बटेंगे तो कटेंगे का सुर बन सकता हैं भस्मासुर!


 

बटेंगे तो कटेंगे का सुर बन सकता हैं भस्मासुर/ झारखण्ड में "बाहरी-भीतरी" मुद्दा/ पश्चिम बंगाल की तरह हो सकता है झारखण्ड का परिणाम!


ले0 - अरुण कुणाल 


लोकसभा चुनाव के बाद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन उनका "बंटोगे तो कटोगे" नारा और उनके हिंदुत्व-प्रचारक छवि ने उनके राजनीतिक कद को और अधिक मजबूत बना दिया है। योगी के इस नारे ने उन्हें एक 'हीरो' की छवि दे दी है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां बीजेपी हिंदुत्व के नाम पर अपना आधार मजबूत करना चाहती है। उनके समर्थकों और बीजेपी के कोर वोटर बेस के बीच उनकी लोकप्रियता और अधिक बढ़ी है। योगी की लोकप्रियता को देखते हुए आरएसएस उनके साथ खड़ा हो गया हैं! जिसके कारण अमित शाह एंड कंपनी को बैकफूट पर जाना पड़ गया! मजबूरन नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी योगी के इस नारे का अपने भाषणों में जिक्र कर रहे हैं।  


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जैसे नेताओं का योगी के नारे का जिक्र करना दर्शाता है कि पार्टी ने इस नारे को अपनी चुनावी रणनीति का हिस्सा बना लिया है। बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व योगी के हिंदुत्व आधारित रुख को आगे बढ़ाने में रूचि दिखा रहा है, जिससे योगी की पार्टी के अंदर भी लोकप्रियता और प्रभाव में वृद्धि हुई है।


 "बंटोगे तो कटोगे" नारे ने झारखंड में बीजेपी को एक मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक लाभ दिया है, जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस को एक तरह से रक्षात्मक मुद्रा में धकेल दिया है। यह नारा बीजेपी के एजेंडे को प्रमुख बना देता है और विपक्ष को मजबूर करता है कि वे न चाहते हुए भी सांप्रदायिकता के मुद्दे पर जवाब दें, जो कई मायनों में बीजेपी के लिए अनुकूल स्थिति पैदा कर रहा है। योगी के इस नारे ने चुनावी चर्चा का रुख तय कर दिया है। अब मुख्य मुद्दा बीजेपी द्वारा उठाया गया "धार्मिक एकता बनाम विभाजन" बन गया है, जिससे बीजेपी का एजेंडा ही चुनावी विमर्श का केंद्र बन गया है। 


"बंटोगे तो कटोगे" जैसे आक्रामक नारे के सामने JMM और कांग्रेस को सांप्रदायिकता के विरोध में स्पष्ट रुख अपनाना पड़ रहा है। इससे विपक्ष की स्थिति रक्षात्मक बनती है, क्योंकि वे सीधे तौर पर बीजेपी के हिंदुत्ववादी एजेंडे का विरोध करने पर मजबूर हो जाते हैं। इस स्थिति में बीजेपी को यह लाभ मिलता है कि वह विपक्ष पर "हिंदू विरोधी" या "संप्रदाय विशेष का पक्षधर" होने का आरोप लगा सकती है, जो चुनावी संदर्भ में उनके लिए एक अनुकूल नैरेटिव बना सकता है।


JMM और कांग्रेस का मूल ध्यान झारखंड के विकास, आदिवासी अधिकार, और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर है। लेकिन इस नारे के कारण उन्हें सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के मुद्दों पर अधिक ध्यान देना पड़ रहा है, जो उनके प्राथमिक मुद्दों से भटकाव पैदा करता है। इससे बीजेपी को राज्य के पारंपरिक मुद्दों पर जवाबदेही से बचने का अवसर मिलता है, और वह केवल सांप्रदायिक एजेंडे पर चुनाव को केंद्रित करने का प्रयास कर सकती है।


