नोबॉडीज़ गर्ल : ‘भारत-पाक वॉर’ रुकवाने वाले ने ‘एप्सटीन फाइल्स’ भी रुकवा दी!
नोबॉडीज़ गर्ल : ‘भारत-पाक वॉर’ रुकवाने वाले ने ‘एप्सटीन फाइल्स’ रुकवा दी!
*सत्ता और लोलिता का अपराध-पथ*
ले o - अरुण कुणाल
जो ‘भारत -पाक वॉर' रुकवाने का श्रेय ले रहा है, उसी ने ‘एप्सटीन फाइल्स’ पर भी ब्रेक लगा दिया। कुछ लोग वॉर से ज्यादा एप्सटीन फाइल्स रुकवाने पर राहत महसूस कर रहे होंगे और वे लोग ट्रम्प के लिए नोबेल पुरस्कार की सिफारिश जरूर करेंगे! ट्रम्प सरकार का तथाकथित 'ऑपरेशन कवर-अप' दरअसल ‘एप्सटीन कांड’ पर पर्दा डालने की एक नाकाम कोशिश भर है।
इससे कहीं बेहतर होता कि वर्जीनिया गिफ्रे पर आधारित पुस्तक ‘नोबॉडीज़ गर्ल’ को दुनिया भर में निर्बाध रूप से जारी कर दिया जाता। यह किताब जेफरी एप्सटीन के सेक्स-सिंडिकेट की वह भयावह सच्चाई सामने लाती है, जिसे सत्ता और ताकत के गठजोड़ ने वर्षों तक अंधेरे में छिपाए रखा।
‘नोबॉडीज़ गर्ल’ में दर्ज दास्तानें सिर्फ सनसनीखेज नहीं, बल्कि उस वैश्विक नेटवर्क का काला सच हैं, जिसमें सत्ता, पैसा और अपराध एक-दूसरे के संरक्षक बने हुए थे। यह किताब बताती है कि एप्सटीन अकेला नहीं था, वह एक पूरे सिस्टम का चेहरा भर था। सच को फाइलों में कैद किया जा सकता है, लेकिन इतिहास के कटघरे से बचाया नहीं जा सकता। और यही वजह है कि पिक्चर अभी बाकी है।
जेफरी एपस्टीन कांड को अक्सर अमेरिका और पश्चिमी देशों की नैतिक गिरावट के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह कहानी केवल न्यूयॉर्क, फ्लोरिडा या यूएस वर्जिन आइलैंड्स तक सीमित नहीं है। सत्ता, पूंजी और अपराध का यह गठजोड़ वैश्विक था और इसी कारण इसके निहितार्थ भारत तक भी पहुँचते हैं।
एपस्टीन का ‘लोलिता एक्सप्रेस’ नाम का निजी विमान, उस वैश्विक तंत्र का प्रतीक था जिसमें ताकतवर लोग सीमाओं, कानूनों और सभ्यताओं से ऊपर खुद को समझते थे। जेफ़री एपस्टीन का नाम केवल एक यौन अपराधी के रूप में ही नहीं, बल्कि एक विकृत मानसिकता के प्रतीक के रूप में भी दर्ज होता जा रहा है। हाल के दिनों में सामने आईं उसकी निजी जेट से जुड़ी तस्वीरों और विवरणों ने इस काले अध्याय को और भयावह बना दिया है। इस जेट को ‘लोलिता एक्सप्रेस’ कहा जाना महज़ संयोग नहीं लगता, बल्कि यह सीधे तौर पर एक 70 साल पुराने उपन्यास से जुड़ता है—व्लादिमीर नोबोकोव का ‘लोलिता’।
1955 में प्रकाशित लोलिता उपन्यास एक वयस्क पुरुष और नाबालिग लड़की के बीच विकृत यौन आकर्षण की कहानी है। साहित्यिक दुनिया में यह किताब शैली, भाषा और नैतिक बहसों के कारण चर्चित रही, लेकिन इसका मूल विषय हमेशा असहज और विवादास्पद रहा। एपस्टीन के मामले में यह असहजता केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वास्तविक जीवन के जघन्य अपराधों में बदल जाती है।
एपस्टीन से जुड़ी नई तस्वीरों में कथित तौर पर नाबालिग लड़कियों के नग्न शरीर पर लोलिता उपन्यास की पंक्तियाँ लिखी हुई दिखाई देती हैं। एक तस्वीर में बच्ची के पैरों के पास लोलिता किताब का रखा होना इस पूरे कांड को और भी प्रतीकात्मक बना देता है। यह दृश्य किसी सामान्य अपराध का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित मानसिक विकृति का संकेत देता है, जहां साहित्य को अपराध की भाषा में बदल दिया गया।
