चौराहे पर खड़ा देश पूछ रहा हैं -नोटबंदी के 50 दिन कब पूरे होंगे?

 




चौराहे पर खड़ा देश पूछ रहा हैं -नोटबंदी के 50 दिन कब पूरे होंगे?


                      ले0- अरुण कुणाल 

”मैंने देश से सिर्फ 50 दिन मांगे हैं। मुझे 30 दिसंबर तक का वक्त दीजिए। उसके बाद अगर मेरी कोई गलती निकल जाए, कोई कमी रह जाए, मेरे इरादे गलत निकल जाएं तो देश जिस चौराहे पर खड़ा करके जो सजा देगा, उसे भुगतने के लिए मैं तैयार हूं।’’ - नरेंद्र मोदी 


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह बयान, जो उन्होंने नोटबंदी के तुरंत बाद 8 नवंबर 2016 को दिया था, तब उन्होंने देश से "50 दिन" की मोहलत मांगी थी, आज 8 साल हो गया! मोदी जी तो चौराहे पर नहीं आए पर देश चौराहे पर आ गया! 

बयान के बाद के वर्षों में जब आलोचनाएँ बढ़ी और आंकड़े और रिपोर्ट्स सामने आए, तो यह सवाल उठता रहा कि प्रधानमंत्री ने जो "सजा" लेने का वादा किया था, वह क्या कभी पूरी हुई? क्या सरकार ने अपनी जिम्मेदारी और नीतियों के असर पर सही तरीके से जवाब दिया?

सरकार और गोदी मीडिया के ताली -थाली पीटने के बावजूद जैसा कि देखा गया, नोटबंदी के परिणाम जमीनी स्तर पर बहुत विवादित थे। नोटबंदी के प्रभाव लंबे समय तक भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था में महसूस किए गए, और इसे लेकर अब भी विभिन्न स्तरों पर बहस जारी है। लाखों लोगों को मुश्किलें उठानी पड़ीं, और विशेष रूप से गरीब, श्रमिक, किसान और छोटे व्यापारी सबसे अधिक प्रभावित हुए। 

नोटबंदी के 50 दिन बाद चौराहे पर आने की बजाए नरेंद्र मोदी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम ठहाके लगाते हुए कहा था, ”घर मे मां बीमार है लेकिन इलाज के लिए जेब में पैसे नहीं है, लोगों के घरों में शादी है लेकिन नोटों की गड्डियां बेकार हो चुकी हैं।’’ मोदी के इस कथन पर वहां मौजूद लोगों ने जिस तरह तालियां पीट रहे थे, वह बड़ा ही अमानवीय और वीभत्स दृश्य था। 

नोटबंदी के पीछे की मंशा भ्रष्टाचार और काले धन के खात्मे के रूप में बताई गई थी। लेकिन यह भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार का एक हिस्सा था और इसके पीछे कुछ विशेष समूहों को लाभ पहुंचाने का मकसद छिपा था। नोटबंदी का असर एक धीमे जहर के रूप में देखा गया है, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था के हर हिस्से को प्रभावित किया। इसका गहरा असर किसानों, मजदूरों, मध्यवर्गीय परिवारों, छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों, और अन्य व्यावसायिक समूहों पर पड़ा। धीरे-धीरे, लोगों की आर्थिक स्थिति और जीवन स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, जिससे उनकी आय में कमी और रोजगार के अवसरों में भी गिरावट आई।


पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नोटबंदी के एक साल बाद इसे एक “संगठित लूट” और “कानूनी डाका” के रूप में परिभाषित किया। उनका यह बयान न केवल नोटबंदी के निर्णय की तीखी आलोचना थी, बल्कि इसके व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर गंभीर चिंता भी व्यक्त करता था। उन्होंने यह बताया कि इस नीति के कारण लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हुई और आर्थिक अस्थिरता का माहौल बना।


प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज के शब्दों में "नोटबंदी पूरी रफ्तार से चल रही कार के टायरों पर गोली मार देने जैसा कार्य था।" ज्यां द्रेज का यह बयान बताता हैं कि जिस तरह एक चलती हुई कार के टायर को नुकसान पहुँचाने से यात्री खतरे में आ जाते हैं और दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है, उसी तरह नोटबंदी ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता को एक झटके में हिला दिया। इसके कारण लाखों लोगों की नौकरियां गईं, छोटे व्यवसाय ठप हो गए, और कई क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां ठहर सी गईं।

 

