बीजेपी का "मगध" फतह नीतीश का "शिंदेकरण" या "धनखड़ीकरण"?
बीजेपी का "मगध" फतह नीतीश का "शिंदेकरण" या "धनखड़ीकरण"?
लेखक – अरुण कुणाल
भारतीय राजनीति में सत्ता परिवर्तन कभी भी केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होता, वह रणनीति, समय-निर्धारण और शक्ति-संतुलन का परिणाम होता है। बिहार की मौजूदा सियासत भी इसी तरह के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। यदि हाल के घटनाक्रमों को जोड़कर देखा जाए तो ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी का वर्षों पुराना ‘मगध फतह’ का सपना अब साकार होने की दिशा में बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी है और इस संभावना को मजबूत कर दिया है कि राज्य में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बन सकता है।
नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने तीन दशकों से अधिक समय तक सत्ता और विपक्ष दोनों में रहकर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखी। लेकिन राजनीति का स्वभाव ही ऐसा है कि समय के साथ समीकरण बदलते रहते हैं। यदि वास्तव में उन्हें राज्यसभा भेजा जाता है और बिहार की सत्ता बीजेपी के हाथों में आती है, तो इसे केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि एक लंबे राजनीतिक दौर के अंत के रूप में भी देखा जाएगा।
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिदृश्य किसी हद तक ‘महाराष्ट्र मॉडल’ की याद दिलाता है। जिस तरह महाराष्ट्र में सहयोगी दलों के भीतर शक्ति-संतुलन बदलकर नई राजनीतिक व्यवस्था बनाई गई थी, उसी तरह का संकेत बिहार में भी दिखाई देने लगा है। यही कारण है कि विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने इस पूरे घटनाक्रम को ‘महाराष्ट्र मॉडल’ से जोड़ते हुए बीजेपी पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि अगर नीतीश कुमार महागठबंधन के साथ रहते तो उनके साथ ऐसा व्यवहार नहीं होता।
हालाँकि यह भी सच है कि बिहार की राजनीति हमेशा से बहुस्तरीय रही है और यहां गठबंधनों का बनना और टूटना कोई नई बात नहीं है। लेकिन मौजूदा स्थिति इसलिए अलग मानी जा रही है क्योंकि इस बार सत्ता-संतुलन बदलने की प्रक्रिया कहीं अधिक सुनियोजित और रणनीतिक दिखाई दे रही है।
कुछ समय पहले तक यह माना जा रहा था कि बीजेपी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव तक बिहार में कोई बड़ा राजनीतिक कदम नहीं उठाएगी। इसकी वजह भी साफ थी। पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता हैं जिनकी जड़ें बिहार और झारखंड से जुड़ी हुई हैं। बीजेपी इन वोटरों को अपने पक्ष में बनाए रखना चाहती है, इसलिए वह एक ही समय में दो मोर्चों पर राजनीतिक जोखिम नहीं लेना चाहती थी। लेकिन राजनीति में परिस्थितियाँ अक्सर उम्मीद से पहले बदल जाती हैं।
पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले बिहार में तख्तापलट की उम्मीद शायद ही किसी ने की थी। लेकिन परिस्थितियाँ तेजी से बदलीं। नीतीश कुमार के सामने आखिरकार दो ही रास्ते बचे—या तो सम्मानजनक विदाई स्वीकार करें, या फिर शिवसेना और एनसीपी की तरह जेडीयू के दो फाड़ होने का जोखिम उठाएँ। ऐसे में नीतीश कुमार ने शायद अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य को ध्यान में रखते हुए दिल्ली का रास्ता चुनना ज्यादा सुरक्षित समझा।
अब तक बिहार की राजनीति से दूर रहने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार पर भी सियासत का रंग चढ़ने की चर्चा तेज हो गई है। वर्षों तक सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाए रखने वाले निशांत का नाम अचानक राजनीतिक गलियारों में गूंजने लगा है। कहा जा सकता है कि इस बार की होली उनके लिए सिर्फ रंगों की नहीं, बल्कि राजनीति की भी शुरुआत लेकर आई है।
भारतीय राजनीति में वंशवाद कोई नई बात नहीं है। कई बड़े राजनीतिक परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी सत्ता का हस्तांतरण होता रहा है। लेकिन नीतीश कुमार अब तक खुद को इस परंपरा से अलग रखने की कोशिश करते रहे हैं। यही वजह है कि उनके बेटे का राजनीति में संभावित प्रवेश एक दिलचस्प मोड़ माना जा रहा है।
बीजेपी की रणनीति को समझने के लिए उसके हाल के संगठनात्मक फैसलों पर भी नजर डालना जरूरी है। उदाहरण के लिए, बिहार बीजेपी में नितिन नबीन को प्रमुख भूमिका देना केवल एक संगठनात्मक बदलाव नहीं माना जा रहा। कई विश्लेषकों के अनुसार यह कदम राज्य की राजनीति में शक्ति-संतुलन को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास है।
इस फैसले का एक संदेश यह भी माना गया कि अब बिहार की राजनीति में निर्णय लेने का केंद्र धीरे-धीरे बदल रहा है। पहले जहां राज्य की राजनीति में क्षेत्रीय नेतृत्व का प्रभाव ज्यादा था, वहीं अब राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका और अधिक मजबूत होती दिखाई दे रही है।
बीजेपी के लिए बिहार केवल एक राज्य नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। उत्तर प्रदेश के बाद बिहार वह राज्य है जहां की राजनीतिक दिशा राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करती है। यही कारण है कि बीजेपी लंबे समय से यहां अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित करने की कोशिश कर रही है।