यह केवल यौन शोषण नहीं था, बल्कि पीड़ितों के शरीर को एक ‘कैनवास’ की तरह इस्तेमाल कर अपनी विकृत सोच को प्रदर्शित करने का प्रयास था। लोलिता की पंक्तियाँ यहाँ महज़ शब्द नहीं, बल्कि अपराधी की उस मानसिकता का बयान हैं, जिसमें नाबालिग देह को वस्तु, प्रयोग और सत्ता के प्रदर्शन का माध्यम माना जाता है।
एपस्टीन का अपराध इसलिए और भयावह हो जाता है क्योंकि वह इसे छिपाकर नहीं, बल्कि प्रतीकों और संकेतों के ज़रिये लगभग गर्व के साथ अंजाम देता दिखता है। ‘लोलिता एक्सप्रेस’ नाम, किताब की मौजूदगी और पंक्तियों का इस्तेमाल—ये सब मिलकर यह बताते हैं कि यह सिर्फ व्यक्तिगत विकृति नहीं थी, बल्कि एक सोच थी, जिसे वह सामान्य बनाने की कोशिश कर रहा था।
इस ‘लोलिता कनेक्शन’ को समझना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि यह हमें बताता है कि कैसे शक्ति, धन और बौद्धिक आवरण के पीछे छिपी विकृति सबसे खतरनाक रूप ले सकती है और कैसे साहित्य का दुरुपयोग अपराध को वैचारिक जामा पहनाने के लिए किया जा सकता है।
जेफरी एपस्टीन का नाम आज सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि सत्ता, धन और अपराध के उस जाल का प्रतीक बन चुका है, जिसने दशकों तक कानून और नैतिकता, दोनों को चुनौती दी। इस पूरी कहानी का सबसे बदनाम प्रतीक था उसका निजी विमान ‘लोलिता एक्सप्रेस’। एक ऐसा जेट, जिसकी उड़ानों के साथ सत्ता के गलियारों में सन्नाटा और पीड़ितों की जिंदगी में अंधेरा जुड़ा रहा।
‘लोलिता एक्सप्रेस’ जेफरी एपस्टीन का निजी जेट था, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर नाबालिग लड़कियों को अमेरिका से उसके निजी द्वीप लिटिल सेंट जेम्स (यूएस वर्जिन आइलैंड्स) ले जाने के लिए किया जाता था। यही द्वीप आगे चलकर “पेडोफाइल आइलैंड” के नाम से बदनाम हुआ। पीड़ितों और अदालत में आई गवाहियों के मुताबिक, इस द्वीप पर अमीर और ताकतवर मेहमानों के लिए लड़कियों को उपलब्ध कराया जाता था, जहां उनका यौन शोषण होता था। ‘लोलिता एक्सप्रेस’ नाम अपने-आप में इस भयावह सच्चाई की ओर इशारा करता है, यानी ऐसी उड़ानें जिनका बोझ सिर्फ ईंधन का नहीं, अपराध का भी था।
क्राइम पार्टनर ‘ग्लोबल गर्ल’ नादिया मार्सिंकोवा और घिसलेन मैक्सवेल!
इस गाथा का सबसे रहस्यमय नाम है नादिया मार्सिंकोवा—जिसे “ग्लोबल गर्ल” कहा जाता था। बताया जाता है कि एपस्टीन 2001 में उसे स्लोवाकिया से अमेरिका लाया, तब वह महज 15 साल की थी। अन्य पीड़ितों के अनुसार, एपस्टीन उसे अपमानजनक ढंग से अपनी “युगोस्लावियाई यौन दासी” कहा करता था। समय के साथ नादिया की भूमिका बदलती दिखती है।
मॉडल से पायलट बनने तक की उसकी यात्रा, और ‘लोलिता एक्सप्रेस’ में उसकी मौजूदगी, कई सवाल खड़े करती है। गवाहियों में यह भी सामने आया कि बाद के वर्षों में वह खुद अन्य लड़कियों पर अत्याचार करने लगी और एपस्टीन के सिस्टम का हिस्सा बन गई। हालांकि, यह आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि उसने कभी औपचारिक रूप से एपस्टीन के विमान को पायलट के रूप में उड़ाया या नहीं।
घिसलेन मैक्सवेल: एप्सटीन की प्रेमिका और राजदार!
