मीडिया की नान-पॉलिटिकल भक्ति
मीडिया की नान-पॉलिटिकल भक्ति
- ए एम कुणाल
जिस तरह से मोदी भक्त खुलकर अपनी भक्ति व्यक्त करने में लगे है। ऐसे में लोकतंत्र का
लेकर सामने प्रकट हो जाएगें।
अगर ‘आम और फकीरी’ वाले सवाल से ‘सास-बहू’ वाले सवाल की तुलना करें, तो गोदी मीडिया
कहीं गलत नहीं है। सवाल भक्ति का नहीं है। खुलकर भक्ति करो, किसने रोका है? सवाल उस
भक्ति की कीमत पर है। हिटलर का साथी और नाज़ी मीडिया प्रभारी जोसेफ गोएबेल्स के प्रभाव
में आकर जर्मनी ने क्या कीमत अदा की, ये आज बच्चा-बच्चा जानता है। क्या हम भी जर्मनी
की राह पर जा रहे है ? जब आने वाली पीड़ी भक्तिकाल पर रिसर्च के सिलसिले में आपसे
सवाल करेगी तब आप क्या जवाब दोगें ? कलम की स्याही का रंग भगवा कैसे हो गया? आपके
सवाल के पेपर मोदीजी के हाथ में क्या कर रहे थे ? प्रेसवार्ता के समय जब मोदीजी ने सवाल
का जवाब देने से इनकार कर दिया तब आपने वॉकआउट क्यों नहीं किया? राफेल का दाग
बोफोर्स के दाग से बेहतर कैसे? भक्ति के दौर में किसान और बेरोजगार की आवाज क्यों नही
सुनाई दे रही थी ? CAA-NRC पर मीडिया किसकी आवाज़ दबा रही थी?
करोना पर सरकार के बजाय विपक्ष से सवाल क्यों किया जा रहा था?
2024 तक न जाने कितने सवाल होंगे, जिसका जवाब देना मुश्किल होगा!
पिछले 6 सालों में मीडिया की भूमिका को लेकर जिस तरह से सवाल उठाए जा रहे है, वह
जग जाहिर है। वैसे तो पूरी दुनिया में मीडिया पूरे समाज का पौष्टिक मानसिक आहार बनकर
रह गया है। हमारी सूचनाओं, सोच-समझ, विश्लेषण इत्यादि सब कुछ के निर्धारण में मीडिया की
महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह बौद्धिक खुराक पीएम स्वास्थ्य योजना के बिना मुफ्त में दी जा
रही है। करीब-करीब 80 प्रतिशत भारतीय इससे प्रभावित होते हैं। प्रभावित होने का अर्थ यह कि
कहने को यह कहा जा सकता है कि हर एक व्यक्ति अपना निर्णय स्वयं लेता है। यह बात
सतही तौर पर देखने में तो ठीक लगती है लेकिन थोड़ा बारीकी से देखे तो साफ नजर आएगा
कि मीडिया निर्णय लेने की शक्ति को काफी हद तक प्रभावित करता है। सच यह है कि हम 24
घंटे मीडिया की धारा में जाने-अनजाने प्रवाहमान होते रहते हैं। सुबह के अखबार से लेकर रात
को सोने के समय तक टेलीविजन के समाचारों और फीचरों को देखते रहते हैं। सोने के समय
भी अवचेतन मन में मीडिया का प्रभाव अवश्य होता है। हम जो कपड़े पहनते हैं, हम जो खाते
हैं, हम जो लिखते-पढ़ते हैं, हम जो पर्यटन स्थलों पर जाते हैं, हम जो कार खरीदते हैं, हम जो
रिश्ते-नाते बनाते हैं, अर्थात हम जो कुछ भी करते हैं, उसमें मीडिया की सोच से प्रभावित होते हैं।
मीडिया के समाचारों, फीचर, लेखों, शीर्षकों, चित्रों, हजारों तरह की जानकारियों जैसे सभी आयाम