मनमोहन सिंह और ज्यां द्रेज जैसे अर्थशास्त्रियों के इन तीखे बयानों से यह संदेश मिलता है कि नोटबंदी का प्रभाव एक नीतिगत असफलता से कहीं अधिक था। इसने भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था के कमजोर वर्गों पर भारी बोझ डाला। इस कदम से नकदी संकट, बेरोजगारी, और आर्थिक अस्थिरता जैसे गंभीर परिणाम सामने आए। आर्थिक नीतियों को लागू करने से पहले उनके व्यापक प्रभावों पर गहन विचार और विवेकशीलता आवश्यक है, अन्यथा वे बड़े स्तर पर संकट का कारण बन सकती हैं।


नोटबंदी का प्रभाव छोटे और मध्यम स्तर के कारोबारियों के लिए अत्यधिक हानिकारक साबित हुआ। नकदी पर आधारित कारोबार, जैसे छोटे व्यापारी, दुकानदार, और अन्य मझोले व्यवसाय, जिनकी रोजमर्रा की गतिविधियाँ नकद लेन-देन पर निर्भर थीं, अचानक नकदी संकट का सामना करने लगे। इस कारण कई व्यापारों में बिक्री ठप हो गई, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर भारी दबाव पड़ा। इनमें से कई व्यवसाय आज तक पूरी तरह से पुनःस्थापित नहीं हो पाए हैं, और उनकी कमाई भी काफी प्रभावित हुई है। इसके परिणामस्वरूप लाखों लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा। छोटे उद्योगों में छंटनी बढ़ गई, और इसने बेरोजगारी की दर को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा दिया। बेरोजगारी की वर्तमान दर, जो आज़ादी के बाद के सबसे उच्चतम स्तरों में से एक है, के पीछे नोटबंदी एक प्रमुख कारण माना जा सकता है।


नोटबंदी के आठ साल बाद देश में कैश सर्कुलेशन का इतना बढ़ जाना यह सवाल उठाता है कि क्या नोटबंदी के मूल उद्देश्य पूरी तरह से सफल हुए। 2016 में नोटबंदी का मुख्य लक्ष्य काले धन पर नियंत्रण, नकली मुद्रा का खात्मा और डिजिटल लेनदेन को प्रोत्साहित करना था। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि कैश सर्कुलेशन में न केवल कमी आई, बल्कि यह अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। कैश सर्कुलेशन में इतनी बड़ी वृद्धि दर्शाती है कि लोग अभी भी नकदी पर अधिक निर्भर हैं, और डिजिटल भुगतान प्रणाली अभी भी पूरी तरह से नकदी का विकल्प नहीं बन पाई है। 


नोटबंदी के बाद से भारत में आर्थिक विकास के कई विरोधाभासी पहलू सामने आए हैं। सरकार भले ही यह दावा करती है कि भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, लेकिन जमीनी वास्तविकता में आम जनता के लिए आर्थिक स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं दिखता। GDP और आर्थिक आकार के आंकड़ों के बावजूद, कई आर्थिक सूचकांक, जैसे बेरोजगारी, महंगाई, और रुपये की घटती कीमत, जनता की परेशानियों को दर्शाते हैं।


डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में गिरावट भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। नोटबंदी के बाद, रुपये के मूल्य में गिरावट की रफ्तार तेज हुई है। इसका कारण यह है कि नोटबंदी के बाद नकदी संकट, निवेश में कमी, और छोटे व्यवसायों के बंद होने से भारतीय अर्थव्यवस्था में अस्थिरता आई। आयात महंगे हो गए, जिससे महंगाई बढ़ी और रुपये पर और दबाव पड़ा।


इसके अलावा, रुपये की गिरती कीमत का प्रभाव आम नागरिक की क्रय शक्ति पर भी पड़ता है। पेट्रोल, डीजल, खाने-पीने की चीजें, और अन्य आवश्यक वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। वैश्विक स्तर पर भारत की आर्थिक स्थिति भले ही कुछ आँकड़ों में अच्छी दिखाई दे, लेकिन घरेलू स्तर पर यह आर्थिक असमानता, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के रूप में एक चुनौती के रूप में सामने आती है।


संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूएनडीपी तमाम आंकड़ों के आधार पर बता रही है कि भारत टिकाऊ विकास के मामले में दुनिया के 190 देशों में 117वें स्थान पर है। अमेरिका और जर्मनी की एजेसियां बताती है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स में दुनिया के 127 देशों में भारत 105वें स्थान पर है। बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल जैसे देश भी भारत से बेहतर स्थिति में हैं।


नोटबंदी उर्फ मोदी_बंदी के परिणाम - 

टिकाऊ विकास सूचकांक: 190 देशों में भारत का 117वां स्थान यह दिखाता है कि हमारे विकास की राह में कई स्थायित्व से जुड़ी समस्याएं हैं। टिकाऊ विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, और गरीबी उन्मूलन जैसे पहलुओं पर ध्यान देना शामिल है। भारत में तेजी से शहरीकरण और औद्योगीकरण के चलते पर्यावरणीय क्षति, जलवायु संकट, और संसाधनों के असमान वितरण जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। इसके अलावा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सुधार की गति भी धीमी है, जो भारत को इन सूचकांकों में पिछड़ा हुआ दिखाता है।


