धनबाद का चुनावी T-20 मुकाबले में बागी गुट का दबदबा : मेयर की कुर्सी पर संजीव सिंह का कब्जा!
धनबाद का चुनावी T-20 मुकाबले में बागी गुट का दबदबा : मेयर की कुर्सी पर संजीव सिंह का कब्जा!
ले 0- अरुण कुणाल
लगता है धनबाद की जनता ने फिल्म 'मकबूल' का मशहूर संवाद—"शक्ति का संतुलन ज़रूरी है, आग के लिए पानी का डर बने रहना चाहिए", को सचमुच आत्मसात कर लिया है। मेयर चुनाव में संजीव सिंह की शानदार जीत, खासकर ढुलू महतो के गढ़ में बढ़त हासिल करना, इसी “संतुलन” की राजनीतिक अभिव्यक्ति प्रतीत होती है। यह परिणाम संकेत देता है कि लोकतंत्र में एकतरफा वर्चस्व के बजाय संतुलित शक्ति-समीकरण को मतदाता अधिक सुरक्षित मानते हैं। अर्थात लोकतंत्र में “आग” कितनी भी प्रचंड क्यों न हो, “पानी” का भय बना रहना ही उसकी असली गारंटी है।
कोयला नगरी में यह जीत केवल एक पद पर कब्ज़ा नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक वापसी के रूप में भी देखी जा रही है, जहाँ “सिंह मेंशन” का पुराना प्रभाव पुनः चर्चा में है। धनबाद में अब सिर्फ कोयले की आग नहीं, राजनीति की तपिश भी बढ़ने वाली है। संकेत साफ हैं, संजीव सिंह अब केवल नगर राजनीति तक सीमित नहीं दिख रहेंगे, वे बड़ी पारी खेलने की तैयारी में हैं। आने वाले चुनावों में धनबाद का राजनीतिक शतरंज और भी दिलचस्प होने वाला है।
अखबारों की सुर्खियों में मुकाबला भले ही भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी संजीव कुमार अग्रवाल और बागी उम्मीदवार संजीव सिंह के बीच दिखाया गया, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कहीं अधिक जटिल थी। वास्तव में यह लड़ाई केवल “अधिकृत बनाम बागी” की नहीं थी, बल्कि स्थानीय गुटों, व्यक्तिगत प्रभाव, जातीय-सामाजिक समीकरण और पुराने राजनीतिक वर्चस्व के बीच की टकराहट थी। बागी गुट के नेताओं का स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता, व्यक्तिगत पहुँच और वर्षों से बने नेटवर्क ने निर्णायक भूमिका अदा किया।
धनबाद के सांसद ढुलू महतो ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। यदि वे अपनी पत्नी सावित्री देवी को मैदान में उतारते, तो उनका यह दांव राजनीतिक जोखिम भरा हो सकता था। बीजेपी के भीतर की आंतरिक गुटबाज़ी भी खुलकर सतह पर आती दिखी। अधिकृत प्रत्याशी के प्रदर्शन और स्थानीय स्तर पर अलग-अलग शक्ति-केंद्रों की सक्रियता ने यह स्पष्ट कर दिया कि संगठनात्मक एकजुटता उतनी सुदृढ़ नहीं थी, जितनी मानी जा रही थी।
अब जबकि संजीव सिंह मेयर पद पर काबिज हैं, स्थानीय सत्ता का संतुलन बदलता हुआ दिख रहा है। यदि उनकी जगह कोई अपेक्षाकृत कम प्रभावशाली चेहरा होता, तो संभवतः ढुलू महतो खेमे का दबदबा बना रहता। संजीव सिंह की सक्रियता और जीत ने सारे समीकरणों को बदल दिया है। उनके रहते ढुलू महतो के लिए अगली बार पार्टी टिकट हासिल करना सहज नहीं होगा, खासतौर पर यदि संगठन आंतरिक शक्ति-संतुलन और जीत की संभावनाओं को प्राथमिकता देता है।
चुनाव भले ही ढुलू महतो बनाम संजीव सिंह के द्वंद्व के रूप में प्रस्तुत हुआ हो, लेकिन चंद्रशेखर अग्रवाल का दूसरे स्थान पर आना यह दर्शाता है कि मतदाता मीडिया नैरेटिव से परे जाकर भी निर्णय लेते हैं। वहीं, संजीव अग्रवाल का फोर्थ स्थान पर खिसकना इस बात का संकेत है कि बहुकोणीय मुकाबले में रणनीतिक संतुलन कितना निर्णायक होता है।
पिछले लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर अग्रवाल की कांग्रेस के साथ बात भले नहीं बन पाई हो, लेकिन मौजूदा मेयर चुनाव के प्रदर्शन के बाद उन्हें नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं होगा। दूसरे स्थान पर रहकर भी उन्होंने जो राजनीतिक आधार और जनसमर्थन प्रदर्शित किया है, वह उन्हें आगामी चुनावी समीकरणों में एक गंभीर दावेदार बनाता है। चंद्रशेखर अग्रवाल आगामी लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के संभावित उम्मीदवार बन सकते है!
