मोदी कॉलिंग पटेल एंड पटेल कॉलिंग नेहरू!
मोदी कॉलिंग पटेल एंड पटेल कॉलिंग नेहरू!
- -अरुण कुणाल
सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर अक्सर नेहरू पर निशाना साधना एक राजनीतिक प्रवृत्ति बन गई है। हालांकि, इतिहास की दृष्टि से देखा जाए तो पटेल और नेहरू के बीच कई मुद्दों पर मतभेद होते थे, लेकिन उनके बीच एक गहरी समझ और परस्पर सम्मान भी था। पटेल ने कई मौकों पर नेहरू की नेतृत्व क्षमता की सराहना की थी और स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें उपयुक्त माना था। पटेल का कहना था कि नेहरू में वह वैश्विक दृष्टिकोण और दूरदर्शिता थी जो उस समय देश को दिशा दे सकती थी।
यह कहना भी उचित है कि नेहरू और पटेल दोनों ने एक-दूसरे की क्षमताओं और सीमाओं को समझते हुए एक साथ काम किया, जिसमें पटेल ने नेहरू का समर्थन किया और देश की एकता के लिए योगदान दिया। दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत मतभेदों के बावजूद उनका उद्देश्य एक ही था - भारत का समग्र विकास और एकता।
आज पटेल की विरासत को नेहरू के खिलाफ प्रस्तुत करना एक राजनीतिक रणनीति बन गया है, जिससे मोदी सरकार अपनी विचारधारा को सही ठहराने का प्रयास करती है। इसके बजाय, अगर पटेल के वास्तविक विचारों को समझा जाए, तो नेहरू के प्रति उनकी प्रशंसा और समर्थन की भावना स्पष्ट हो जाती है।
नेहरू पर सवाल उठाने वाले आज खुद विदेशी नीति पर जवाब नहीं दे पा रहे है! जो लोग अतीत में नेहरू पर चीन के मुद्दे को लेकर सवाल उठाते रहे हैं, वे स्वयं आज के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में चुनौतियों का सामना कर रहे हैं! नेपाल और भूटान तक भारत को लाल आंख दिखा रहा है! चीन के सामने झुक कर समझौता करना पड़ रहा है। नेपाल और भूटान जैसे छोटे पड़ोसी देशों के साथ भी हाल के वर्षों में भारत के संबंधों में खटास आई है, जबकि ये देश पहले भारत के बहुत नज़दीकी माने जाते थे। नेपाल ने हाल के समय में भारत के कुछ क्षेत्रों पर दावा किया और चीन के प्रभाव में आता दिखा, वहीं भूटान भी अपनी कूटनीति में भारत और चीन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। यह दर्शाता है कि पड़ोसी देशों के साथ स्थिर और सकारात्मक संबंध बनाए रखना उतना सरल नहीं है जितना आलोचक नेहरू के काल के संदर्भ में सोचते हैं।
चीन के साथ वर्तमान तनावों में भी बार-बार समझौतों और संघर्षविरामों के बावजूद वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिति अस्थिर बनी हुई है। ऐसे में, नेहरू पर सवाल उठाना शायद कम प्रासंगिक हो जाता है जब आज की सरकार भी चीन के साथ मुद्दों पर ठोस समाधान ढूंढ़ने में संघर्ष कर रही है! नेहरू का आलोचना करना आज के दौर की समस्याओं का हल नहीं है। मौजूदा चुनौतियों का सामना करने के लिए एक दीर्घकालिक और संतुलित विदेश नीति की आवश्यकता है, जो भारत के पड़ोसी देशों के साथ भरोसे को पुनः स्थापित कर सके और भारत की सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा करे।
पहले डोकलाम और अब अरुणाचल प्रदेश व लद्दाख़! कब तक इंच-इंच पीछे हटते रहेंगे? कब तक पंडित नेहरू के कंधे पर बंदूक़ रख कर चलाते रहेंगे? नेहरू से इतिहास सवाल करेगा और उसे करना भी चाहिए। नरेंद्र मोदी हर बात के लिए सरदार पटेल की अदालत में नेहरू को कठघरे में क्यों खड़ा कर रहे है?
मोदी के असफल विदेश नीति के कारण एक बार फिर से भारत-चीन विवाद के जीन को बोतल से बाहर निकाल दिया है। हालांकि दोनों देशों की सरकारें बोतल के ऊपर कॉर्क लगाने की कोशिश में है। जबकि व्हात्सप्प यूनिवर्सिटी के लोग नेहरू को आपकी अदालत के लिए समन भेजने की तैयारी कर रहे है। व्हात्सप्प यूनिवर्सिटी के छात्रों के जानकारी के लिए बता दूँ, "गलवान वैली" को पंडित नेहरू ने अपने हाथ से जाने नहीं दिया था। ये वैली 1962 से भारत के कब्जे में है।
यह याद रखना चाहिए कि जब अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत-चीन सीमा विवाद सुलझाने में मध्यस्थता की पेशकश की तब चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने किसी तीसरे पक्ष की दखलंदाज़ी से साफ़ इंकार कर दिया था और आपसी बातचीत ज़रिये मुद्दों को सुलझाने पर ज़ोर दिया। अब रशिया को मध्यस्थ बनाया जा रहा है! रशिया के साथ दोस्ती भी नेहरू की देन है!
चीन बार-बार भारत पर दबाव बना रहा था कि सीमा विवाद के लिए अमरीका की तरफ़ देखने के बजाय चीन से बात करने में ही भलाई है। अब जबकि अडानी का हित सामने आ गया तो मोदी सरकार चीन के सामने झुक रही है! झारखण्ड और महाराष्ट्र में चुनाव है इसलिए अडानी हित की बात को देश हित में बताया जा रहा है और गोदी मीडिया इसे भी मास्टर स्टोक बता रहा है!
अब देखना होगा कि वाकई में सीमा पर चीनी बस्ती हटाई जाती है या पीआर इवेंट का सहारा लिया जाता है। नेहरू को कोसने के अलावा अगला कदम क्या होगा-दिल्ली में झूला या बीजिंग में बिना अजेंडा विज़िट या फिर चीन की कंपनी को मोदी का स्टैच्यू बनाने का टेंडर दिया जाएगा...?

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