एपस्टीन फाइल्स का ‘शनि-वार’: भारत और ट्रम्प को राहत, सारा फोकस बिल क्लिंटन पर शिफ्ट
एपस्टीन फाइल्स का ‘शनि-वार’: भारत और ट्रम्प को राहत, सारा फोकस बिल क्लिंटन पर शिफ्ट!
ले o - अरुण कुणाल
अमेरिका में यौन अपराध के दोषी जेफ़री एपस्टीन से जुड़े लंबे समय से गोपनीय रखे गए सरकारी दस्तावेज़ों की सार्वजनिक रिलीज़ 19 दिसंबर 2025 से शुरू हो चुकी है। अमेरिकी न्याय विभाग ने कांग्रेस द्वारा पारित ‘एपस्टीन फ़ाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट’ के तहत हज़ारों पन्नों के दस्तावेज़ और सैकड़ों तस्वीरें जारी की हैं। इनमें एपस्टीन से जुड़ी जांच रिपोर्टें, फ्लाइट लॉग्स, फोटोग्राफ़्स और अन्य आधिकारिक रिकॉर्ड शामिल हैं।
हालांकि, यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप प्रशासन का न्याय विभाग, जिसके पास दस्तावेज़ों की रिलीज़ पर पूर्ण नियंत्रण है, कितनी सामग्री वास्तव में सार्वजनिक करेगा और दस्तावेज़ों के चयन की प्रक्रिया किन मानकों पर आधारित है। पारदर्शिता के दावे के बावजूद, दस्तावेज़ों की आंशिक और चयनात्मक रिलीज़ कई सवाल खड़े कर रही है।
पीड़ितों की गोपनीयता की सुरक्षा का हवाला देते हुए जारी दस्तावेज़ों में व्यापक स्तर पर सेंसरशिप देखने को मिली है। विशेष रूप से, 254 मालिश करने वाली महिलाओं के नामों की सूची वाले सात पूरे पन्नों को पूरी तरह काले रंग से ढक दिया गया है, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि किन व्यक्तियों और नेटवर्क्स की जांच हुई थी।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि दस्तावेज़ों की रिलीज़ में किया गया यह विलंब सीधे-सीधे उसी कानून के उल्लंघन की ओर इशारा करता है, जिस पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नवंबर में हस्ताक्षर किए थे। कानून के अनुसार, न्याय विभाग को एपस्टीन से जुड़े सभी गैर-वर्गीकृत दस्तावेज़, सीमित अपवादों को छोड़कर, 30 दिनों के भीतर सार्वजनिक करना अनिवार्य था।
इस देरी और अधूरी पारदर्शिता ने न केवल न्याय विभाग की मंशा पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि एपस्टीन प्रकरण से जुड़े प्रभावशाली नामों और संस्थानों को बचाने की कोशिशें अब भी जारी हो सकती हैं।
भारतीय समय के अनुसार शनिवार रात 2:30 बजे जेफ्री एपस्टीन फाइल्स से जुड़े नए दस्तावेज़ सार्वजनिक किए गए। भारत के लिए राहत की बात यह है कि अब तक जारी किए गए एपस्टीन से जुड़े दस्तावेज़ों में कोई भी आपत्तिजनक तस्वीर सामने नहीं आई है। फिलहाल सार्वजनिक किए गए रिकॉर्ड में केवल कुछ ई-मेल संवादों का उल्लेख है, जिनका संबंध भारत के दो बड़े नेता, एक उद्योगपति और भारतीय मूल के एक लेखक से बताया जा रहा है।
इन ई-मेल्स का संदर्भ संभावित बैठकों से जुड़ा हुआ है। उल्लेखनीय है कि अभी तक ऐसा कोई दृश्य या दस्तावेज़ी प्रमाण सामने नहीं आया है जो किसी वास्तविक मुलाक़ात या प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि करता हो। दस्तावेज़ों में जिन ई-मेल्स का जिक्र है, वे सभी वर्ष 2014 के बाद की अवधि से संबंधित बताए जा रहे हैं, जब जेफ़री एपस्टीन एक बदनाम शायर था!
यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि जेफ़री एपस्टीन को वर्ष 2008 में नाबालिग से जुड़े यौन अपराध के मामले में 18 महीने की जेल की सजा हो चुकी थी। इसके बाद वह एक दागी और दोषसिद्ध व्यक्ति के रूप में जाना जाता था। ऐसे में उसके साथ किसी भी संभावित संपर्क या संवाद को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना आवश्यक है।
अब तक सामने आए दस्तावेज़ यह संकेत तो देते हैं कि कुछ स्तर पर संवाद हुआ हो सकता है, लेकिन न तो किसी अवैध गतिविधि का प्रमाण मिला है और न ही किसी प्रत्यक्ष सहभागिता की पुष्टि हुई है। ऐसे में केवल ई-मेल्स के आधार पर निष्कर्ष निकालना न केवल जल्दबाज़ी होगी, बल्कि यह जांच की प्रक्रिया और तथ्यों दोनों के साथ अन्याय भी होगा।
नए जारी किए गए दस्तावेज़ों और तस्वीरों में एक अहम तथ्य यह है कि डोनाल्ड ट्रम्प का नाम और तस्वीरें लगभग पूरी तरह अनुपस्थित हैं, जबकि सामने आई अधिकांश तस्वीरें अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से संबंधित बताई जा रही हैं। इस असमानता ने राजनीतिक और मीडिया हलकों में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसी आधार पर यह संभावना जताई जा रही है कि ट्रम्प प्रशासन ने गोपनीयता और पीड़ितों की सुरक्षा के नाम पर दस्तावेज़ों के चयन और प्रस्तुति में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया हो सकता है। दस्तावेज़ों की आंशिक रिलीज़ और व्यापक सेंसरशिप इस संदेह को और गहरा करती है।
यह विरोधाभास अब ट्रम्प प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है! एक ओर चुनावी वादे, दूसरी ओर सत्ता में आने के बाद पारदर्शिता से पीछे हटने का आरोप। एपस्टीन फाइल्स को लेकर जारी यह असमंजस अमेरिकी राजनीति में जवाबदेही और नैतिकता की बहस को और तेज़ कर रहा है।
हालांकि, इस चरण पर किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाज़ी होगी। न्याय विभाग द्वारा स्पष्ट किया गया है कि दस्तावेज़ों की यह प्रक्रिया चरणबद्ध है और आने वाले दो हफ्तों में और भी सामग्री सार्वजनिक की जानी है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आगे जारी होने वाले दस्तावेज़ किस हद तक पारदर्शिता के दावों पर खरे उतरते हैं।
इस पूरे मामले पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पहले ही अपना पक्ष रख चुके हैं। क्लिंटन का कहना है कि उन्हें जेफ्री एपस्टीन के साथ अपने सीमित मेलजोल पर अफसोस है, लेकिन उन्हें उसकी किसी भी आपराधिक गतिविधि की जानकारी नहीं थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि एपस्टीन के अपराधों से जुड़े तथ्य सार्वजनिक होने से पहले ही उन्होंने उससे सभी प्रकार का संपर्क समाप्त कर लिया था।
नई तस्वीरों और दस्तावेज़ों के सामने आने के बाद बिल क्लिंटन की प्रवक्ता ने ट्रंप प्रशासन पर पलटवार किया है। प्रवक्ता का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष पारदर्शिता दिखाने के बजाय खुद को राजनीतिक रूप से बचाने में जुटा हुआ है।
प्रवक्ता ने दोहराया कि पूर्व राष्ट्रपति का एपस्टीन के अपराधों से कोई संबंध नहीं था और जैसे ही उसके खिलाफ गंभीर आरोप सामने आए, क्लिंटन ने उससे दूरी बना ली थी। साथ ही यह भी कहा गया कि दस्तावेज़ों की चयनात्मक रिलीज़ से संदेह और भ्रम फैल रहा है, जिससे सच्चाई सामने आने के बजाय राजनीतिक नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं।
एपस्टीन फाइल्स को लेकर ट्रंप प्रशासन की लगातार हिचकिचाहट ने राष्ट्रपति के कट्टर समर्थकों को भी असहज स्थिति में ला खड़ा किया। ट्रंप के परंपरागत समर्थक माने जाने वाले उद्योगपति एलन मस्क जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों ने भी सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगाया कि ट्रंप प्रशासन जानबूझकर इस मामले से जुड़े दस्तावेज़ों को दबाने की कोशिश कर रहा है।
डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने चुनावी अभियान के दौरान यह स्पष्ट ऐलान किया था कि वह जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी सभी फाइलों को पूरी तरह सार्वजनिक करेंगे। ट्रम्प ने इसे “सच को सामने लाने” और “डीप स्टेट को बेनकाब करने” का वादा बताया था।
राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रम्प का रुख बदला हुआ नजर आया। एपस्टीन फाइल्स को सार्वजनिक करने के मुद्दे पर उन्होंने न सिर्फ हिचकिचाहट दिखाई, बल्कि इस पूरे मामले को “डेमोक्रेटिक साजिश” और “राजनीतिक धोखा” करार दिया। ट्रम्प का तर्क रहा कि इन फाइलों का इस्तेमाल उनके खिलाफ राजनीतिक हथियार के तौर पर किया जा रहा है।
इस मुद्दे पर महीनों तक चली राजनीतिक खींचतान, मीडिया दबाव और सार्वजनिक आलोचना के बाद अंततः राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को झुकना पड़ा। 19 नवंबर को उन्होंने ‘एपस्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट’ पर हस्ताक्षर कर दिए, जिसे अमेरिकी कांग्रेस ने भारी बहुमत से पारित किया था।
कानून पर हस्ताक्षर के बाद, शुक्रवार को अमेरिकी न्याय विभाग ने इस प्रकरण से जुड़े लगभग तीन लाख पन्नों के दस्तावेज़ सार्वजनिक कर दिए। हालांकि, इन फाइलों की आंशिक सेंसरशिप और चयनात्मक रिलीज़ ने यह बहस अभी खत्म नहीं की है कि क्या यह कदम वास्तविक पारदर्शिता की दिशा में है या केवल बढ़ते राजनीतिक दबाव को शांत करने का प्रयास।
एपस्टीन प्रकरण केवल व्यक्तिगत नामों तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी सत्ता, न्याय व्यवस्था और राजनीतिक नैतिकता की परीक्षा भी है। अगले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि यह प्रक्रिया वास्तविक पारदर्शिता की ओर बढ़ती है या फिर चयनात्मक खुलासों तक ही सीमित रह जाती है।
भारत के लिए सवाल यह नहीं है कि एपस्टीन मामले से हमारा कोई लेना देना था या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम अपने यहां मौजूद 'एपस्टीन-संस्कृति' को पहचानने और खत्म करने का साहस रखते हैं? क्योंकि अगर नहीं, तो फर्क सिर्फ इतना होगा कि वहां ‘लोलिता एक्सप्रेस’ थी और यहां अपराध किसी और नाम से उड़ान भरता रहेगा।

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