हमारे दिमाग पर असर डालते हैं। आपका बच्चा आईआईटी में पढ़ेगा या आईआईएम में, साइंस
पढ़ेगा या कॉमर्स, प्राथमिक स्कूल का चयन अक्सर हम मीडिया की सूचनाओं के आधार पर
सामूहिक मन-मिजाज के अनुकूल ही करते हैं। कौन सा राजनीतिक दल अच्छा है, कौन सा बुरा
है,कौन सा दल किस समुदाय के पक्ष में है या खिलाफ है, यह सब धारणाएं मीडिया बनाता है।
मतदान के समाजशास्त्रियों का मानना है कि लोग किस पार्टी को वोट देंगे, इसका वातावरण भी
मीडिया ही बनाता है।
मीडिया इतना प्रभावशाली क्यों है? आज दैनिक पत्रों, साप्ताहिकों से लेकर बाकी सब प्रकाशनों की
संख्या करीब बीस करोड़ है। यह सब अचानक नहीं हो गया। पांचवें और छठे दशक तक पिछड़ी
जातियों की साक्षरता का प्रतिशत बढ़ा है। साधन सम्पन्न लोग जो अखबार खरीद सकते थे, वह
मीडिया के घनिष्ठ सम्पर्क में आए। दैनिक की प्रसार संख्या में प्रारम्भिक विस्फोट हुआ। सत्तर
और अस्सी के दशक में साक्षर अनुसूचित जाति और जनजाति की आबादी में भारी बढ़ोत्तरी हुई।
वह भी अखबार पढ़ने लगे। और इस तरह अखबारों की प्रसार संख्या चैंकाने वाली गति से बढ़ती
गई। कभी दो पेज और चार पेज के अखबार निकला करते थे। लोग उन्हें ही बड़े चाव से पढ़ा
करते थे। धीरे-धीरे आर्थिक विकास के कारण विज्ञापनों की संख्या बढ़ी और अखबारी पन्नों की
भी। आज हिन्दी और क्षेत्रीय अखबारों की पृष्ठ संख्या 12 से लेकर 24 तक हो गई है और
जिस तेज़ी से मीडिया और मनोरंजन का यह सेक्टर बढ़ा है इसकी कल्पना इससे ही कर सकते
हैं कि पिछले एक साल में करीब-करीब एक दर्जन नए चैनल आए। 2002 के बाद जब यह
सेक्टर विदेशी पूंजी निवेश के लिए खुला तब एक तरफ विदेशी पूंजी के आमंत्रण की होड़ लग
गई। दूसरी तरफ अधिग्रहण और विलय के माध्यम से बड़े-बड़े उद्योग घराने इस लाईन में कूद
असल में मीडिया राजनीतिक सत्ता का लाभ उठाने का एक माध्यम बन कर रह गया है। इसके
लिए केवल मोदी सरकार जिम्मेदार नही है। अनेक राजनैतिक दलों ने अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में
समाचार पत्र, टेलीविजन कम्पनी और प्रचार के अन्य माध्यमों का अपना ढांचा खड़ा किया है।
जब आर्थिक सत्ता और राजनीतिक सत्ता से लेकर बाजार के विभिन्न अधिकरणों पर काबिज होने
ऐसा नही है कि मीडिया नियंत्रित करने के बारे में नाज़ी सोच भारत में पहली बार काम कर रही
है, पहले भी कोशिश की गई है लेकिन जिस तरह से शाह एण्ड कंपनी ने भारतीय मीडिया का
बेहतर ढंग से इस्तेमाल किया है, उसके बारे में जोसेफ गोएबेल्स भी कल्पना नहीं कर सकते थे।
जब मीडिया सामूहिक दिमाग को नियंत्रित करता है तो मीडिया को कौन नियंत्रित कर सकता
है? स्वाभाविक है कि इसे वह नियंत्रित करते हैं जिनकी पूंजी होती है। संपादक और वरिष्ठ
