भारत–अमेरिका ट्रेड डील : भारत फर्स्ट, अमेरिका फर्स्ट या “एप्सटीन फाइल्स” फर्स्ट?

 



भारत–अमेरिका ट्रेड डील : भारत फर्स्ट, अमेरिका फर्स्ट या “एप्सटीन फाइल्स” फर्स्ट?


लेखक -अरुण कुणाल 


भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर बहस केवल टैरिफ़ और टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं रही। सवाल अब यह भी है कि इस सौदेबाज़ी की असली प्राथमिकता क्या है? वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के इस उथल-पुथल भरे दौर में भारत–अमेरिका व्यापार संबंध सिर्फ़ आयात–निर्यात का मामला नहीं रहे, वे रणनीतिक संतुलन, तकनीकी वर्चस्व और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का आईना बन चुके हैं। एक ओर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यूनाइटेड स्टेट्स है, तो दूसरी ओर सबसे तेज़ी से उभरती हुई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल इंडिया है! ऐसे में जब “ट्रेड डील” की बात होती है, तो सवाल उठता है कि इस समझौते में किसका गर्दन किसके हाथ में है?

भारत -अमेरिका ट्रेड डील को लेकर असमंजस तब ज्यादा बढ़ जाता है जब विदेश मंत्री एस जय शंकर और वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल सवाल का जवाब देने की बजाय पासिंग द बॉल गेम खेलते नज़र आते है! ट्रेड डील को लेकर ट्रम्प सरकार का हर रोज जिस तरह से बयान आ रहे है, उससे भारत के उद्योग जगत और किसानों के बीच निराशा बढ़ रही है! कॉर्पोरेट जगत के लिए मज़बूरी का नाम मोदी सरकार है पर किसान को डील के फायदे समझा पाना मुश्किल लग रहा है! खासकर के मक्का, जवार और कपास के किसान खुद को ठगा महसूस कर रहे है!

भारतीय राजनीति में इन दिनों दो समानांतर कथाएँ चल रही हैं। एक तरफ़ भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर कयास, वैश्विक दबाव और तथाकथित “एप्सटीन फाइल्स” की छाया है, दूसरी ओर राहुल गांधी के “पद्मव्यूह” को तोड़ने के लिए मोदी सरकार जरूरत से ज्यादा आक्रमक हो रही है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को निशाना बनाना, उस समय जब किसान और मजदूर असंतोष की स्थिति में हों, एक टिकाऊ रणनीति है?

जब मोदी कैबिनेट के वरिष्ठ सदस्य पीयूष गोयल जैसे नेता रात को 12 बजे सोशल मीडिया पर जवाब देते दिखें और हरदीप पुरी एप्सटीन फाइल्स पर सफाई देने की बजाए विपक्ष को टार्गेट करने लगे, तो यह संकेत देता है कि सत्ता पक्ष विपक्षी हमलों को गंभीर खतरे के रूप में देख रहा है। एप्सटीन फाइल्स और ट्रेड डील के जवाब में कैबिनेट मंत्रियों का “ट्रोल मंत्री” जैसी छवि, पार्टी समर्थकों के बीच गलत उदाहरण पेश कर सकता है। यदि सरकार हर आरोप का त्वरित, तीखा और व्यक्तिगत जवाब देती है, तो राजनीतिक विमर्श नीति से हटकर व्यक्ति-केन्द्रित हो जाती है।

राहुल गांधी की रणनीति पिछले कुछ वर्षों में आक्रामक नैरेटिव गढ़ने पर केंद्रित रही है, चाहे वह संसद के भीतर बहस हो या सड़कों पर भारत जोड़ो यात्रा और वोटर्स अधिकार यात्रा हो, जनता से सीधे संवाद करने में सफल रहे है! इतिहास बताता है कि जब सत्ताधारी दल विपक्ष को लगातार निशाना बनाता है, तो सरकार विरोधी संभावनाएँ जन्म लेती हैं! विपक्ष को निशाना बनाना लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है, परंतु जनता की प्राथमिकताओं को दरकिनार कर देना जोखिम भरा कदम है। 

रणनीति के स्तर पर देखें तो जवाबदेही से भागने की धारणा सबसे बड़ा जोखिम है। लोकतंत्र में सरकार की मजबूती इस बात से नहीं आँकी जाती कि वह विपक्ष पर कितनी तीखी टिप्पणी करती है, बल्कि इस बात से कि वह जनसरोकारों पर कितनी ठोस प्रतिक्रिया देती है। जब देश का किसान लागत और आय की चिंता में हो, जब युवा और मजदूर रोज़गार और महँगाई को लेकर बेचैन हो, जब घर संभाल रही महिलाओं की आर्थिक पीड़ा प्रबल हो, ऐसे में सरकार का संवाद नेता प्रतिपक्ष पर केंद्रित दिखे, तो विपक्ष को नैतिक बढ़त मिल जाती है।

यदि विपक्ष को टार्गेट करना ही मुख्य रणनीति बन जाए, तो यह अल्पकालिक लाभ दे सकता है लेकिन दीर्घकाल में जनता नीतिगत परिणाम देखती है। यदि सरकार यह दिखा सके कि ट्रेड डील राष्ट्रीय हित में है, किसान–मजदूर के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं, और विपक्ष के आरोप तथ्यहीन हैं तो आक्रामक जवाब रणनीतिक रूप से सही ठहर सकता है। लेकिन यदि ज़मीन पर असंतोष गहराता जाए और विमर्श केवल व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमे, तो वही चक्रव्यूह सत्ता के लिए उलटा पड़ सकता है।