यदि बिहार में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बनता है तो यह पार्टी के लिए प्रतीकात्मक रूप से भी बड़ी उपलब्धि होगी। इससे यह संदेश जाएगा कि बीजेपी अब केवल सहयोगी दलों पर निर्भर रहने के बजाय खुद भी राज्य की सत्ता संभालने की स्थिति में है।
दरअसल, जब दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस की ‘वोट चोरी’ के खिलाफ आयोजित महा-रैली को राहुल गांधी संबोधित कर रहे थे, ठीक उसी समय बीजेपी ने ‘नितिन नबीन कार्ड’ खेलकर शाम होते-होते हेडलाइन और नैरेटिव दोनों बदल दिए थे। तब भी मैंने कहा था कि बीजेपी में नितिन नबीन की अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी को महज एक संगठनात्मक बदलाव समझना राजनीतिक भूल होगी। यह कदम बिहार से लेकर दिल्ली तक सत्ता-संतुलन को नए सिरे से परिभाषित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था।
इसका पहला और स्पष्ट संदेश यही था कि अब निर्णयों का केंद्र ‘मगध’ नहीं, बल्कि ‘इंद्रप्रस्थ’ होगा। नीतीश कुमार पहले ही गृह मंत्रालय और विधानसभा अध्यक्ष जैसे अहम पदों से वंचित किए जा चुके थे। दिल्ली में नितिन नबीन के रूप में एक प्रभावशाली कायस्थ चेहरे को स्थापित कर उनके राजनीतिक कद के सामने एक लंबी रेखा खींच दी गई थी।
बिहार में सत्ता परिवर्तन की इबारत लगभग लिखी जा चुकी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद राज्यसभा जाने का फैसला सार्वजनिक कर दिया है। इसके बाद बिहार में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बनने की संभावना मजबूत हो गई है।
अब सवाल यह है कि अगर ऐसा होता है तो मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी किसे मिलेगी। इस दौड़ में तीन नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं—नितिन नबीन, सम्राट चौधरी और नित्यानंद राय। बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन को बिहार का मजबूत चेहरा माना जा रहा है। वे कायस्थ समुदाय से आते हैं और पार्टी संगठन में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं।
सम्राट चौधरी ओबीसी वर्ग के कुशवाहा समाज से आते हैं और पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने राज्य की राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। वहीं नित्यानंद राय यादव समुदाय से आते हैं और केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री के रूप में काम कर चुके हैं। उनका अनुभव और संगठन से जुड़ाव भी उन्हें इस दौड़ में महत्वपूर्ण दावेदार बनाता है।
इन तीनों नेताओं की सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग है, इसलिए बीजेपी के सामने चुनौती यह होगी कि वह ऐसा चेहरा चुने जो राज्य के व्यापक सामाजिक समीकरणों को संतुलित कर सके। बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ अपनी पार्टी को साधना नहीं, बल्कि नीतीश कुमार और चिराग पासवान की मौन सहमति के बावजूद पूरे गठबंधन को साथ लेकर चलना भी है।
बिहार की राजनीति सामाजिक संतुलन और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का जटिल समीकरण है, जहाँ एक चेहरे का चयन कई समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। पिछले कुछ वर्षों में बीजेपी ने कई राज्यों में जिस तरह अचानक मुख्यमंत्री के नाम घोषित किए हैं, उसे देखते हुए यह भी संभव है कि बिहार में अंतिम क्षणों में कोई ‘पैराशूट उम्मीदवार’ उतार दिया जाए। अगर ऐसा हुआ तो यह चौंकाने वाला जरूर होगा, लेकिन असंभव बिल्कुल नहीं।
नीतीश कुमार की राजनीति हमेशा व्यावहारिकता के लिए जानी जाती रही है। उन्होंने समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करके सत्ता में बने रहने की क्षमता दिखाई है। लेकिन यदि वे वास्तव में बिहार की सत्ता छोड़कर दिल्ली की राजनीति की ओर जाते हैं, तो इसे उनके राजनीतिक करियर के एक नए अध्याय के रूप में देखा जाएगा।
कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक जीवन से भी जोड़कर देखते हैं। आडवाणी भी एक समय भारतीय राजनीति के केंद्र में थे, लेकिन बाद में धीरे-धीरे उन्हें सक्रिय सत्ता राजनीति से दूर कर दिया गया। फर्क इतना है कि अगर नीतीश कुमार खुद राज्यसभा का रास्ता चुनते हैं, तो यह उनके लिए एक तरह से सम्मानजनक विदाई भी मानी जा सकती है।
बिहार की राजनीति का यह दौर इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि इसमें सत्ता, रणनीति और परिवार—तीनों की कहानी एक साथ दिखाई दे रही है। आने वाले समय में यह तय होगा कि यह केवल राजनीतिक अटकल थी या वास्तव में बिहार की सत्ता का एक नया अध्याय शुरू होने वाला है। और इसी बदलाव के बीच एक और सवाल भी उठेगा, क्या निशांत कुमार सचमुच राजनीति में कदम रखेंगे?अगर ऐसा होता है तो बिहार की राजनीति में एक नई कहानी शुरू होगी, जिसमें पुराने अध्याय के साथ-साथ नई पीढ़ी की भूमिका भी तय होगी।
नीतीश कुमार ने ‘मगध’ त्यागकर ‘इंद्रप्रस्थ’ की ओर प्रस्थान कर खुद को लालकृष्ण आडवाणी की तरह ‘वन-आश्रम’ वाली राजनीतिक स्थिति से बचा लिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि वे पुत्र-मोह से खुद को बचा पाते हैं या नहीं। क्योंकि अब तक वंशवाद की राजनीति से दूर रहने वाले नीतीश कुमार के सीने पर भी बहुत जल्द ही यह ‘मेडल’ लगने वाला है।

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