यदि शमशेर आलम और चंद्रशेखर अग्रवाल के बीच वोटों का विभाजन न होता, तो परिणाम की दिशा अलग हो सकती थी। इस चुनाव ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वामपंथ की जमीन पूरी तरह खिसकी नहीं है, उसका प्रभाव निर्णायक मोड़ पर अब भी असर डाल सकता है। केवल झारखंड मुक्ति मोर्चा के सहारे मुकाबला संभव नहीं था, लेफ्ट के समर्थन ने इस लड़ाई को वास्तविक चुनौती का रूप दिया।
धनबाद मेयर चुनाव के आँकड़े कई स्तरों पर राजनीतिक संकेत दे रहे हैं। सबसे पहले परिणाम पर नज़र डालें -
संजीव सिंह — 1,14,362 वोट
चंद्रशेखर अग्रवाल — 82,460 वोट
शमशेर आलम — 59,079 वोट
संजीव कुमार अग्रवाल — 57,895 वोट
धनबाद की राजनीति में संजीव सिंह एक ऐसे प्रभावशाली चेहरे के रूप में उभरे हैं, जिनकी अनदेखी करना किसी भी दल के लिए रणनीतिक भूल साबित हो सकता है। यदि बीजेपी उन्हें अपने से दूर जाने देती है, तो इसका असर केवल व्यक्ति-विशेष तक सीमित नहीं रहेगा, यह स्थानीय राजनीतिक पकड़ पर भी असर डाल सकता है।
संजीव सिंह की हालिया सफलता ने यह संकेत दिया है कि वे केवल एक चुनावी उम्मीदवार नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र शक्ति-केंद्र के रूप में स्थापित हो रहे हैं। ऐसे में यदि पार्टी उनके प्रभाव और जनाधार को समाहित करने के बजाय टकराव की राह चुनती है, तो यह उसे स्थानीय राजनीति में कमजोर कर सकता है।
भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी संजीव कुमार अग्रवाल के लिए यह चुनाव निराशाजनक रहा। उन्हें प्रबल दावेदार माना जा रहा था, पर वे टॉप थ्री में भी जगह नहीं बना सके। पहले ही राउंड से उन्हें तीसरे स्थान के लिए शमशेर आलम से संघर्ष करना पड़ा, जो बताता है कि संगठनात्मक समर्थन और जमीनी पकड़ में कहीं न कहीं कमी रह गई।
चुनाव में जयराम फैक्टर की भी चर्चा थी, लेकिन वह प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित नहीं हुआ। जयराम महतो समर्थित उम्मीदवार प्रकाश महतो पूर्व मेयर इंदु देवी को पीछे छोड़कर पाँचवें स्थान पर रहे। झारखंड लोक क्रांति मोर्चा (जेएलकेएम) के प्रकाश महतो को 21,727 मत मिले, जो संगठन की सीमित लेकिन स्थायी उपस्थिति का संकेत है।
सबसे चिंताजनक पहलू रहा मतदान प्रबंधन और जागरूकता की कमी। कुल 4,61,509 मत पड़े, जिनमें से 31,727 मत रद्द हो गए! यानी लगभग 7% वोट बर्बाद। बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने के बावजूद मतदाताओं को पर्याप्त प्रशिक्षण या मॉक ड्रिल नहीं दी गई। यह जिम्मेदारी राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन दोनों पर जाती है।
धनबाद का चुनावी T20 मुकाबले में केवल मेयर की कुर्सी नहीं, बल्कि स्थानीय सत्ता का भविष्य दांव पर था। इन परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि धनबाद की राजनीति अब बहुकोणीय हो चुकी है, जहाँ जीत का अंतर भले स्पष्ट हो, पर भविष्य की लड़ाई और अधिक पेचीदा होने वाली है। धनबाद जैसे बहुकोणीय और व्यक्तित्व-प्रधान राजनीति में जमीनी पकड़, नेटवर्क और सामाजिक समीकरण अक्सर संगठनात्मक पहचान से अधिक निर्णायक साबित होते हैं।


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