21वीं सदी का असली खेल तकनीक और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का है। अमेरिका रणनीति चीन को तकनीकी रूप से अलग-थलग करने की है। इस परिप्रेक्ष्य में भारत एक “विश्वसनीय साझेदार” के रूप में उभरा है। कुछ वर्ष पहले अमेरिका ने भारत को “जनरलाइज़्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज़ (GSP)” से बाहर कर दिया था। यह संदेश साफ़ था कि यदि बाज़ार खोलना है तो पारस्परिकता के आधार पर होना चाहिए! अमेरिका चाहता था कि भारत कृषि, डेयरी और ई-कॉमर्स क्षेत्र में अधिक खुलापन दिखाए, जिसका परिणाम है ये ट्रेड डील!

भारतीय राजनीति में अक्सर आर्थिक फैसलों का बोझ किसी उद्योगपतियों के कंधे पर डालकर सरकारें अपने हाथ झाड़ लेने की कोशिश करती दिखती हैं। कच्चे तेल की कीमतों, रिफाइनरी मार्जिन या निर्यात–आयात नीति पर जब सवाल उठते हैं, तो बहस कॉरपोरेट बनाम सरकार की दिशा में मुड़ जाती है। लेकिन कृषि, विशेषकर कपास जैसे नकदी फसल का सवाल कहीं अधिक संवेदनशील है, क्योंकि वहाँ सीधे किसान की आय और सामाजिक संतुलन जुड़ा होता है।

भारत में टेक्सटाइल इंडस्ट्री और कपास किसान आजीविका की रीढ़ हैं, जो देश के 3.5 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार देते हैं। चीन के बाद भारत दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जहां लगभग 5.8 लाख किसान इस उद्योग से जुड़े हैं। गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। गुजरात देश का अग्रणी कपास उत्पादक राज्य है। 

भारत–अमेरिका ट्रेड वार्ता के बीच कपास का प्रश्न केवल कृषि नीति नहीं, बल्कि पूरी वैल्यू-चेन का संकट बनकर उभरा है। मान लीजिए टेक्सटाइल कंपनियों को बचाने 0% टैरिफ पर अमेरिकी कपास आयात की अनुमति दी जाती है तो घरेलू कीमतों पर दबाव आएगा और किसान की आय प्रभावित होगी। यदि आयात रोका जाता है, तो टेक्सटाइल उद्योग कच्चे माल की लागत और उपलब्धता को लेकर संकट में आ जाएगा। ऊपर से यदि बांग्लादेश, जैसा कि संकेत आ रहे है कि वह भारत से कपास लेना बंद कर देगा या आयात घटा सकता है, तो “खेत से बाज़ार” तक  बहुस्तरीय संकट पैदा हो सकता है।

नरेंद्र मोदी का राजनीतिक आधार भले राष्ट्रीय स्तर पर फैला हो, पर उनका गृह प्रदेश प्रतीकात्मक रूप से विशेष महत्व रखता है। गुजरात के कपास उत्पादक किसानों की नाराजगी केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि भावनात्मक और राजनीतिक संदेश बन सकती है! पंजाब और हरियाणा के किसान आंदोलनों ने राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित किया, परंतु वहाँ की क्षेत्रीय राजनीति पहले से विविध रही है। गुजरात जैसे राज्य में, जहाँ कपास उत्पादन और राजनीतिक प्रतीक दोनों मजबूत हैं, किसान असंतोष 2027 के गुजरात चुनाव में भारी पड़ सकता है।

अमेरिकी सब्सिडी पर अक्सर बहस होती रही है और विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भी कृषि समर्थन को लेकर विवाद होते रहे हैं। भारत लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि विकसित देशों की उच्च कृषि सब्सिडी विकासशील देशों के किसानों के साथ प्रतिस्पर्धा को असमान बनाती है। इन सब के बावजूद अमेरिकी कपास पर आयात शुल्क खत्म होने से भारतीय कपास किसानों को आर्थिक नुकसान और देश के टेक्सटाइल सेक्टर को झटका लगने का खतरा है, क्योंकि गरीब भारतीय किसान 64 लाख रुपये सालाना सब्सिडी वाले अमेरिकी किसानों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे।

भारत–अमेरिका ट्रेड डील केवल दो देशों के बीच समझौता नहीं, यह घरेलू राजनीतिक संतुलन की परीक्षा भी है। कच्चे तेल का खेल भले वैश्विक मंच पर तय हो, पर कपास का दाम खेत में तय होता है। सरकार यदि दोनों के बीच संतुलन साध लेती है, तो वह रणनीतिक जीत होगी। यदि संतुलन बिगड़ता है, तो वही सौदा राजनीतिक बोझ बन सकता है। अंततः, वैश्विक साझेदारी तभी टिकाऊ होती है जब घरेलू विश्वास मज़बूत हो और भारत में वह विश्वास शेयर बाजार से नहीं, खेत-खलिहान से शुरू होता है। 

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