#BhonsleTheMovie
इतना सन्नाटा क्यों है भाई...
ए॰ एम॰ कुणाल
अगर फ़िल्म शोले का ए० के० हंगल साहब का डायलॉग "इतना सन्नाटा क्यों है भाई", आप भूल चुके है तो "भोंसले" ज़रूर देखें। मनोज बाजपेयी मुंबई के शोर को अपने अंदर समेटे एक साठ साल का एंग्री यंग मैन का रोल प्ले कर रहे है, जो बग़ैर एक शब्द कहे आपको एहसास करा देगा कि "बुड्ढ़ा होगा तेरा बाप!"
जब-जब लगता है कि मनोज बाजपेयी का समय पूरा हो गया है, वे "गैंग्स ऑफ वासेपुर" और "अलीगढ़" जैसी फ़िल्म लेकर आ जाते है। अपने डायलॉग डिलीवरी के लिए मशहूर मनोज फ़िल्म भोंसले बिल्कुल नए अंदाज़ में दिख रहे है। उनकी ऐक्टिंग को देख कर लगेगा कि डायलॉग राइटर की ज़रूरत ही नहीं है। इस फ़िल्म में मनोज बाजपेयी ने शब्द से ज़्यादा बॉडी लैंग्वेज पर ज़ोर दिया है। भोंसले के किरदार को समझने के लिए दर्शकों को काफ़ी मेहनत करनी पड़ेगी। भोंसले के कई रंग देखने को मिलेंगे। शांत सा रहने वाला भोंसले पटाके की आवाज़ पर चिड़चिड़ा हो जाता है। सच्चाई के लिए आवाज़ उठाने वाला भोंसले नौकरी के लिए अपने साहब को चाय पिलाता नज़र आता है। एकांत जीवन जीने वाला भोंसले एक प्रवासी की आवाज़ बन जाता है। यहाँ तक कि फ़िल्म के निर्देशक देबाशीष मखीजा ने भोंसले की अनकही लव स्टोरी को समझने की ज़िम्मेदारी भी दर्शकों पर छोड़ दी है।
उत्तर भारतीय वर्सेस मराठी का मुद्दा कोई नया सब्जेक्ट नहीं है पर उस सच्चाई को जिस ख़ूबसूरती से फ़िल्माया गया है, उसके पीछे देबाशीष मखीजा की मेहनत साफ़ दिखाई देती है। इसके लिए वे पिछले छह साल से लगें हुए थे।
फिल्म भोंसले प्रवासी और स्थानीय लोगों के बीच गहरी होती खाई की कहानी है। कहानी गणेश चतुर्थी से शुरू होती है और खत्म विसर्जन पर होती है। गणपत भोंसले (मनोज बाजपयी) एक पुलिसवाला हैं । उसकी दुनिया काफ़ी सीमित है। उसे बस अपने काम-से- काम है। अगर कोई उससे बात करता तो उसका एक लाईनर जवाब होता है। उसके चौल में एक ड्राईवर रहता है, जिसका नाम विलास (संतोष जुवेकर) है, वह उत्तर भारतीयों के खिलाफ सबको भड़काता रहता है। बिहार की सीता (इप्शिता चक्रवर्ती सिंह) और उसका भाई लालू (विराट वैभव) भोंसले के पड़ोस में रहते है। दुनिया दारी से दूर रहने वाला भोंसले धीरे-धीरे सीता को पसंद करने लगता है।हालाँकि विलास उत्तर भारतीयों के ख़िलाफ़ भोंसले को भी भड़काता रहता है पर वह उसकी बातों पर ध्यान नहीं देता है।जब सीता को उसकी ज़रूरत पड़ती है तो भोंसले मराठा मानुस के बजाय प्रवासियों का साथ देता है।
इस फिल्म को देखने के बाद भोंसले की तरह दर्शकों को भी प्रवासियों से प्यार हो जाएगा। लॉकडाउन के समय जो प्रवासी मुंबई पर बोझ बन गए थे, महज़ तीन महीने बाद ही उनका महत्व समझ में आने लगा है। प्रवासियों की कमी मुंबई के उद्योगपतियों को महसूस होने लगी है। खबरें यहाँ तक आ रही है कि मजदूरों की वापसी के लिए प्लेन की टिकट भेजने से लेकर खाते में पैसा तक डाले जा रहे है। शायद वक़्त बदल रहा है। अब एक नहीं बल्कि हज़ारों भोंसले दिखाई देंगे।
फिल्म का क्लाइमेक़्स अनिश्चता से भरा हुआ है। इस फ़िल्म के साथ मनोज की एक साइलेंट हीरो के तौर पर छवि बनने वाली है। हमेशा की तरह इस फिल्म में उन्होंने बेहतरीन अदाकारी की है। मनोज ने बग़ैर संवाद के अपने एक्सप्रेशन के जादू से कमाल दिखाया है। फ़िल्म के निर्देशक मखीजा ने दूसरे कलाकारों पर भी बराबर भरोसा दिखाया है। इस फ़िल्म संतोष जुवेकर, इप्शिता चक्रवर्ती सिंह, विराट वैभव और अभिषेक बनर्जी ने अच्छा काम किया है। उनके अलावा थप्पड़ खा कर चलने वाला एक पुरानी "रेडियो" और “चाय का थर्मस” भी एक किरदार में नज़र आते है। उनकी भूमिका को नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता है। "रेडियो" और “चाय का थर्मस” भोंसले के अकेलापन के साथी है।
