकारी आवास खाली करवाया जा चुका है। अब क्या अगला कदम संसद से बाहर का रास्ता होगा? 

पिछले एक दशक में राहुल गांधी की राजनीति ने उल्लेखनीय रूप से बदलाव देखा है। कभी “लेफ्ट–राइट–सेंटर” के बीच संतुलन साधने की कोशिश करने वाले नेता के रूप में देखे जाने वाले राहुल अब अधिक स्पष्ट वैचारिक स्थिति में दिखाई देते हैं। उनकी सार्वजनिक भाषा, कॉर्पोरेट पूंजी पर तीखे हमले, असमानता और सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर निरंतर जोर, इन सबने उनकी छवि को अधिक स्पष्ट वाम-झुकाव वाली बना दिया है।  

राहुल गांधी की यह नई राजनीतिक छवि युवाओं के एक वर्ग को आकर्षित करती है, जो व्यवस्था-विरोधी स्वर में बदलाव की संभावना देखता है। उनके भाषणों में कॉर्पोरेट-राजनीति संबंधों पर सीधा हमला और सत्ता के केंद्रीकरण की आलोचना उन्हें एक स्पष्ट वैचारिक धुरी पर स्थापित करती है। यही आक्रामक रुख सत्ता पक्ष और उद्योग जगत, दोनों के लिए असहजता का कारण बनता है। परिणामस्वरूप, उनके विरोधियों की संख्या स्वाभाविक रूप से बढ़ती दिखाई देती है।

दिलचस्प बात यह है कि असहजता केवल विपक्षी दलों या कॉर्पोरेट हलकों तक सीमित नहीं है। कांग्रेस पार्टी के भीतर भी कुछ लोग राहुल गांधी के इस निरंतर टकराववादी अंदाज़ को लेकर पूरी तरह सहज नहीं दिखते है। यही कारण है कि कई मौकों पर राहुल गांधी और उनका 'युवा तुर्क गैंग्स' अलग-थलग पड़ गया है!

राहुल गांधी पर साल 2014 से 2024 तक 20 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। एक केस में राहुल गांधी दोषी पाए गए थे, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी। वहीं अन्य कई मामलों में अभी ट्रायल कोर्ट में जारी है। संसद परिसर में प्रताप सारंगी और मुकेश राजपूत के साथ धक्का-मुक्की को लेकर अटेम्प्ट टू मर्डर का केस भी है! वर्तमान राजनीति में प्रमुख विपक्षी नेता पर ऐसे मामलों का दर्ज होना न्यू नार्मल है!

हालांकि परिस्थितियां भिन्न हैं, पर प्रतीकात्मक राजनीति में इतिहास की गूंज अक्सर वर्तमान बहसों को तीखा बना देती है। यह वही संसद है जहां कभी विपक्ष की आवाज़ लोकतंत्र की मजबूती मानी जाती थी। आज हालात ऐसे हैं कि जब विपक्ष का नेता बोलता है, तो कैमरे का एंगल बदल जाता है, माइक म्यूट हो जाता है और सत्ता पक्ष की बेंचों से शोर शुरू हो जाता है। सवाल यह नहीं कि राहुल गांधी सही हैं या गलत? सवाल यह है कि क्या उन्हें आगे बोलने दिया जाएगा?

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