डिलिमिटेशन बिल पर नार्थ फर्स्ट बनाम साउथ फर्स्ट : क्या महिला आरक्षण की बोतल से निकलेगा परिसीमन का जिन्न?

डिलिमिटेशन बिल पर नार्थ फर्स्ट बनाम साउथ फर्स्ट : क्या महिला आरक्षण की बोतल से निकलेगा परिसीमन का जिन्न?

                            लेखक- अरुण कुणाल 


भारतीय राजनीति में कई बार बड़े सुधार वन प्लस वन पैकेज के रूप में सामने आते हैं, जहां एक लोकप्रिय और व्यापक समर्थन वाले मुद्दे के साथ एक जटिल और विवादित विषय भी जोड़ दिया जाता है। आज महिला आरक्षण और डिलिमिटेशन का समीकरण कुछ ऐसा ही संकेत दे रहा है। महिला आरक्षण बिल के साथ डिलिमिटेशन ऑफर आधी आबादी के की राह में रोड़ा बन गया है!

संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र के दौरान तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए जाने प्रस्तावित हैं, जो महिला आरक्षण के साथ -साथ भारत के प्रतिनिधित्व तंत्र को नया रूप दे सकते हैं। इन विधेयकों में संविधान (131वां संशोधन) बिल, परिसीमन बिल 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल शामिल हैं।

महिला आरक्षण बिल , जिसे औपचारिक रूप से ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ कहा जाता है, लंबे समय से लंबित एक ऐतिहासिक सुधार माना जा रहा है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में यह एक अहम कदम है। लेकिन इसके साथ जुड़ी  'डिलिमिटेशन' की शर्त, पूरे विमर्श को नया मोड़ देती नज़र आ रही है।

गौरतलब है कि मनमोहन सिंह सरकार के दौरान 9 मार्च 2010 को महिला आरक्षण विधेयक, यानी 108वां संविधान संशोधन बिल, राज्यसभा में भारी हंगामे और विरोध के बीच पारित हुआ था। उस समय बिल का विरोध करने वाले सांसदों को हटाने के लिए मार्शलों की मदद भी ली गई थी। हालांकि यह विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो पाया था, लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि राज्यसभा में पारित किए गए बिल स्वतः समाप्त नहीं होते। उन्हें लंबित रखा जा सकता है, जैसा कि इस मामले में पिछले 16 वर्षों से होता आया है।

131वें संविधान संशोधन बिल को पारित होने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है, जो जादुई आंकड़ा फिलहाल बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के पास नहीं है। ऐसे में यह तर्क उभरता है कि सत्तापक्ष महिला आरक्षण के मुद्दे के जरिए विपक्ष पर नैतिक दबाव बनाकर डिलिमिटेशन से जुड़े प्रावधानों को आगे बढ़ाना चाहता है। साफ शब्दों में कहें तो यह एक तरह का “वन प्लस वन” ऑफर प्रतीत होता है, यानी महिला आरक्षण बिल के साथ डिलिमिटेशन का एजेंडा भी साथ में आगे बढ़ाने की मार्केटिंग चाल है!

दरअसल,2024 में अयोध्या में झटका लगने और वाराणसी जैसी प्रतिष्ठित सीट पर जीत का अंतर कम होने के बाद बीजेपी की रणनीतियों को नए सिरे से देखा जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि SIR और परिसीमन उसी व्यापक “चाणक्य नीति” का हिस्सा हैं, जिसके जरिए भविष्य के चुनावी समीकरण साधने की कोशिश हो रही है।

महिला आरक्षण का जो मुद्दा सरकार लगभग तीन वर्षों तक टालती रही, उस पर अचानक तेजी से आगे बढ़ना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है। विपक्ष का कहना है कि 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण करने की कोशिश इसलिए हो रही है, ताकि राजनीतिक भूगोल को इस तरह बदला जा सके, जो सत्तापक्ष के लिए अनुकूल हो। इस दृष्टिकोण के अनुसार, उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में सीटों का अनुपात बढ़ने से चुनावी गणित बदल सकता है, और 2029 के संभावित नुकसान को लाभ में बदला जा सकता है। 

