परिवारवाद : हम साथ - साथ है!
परिवारवाद : हम साथ - साथ है!
संदर्व : झारखण्ड चुनाव
ले 0 - अरुण कुणाल
अक्सर जवाहरलाल नेहरू पर वंशवाद की परंपरा को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया जाता है और बीजेपी के परिवारवादी नेताओं को ऊर्जा भी नेहरू से मिलता है, लेकिन सच्चाई यह है कि नेहरूजी ने कभी वंशवाद का समर्थन नहीं किया। उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल के बेटे और बेटी को संसद में भूमिका दी, जबकि उनकी अपनी बेटी इंदिरा गांधी को राजनीति में लाने का कोई प्रयास नहीं किया। नेहरूजी के जीते जी इंदिरा गांधी कभी चुनावी राजनीति का हिस्सा नहीं बनीं। उनकी मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने देश का नेतृत्व संभाला, और शास्त्रीजी के आकस्मिक निधन के बाद इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला। इससे स्पष्ट होता है कि नेहरूजी ने वंशवाद को आगे बढ़ाने के बजाय योग्यता को महत्व दिया।
परिवारवाद पर सवाल उठाने वाली बीजेपी के झारखण्ड उम्मीदवारों की लिस्ट में इस बार पांच पूर्व मुख्यमंत्री के रिश्तेदारों के नाम हैं! इनमें मीरा मुंडा, पूर्णिमा दास, बाबूलाल सोरेन का नाम काफी चर्चा में है! मीरा मुंडा पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा की पत्नी हैं, गीता कोड़ा पूर्व सीएम मधु कोड़ा की पत्नी हैं, बाबूलाल सोरेन पूर्व सीएम चंपाई सोरेन के पुत्र हैं! जबकि धनबाद से भाजपा सांसद ढुलू महतो के भाई शत्रुघ्न महतो को टिकट दिया गया है! पूर्णिमा दास पूर्व सीएम और ओडिशा के राज्यपाल रघुवर दास की बहू हैं! ओडिशा के राज्यपाल रघुवर दास का अपनी बहू के लिए चुनाव प्रचार करना कई सवाल खड़े करता है। राज्यपाल का पद संविधान के तहत एक निष्पक्ष और गैर-राजनीतिक भूमिका मानी जाती है, और इस पद पर बैठे व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वे किसी भी प्रकार के राजनीतिक प्रचार में शामिल न हों पर रघुवर दास का 'परिवार' संविधान से ऊपर है!
भाजपा उमीदवारों की यह सूची साफ तौर पर दर्शाती है कि परिवारवाद का प्रभाव अब बीजेपी में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, विशेषकर झारखंड जैसे राज्यों में, जहाँ यह प्रवृत्ति पहले अन्य पार्टियों में देखी जाती थी। मीरा मुंडा, पूर्णिमा दास, और बाबूलाल सोरेन जैसे प्रमुख नाम, जो पूर्व मुख्यमंत्रियों के परिवार से आते हैं, इस बात का उदाहरण हैं कि पार्टी में परिवारवाद का चलन जोर पकड़ रहा है। यह स्थिति बीजेपी के परिवारवाद विरोधी रुख के लिए एक बड़ी चुनौती है, और विपक्षी पार्टियाँ इसे ज़रूर एक मुद्दा बनाएंगी। एक ओर जहां बीजेपी खुद को एक अनुशासन और विचारधारा-आधारित पार्टी कहती है, वहीं दूसरी ओर ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देना पार्टी की मौलिक विचारधारा और वास्तविकता के बीच अंतर को उजागर करता है।
आरएसएस, जिसने पारंपरिक रूप से परिवारवाद का विरोध किया है और नेतृत्व को नीति और सिद्धांतों के आधार पर चुने जाने पर जोर दिया है, उसके द्वारा मौन स्वीकृति मिलने की अटकलें भी इस दिशा में संकेत करती हैं कि राजनीतिक व्यावहारिकता विचारधारा पर हावी हो रही है। यह स्थिति पार्टी की विचारधारा और वास्तविकता के बीच अंतर को उजागर करती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले चुनावों में क्या वाकई बीजेपी इस विचारधारा का पालन करती है या फिर राजनीतिक मजबूरियों के चलते परिवारवाद को नजरअंदाज कर देती है।
बीजेपी के भीतर परिवारवाद को लेकर गहराता असंतोष अब खुलकर सामने आ रहा है। लुइस मरांडी का उदाहरण इस बात का प्रतीक है कि पार्टी के वफादार और वरिष्ठ नेता, जो सालों तक पार्टी की सेवा में रहे हैं, खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। दुमका सीट से चुनाव लड़ने की उनकी इच्छा को नजरअंदाज करते हुए, सुनील सोरेन को उम्मीदवार बनाए जाने से उनका असंतोष इस कदर बढ़ा कि उन्होंने लगभग 25 साल की निष्ठा के बाद बीजेपी छोड़कर जेएमएम का साथ पकड़ लिया।