देबाशीष मखीजा ने साउंड और विज़ूअल के साथ काफ़ी मेहनत किया है, जिसे डायरेक्टर्स कट कह सकते है।फ़िल्म भोंसले में मनोज को अगर कोई चुनौती देता है तो वह है साउंड और विज़ूअल का स्पेशल ईफ़ेक्टस।
फ़िल्म की कहानी गणेश चतुर्थी से शुरू होकर विसर्जन के दिन ख़त्म होती है अर्थात कहानी 12 दिन का है पर गणपत भोंसले के कैरेक्टर को इस्टेबलिस्ट करने में निर्देशक मखीजा ने समय ज़्यादा लिया है। फिल्म की अवधि कम की जा सकती थी। भोंसले की दुनिया दिखाने के चक्कर में प्रवासी के मुद्दे पर कम समय दिया गया हैं।
भोंसले मनोज बाजपेयी होम प्रोडक्शन की फ़िल्म है।इस फ़िल्म के दूसरे निर्माता संदीप कपूर है।लीक से हटकर फ़िल्म बनाना अक्सर घाटे का सौदा होता है। जैसा कि मनोज ने मीडिया इंटर्व्यू के दौरान स्वीकार किया है कि कोई फ़िल्म प्रोड्यूसर नहीं मिल पाने के कारण भोंसले के निर्माण में काफ़ी समय लग गया। संदीप कपूर की पहल के बाद शायद अब दूसरे निर्माता भी भोंसले जैसी फ़िल्म के लिए आगे आयेंगे और कमर्शियल फिल्म के साथ-साथ पैरलल सिनेमा का दौर एक बार फिर से देखने को मिलें।
फ़िल्म : भोंसले
निर्माता : मनोज बाजपेयी, संदीप कपूर
निर्देशक : देबाशीष मखीजा
कलाकार : मनोज बाजपेयी, संतोष जुवेकर, इप्शिता चक्रवर्ती सिंह, विराट वैभव, अभिषेक बनर्जी, राजेंद्र सिसादर, कैलाश वाघमारे, श्रीकांत यादव, नीतू पांडे
ओटी टी : सोनी लिव
ए॰ एम॰ कुणाल
अगर फ़िल्म शोले का ए० के० हंगल साहब का डायलॉग "इतना सन्नाटा क्यों है भाई", आप भूल चुके है तो "भोंसले" ज़रूर देखें। मनोज बाजपेयी मुंबई के शोर को अपने अंदर समेटे एक साठ साल का एंग्री यंग मैन का रोल प्ले कर रहे है, जो बग़ैर एक शब्द कहे आपको एहसास करा देगा कि "बुड्ढ़ा होगा तेरा बाप!"
जब-जब लगता है कि मनोज बाजपेयी का समय पूरा हो गया है, वे "गैंग्स ऑफ वासेपुर" और "अलीगढ़" जैसी फ़िल्म लेकर आ जाते है। अपने डायलॉग डिलीवरी के लिए मशहूर मनोज फ़िल्म भोंसले बिल्कुल नए अंदाज़ में दिख रहे है। उनकी ऐक्टिंग को देख कर लगेगा कि डायलॉग राइटर की ज़रूरत ही नहीं है। इस फ़िल्म में मनोज बाजपेयी ने शब्द से ज़्यादा बॉडी लैंग्वेज पर ज़ोर दिया है। भोंसले के किरदार को समझने के लिए दर्शकों को काफ़ी मेहनत करनी पड़ेगी। भोंसले के कई रंग देखने को मिलेंगे। शांत सा रहने वाला भोंसले पटाके की आवाज़ पर चिड़चिड़ा हो जाता है। सच्चाई के लिए आवाज़ उठाने वाला भोंसले नौकरी के लिए अपने साहब को चाय पिलाता नज़र आता है। एकांत जीवन जीने वाला भोंसले एक प्रवासी की आवाज़ बन जाता है। यहाँ तक कि फ़िल्म के निर्देशक देबाशीष मखीजा ने भोंसले की अनकही लव स्टोरी को समझने की ज़िम्मेदारी भी दर्शकों पर छोड़ दी है।
उत्तर भारतीय वर्सेस मराठी का मुद्दा कोई नया सब्जेक्ट नहीं है पर उस सच्चाई को जिस ख़ूबसूरती से फ़िल्माया गया है, उसके पीछे देबाशीष मखीजा की मेहनत साफ़ दिखाई देती है। इसके लिए वे पिछले छह साल से लगें हुए थे।
