Shakuntala Devi,
शकुंतला देवी: फ़ास्ट फ़ॉर्वर्ड मोड़ में बॉलीवुड का डबल तड़का!
-ए॰ एम॰ कुणाल
सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया और विक्रम मल्होत्रा के बैनर तले बनी फ़िल्म शकुंतला देवी के साथ एक बार फिर से विद्या बालन ने छोटे पर्दे पर इंट्री मारी है। "ह्यूमन कंप्यूटर" के नाम से प्रसिद्ध समाजिक परंपराओं की जंजीरों को तोड़ने वाली शकुंतला देवी ने विश्व भर में भारत का नाम ऊँचा किया था। छोटी सी उम्र से जटिल गणित को चुटकियों में जुबानी हल कर देती थीं। गणित के जटिल सवाल को रिकॉर्ड समय में हल करने के कारण गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड उनका नाम दर्ज है।
अमेजन प्राइम वीडियो पर विद्या बालन की फिल्म 'शकुंतला देवी' रिलीज हो चुकी है. फिल्म एक बायोग्राफिकल ड्रामा है, जिसमें 1934 से 2000 तक के शकुंतला देवी के जीवन सफर को दिखाने में फ़िल्म के निर्देशक अनु मेनन सफल रहे है। बायोपिक फिल्मों के साथ बॉलीवुड तड़का हमेशा देखने को मिलता है। इस फ़िल्म को मनोरंजक और दिलचस्प बनाने की कोशिश की गई हैं। शंकुतला देवी का गणित के साथ रिश्ता के अलावा उनकी पारिवारिक जिंदगी को बॉलीवुड डबल तड़का लगाकर फ़िल्मी अंदाज में दिखाया गया है।
फिल्म की कहानी बेंगलुरु के एक छोटे से गांव से शुरू होती है। 5 साल की छोटी उम्र में शकुंतला (विद्या बालन) के टैलेंट का पता चल जाता है। शकुंतला के गरीब पिता उसके टैलेंट को रोजगार का जरिया बना लेते हैं। समय के साथ शकुंतला मशहूर हो जाती है। इस बीच शकुंतला को धीरज (नील भूपलम) से प्यार हो जाता है। वह शकुंतला को धोखा देता है, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर पाती और उसे गोली मार देती है। यह उसके लाइफ़ का टर्निंग पोईंट होता है। पुलिस और समाज से बचने के लिए वह भागकर लंदन चली जाती है।
शकुंतला अपने निर्भीक स्वभाव और आजाद ख्याल के कारण परिवार से दूर हो जाती है। दुनिया के बनाए तौर तरीकों को लेकर वो कई सवाल करती हैं। उन सवालों के चलते शकुंतला अपनी मां से उम्र के आखिरी पड़ाव तक नाराज रहती हैं।
लंदन में शकुंतला से शकुंतला देवी बनने की कहानी शुरू होती है। वहाँ उसकी ज़िंदगी में दूसरा प्यार जेवियर (लुका कैलवानी) के रूप में मिलता है। वह शकुंतला के गणित का स्पेशल शो करने में मदद करता है। शकुंतला को जेवियर से प्यार हो जाता है और साथ ही शुरू होता जीनियस बनने का सफ़र। वह दुनियाभर में नाम कमाती हैं और कंप्यूटर के कैल्कुलेशन तक को गलत साबित कर देती हैं। वह गणित के साथ-साथ ज्योतिष शास्त्र के विद्वान के तौर पर मशहूर हो जाती है। पर अपनी ज़िंदगी की ऊँचाई पर पहुँच कर वह अपने दूसरे प्यार को भी खो देती है।
