"द लास्ट मुगल: द फॉल ऑफ ए डायनेस्टी"



*द लास्ट मुगल: द फॉल ऑफ ए डायनेस्टी*

(संदर्भ : झारखण्ड व बाघमारा विधानसभा चुनाव)

                             - अरुण कुणाल 

झारखंड की राजनीति में इस समय बड़े-बड़े खिलाड़ी मैदान में उतर चुके हैं। कोई अपने "वजीर" यानि प्रमुख नेताओं पर दांव लगा रहा है, तो कोई अपनी पूरी ताकत "प्यादों" पर लगा चुका है, जो अंत में निर्णायक साबित हो सकते हैं। और "घोड़े" की चाल, जो अप्रत्याशित और शक्तिशाली होती है, उसे लेकर आशंका है कि वही इस चुनाव में गेम-चेंजर साबित होंगे। शतरंज के इस खेल में, जिस तरह से एक गलत चाल पूरे खेल को पलट सकती है, उसी तरह एक छोटा लेकिन सही कदम सत्ता की बिसात को नए तरीके से सजा सकता है।

बाघमारा की सियासी बिसात में दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है। यहां हर पार्टी और हर नेता अपनी रणनीति के साथ मैदान में है, लेकिन असल सवाल यही है कि बाघमारा का कौन वजीर, कौन प्यादा, और कौन घोड़ा है?

धनबाद से सांसद बनने के बाद ढुल्लू महतो के खिलाफ एंटी-इनकम्बेंसी का माहौल बन रहा है, जिससे उनकी सियासी विरासत पर संकट आ सकता है। ढुल्लू महतो ने अपने भाई शत्रुघ्न महतो को मैदान में उतारकर अपने किले को बनाए रखने का प्रयास तो किया है, पर जनता के बीच यह सवाल जरूर उठ रहा है कि क्या शत्रुघ्न महतो में वो काबिलियत है जो ढुल्लू महतो की सियासी विरासत को आगे बढ़ा सके? यदि ढुल्लू महतो ने अपनी पत्नी सावित्री देवी को उम्मीदवार बनाया होता, तो शायद सहानुभूति वोट का लाभ मिल सकता था और वे एक मजबूत उम्मीदवार के रूप में उभर सकती थीं।

बाघमारा की सियासी बिसात पर इस बार बेहद पेचीदा समीकरण बन रहे हैं। धनबाद से सांसद बनने के बाद भी ढुल्लू महतो ने क्षेत्र में अपना प्रभाव कायम रखा है, लेकिन शत्रुघ्न महतो के सामने चुनौती यह है कि वे उन पुराने बीजेपी नेताओं को साथ जोड़ सकें, जो ढुल्लू महतो के विरोध में रहे हैं! प्रभात मिश्रा और प्रिन्स शर्मा जैसे स्थानीय बीजेपी नेता, जो कभी ढुल्लू महतो के चाणक्य माने जाते थे, आज उनका साथ छोड़ चूके है! हालांकि शत्रुघ्न महतो पुराने समय का हवाला देकर उन्हें अपने पाले में लाने का प्रयास कर रहे हैं। अगर ये नेता साथ आते हैं तो इस बार चुनाव की दिशा बदल सकती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां बीजेपी का झंडा उठाने वाला कोई नहीं है। क्योंकि कतरास और खासकर पचगढ़ी बाजार जैसे शहरी इलाकों में बीजेपी का मजबूत आधार रहा है। पिछली बार, इन क्षेत्रों का एकतरफा समर्थन जलेश्वर महतो को मिला था, जिससे बीजेपी को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था। इस बार भी कतरास की जनता जलेश्वर महतो के साथ खड़ी नज़र आ रही है!

रोहित यादव का निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़ा होना भी समीकरण को उलझा रहा है। बीजेपी के कार्यकर्ताओं और नेताओं का रोहित यादव के पक्ष में जाना जलेश्वर महतो से ज्यादा शत्रुघ्न महतो के लिए चुनौती साबित हो सकता है। ऐसे में बीजेपी की स्थिति कमज़ोर होती दिख रही है, और शत्रुघ्न महतो के लिए अपने भाई की विरासत को बरकरार रखना आसान नहीं होगा।