ग्लोबल हंगर इंडेक्स: 127 देशों में 105वें स्थान पर होने से स्पष्ट है कि भारत में भूख और कुपोषण जैसी समस्याएं गंभीर रूप से बनी हुई हैं। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब बांग्लादेश, श्रीलंका, और नेपाल जैसे पड़ोसी देश भी हमसे बेहतर स्थिति में हैं। भारत में आर्थिक असमानता और सामाजिक विभाजन, खासकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच, भोजन और पोषण की उपलब्धता को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा, बच्चों में कुपोषण और मातृ स्वास्थ्य की कमी भी बड़ी चुनौतियां हैं।

आय का असमान वितरण: भारत में आर्थिक विकास के फल का अधिकांश हिस्सा समाज के उच्च वर्ग और कुछ बड़े उद्योगपतियों तक सीमित है। वहीं, समाज का एक बड़ा हिस्सा, विशेषकर ग्रामीण और श्रमिक वर्ग, कम आय और रोजगार की अस्थिरता का सामना कर रहा है। विश्व बैंक और ओईसीडी की रिपोर्टों के अनुसार, भारत में शीर्ष 1% आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का 40% से अधिक हिस्सा है। इससे समाज में संपत्ति और आय की गहरी खाई बनती जा रही है।


शिक्षा और स्वास्थ्य में असमानता: गुणवत्ता वाली शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच अभी भी एक बड़े वर्ग के लिए कठिन है। गरीब परिवार महंगी शिक्षा और चिकित्सा सेवाओं का खर्च नहीं उठा पाते, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार की संभावनाएँ और कम हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप, सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के बीच विकास की गति धीमी रहती है।


आर्थिक नीतियों का असमान असर: सरकार की नीतियों का लाभ भी अक्सर समाज के उच्च वर्ग तक ही पहुँचता है। जैसे, बड़ी कंपनियों और उद्योगों को दी जाने वाली सब्सिडी और कर छूट अक्सर छोटे व्यापारियों या किसानों को मिलने वाली सहायता से कहीं अधिक होती है।


भारत आज दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन इसके बावजूद देश में आर्थिक असमानता एक गंभीर मुद्दा है। इस असमानता का कारण आर्थिक वृद्धि का असमान वितरण है, जिसके चलते समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी बुनियादी जरूरतों और संसाधनों से वंचित है। 


भारत के आर्थिक विकास का यह विरोधाभास दिखाता है कि केवल जीडीपी के आधार पर अर्थव्यवस्था की मजबूती का दावा करना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक प्रगति तब होगी जब यह सुनिश्चित किया जाएगा कि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचे। इसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्रों में सुधार और बेहतर रोजगार के अवसरों की आवश्यकता है ताकि सभी लोग भारत की इस आर्थिक प्रगति में बराबरी से शामिल हो सकें।


भारत में आर्थिक विकास का यह विरोधाभास चिंता का विषय है। आँकड़े बताते हैं कि सिर्फ जीडीपी में वृद्धि से टिकाऊ और समग्र विकास सुनिश्चित नहीं हो सकता। विकास की नीतियों में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि समाज के हर वर्ग को भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, और स्वच्छ पर्यावरण जैसी बुनियादी आवश्यकताओं तक पहुँच मिले।


जब अर्थव्यवस्था के निचले स्तर पर स्थित छोटे और मझोले व्यापार प्रभावित होते हैं, तो इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। नौकरियों में कमी, बाजार में मांग में गिरावट और उपभोक्ता खरीद शक्ति का कम होना लंबे समय तक चलने वाली आर्थिक मंदी का संकेत है। इस प्रकार, नोटबंदी ने न केवल तत्काल आर्थिक संकट पैदा किया, बल्कि बेरोजगारी की एक संरचनात्मक समस्या भी उत्पन्न की है जो अभी तक हल नहीं हो पाई है।


भारत की अर्थव्यवस्था का यह विरोधाभास दिखाता है कि केवल आंकड़ों के आधार पर अर्थव्यवस्था की मजबूती का दावा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वास्तविक सुधार के लिए ज़मीनी स्तर पर आर्थिक नीतियों का असर जनता के जीवन में दिखाई देना चाहिए। भारत को सामाजिक विकास, पोषण सुरक्षा, और संसाधनों के समान वितरण की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। आर्थिक रूप से मजबूत होते हुए भी यदि हम अपने लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं, तो हमें अपनी नीतियों में बदलाव की ज़रूरत है ताकि विकास का लाभ सभी तक पहुँच सके।








 


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