खाड़ी क्षेत्र का संकट : जियो-पॉलिटिक्स, तेल का खेल और भारत की मौन कूटनीति की दुविधा!
खाड़ी क्षेत्र का संकट : जियो-पॉलिटिक्स, तेल का खेल और भारत की मौन कूटनीति की दुविधा!
लेखक - अरुण कुणाल
पश्चिम एशिया एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठा है। ईरान, इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तेज़ी से बढ़ते सैन्य टकराव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ता तनाव अब सिर्फ दो देशों के बीच का झगड़ा नहीं रहा। ईरान, इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच टकराव ने पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है। इस समूचे परिदृश्य में भारत एक जटिल कूटनीतिक दुविधा के केंद्र में खड़ा है।
युद्ध की आग अब भारत के दरवाज़े तक पहुँच चुकी है। हिन्द महासागर में ईरानी युद्धपोत के डूबने को सिर्फ़ युद्ध जनित कार्रवाई कहकर टाल देना भारत की रणनीतिक भूल होगी। अमेरिका ने भारत के इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में भाग लेकर लौटते हुए सिर्फ़ एक ईरानी जहाज़ को नहीं, भारत की प्रतिष्ठा को निशाना बनाया है। इस मुद्दे पर भारत की ख़ामोशी कूटनीति नहीं, बल्कि मौन सहमति मानी जाएगी।
ईरान–इज़रायल–अमेरिका संघर्ष जिस बिंदु पर पहुँच चुका है, वहाँ युद्धक्षेत्र की गोलाबारी से अधिक निर्णायक परीक्षा कूटनीति की है। जब प्रत्यक्ष टकराव महाशक्तियों को व्यापक क्षेत्रीय युद्ध और वैश्विक आर्थिक संकट की ओर धकेल सकता हो, तब रणनीति अक्सर खुली सैन्य कार्रवाई से हटकर परोक्ष साधनों की ओर मुड़ती है। यदि अमेरिका सीधे दीर्घकालिक युद्ध में उतरता है, तो उसे तीन मोर्चों पर दबाव झेलना होगा- घरेलू राजनीतिक मतभेद, वैश्विक गठबंधनों की संवेदनशीलता और ऊर्जा बाजार की अस्थिरता।
एप्सटीन फाइल्स और ईरान संकट की पृष्ठभूमि में डोनाल्ड ट्रंप की ताकत का पहला लिटमस टेस्ट शुरू हो गया है! अमेरिका में मिडटर्म चुनाव की तैयारी तेज हो रही है और यही उनके नेतृत्व की असली परीक्षा बनेगा। ट्रम्प द्वारा “ग्रेट अमेरिका” की नीति की जगह बेंजामिन नेतन्याहू की “ग्रेट इजराइल” के लिए अमेरिका को युद्ध में झोकना, उनकी राजनीतिक जमीन को प्रभावित कर सकती है। भले ही नतीजे सीधे उनकी सत्ता को न बदलें, लेकिन यदि जनमत प्रतिकूल गया तो उनकी कार्यशैली और निर्णयों पर एक मजबूत लगाम जरूर लग सकती है।
युद्ध के शुरुआत में ही स्पेन और ब्रिटेन द्वारा ईरान नीति पर अमेरिका से दूरी बना लेने से अब यह युद्ध 'नाटो गुट' से ज्यादा 'एपस्टीन गुट' का लगने लगा है। ब्रिटेन को लंबे समय से अमेरिका का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना जाता रहा है! द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर इराक और अफगानिस्तान युद्ध तक दोनों देशों ने साथ मिलकर सैन्य अभियान चलाए है। लेकिन ईरान के खिलाफ संभावित युद्ध से दूरी बनाना, डोनाल्ड ट्रंप के लिए कूटनीतिक चेतावनी की तरह है। ट्रम्प का अपने मित्र देशों को सार्वजनिक दबाव और धमकी की राजनीति से साधने की कोशिश के बीच उनकी रणनीतिक चूक भी उजागर होती दिख रही है!