उसके बाद शकुंतला की ज़िंदगी में दुष्यंत आता है। शकुंतला को आईएएस अफसर परितोष बनर्जी (जीशु सेनगुप्ता) से प्यार हो जाता है, जो उसका हमसफ़र बनता है। शकुंतला उसके साथ कलकत्ता में रहने लगती है और फिर उनकी जिंदगी में आती है अनुपमा बनर्जी उर्फ़अनु (सान्या मल्होत्रा)।अनु के जन्म के साथ शकुंतला की ज़िंदगी ठहर सी जाती है। परितोष अपनी पत्नी का साथ देता है और अनु की ज़िम्मेदारी खुद सम्भालता है। जब शकुंतला को लगता है कि वह काम के चक्कर में अपनी बेटी से दूर हो रही है तो परितोष पर नौकरी छोड़कर लंदन चलने का दबाव बनाती है। परितोष नहीं मानता है और दोनों अलग हो जाते है।
अपने करियर के प्रति शकुंतला का प्यार और अपनी बेटी को साथ रखने की जिद के कारण वह अनु के प्यार को भी खो देती है। अनु अपनी माँ से नफरत करने लगती है।इस नफ़रत को तब और बल मिलता है जब अनु की ज़िंदगी में अजय (अमित साध) आता है। अनु अपनी माँ की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अजय से शादी कर लेती है और इंडिया में बस जाती है। अनु को उसके पिता का साथ मिलता है। इस तरह दुनिया को जीतने वाली शकुंतला अपनी बेटी के आगे हार जाती है।
फ़िल्म के अंत में शकुंतला का ब्लैक बुक दोनों को क़रीब लाता है, जिसे अनु अपनी माँ का प्रोफ़ाईल बुक समझ कर कभी देखती नहीं है, वह दरअसल अनु के यादों का ख़ज़ाना होता है।
विद्या बालन बड़े पर्दे के बाद अब छोटे स्क्रीन पर धमाल मचाने वाली है। वह अपने शानदार अभिनय से शंकुतला देवी के शख्सियत पर भारी पड़ी है। यह फ़िल्म शंकुतला देवी की बॉयोपिक के लिए कम, विद्या बालन की दमदार ऐक्टिंग के लिए ज़्यादा याद रखा जाएगा।
विद्या बालन के अलावा सान्या मल्होत्रा, अमित साध और जीशू सेनगुप्ता का काम अच्छा है। जीशू सेनगुप्ता ने विद्या बालन के साथ स्क्रीन कम शेयर किया है पर टक्कर बराबर की दी है। वही सान्या मल्होत्रा को एक बार फिर से अपना बेस्ट देने का अवसर था पर विद्या बालन के सामने वह अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रही है। सपोर्टिंग ऐक्टर के तौर पर अपना लोहा मनवाने में अमित साध एक बार फिर सफल रहे है। इतालवी अभिनेता लुका कैलवानी ने छोटे से रोल में अपने किरदार को जीवंत कर दिया हैं।
फिल्म की कहानी अतीत और वर्तमान में साथ-साथ चलती रहती हैं। विद्या बालन और जीशु सान्या मल्होत्रा की दो अलग कहानी को निर्देशक अनु मेनन ने ख़ूबसूरती से फ़िल्माया है। इशिता मोईत्रा ने संवाद लिखे हैं। फिल्म के संवाद शकुंतला देवी के किरदार को प्रभावशाली बनाता है। फ़िल्म स्क्रीनप्ले सटीक तरीके से लिखा गया है। एक बायोपिक होने के बावजूद फ़िल्म कभी स्लो नहीं होती बल्कि हमेशा फ़ास्ट फ़ॉर्वर्ड मोड़ में होती है। जिसके कारण शकुंतला देवी के राजनीतिक जीवन पर कम फ़ोकस किया गया है। हालाँकि अनु मेनन ने फ़ास्ट फ़ॉर्वर्ड मोड़ में शकुंतला देवी के जीवन के हर पहलू को छूने का प्रवास किया है।
फ़िल्म निर्माता- सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया और विक्रम मल्होत्रा
निर्देशक- अनु मेनन
कलाकार- विद्या बालन, जीशु सेनगुप्ता, सान्या मल्होत्रा, अमित साध
प्लेटफॉर्म- अमेज़न प्राइम वीडियो