जिस तरह से अपने अखबार और चैनल की लोकप्रियता बढ़ाने के लिए मीडिया ने अपने-अपने
अश्वमेघ यज्ञ का घोडा छोड रखा है, वह एक अच्छा संकेत नही है। एक पक्ष को दबाना और
दूसरे पक्ष की हौसला अफजाई की जो कोशिश की जा रही है, वह भारतीय समाज और इसके
लोकतंत्र की जड़ें खोदने का काम कर रही है। सरकार से लेकर उद्योग घराने तक पार्टियों से
लेकर छोटे-बड़े संगठनों तक, मीडिया के मोहताज हैं। वे इसकी तरफ याचना भरी नजरों से देखते
रहते हैं। आज मीडिया के पक्षपात के खिलाफ न अपील की जा सकती है न दलील दी जा
सकती है। जब मीडिया दुशासन की भुमिका में हो तो भला द्रौपदी को चीर हरण से कौन बचा
अगले पांच वर्षों में गोदी मीडिया ‘संजय’ की भूमिका में नज़र आए, तो किसी को आश्चर्य नही
होगा। द्रौपदी रुपी जनता के चीर हरण से अंधभक्तों का ध्यान हटाने के लिए केदारनाथ,
बद्ररीनाथ और हिमालय की गुफाओं से लाईव टेलीकास्ट किया जाएगा। बुलंद भारत की बुलंद
तस्वीर जो पेश करनी है। हो सकता है रामानंद सागर की रामायण और बी आर चोपड़ा की
महाभारत फिर से दिखाई जाए। भक्तिकाल की समाप्ति के बाद या यूं कहे कि घने बादलों के
हट जाने के बाद जब रडार ठीक से काम करने लगेगा तब इस दौर के बारे में क्या गोदी
मीडिया के भक्त कह पाएंगे कि ‘हुआ तो हुआ’? इतिहास मीडिया के इस भक्ति दौर का
विश्लेषण करते वक्त कितना उदार रहता है, ये तो वक्त ही बताएगा?
- ए एम कुणाल
जिस तरह से मोदी भक्त खुलकर अपनी भक्ति व्यक्त करने में लगे है। ऐसे में लोकतंत्र का
चौथा स्तम्भ अगर केदारनाथ की गुफा या 7-लोक कल्याण मार्ग का एक स्तम्भ बनकर रह जाए,
तो इसकी चिंता भला किसे है ? भक्तों को इसमें कोई खामी भी नजर नहीं आती है। उनकी भक्ति पर सवाल करने
की हिम्मत भला किसमें है? वे अपने प्रभु को आवाज देंगे और प्रभु पाकिस्तान का वीजा हाथों मेंलेकर सामने प्रकट हो जाएगें।
अगर ‘आम और फकीरी’ वाले सवाल से ‘सास-बहू’ वाले सवाल की तुलना करें, तो गोदी मीडिया
कहीं गलत नहीं है। सवाल भक्ति का नहीं है। खुलकर भक्ति करो, किसने रोका है? सवाल उस
भक्ति की कीमत पर है। हिटलर का साथी और नाज़ी मीडिया प्रभारी जोसेफ गोएबेल्स के प्रभाव
में आकर जर्मनी ने क्या कीमत अदा की, ये आज बच्चा-बच्चा जानता है। क्या हम भी जर्मनी
की राह पर जा रहे है ? जब आने वाली पीड़ी भक्तिकाल पर रिसर्च के सिलसिले में आपसे
सवाल करेगी तब आप क्या जवाब दोगें ? कलम की स्याही का रंग भगवा कैसे हो गया? आपके
सवाल के पेपर मोदीजी के हाथ में क्या कर रहे थे ? प्रेसवार्ता के समय जब मोदीजी ने सवाल
का जवाब देने से इनकार कर दिया तब आपने वॉकआउट क्यों नहीं किया? राफेल का दाग
बोफोर्स के दाग से बेहतर कैसे? भक्ति के दौर में किसान और बेरोजगार की आवाज क्यों नही
सुनाई दे रही थी ? CAA-NRC पर मीडिया किसकी आवाज़ दबा रही थी?