एपस्टीन की मृत्यु के करीब एक साल बाद, जुलाई 2020 में उसकी सबसे करीबी सहयोगी घिसलेन मैक्सवेल को अमेरिकी जांच एजेंसियों ने गिरफ्तार किया। लंबी सुनवाई और कई पीड़ितों की गवाही के बाद दिसंबर 2021 में अदालत ने मैक्सवेल को नाबालिगों की यौन तस्करी और उससे जुड़े अपराधों के पांच मामलों में दोषी करार दिया।
मुकदमे के दौरान सामने आया कि मैक्सवेल सिर्फ एपस्टीन की सहयोगी नहीं, बल्कि उसके पूरे यौन शोषण नेटवर्क की एक अहम कड़ी थी। पीड़ितों के मुताबिक, वह नाबालिग लड़कियों की पहचान करती थी, उन्हें फुसलाती थी, “ग्रूमिंग” करती थी और बाद में एपस्टीन तथा उसके रसूखदार मेहमानों तक पहुंचाती थी। अदालत ने माना कि यदि मैक्सवेल की भूमिका न होती, तो एपस्टीन का यह अपराध तंत्र इतने वर्षों तक इतने संगठित रूप में नहीं चल पाता।
एपस्टीन की दुनिया में सबसे प्रभावशाली किरदार थीं घिसलेन मैक्सवेल। कभी उसकी प्रेमिका रहीं मैक्सवेल को एपस्टीन का सबसे करीबी और भरोसेमंद माना जाता था। आज वह 20 साल की सजा काट रही हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सजा उस पूरे नेटवर्क की सच्चाई को उजागर करने के लिए पर्याप्त है?
ट्रंप- एपस्टीन : ये रिश्ता क्या कहलाता है?
इस पूरे प्रकरण में एक तीसरी महिला, वर्जीनिया गिउफ्रे, का उल्लेख भी आवश्यक है। गिउफ्रे वही महिला थीं, जिन्होंने जेफ़री एपस्टीन और घिस्लेन मैक्सवेल पर नाबालिग अवस्था में यौन शोषण और तस्करी के गंभीर आरोप लगाए थे। गिउफ्रे ने यह स्वीकार किया था कि वह कभी डोनाल्ड ट्रम्प के मार-ए-लागो (Mar-a-Lago) क्लब में काम करती थीं, और वहीं उसकी मुलाकात एपस्टीन की पार्टनर मैक्सवेल से हुई थी।
डोनाल्ड ट्रम्प के प्रसिडेंट बनने के बाद वर्जीनिया गिउफ्रे का अप्रैल 2025 में ऑस्ट्रेलिया में 41 वर्ष की आयु में निधन हो गया। स्थानीय जांच एजेंसियों के अनुसार उनकी मृत्यु को आत्महत्या बताया गया। एपस्टीन प्रकरण से जुड़ी एक प्रमुख गवाह की यह असामयिक मौत, पहले से ही रहस्यों और साजिशों से घिरे इस मामले को और अधिक संवेदनशील तथा जटिल बना देती है।
वर्जीनिया गिफ्रे की मौत के बाद आई किताब 'नोबॉडीज गर्ल' एपस्टीन के सेक्स-सिंडिकेट की भयावह सच्चाई खोलती है। जेफरी एपस्टीन और उसके सेक्स-ट्रैफिकिंग नेटवर्क से जुड़ी बेहद गंभीर और सनसनीखेज दास्तानें दर्ज हैं। इसमें गिफ्रे ने विस्तार से बताया है कि कैसे उन्हें अत्यधिक बलपूर्वक, यौन तस्करी के ज़रिये शक्तिशाली पुरुषों के पास भेजा गया और बार-बार शोषण का सामना करना पड़ा! किताब में गिफ्रे का दावा है कि एक ‘नामी-गिरामी प्रधानमंत्री’ ने उनके साथ बलात्कार किया। पुस्तक में नाम नहीं है पर आरोप बेहद गंभीर। सत्ता, सेक्स और साज़िश का काला अध्याय है!