-ए॰ एम॰ कुणाल
सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया और विक्रम मल्होत्रा के बैनर तले बनी फ़िल्म शकुंतला देवी के साथ एक बार फिर से विद्या बालन ने छोटे पर्दे पर इंट्री मारी है। "ह्यूमन कंप्यूटर" के नाम से प्रसिद्ध समाजिक परंपराओं की जंजीरों को तोड़ने वाली शकुंतला देवी ने विश्व भर में भारत का नाम ऊँचा किया था। छोटी सी उम्र से जटिल गणित को चुटकियों में जुबानी हल कर देती थीं। गणित के जटिल सवाल को रिकॉर्ड समय में हल करने के कारण गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड उनका नाम दर्ज है।
अमेजन प्राइम वीडियो पर विद्या बालन की फिल्म 'शकुंतला देवी' रिलीज हो चुकी है. फिल्म एक बायोग्राफिकल ड्रामा है, जिसमें 1934 से 2000 तक के शकुंतला देवी के जीवन सफर को दिखाने में फ़िल्म के निर्देशक अनु मेनन सफल रहे है। बायोपिक फिल्मों के साथ बॉलीवुड तड़का हमेशा देखने को मिलता है। इस फ़िल्म को मनोरंजक और दिलचस्प बनाने की कोशिश की गई हैं। शंकुतला देवी का गणित के साथ रिश्ता के अलावा उनकी पारिवारिक जिंदगी को बॉलीवुड डबल तड़का लगाकर फ़िल्मी अंदाज में दिखाया गया है।
फिल्म की कहानी बेंगलुरु के एक छोटे से गांव से शुरू होती है। 5 साल की छोटी उम्र में शकुंतला (विद्या बालन) के टैलेंट का पता चल जाता है। शकुंतला के गरीब पिता उसके टैलेंट को रोजगार का जरिया बना लेते हैं। समय के साथ शकुंतला मशहूर हो जाती है। इस बीच शकुंतला को धीरज (नील भूपलम) से प्यार हो जाता है। वह शकुंतला को धोखा देता है, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर पाती और उसे गोली मार देती है। यह उसके लाइफ़ का टर्निंग पोईंट होता है। पुलिस और समाज से बचने के लिए वह भागकर लंदन चली जाती है।
शकुंतला अपने निर्भीक स्वभाव और आजाद ख्याल के कारण परिवार से दूर हो जाती है। दुनिया के बनाए तौर तरीकों को लेकर वो कई सवाल करती हैं। उन सवालों के चलते शकुंतला अपनी मां से उम्र के आखिरी पड़ाव तक नाराज रहती हैं।
लंदन में शकुंतला से शकुंतला देवी बनने की कहानी शुरू होती है। वहाँ उसकी ज़िंदगी में दूसरा प्यार जेवियर (लुका कैलवानी) के रूप में मिलता है। वह शकुंतला के गणित का स्पेशल शो करने में मदद करता है। शकुंतला को जेवियर से प्यार हो जाता है और साथ ही शुरू होता जीनियस बनने का सफ़र। वह दुनियाभर में नाम कमाती हैं और कंप्यूटर के कैल्कुलेशन तक को गलत साबित कर देती हैं। वह गणित के साथ-साथ ज्योतिष शास्त्र के विद्वान के तौर पर मशहूर हो जाती है। पर अपनी ज़िंदगी की ऊँचाई पर पहुँच कर वह अपने दूसरे प्यार को भी खो देती है।