अली ख़ामेनेई की संभावित हत्या और इज़राइल के प्रति मोदी सरकार के कथित झुकाव जैसे घटनाक्रम भारत के लिए एक जटिल कूटनीतिक चुनौती बन गए हैं। ऐसे समय में जब स्पेन और यूनाइटेड किंगडम जैसे सहयोगी देशों के रुख में भी बदलाव दिखाई दे रहा है, भारत की हर प्रतिक्रिया, चाहे वह रणनीतिक मौन हो या संतुलित बयान, घरेलू राजनीति और वैश्विक मंच, दोनों पर गहराई से परखी जाएगी। भारत के लिए चुनौती केवल पक्ष चुनने की नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए विश्वसनीयता बनाए रखने की है।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम” कहना और सोनिया गांधी द्वारा ईरान संकट व युद्ध से दो दिन पहले इज़रायल यात्रा पर प्रश्न उठाने से यह मुद्दा अब घरेलू राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया है। शुरुआत में संकेत मिल रहे थे कि “ऑपरेशन सिंदूर” जैसे मौकों की तरह विपक्ष सरकार के साथ खड़ा दिखाई देगा। लेकिन इस बार तस्वीर अलग है। राहुल गांधी के साथ कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व खुलकर सामने है, और पूरा हमला सीधे नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर केंद्रित है।
विपक्ष का आरोप है कि वैश्विक मंचों पर सक्रियता के बावजूद रणनीतिक संतुलन साधने में चूक हुई है। ऐसे में यह मुद्दा केवल कूटनीतिक बहस नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही का प्रश्न बनता जा रहा है। विपक्ष इस अवसर को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा और इसका प्रभाव आने वाले राज्यों के चुनावों में साफ दिखाई दे सकता है।
विपक्ष ईरान के साथ भारत के पुराने संबंध की दुहाई दे रहा है! उनका मानना है कि ईरान से रिश्ता केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भी रहे हैं। 1990 के दशक में जब इस्लामिक सहयोग संगठन के कुछ देशों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार मंच पर कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बनाने का प्रयास किया था, तब ईरान की भूमिका भारत के पक्ष में महत्त्वपूर्ण रही थी।
इस समय मोदी सरकार कई मोर्चों पर दबाव झेल रही है। खाड़ी संकट यदि लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमत, दोनों पर असर पड़ सकता है। ऐसे में अमेरिका के साथ संभावित ट्रेड डील की शर्तों और रूस से तेल खरीद के विकल्प के बीच संतुलन साधना सरकार के लिए कूटनीतिक ही नहीं, आर्थिक परीक्षा भी होगा। यदि निर्णय में देरी या असंतुलन हुआ, तो आर्थिक दबाव राजनीतिक संकट का रूप ले सकता है।
भारत अपनी कच्चे तेल की लगभग 88% आवश्यकता आयात से पूरी करता है। इन आयातों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है और विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यह संकरा समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग एक-तिहाई वहन करता है। यदि ईरान इसे अवरुद्ध करने की दिशा में कदम बढ़ाता है, तो भारत सहित एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर तात्कालिक दबाव पड़ेगा।
भारत के पास लगभग 25 दिनों का कच्चा तेल और 25–30 दिनों के पेट्रोलियम उत्पाद। कुल मिलाकर 40–45 दिनों की ऊर्जा आवश्यकता पूरी करने की क्षमता है। किंतु यदि संकट लंबा खिंचता है, तो मुद्रास्फीति, चालू खाते का घाटा और रुपये पर दबाव अपरिहार्य होंगे।
अक्सर देखा गया है कि कच्चे तेल की कीमत 80 डॉलर से ऊपर जाते ही सरकार की चिंता बढ़ जाती है। अगर यह 85–90 डॉलर पर टिक जाए, तो महँगाई बढ़ सकती है। सरकार को टैक्स कम करने या सब्सिडी बढ़ाने का दबाव आ सकता है। इससे राजकोषीय घाटा भी बढ़ सकता है।
यदि अमेरिकी आपूर्ति सीमित रहती है और वेनेज़ुएला से तेल उत्पादन तत्काल संभव नहीं होता, तो रूस एक बार फिर भारत के ऊर्जा समीकरण में केंद्रीय भूमिका निभा सकता है, जैसा यूक्रेन संकट के बाद देखने को मिला था। आने वाले सप्ताह यह तय करेंगे कि भारत पश्चिम एशिया की इस उथल-पुथल में संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक विश्वसनीयता, इन तीनों को किस कौशल से साध पाता है।