आग में घी डालने का काम ट्रंप के 2002 के एक इंटरव्यू ने किया, जिसमें उन्होंने कहा था—“मैं जेफ को 15 साल से जानता हूं। वह कमाल का आदमी है। हम दोनों को कम उम्र की खूबसूरत लड़कियां पसंद हैं।” आज 22 साल बाद यही बयान ट्रंप के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक बोझ बन गया है, क्योंकि एपस्टीन की फाइलें और नए खुलासे इस कथन को बार-बार जिंदा कर रहे हैं।
इस पूरे मामले में राजनीति तब और गरमा गई जब एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के लिए उस जेट का इस्तेमाल किया, जो कभी एपस्टीन के स्वामित्व में था।हालांकि यह विमान ‘लोलिता एक्सप्रेस’ नहीं था, लेकिन उस पर “ट्रम्प 2024” का नारा लिखा होना और उसका एपस्टीन से जुड़ा अतीत, दोनों ने अमेरिका में तूफान खड़ा कर दिया।
जेफरी एपस्टीन: एक मामूली टीचर से अरबपति तक का सफर!
जेफरी एपस्टीन की कहानी और भी डरावनी इसलिए है क्योंकि उसकी शुरुआत एक साधारण स्कूल टीचर के रूप में हुई थी। वॉल स्ट्रीट के निवेशकों से संपर्क बढ़ा, 1982 में उसने ‘एपस्टीन एंड कंपनी’ बनाई और देखते-देखते अरबपतियों का फाइनेंशियल सलाहकार बन गया। न्यूयॉर्क का सबसे बड़ा प्राइवेट घर, फ्लोरिडा की हवेली और निजी द्वीप, यह सब उसकी तेज उड़ान की गवाही देते हैं। लेकिन इसी उड़ान की कीमत दर्जनों नाबालिग लड़कियों ने अपनी जिंदगी से चुकाई।
एपस्टीन की पार्टियों में कई बड़े नामों की मौजूदगी की चर्चा रही—बिल क्लिंटन से लेकर स्टीफन हॉकिंग और माइकल जैक्सन तक। हालांकि, किसी की मौजूदगी अपराध में संलिप्तता का प्रमाण नहीं होती, लेकिन यह सवाल जरूर उठता है कि इतने शक्तिशाली लोग इतने लंबे समय तक इस अंधेरे को कैसे नजरअंदाज करते रहे?
एपस्टीन की मौत को भले ही आत्महत्या कहा गया हो, लेकिन उससे जुड़े सवाल, नाम और साजिशें आज भी जिंदा हैं। असल सवाल यह नहीं कि कौन-कौन उस विमान में बैठा, बल्कि यह है कि क्या कभी पूरी सच्चाई जमीन पर उतरेगी या फिर यह कहानी भी ताकतवरों की अगली उड़ान में कहीं गुम हो जाएगी।
एपस्टीन नेटवर्क : मोसाद का ‘हनी ट्रैप’
एपस्टीन नेटवर्क को लेकर एक और गंभीर आरोप इज़राइल के सत्ता–तंत्र तक संबंधों से जुड़ा रहा है। रिपोर्टों और खोजी पत्रकारों के दावों के अनुसार, जेफ़री एपस्टीन के संबंध इज़राइल के एक पूर्व प्रधानमंत्री सहित, कई प्रभावशाली इज़राइली व्यक्तियों से बताए जाते रहे हैं। इन्हीं संदर्भों के आधार पर समय–समय पर यह आशंका भी व्यक्त की जाती रही है कि एपस्टीन का पूरा नेटवर्क केवल व्यक्तिगत अपराध तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे इज़राइली खुफिया एजेंसी मोसाद द्वारा संचालित कथित ‘हनी ट्रैप’ ऑपरेशन की भूमिका भी हो सकती है।
हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि मोसाद की भूमिका को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि आज तक सामने नहीं आई है। इसके बावजूद, यह तथ्य नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि एपस्टीन की पहुँच केवल धनकुबेरों या सेलिब्रिटीज़ तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह राजनीति, सत्ता और खुफिया दुनिया के उच्चतम गलियारों तक फैली हुई थी। यह मामला वैश्विक सत्ता संरचनाओं, ब्लैकमेल राजनीति और अंतरराष्ट्रीय खुफिया खेलों की उस अंधेरी दुनिया की ओर इशारा करता है, जहाँ नैतिकता अक्सर ‘राष्ट्रीय हित’ के नाम पर कुचल दी जाती है।