महिला आरक्षण पर लगभग सभी राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से सहमत दिखते हैं। चाहे बीजेपी हो, कांग्रेस हो या फिर क्षेत्रीय दल, कोई भी महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता से कोई इनकार नहीं करता हैं। लेकिन विपक्ष 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन किए जाने का विरोध कर रहा है। विपक्ष का रुख साफ है कि महिला आरक्षण को बिना किसी जटिल शर्त के लागू किया जाए और परिसीमन जैसी प्रक्रिया को 2027 की जनगणना के बाद, व्यापक सहमति और पारदर्शिता के साथ ही आगे बढ़ाया जाए।

कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष की मांग है कि लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों में से एक-तिहाई सीटें सीधे तौर पर महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएं। इसके साथ ही अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से आने वाली महिलाओं के लिए भी इस 33% आरक्षण के भीतर उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए, ताकि सामाजिक न्याय का दायरा व्यापक हो सके।

सत्ता पक्ष को भी यह भली-भांति पता है कि विपक्ष के समर्थन के बिना इस तरह के संवैधानिक बिल को पारित कराना आसान नहीं होगा। शायद यही वजह है कि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के चुनाव से ठीक पहले संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है। बीजेपी के लिए यह एक “विन-विन” रणनीति प्रतीत होती है। यदि बिल पास हो जाता है, तो सरकार इसे अपनी बड़ी जीत के रूप में पेश करेगी। और यदि पास नहीं होता, तो चुनावी मंचों से यह नैरेटिव गढ़ा जाएगा कि कौन दल महिला आरक्षण के पक्ष में है और कौन उसके विरोध में खड़ा है?

इस तरह, महिला आरक्षण का मुद्दा जहां सार्वजनिक रूप से सहमति का विषय है, वहीं परिसीमन का सवाल राजनीतिक अविश्वास और टकराव का केंद्र बन गया है। लेकिन इस पूरे विमर्श की परतें थोड़ी गहराई से खोलें, तो तस्वीर कुछ और ही सामने आती है। महिला आरक्षण से जुड़ा कानून ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ वर्ष 2023 में ही पारित हो चुका है और उसके प्रावधानों के अनुसार इसे जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, संभावित रूप से 2029 तक लागू किया जाना है।

यानी वर्तमान बहस का मूल मुद्दा महिला आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन से जुड़ा नया संवैधानिक संशोधन है। यही वह बिंदु है, जिस पर  कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन सरकार का विरोध कर रहा है। विपक्ष का तर्क है कि सरकार अपने ही पूर्व रुख से पीछे हटती दिखाई दे रही है। लगभग तीस महीने पहले यही कहा गया था कि पहले नई जनगणना कराई जाएगी, उसके बाद परिसीमन होगा, और तब जाकर महिला आरक्षण लागू किया जाएगा। 

अगर इसे राजनीतिक दृष्टि से देखें, तो यह सरकार की एक “स्मार्ट पैकेजिंग” हो सकती है। महिला आरक्षण जैसे लोकप्रिय मुद्दे के साथ डिलिमिटेशन को जोड़कर सरकार उस पर व्यापक विरोध को कम करना चाहती है। लेकिन विपक्ष के विरोध के कारण यह रणनीति उलटी भी पड़ सकती है। क्योंकि जहां महिला आरक्षण समर्थन जुटाता है, वहीं डिलिमिटेशन आशंकाएं पैदा करता है। ऐसे में दोनों को साथ लाने से सहमति और असहमति का टकराव तेज हो सकता है।