 2014 में बड़ी जीत हासिल करने वाले ढुल्लू महतो का 2019 का मुकाबला काफी कठिन साबित हुआ था। महज 824 वोटों से मिली जीत में दोबारा गिनती का मामला भी जुड़ा रहा, जिसने चुनाव के नतीजे को विवादास्पद बना दिया। इससे क्षेत्र में उनकी जीत पर सवाल उठे और असंतोष भी बढ़ा। जिसके कारण शत्रुघ्न महतो को भी असंतोष का सामना करना पड़ रहा है। बीजेपी और संघ से जुड़े पुराने नेता, जो ढुल्लू महतो से दूरी बनाए हुए हैं, उनके असंतोष का सीधा असर इस चुनाव में देखने को मिल सकता है। इन नेताओं का असंतोष न केवल संगठन में दरार डालता है, बल्कि समर्थकों के मनोबल पर भी असर डालता है। कतरास जैसे इलाकों में जहां बीजेपी का परंपरागत समर्थन रहा है, वहां यदि ये पुराने नेता और कार्यकर्ता सक्रिय नहीं होते हैं या विपक्ष की तरफ झुकते हैं, तो इसका नुकसान शत्रुघ्न महतो को उठाना पड़ सकता है! अतः, यह चुनाव शत्रुघ्न महतो के लिए केवल जनता का समर्थन पाने की चुनौती नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर से समर्थन जुटाना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

जलेश्वर महतो का पिछले चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन, और इस बार बीजेपी के कमजोर कैंडिडेट के कारण उनकी स्थिति और भी मजबूत लग रही है। जलेश्वर महतो ने एक कद्दावर नेता के रूप में क्षेत्र में अपनी छवि बनाई है, और उनका समर्थन आधार भी स्थिर दिखता है।

2014 में भारी अंतर से हारने के बाद, जलेश्वर महतो ने 2019 के चुनाव में प्रभावशाली वापसी की थी। ढुलू महतो के सामने कड़ी चुनौती पेश करते हुए वे लगभग जीत के करीब पहुँच गए थे। इस कड़े मुकाबले ने बाघमारा की राजनीति को नई दिशा दी, क्योंकि अंतिम नतीजा दोबारा गिनती के बाद 824 मतों के मामूली अंतर से ढुलू महतो के पक्ष में गया। जिसके कारण न सिर्फ चुनाव परिणाम पर सवाल खड़े किए गए, बल्कि जलेश्वर महतो के लिए जनता में सहानुभूति भी पैदा की। यह सहानुभूति अब उनके समर्थन को और मजबूत करती दिख रही है। 

इस बार के चुनाव में जलेश्वर महतो का यह सहानुभूति वाला फैक्टर उनके पक्ष में निर्णायक भूमिका निभा सकता है, क्योंकि जनता के बीच यह भावना घर कर चुकी है कि पिछली बार परिणाम उनके पक्ष में होते हुए भी अनदेखा किया गया। यहां तक कि बाघमारा में उन लोगों का समर्थन भी अब जलेश्वर महतो के साथ हो सकता है, जो पहले शायद अनिश्चित थे। इस बार उनके पास जनता के बीच अपने संघर्ष की कहानी है, जिसने उन्हें एक सशक्त और प्रतिबद्ध नेता की छवि दी है।

वहीं, रोहित यादव की उम्मीदवारी ने चुनावी समीकरण को उलझा दिया है। शुरू में बीजेपी को लगा कि रोहित यादव की मौजूदगी जलेश्वर महतो के वोट बैंक को बांट देगी, जिससे उनके कैंडिडेट के लिए रास्ता आसान हो जाएगा। यही वजह है कि बीजेपी समर्थक कुछ मीडिया हाउसेज भी रोहित यादव के पक्ष में सकारात्मक कवरेज दे रहे है, ताकि कांग्रेस के वोटों में सेंध लगाई जा सके।

हालांकि, जिस तरह रोहित यादव खुलकर जलेश्वर महतो के खिलाफ प्रचार में लगे हुए हैं, इससे क्षेत्र में यह धारणा बन रही है कि वे अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के हित साधने में जुटे हैं। जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि रोहित यादव बीजेपी की "बी टीम" की भूमिका निभा रहे हैं। यह स्थिति कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है, क्योंकि इस तरह के आक्रामक प्रचार से जलेश्वर महतो को सहानुभूति वोट मिलने की संभावना बढ़ जाती है। रोहित यादव का यह कदम अंततः बीजेपी के लिए "भस्मासुर" साबित हो सकता है, क्योंकि उनका प्रचार जलेश्वर महतो के खिलाफ जितना आक्रामक होगा, कांग्रेस समर्थकों को एकजुट करने में उतना ही प्रभावी साबित होगा।

बाघमारा के लोगों में यह भी धारणा है कि पिछली बार जीत में जलेश्वर महतो के साथ धांधली हुई थी, जिससे इस बार विरोध और भी मजबूत हो सकता है। ऐसे में यदि शत्रुघ्न महतो जीत हासिल नहीं कर पाते, तो बाघमारा की राजनीति में उनका भविष्य "लास्ट मुगल" के रूप में सीमित हो सकता है, और ढुल्लू महतो का राजनीतिक वर्चस्व भी खतरे में पड़ सकता है।

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