उसके बाद शकुंतला की ज़िंदगी में दुष्यंत आता है। शकुंतला को आईएएस अफसर परितोष बनर्जी (जीशु सेनगुप्ता) से प्यार हो जाता है, जो उसका हमसफ़र बनता है। शकुंतला उसके साथ कलकत्ता में रहने लगती है और फिर उनकी जिंदगी में आती है अनुपमा बनर्जी उर्फ़अनु (सान्या मल्होत्रा)।अनु के जन्म के साथ शकुंतला की ज़िंदगी ठहर सी जाती है। परितोष अपनी पत्नी का साथ देता है और अनु की ज़िम्मेदारी खुद सम्भालता है। जब शकुंतला को लगता है कि वह काम के चक्कर में अपनी बेटी से दूर हो रही है तो परितोष पर नौकरी छोड़कर लंदन चलने का दबाव बनाती है। परितोष नहीं मानता है और दोनों अलग हो जाते है।
अपने करियर के प्रति शकुंतला का प्यार और अपनी बेटी को साथ रखने की जिद के कारण वह अनु के प्यार को भी खो देती है। अनु अपनी माँ से नफरत करने लगती है।इस नफ़रत को तब और बल मिलता है जब अनु की ज़िंदगी में अजय (अमित साध) आता है। अनु अपनी माँ की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अजय से शादी कर लेती है और इंडिया में बस जाती है। अनु को उसके पिता का साथ मिलता है। इस तरह दुनिया को जीतने वाली शकुंतला अपनी बेटी के आगे हार जाती है।
फ़िल्म के अंत में शकुंतला का ब्लैक बुक दोनों को क़रीब लाता है, जिसे अनु अपनी माँ का प्रोफ़ाईल बुक समझ कर कभी देखती नहीं है, वह दरअसल अनु के यादों का ख़ज़ाना होता है।
विद्या बालन बड़े पर्दे के बाद अब छोटे स्क्रीन पर धमाल मचाने वाली है। वह अपने शानदार अभिनय से शंकुतला देवी के शख्सियत पर भारी पड़ी है। यह फ़िल्म शंकुतला देवी की बॉयोपिक के लिए कम, विद्या बालन की दमदार ऐक्टिंग के लिए ज़्यादा याद रखा जाएगा।
विद्या बालन के अलावा सान्या मल्होत्रा, अमित साध और जीशू सेनगुप्ता का काम अच्छा है। जीशू सेनगुप्ता ने विद्या बालन के साथ स्क्रीन कम शेयर किया है पर टक्कर बराबर की दी है। वही सान्या मल्होत्रा को एक बार फिर से अपना बेस्ट देने का अवसर था पर विद्या बालन के सामने वह अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रही है। सपोर्टिंग ऐक्टर के तौर पर अपना लोहा मनवाने में अमित साध एक बार फिर सफल रहे है। इतालवी अभिनेता लुका कैलवानी ने छोटे से रोल में अपने किरदार को जीवंत कर दिया हैं।
फिल्म की कहानी अतीत और वर्तमान में साथ-साथ चलती रहती हैं। विद्या बालन और जीशु सान्या मल्होत्रा की दो अलग कहानी को निर्देशक अनु मेनन ने ख़ूबसूरती से फ़िल्माया है। इशिता मोईत्रा ने संवाद लिखे हैं। फिल्म के संवाद शकुंतला देवी के किरदार को प्रभावशाली बनाता है। फ़िल्म स्क्रीनप्ले सटीक तरीके से लिखा गया है। एक बायोपिक होने के बावजूद फ़िल्म कभी स्लो नहीं होती बल्कि हमेशा फ़ास्ट फ़ॉर्वर्ड मोड़ में होती है। जिसके कारण शकुंतला देवी के राजनीतिक जीवन पर कम फ़ोकस किया गया है। हालाँकि अनु मेनन ने फ़ास्ट फ़ॉर्वर्ड मोड़ में शकुंतला देवी के जीवन के हर पहलू को छूने का प्रवास किया है।
फ़िल्म निर्माता- सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया और विक्रम मल्होत्रा
निर्देशक- अनु मेनन
कलाकार- विद्या बालन, जीशु सेनगुप्ता, सान्या मल्होत्रा, अमित साध
प्लेटफॉर्म- अमेज़न प्राइम वीडियो

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