महिलाओं के मुद्दे की आड़ लेकर मोदी सरकार परिसीमन से जुड़े प्रावधानों को आगे बढ़ाना चाहती है, जिसे विपक्ष एक संभावित “भस्मासुर” के रूप में देख रहा है। उसका तर्क है कि यह ऐसा कदम हो सकता है, जो अंततः विपक्ष की राजनीतिक ताकत को ही कमजोर कर दे। मोदी सरकार को शायद उम्मीद थी कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इस प्रस्ताव का समर्थन कर देंगे, लेकिन फिलहाल उनका रुख साफ दिखाई देता है कि वह ऐसे किसी भी कदम के पक्ष में नहीं हैं, जिसे विपक्ष लोकतांत्रिक संतुलन के लिए खतरा मानता है।

डिलिमिटेशन बिल में एक प्रस्ताव यह भी है कि इस प्रावधान को संविधान से निकालकर सामान्य कानून के दायरे में लाया जाए। आज संविधान में निहित ‘दो-तिहाई बहुमत’ की अनिवार्यता के कारण विपक्ष के पास प्रभावी वीटो की शक्ति रहती है, लेकिन यदि इसे सामान्य कानून बना दिया गया, तो भविष्य में कोई भी सरकार साधारण बहुमत के आधार पर इसमें बदलाव कर सकेगी।

नॉर्थ बनाम साउथ की बहस अब खुलकर सामने आने लगी है। एम . के. स्टालिन ने काली शर्ट पहनकर विरोध दर्ज कराया, काला झंडा लहराया और परिसीमन बिल की प्रति जलाकर इस राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत का स्पष्ट संकेत दे दिया है। हालांकि इस मुद्दे पर एन. चन्द्राबाबू नायडू का खुलकर साथ न आना इस विरोध को कुछ हद तक कमजोर कर सकता है, लेकिन इसके बावजूद संदेश साफ है कि दक्षिण भारत में “नॉर्थ फर्स्ट” जैसी धारणा को लेकर असहजता बढ़ रही है।

दक्षिण के केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और अन्य वे प्रदेश, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया, आज अपने राजनीतिक महत्व को कम होते देख रहे हैं। जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में, जहाँ जनसंख्या अपेक्षाकृत तेज़ी से बढ़ी, उन्हें इससे अधिक राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या संबंधी मुद्दों को संभाला, क्या उन्हें परिसीमन के नाम पर दंडित किया जाना उचित है?

दरअसल, यह विरोध केवल परिसीमन तक सीमित नहीं है। दक्षिणी राज्यों की लंबे समय से यह शिकायत रही है कि वे केंद्र को अपेक्षाकृत अधिक टैक्स योगदान देते हैं, लेकिन बदले में उनकी हिस्सेदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व संतुलित नहीं रहता। अब जब परिसीमन के जरिए सीटों के पुनर्वितरण की बात हो रही है, तो यह आशंका और गहरा गई है कि उनका प्रभाव और कम हो सकता है।

असम और जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से परिसीमन किया गया है, उससे यह आशंका ज़रूर पैदा होती है कि राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने की गुंजाइश बनी रहती है। विपक्ष का आरोप रहा है कि परिसीमन की प्रक्रिया का इस्तेमाल सीटों के स्वरूप को इस तरह बदलने के लिए किया जा सकता है, जिससे किसी दल का प्रभाव सीमित हो जाए।

उदाहरण के तौर पर, यदि किसी पार्टी का वोट बैंक 10 सीटों पर प्रभावी है, तो परिसीमन के जरिए उसकी भौगोलिक संरचना को इस तरह बदला जा सकता है कि उसका असर घटकर 2–3 सीटों तक सिमट जाए। इसी तरह, विरोधी मतदाताओं के इलाकों को अलग-अलग सीटों में बाँटकर किसी विशेष पार्टी के पक्ष में “सुरक्षित” सीटें बनाई जा सकती हैं।

हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि आधिकारिक तौर पर परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण और प्रतिनिधित्व को संतुलित करना होता है। लेकिन जब प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो यह बहस तेज हो जाती है कि क्या यह केवल तकनीकी अभ्यास है या राजनीतिक प्रभाव का उपकरण भी बन सकता है।

यही कारण है कि SIR में उठे सवालों के बाद डिलिमिटेशन को लेकर संदेह और गहरा गया है। यह धारणा बन रही है कि यदि SIR में कुछ खामियां रह गईं, तो उन्हें परिसीमन के जरिए “संतुलित” किया जा सकता है और इस तरह एक राजनीतिक रूप से “अभेद किला” तैयार किया जा सकता है। इसीलिए विपक्ष लगातार यह मांग कर रहा है कि परिसीमन की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और व्यापक सहमति के साथ हो, ताकि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की विश्वसनीयता पर कोई आंच न आए।

यह भी एक दिलचस्प विरोधाभास है कि जिस महिला आरक्षण को सशक्तिकरण का प्रतीक बताया जा रहा है, वही एक जटिल शर्त 'डिलिमिटेशन' से जुड़ा हुआ है। यानी महिलाओं को प्रतिनिधित्व तो मिलेगा, लेकिन कब और कैसे? यह एक दूसरी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। इससे यह सवाल उठता है कि क्या सरकार महिला आरक्षण के पक्ष में है, या वेस्ट बंगाल और तमिलनाडु चुनाव के बीच संसद का विशेष सत्र एक बड़े राजनीतिक समीकरण का हिस्सा है ?

राजनीतिक भाषा में कहें तो यह टकराव अब केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि “नैरेटिव बनाम आशंका” की लड़ाई बन चुका है, जहां एक पक्ष इसे सुधार के रूप में पेश कर रहा है, तो दूसरा इसे सत्ता संतुलन बदलने की कोशिश के तौर पर देख रहा है। यह टकराव केवल एक विधेयक का विरोध नहीं, बल्कि संघीय ढांचे, संसाधनों के बंटवारे और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के व्यापक सवालों से जुड़ा हुआ है, जहां आने वाले समय में केंद्र और राज्यों के रिश्तों की नई परिभाषा तय हो सकती है।

इसलिए जरूरी है कि महिला आरक्षण को उसके मूल उद्देश्य महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में देखा जाए, और डिलिमिटेशन पर अलग, व्यापक और सहमति आधारित चर्चा हो। अन्यथा यह खतरा बना रहेगा कि महिला आरक्षण की “बोतल” से निकला “परिसीमन का जिन्न” पूरे राजनीतिक परिदृश्य को नई और अनियंत्रित दिशा में ले जाए। 

सदन में किसी विधेयक को पेश करने के लिए सदन की अनुमति आवश्यक होती है। आज जब 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया जा रहा था, तो विपक्ष ने इस पर मतदान की मांग करके सरकार को असहज स्थिति में ला दिया। मतदान के आंकड़े भी काफी कुछ संकेत देते हैं- सदन में मौजूद 436 सांसदों में से सत्ता पक्ष को 251 और विपक्ष को 185 वोट मिले। लोकसभा में साधारण बहुमत का आंकड़ा 272 होता है। इस लिहाज से देखा जाए तो सरकार इस चरण में साधारण बहुमत का आंकड़ा भी नहीं छू पाई, जो आगे की प्रक्रिया के लिए एक राजनीतिक संकेत माना जा सकता है। 

अब नजरें 17 अप्रैल शाम 4 बजे होने वाले मतदान पर टिकी हैं, जब इन तीन महत्वपूर्ण विधेयकों पर फैसला होना है। सबसे दिलचस्प पहलू क्रॉस-वोटिंग का रहेगा। अगर कहीं भी संख्या में हलचल होती है, तो यह न केवल इन विधेयकों के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि आने वाले चुनावी माहौल और राजनीतिक समीकरणों पर भी सीधा असर डालेगा।



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