फिल्म भोंसले प्रवासी और स्थानीय लोगों के बीच गहरी होती खाई की कहानी है। कहानी गणेश चतुर्थी से शुरू होती है और खत्म विसर्जन पर होती है। गणपत भोंसले (मनोज बाजपयी) एक पुलिसवाला हैं । उसकी दुनिया काफ़ी सीमित है। उसे बस अपने काम-से- काम है। अगर कोई उससे बात करता तो उसका एक लाईनर जवाब होता है। उसके चौल में एक ड्राईवर रहता है, जिसका नाम विलास (संतोष जुवेकर) है, वह उत्तर भारतीयों के खिलाफ सबको भड़काता रहता है। बिहार की सीता (इप्शिता चक्रवर्ती सिंह) और उसका भाई लालू (विराट वैभव) भोंसले के पड़ोस में रहते है। दुनिया दारी से दूर रहने वाला भोंसले धीरे-धीरे सीता को पसंद करने लगता है।हालाँकि विलास उत्तर भारतीयों के ख़िलाफ़ भोंसले को भी भड़काता रहता है पर वह उसकी बातों पर ध्यान नहीं देता है।जब सीता को उसकी ज़रूरत पड़ती है तो भोंसले मराठा मानुस के बजाय प्रवासियों का साथ देता है।
इस फिल्म को देखने के बाद भोंसले की तरह दर्शकों को भी प्रवासियों से प्यार हो जाएगा। लॉकडाउन के समय जो प्रवासी मुंबई पर बोझ बन गए थे, महज़ तीन महीने बाद ही उनका महत्व समझ में आने लगा है। प्रवासियों की कमी मुंबई के उद्योगपतियों को महसूस होने लगी है। खबरें यहाँ तक आ रही है कि मजदूरों की वापसी के लिए प्लेन की टिकट भेजने से लेकर खाते में पैसा तक डाले जा रहे है। शायद वक़्त बदल रहा है। अब एक नहीं बल्कि हज़ारों भोंसले दिखाई देंगे।
फिल्म का क्लाइमेक़्स अनिश्चता से भरा हुआ है। इस फ़िल्म के साथ मनोज की एक साइलेंट हीरो के तौर पर छवि बनने वाली है। हमेशा की तरह इस फिल्म में उन्होंने बेहतरीन अदाकारी की है। मनोज ने बग़ैर संवाद के अपने एक्सप्रेशन के जादू से कमाल दिखाया है। फ़िल्म के निर्देशक मखीजा ने दूसरे कलाकारों पर भी बराबर भरोसा दिखाया है। इस फ़िल्म संतोष जुवेकर, इप्शिता चक्रवर्ती सिंह, विराट वैभव और अभिषेक बनर्जी ने अच्छा काम किया है। उनके अलावा थप्पड़ खा कर चलने वाला एक पुरानी "रेडियो" और “चाय का थर्मस” भी एक किरदार में नज़र आते है। उनकी भूमिका को नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता है। "रेडियो" और “चाय का थर्मस” भोंसले के अकेलापन के साथी है।
देबाशीष मखीजा ने साउंड और विज़ूअल के साथ काफ़ी मेहनत किया है, जिसे डायरेक्टर्स कट कह सकते है।फ़िल्म भोंसले में मनोज को अगर कोई चुनौती देता है तो वह है साउंड और विज़ूअल का स्पेशल ईफ़ेक्टस।
फ़िल्म की कहानी गणेश चतुर्थी से शुरू होकर विसर्जन के दिन ख़त्म होती है अर्थात कहानी 12 दिन का है पर गणपत भोंसले के कैरेक्टर को इस्टेबलिस्ट करने में निर्देशक मखीजा ने समय ज़्यादा लिया है। फिल्म की अवधि कम की जा सकती थी। भोंसले की दुनिया दिखाने के चक्कर में प्रवासी के मुद्दे पर कम समय दिया गया हैं।
भोंसले मनोज बाजपेयी होम प्रोडक्शन की फ़िल्म है।इस फ़िल्म के दूसरे निर्माता संदीप कपूर है।लीक से हटकर फ़िल्म बनाना अक्सर घाटे का सौदा होता है। जैसा कि मनोज ने मीडिया इंटर्व्यू के दौरान स्वीकार किया है कि कोई फ़िल्म प्रोड्यूसर नहीं मिल पाने के कारण भोंसले के निर्माण में काफ़ी समय लग गया। संदीप कपूर की पहल के बाद शायद अब दूसरे निर्माता भी भोंसले जैसी फ़िल्म के लिए आगे आयेंगे और कमर्शियल फिल्म के साथ-साथ पैरलल सिनेमा का दौर एक बार फिर से देखने को मिलें।
फ़िल्म : भोंसले
निर्माता : मनोज बाजपेयी, संदीप कपूर
निर्देशक : देबाशीष मखीजा
कलाकार : मनोज बाजपेयी, संतोष जुवेकर, इप्शिता चक्रवर्ती सिंह, विराट वैभव, अभिषेक बनर्जी, राजेंद्र सिसादर, कैलाश वाघमारे, श्रीकांत यादव, नीतू पांडे
ओटी टी : सोनी लिव

Comments
Post a Comment