पश्चिम एशिया की स्थिति जितनी विस्फोटक दिख रही है, उतनी ही संवेदनशील भी है। यदि अली ख़ामेनेई की मृत्यु के बाद ईरान ने प्रत्यक्ष सैन्य जवाबी कार्रवाई की है, तो यह संघर्ष “सीमित टकराव” से आगे बढ़कर क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। स्थिति गंभीर अवश्य है, परंतु अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अंतिम अध्याय अक्सर युद्धक्षेत्र में नहीं, वार्ताकक्ष में लिखा जाता है।
ईरान के अगले सुप्रीम लीडर का ऐलान खामेनेई को दफनाने के बाद ही किया जाएगा। अली ख़ामेनेई के संभावित उत्तराधिकार को लेकर उनके पुत्र मोजतबा ख़ामेनेई का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है। अली ख़ामेनेई के उत्तराधिकारी की घोषणा में देरी के पीछे इजराइल की धमकी और आंतरिक गुटबाज़ी को सार्वजनिक होने से रोकना मुख्य कारण माना जा रहा है! जबकि 1989 में रूहोल्लाह खुमैनी के निधन के बाद ही उसी दिन अली ख़ामेनेई को चुना गया था।
पश्चिम एशिया में किसी भी बड़े सैन्य टकराव का प्रभाव अब केवल क्षेत्रीय नहीं रहता, वह तुरंत वैश्विक शक्ति-संतुलन की परीक्षा बन जाता है। यदि ईरान पर अमेरिकी-इज़रायली हमलों के बाद रूस, यूरोपीय शक्तियाँ और चीन खुलकर बयान दे रहे हैं, तो यह संकेत है कि संघर्ष “प्रॉक्सी” दायरे से निकलकर महाशक्तियों की प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ सकता है। ऐसे में खुला पक्ष लेना भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” को सीमित कर सकता है।
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच भारत की रणनीतिक चुनौतियाँ और जटिल होती जा रही हैं। एक ओर अमेरिका और इजराइल के साथ व्यापारिक समझौतों और सामरिक साझेदारी का दबाव है, तो दूसरी ओर ईरान के साथ वर्षों से विकसित होता आया संबंध को लेकर विपक्ष का दबाव और घरेलू राजनीति में छवि बनाए रखने की चुनौती है!
भारत का मध्य एशिया (कज़ाख़िस्तान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि) के साथ व्यापार पारंपरिक रूप से सीमित रहा है, लेकिन पिछले वर्षों में इसे रणनीतिक प्राथमिकता दी गई है। इसमें दो प्रमुख मार्ग अहम हैं- पहला चाबहार पोर्ट, जो ईरान के जरिए मध्य एशिया तक भारत की पहुँच का आधार। दूसरा इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC), जो भारत, ईरान, रूस और मध्य एशिया को जोड़ने वाला बहु-मोडल परिवहन नेटवर्क है ।
यदि ईरान युद्ध की आग में घिरता है, तो ये दोनों परियोजनाएँ अस्थिर हो सकती हैं। चाबहार भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच देता है। इसलिए चाबहार पोर्ट का मुद्दा केवल एक प्रोजेक्ट का सवाल नहीं है। यह भारत की दीर्घकालिक क्षेत्रीय रणनीति से जुड़ा हुआ है। अगर भारत इससे पीछे हटता है, तो मध्य एशिया में उसकी पहुँच सीमित हो सकती है।
अंततः, खाड़ी संकट और अमेरिकी दबाव ने भारत की मुश्किलें जरूर बढ़ा दी हैं। लेकिन यही वह समय है जब धैर्य, स्पष्ट रणनीति और संतुलित कूटनीति की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसा रास्ता चुनना होगा, जो न केवल वर्तमान संकट से उबारे बल्कि भविष्य की संभावनाओं को भी सुरक्षित रखे। भारत इस कठिन समय में कितनी समझदारी से अपना रास्ता तय करता है, यही असली परीक्षा है।
आज जब थर्ड वर्ल्ड वॉर के आहट के बीच विश्व में तनाव बढ़ रहा है, तब साहिर लुधियानवी साहब की ये पंक्तियाँ केवल नज़्म नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक चेतावनी और उम्मीद दोनों बन जाती हैं-
जंग तो ख़ुद ही एक मसला है
जंग क्या मसलों का हल देगी
आग और ख़ून आज बख़्शेगी
भूक और एहतियाज कल देगी
इसलिए ऐ शरीफ़ इंसानों
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शमा जलती रहे तो बेहतर है....


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