लुइस मरांडी का यह कदम न केवल बीजेपी के भीतर असंतोष को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पार्टी की पारंपरिक नेतृत्व प्रणाली में परिवारवाद ने बड़ी दरारें डाल दी हैं। ऐसे बगावती सुर अन्य नेताओं को भी प्रेरित कर सकते हैं, और अगर यह प्रवृत्ति बढ़ती है, तो चुनाव में बीजेपी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। पार्टी के लिए यह जरूरी है कि वह अपने असंतुष्ट नेताओं की बात सुने और परिवारवाद के प्रति संतुलित नीति अपनाए, अन्यथा पार्टी की छवि और एकजुटता पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।
बाघमारा में ढुल्लू महतो का 'परिवार मोह' उनके भाई शत्रुघ्न महतो पर भारी पड़ने वाला हैँ! बीजेपी के इस फैसले ने बीजेपी में गहरी असंतोष की लहर पैदा कर दी है। यह परिवारवाद का प्रभाव है कि पार्टी के पुराने नेता और कार्यकर्ता, जो वर्षों से संगठन के लिए मेहनत कर रहे हैं, अब खुद को किनारे किया हुआ महसूस कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, कई लोग पार्टी से निराश होकर घर बैठ गए हैं, जबकि कुछ ने कांग्रेस या अन्य पार्टियों को ज्वाइन कर लिया है।
बाघमारा में परिवारवाद का मुद्दा वाकई गंभीर रूप ले चुका है, और इसका सीधा फायदा कांग्रेस प्रत्याशी जलेश्वर महतो को मिल रहा है। बीजेपी ने ढुल्लू महतो के भाई शत्रुघ्न महतो को टिकट देकर परिवारवाद के मुद्दे को और उभार दिया है। इससे जलेश्वर महतो को बैठे-बिठाए एक महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा मिल गया है, जिसे वे बीजेपी के खिलाफ प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं।
बीजेपी उम्मीदवार शत्रुघ्न महतो के खिलाफ असंतोष के चलते जलेश्वर महतो की चुनावी संभावनाएं बेहतर नजर आ रही हैं, क्योंकि बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक विभाजित हो रहा है। परिवारवाद के खिलाफ जनता में बढ़ता असंतोष और बीजेपी के अंदर की कलह, जलेश्वर महतो के पक्ष में माहौल बना रहे हैं। इस मुद्दे के चलते उन्हें उन वोटरों का समर्थन मिल सकता है जो परिवारवादी राजनीति के खिलाफ हैं और बाघमारा में समान अवसर व विकास देखना चाहते हैं। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि परिवारवाद का मुद्दा बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, और जलेश्वर महतो इसे अपने पक्ष में मोड़ने में सफल हो सकते हैं।
पिछले एक दशक में भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ आवाज उठाने वाली बीजेपी, जो पहले इन मुद्दों को विपक्ष के खिलाफ उपयोग करती रही है, अब खुद इनका सामना करती दिख रही है। जिस तरह से परिवारवाद पार्टी में अपनी जड़ें जमा रहा है, वह एक विडंबना प्रस्तुत करता है, खासकर जब यह पार्टी एक अनुशासित और विचारधारा-समर्पित संगठन के रूप में खुद को प्रस्तुत करती रही है।
झारखण्ड बीजेपी में इस तरह असंतोष का विस्तार होना केडर बेस्ड पार्टी के लिए गंभीर चिंता का विषय है। पार्टी के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि बागी नेताओं की बढ़ती संख्या चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। अगर पार्टी इस असंतोष का समाधान नहीं करती, तो आने वाले चुनावों में यह मुद्दा बीजेपी की संभावनाओं को कमजोर कर सकता है।
परिवारवाद पर अक्सर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व, खासकर प्रधानमंत्री मोदी, ने सख्त रुख अपनाया है और इसे लोकतंत्र के लिए घातक बताया है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या वो खुद उस मंच पर परिवारवाद को बढ़ावा देने वाले नेताओं के साथ खड़े रहेंगे? यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी इस मुद्दे पर अपने समर्थकों को कैसे संतुष्ट करती है और मोदी जी चुनावी मंच पर इसका बचाव कैसे करते है?

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