करोना पर सरकार के बजाय विपक्ष से सवाल क्यों किया जा रहा था?
2024 तक न जाने कितने सवाल होंगे, जिसका जवाब देना मुश्किल होगा!
पिछले 6 सालों में मीडिया की भूमिका को लेकर जिस तरह से सवाल उठाए जा रहे है, वह
जग जाहिर है। वैसे तो पूरी दुनिया में मीडिया पूरे समाज का पौष्टिक मानसिक आहार बनकर
रह गया है। हमारी सूचनाओं, सोच-समझ, विश्लेषण इत्यादि सब कुछ के निर्धारण में मीडिया की
महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह बौद्धिक खुराक पीएम स्वास्थ्य योजना के बिना मुफ्त में दी जा
रही है। करीब-करीब 80 प्रतिशत भारतीय इससे प्रभावित होते हैं। प्रभावित होने का अर्थ यह कि
अच्छे बुरे दोनों तरह के प्रभावों से उनका दिमाग बनता है।
सतही तौर पर देखने में तो ठीक लगती है लेकिन थोड़ा बारीकी से देखे तो साफ नजर आएगा
कि मीडिया निर्णय लेने की शक्ति को काफी हद तक प्रभावित करता है। सच यह है कि हम 24
घंटे मीडिया की धारा में जाने-अनजाने प्रवाहमान होते रहते हैं। सुबह के अखबार से लेकर रात
को सोने के समय तक टेलीविजन के समाचारों और फीचरों को देखते रहते हैं। सोने के समय
भी अवचेतन मन में मीडिया का प्रभाव अवश्य होता है। हम जो कपड़े पहनते हैं, हम जो खाते
हैं, हम जो लिखते-पढ़ते हैं, हम जो पर्यटन स्थलों पर जाते हैं, हम जो कार खरीदते हैं, हम जो
रिश्ते-नाते बनाते हैं, अर्थात हम जो कुछ भी करते हैं, उसमें मीडिया की सोच से प्रभावित होते हैं।
मीडिया के समाचारों, फीचर, लेखों, शीर्षकों, चित्रों, हजारों तरह की जानकारियों जैसे सभी आयाम
हमारे दिमाग पर असर डालते हैं। आपका बच्चा आईआईटी में पढ़ेगा या आईआईएम में, साइंस
पढ़ेगा या कॉमर्स, प्राथमिक स्कूल का चयन अक्सर हम मीडिया की सूचनाओं के आधार पर
सामूहिक मन-मिजाज के अनुकूल ही करते हैं। कौन सा राजनीतिक दल अच्छा है, कौन सा बुरा
है,कौन सा दल किस समुदाय के पक्ष में है या खिलाफ है, यह सब धारणाएं मीडिया बनाता है।
मतदान के समाजशास्त्रियों का मानना है कि लोग किस पार्टी को वोट देंगे, इसका वातावरण भी
मीडिया ही बनाता है।
मीडिया इतना प्रभावशाली क्यों है? आज दैनिक पत्रों, साप्ताहिकों से लेकर बाकी सब प्रकाशनों की
संख्या करीब बीस करोड़ है। यह सब अचानक नहीं हो गया। पांचवें और छठे दशक तक पिछड़ी
जातियों की साक्षरता का प्रतिशत बढ़ा है। साधन सम्पन्न लोग जो अखबार खरीद सकते थे, वह
मीडिया के घनिष्ठ सम्पर्क में आए। दैनिक की प्रसार संख्या में प्रारम्भिक विस्फोट हुआ। सत्तर
और अस्सी के दशक में साक्षर अनुसूचित जाति और जनजाति की आबादी में भारी बढ़ोत्तरी हुई।
वह भी अखबार पढ़ने लगे। और इस तरह अखबारों की प्रसार संख्या चैंकाने वाली गति से बढ़ती
गई। कभी दो पेज और चार पेज के अखबार निकला करते थे। लोग उन्हें ही बड़े चाव से पढ़ा