एप्सटीन फाइल्स: पटेल बनाम खन्ना
एप्सटीन फाइल्स को लेकर इन दिनों अमेरिकी राजनीति में भारतीय मूल के दो नाम सबसे ज़्यादा चर्चा में हैं—एक, जो फाइलों को सार्वजनिक रोशनी में लाना चाहता है, और दूसरा, जो उन पर काली स्याही फेर कर मामला ठंडे बस्ते में डालने का पक्षधर दिखाई देता है। डेमोक्रेट सांसद रो खन्ना एप्सटीन फाइल्स को सार्वजनिक करने की मुहिम के सबसे मुखर और निर्णायक चेहरा बनकर उभरे हैं। अमेरिका में पले-बढ़े रो खन्ना न सिर्फ़ संवैधानिक पारदर्शिता की बात कर रहे हैं, बल्कि उनका पारिवारिक संदर्भ भी दिलचस्प है—वे महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय के वंशज बताए जाते हैं। शायद इसी विरासत का असर है कि वे सत्ता के बजाय सार्वजनिक जवाबदेही को प्राथमिकता देते नज़र आते हैं।
दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप के कट्टर समर्थक काश पटेल, जो एफबीआई चीफ़ जैसे संवेदनशील पद पर रहे हैं, को लेकर यह धारणा मज़बूत होती जा रही है कि उनके कार्यकाल में ऐसा कोई खुलासा होने की संभावना कम है, जिससे पूर्व या वर्तमान राष्ट्रपति ट्रंप को राजनीतिक नुकसान पहुँचे। आलोचकों का आरोप है कि पारदर्शिता के नाम पर जारी की जा रही फाइलें इतनी रेडैक्टेड हैं कि सच काग़ज़ों में दम घुटकर रह जाए।
लोलिता एक्सप्रेस संस्कृति: भारत के लिए सबक!
भारत खुद को नैतिकता, पारिवारिक मूल्यों और सभ्यतागत संस्कारों का वाहक मानता है। लेकिन वैश्वीकरण के दौर में भारत भी उसी वैश्विक शक्ति-संरचना का हिस्सा है, जहां पूंजी और प्रभाव अक्सर जवाबदेही से बच निकलते हैं। एपस्टीन कांड हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या भारत भी ऐसी किसी “लोलिता एक्सप्रेस संस्कृति” से पूरी तरह अछूता है?
भारत में भी समय-समय पर बड़े सेक्स-तस्करी रैकेट, नाबालिगों के शोषण और प्रभावशाली लोगों को बचाने के आरोप सामने आते रहे हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि यहां ‘प्राइवेट आइलैंड’ नहीं होते, बल्कि आलीशान फार्महाउस, रिसॉर्ट्स और “सीक्रेट पार्टियां” होती हैं, जहां कानून अक्सर पहुंच नहीं पाता।
एपस्टीन को 2005 में गिरफ्तार किया गया, लेकिन प्रभाव के चलते उसे वर्षों तक नरमी मिलती रही। भारत में भी “पॉक्सो एक्ट” जैसे सख्त कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन अक्सर कमजोर पड़ जाता है, खासतौर पर जब आरोपी रसूखदार हों।
एपस्टीन की मौत ने यह भी दिखाया कि अगर जांच अधूरी रह जाए, तो न्याय हमेशा के लिए दफन हो सकता है। भारत के लिए यह चेतावनी है कि मामलों को सिर्फ सजा तक नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क के खुलासे तक ले जाना जरूरी है।
यह कांड हमें आईना दिखाता है कि अगर पैसा और प्रभाव को बिना जवाबदेही के छोड़ दिया गया, तो सभ्यता का दावा खोखला हो जाता है। भारतीय राजनीति के लिए यह एक बड़ा सबक है। यहां भी अक्सर नेताओं के विवादित बयान, महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियां या अपराधियों से नजदीकी को “राजनीतिक शोर” कहकर टाल दिया जाता है। एपस्टीन कांड बताता है कि समय भले बीत जाए, लेकिन सच एक दिन लौटकर जरूर आता है।
‘

Comments
Post a Comment