दूसरी ओर, झारखंड में बीजेपी द्वारा सांप्रदायिकता पर अधिक जोर देने से पार्टी को आदिवासी वोटों के खिसकने का खतरा हो सकता है। आदिवासी समुदाय के लिए सांप्रदायिक मुद्दों से अधिक उनके अधिकार, आजीविका, और संसाधनों पर नियंत्रण महत्वपूर्ण हैं। यदि चुनाव स्थानीय बनाम बाहरी यानी "बाहरी-भीतरी" के मुद्दे पर केंद्रित हो जाता है, तो यह स्थिति बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है, और परिणाम पश्चिम बंगाल की तरह हो सकता है, जहाँ टीएमसी ने "बंगाल की अस्मिता" के मुद्दे पर बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति को मात दी थी।


संभावित जोखिम और चुनौतियाँ :


1. आदिवासी अस्मिता और पहचान का मुद्दा: झारखंड के आदिवासी समुदायों के लिए उनकी अस्मिता, संसाधनों पर अधिकार, और संस्कृति महत्वपूर्ण हैं। अगर बीजेपी का फोकस हिंदुत्व और सांप्रदायिक एजेंडे पर रहेगा, तो यह आदिवासी समुदाय के बीच असुरक्षा की भावना पैदा कर सकता है। इस स्थिति में JMM और कांग्रेस जैसे दल "भीतरी बनाम बाहरी" का मुद्दा उठाकर आदिवासी मतदाताओं का समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे, जिससे बीजेपी के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।


2. स्थानीय मुद्दों की अनदेखी: आदिवासी समुदाय की प्राथमिकताएँ धार्मिक नहीं, बल्कि क्षेत्रीय मुद्दों पर आधारित होती हैं, जैसे जल, जंगल, जमीन और अधिकार। अगर बीजेपी का अधिक जोर सांप्रदायिकता और हिंदुत्व पर रहेगा तो यह पार्टी की स्थानीय मुद्दों पर उदासीनता को दिखाएगा, जो आदिवासी मतदाताओं के बीच नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इसके चलते मतदाता विपक्षी दलों की ओर रुख कर सकते हैं, जो उनके मुद्दों को उठाने का वादा करते हैं।


3. बाहरी-भीतरी की राजनीति: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने "बाहरी-भीतरी" का मुद्दा उठाकर बीजेपी के खिलाफ सफल रणनीति अपनाई थी। झारखंड में भी JMM और कांग्रेस इस मुद्दे को उठाकर आदिवासी मतदाताओं को यह संदेश दे सकते हैं कि बीजेपी का सांप्रदायिक एजेंडा राज्य की सांस्कृतिक पहचान और स्थानीयता के लिए खतरा है। इससे आदिवासी समुदाय के मतदाता बीजेपी से दूर जा सकते हैं, और झारखंडी अस्मिता के नाम पर एकजुट हो सकते हैं।


4. बीजेपी के प्रति अविश्वास का खतरा: आदिवासी समुदायों में बीजेपी के प्रति पहले से ही कुछ हद तक अविश्वास रहा है, क्योंकि वे आदिवासी अधिकारों और संरक्षण के मुद्दों पर बीजेपी को कमजोर मानते हैं। यदि बीजेपी सांप्रदायिकता को अधिक महत्व देती है, तो विपक्षी दल इसे आदिवासी अधिकारों की उपेक्षा के रूप में प्रचारित कर सकते हैं, जिससे आदिवासी वोट बैंक और भी प्रभावित हो सकता है।


5. ध्रुवीकरण का इंडिया गठबंधन के पक्ष में असर: बीजेपी के "बंटोगे तो कटोगे" नारे के कारण झारखंड में आदिवासी और मुस्लिम समुदाय का झुकाव इंडिया गठबंधन (जिसमें JMM, कांग्रेस, और RJD शामिल हैं) की ओर बढ़ने का खतरा है। बीजेपी के इस नारे के प्रभाव से चुनावी माहौल में एक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का माहौल तो बन सकता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि इसका लाभ विपक्ष को मिल सकता है।