करते थे। धीरे-धीरे आर्थिक विकास के कारण विज्ञापनों की संख्या बढ़ी और अखबारी पन्नों की
भी। आज हिन्दी और क्षेत्रीय अखबारों की पृष्ठ संख्या 12 से लेकर 24 तक हो गई है और
अंग्रेजी अखबारों की तो 30 से 50 पृष्ठों तक की।
हैं कि पिछले एक साल में करीब-करीब एक दर्जन नए चैनल आए। 2002 के बाद जब यह
सेक्टर विदेशी पूंजी निवेश के लिए खुला तब एक तरफ विदेशी पूंजी के आमंत्रण की होड़ लग
गई। दूसरी तरफ अधिग्रहण और विलय के माध्यम से बड़े-बड़े उद्योग घराने इस लाईन में कूद
पड़े हैं।
लिए केवल मोदी सरकार जिम्मेदार नही है। अनेक राजनैतिक दलों ने अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों में
समाचार पत्र, टेलीविजन कम्पनी और प्रचार के अन्य माध्यमों का अपना ढांचा खड़ा किया है।
जब आर्थिक सत्ता और राजनीतिक सत्ता से लेकर बाजार के विभिन्न अधिकरणों पर काबिज होने
का यह माध्यम बन गया हो, तो इस महत्ता से भला संघ और भाजपा कैसे पीछे रह सकती थी?
है, पहले भी कोशिश की गई है लेकिन जिस तरह से शाह एण्ड कंपनी ने भारतीय मीडिया का
बेहतर ढंग से इस्तेमाल किया है, उसके बारे में जोसेफ गोएबेल्स भी कल्पना नहीं कर सकते थे।
जब मीडिया सामूहिक दिमाग को नियंत्रित करता है तो मीडिया को कौन नियंत्रित कर सकता
है? स्वाभाविक है कि इसे वह नियंत्रित करते हैं जिनकी पूंजी होती है। संपादक और वरिष्ठ
पत्रकारों तक की हैसियत नियंत्रणकर्ताओं के सामने नगण्य है।
अश्वमेघ यज्ञ का घोडा छोड रखा है, वह एक अच्छा संकेत नही है। एक पक्ष को दबाना और
दूसरे पक्ष की हौसला अफजाई की जो कोशिश की जा रही है, वह भारतीय समाज और इसके
लोकतंत्र की जड़ें खोदने का काम कर रही है। सरकार से लेकर उद्योग घराने तक पार्टियों से
लेकर छोटे-बड़े संगठनों तक, मीडिया के मोहताज हैं। वे इसकी तरफ याचना भरी नजरों से देखते
रहते हैं। आज मीडिया के पक्षपात के खिलाफ न अपील की जा सकती है न दलील दी जा
सकती है। जब मीडिया दुशासन की भुमिका में हो तो भला द्रौपदी को चीर हरण से कौन बचा
सकता है?
होगा। द्रौपदी रुपी जनता के चीर हरण से अंधभक्तों का ध्यान हटाने के लिए केदारनाथ,
बद्ररीनाथ और हिमालय की गुफाओं से लाईव टेलीकास्ट किया जाएगा। बुलंद भारत की बुलंद
तस्वीर जो पेश करनी है। हो सकता है रामानंद सागर की रामायण और बी आर चोपड़ा की
महाभारत फिर से दिखाई जाए। भक्तिकाल की समाप्ति के बाद या यूं कहे कि घने बादलों के
हट जाने के बाद जब रडार ठीक से काम करने लगेगा तब इस दौर के बारे में क्या गोदी
मीडिया के भक्त कह पाएंगे कि ‘हुआ तो हुआ’? इतिहास मीडिया के इस भक्ति दौर का
विश्लेषण करते वक्त कितना उदार रहता है, ये तो वक्त ही बताएगा?

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