 झारखंड में JMM, कांग्रेस, और RJD जैसे दलों ने हमेशा से धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय का समर्थन किया है। "बंटोगे तो कटोगे" नारे से बने ध्रुवीकरण के माहौल में इंडिया गठबंधन खुद को धर्मनिरपेक्ष और आदिवासी-मुस्लिम हितैषी के रूप में पेश कर सकता है। इससे धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में एक मजबूत ध्रुवीकरण हो सकता है, जो इंडिया गठबंधन को फायदा पहुंचा सकता है।


बीजेपी का इस तरह का सांप्रदायिक नारा आदिवासी और मुस्लिम समुदायों में असुरक्षा की भावना पैदा कर सकता है। विपक्षी दल इसे "धर्म आधारित विभाजन" के रूप में प्रचारित कर बीजेपी को एक ऐसी पार्टी के रूप में दिखा सकते हैं जो आदिवासी और मुस्लिम हितों को अनदेखा कर रही है। इससे इन समुदायों का वोट बैंक इंडिया गठबंधन की ओर खिसक सकता है।

यही वजह हैं कि अजित पवार और एकनाथ शिंदे जैसे नेता "बंटोगे तो कटोगे" नारे से दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रहे  हैं। अजित पवार और एकनाथ शिंदे की राजनीति महाराष्ट्र के मुद्दों पर आधारित है जैसे कि मराठा आरक्षण, किसान कल्याण, और क्षेत्रीय विकास। ऐसे में, "बंटोगे तो कटोगे" जैसा नारा उनकी प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाता और इसे अपनाने पर उनकी छवि एक क्षेत्रीय और विकासोन्मुखी नेता से हट सकती है।


महाराष्ट्र में विभिन्न समुदायों और जातियों का मिश्रण है, जहाँ की राजनीति धर्म से अधिक सामाजिक मुद्दों, मराठा अस्मिता, और जातिगत समीकरणों पर आधारित है। अजित पवार और एकनाथ शिंदे जैसे नेता जानते हैं कि सीधे तौर पर ध्रुवीकरण के नारे महाराष्ट्र के मतदाताओं पर विपरीत प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए वे इस तरह के नारों से सावधानी बरतते हैं ताकि उनकी छवि स्थानीय और सर्व-समावेशी नेता की बनी रहे। इस प्रकार, योगी आदित्यनाथ के उग्र हिंदुत्व के नारे से दूरी बनाकर वे अपने मतदाताओं को बनाए रखना चाहते हैं।


महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना का हमेशा से हिंदुत्व का आधार रहा है, लेकिन उस हिंदुत्व का स्वरुप अपेक्षाकृत संतुलित और मराठी अस्मिता पर आधारित रहा है। इसलिए, एकनाथ शिंदे, शिवसेना के इस परंपरागत पहचान को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे अपनी पुरानी वोट बैंक को संतुलित रख सकें। वहीं, अजित पवार अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को सुरक्षित रखना चाहते हैं, ताकि एनसीपी के भीतर उनकी पकड़ और उनके धर्मनिरपेक्ष समर्थकों का समर्थन बना रहे।

अजित पवार और एकनाथ शिंदे जिस खतरे को भांप रहे हैं, शायद झारखण्ड के नेता उससे अनजान हैं! "बंटोगे तो कटोगे" नारे से उत्पन्न ध्रुवीकरण का एक उल्टा प्रभाव यह हो सकता है कि आदिवासी और मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर इंडिया गठबंधन को वोट दें। इससे चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकता है, और विपक्षी दलों का पक्ष मजबूत हो सकता है। बीजेपी के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्योंकि इससे उसका कोर वोट बैंक कमजोर हो सकता है, और विपक्षी दलों को राज्य में एक बढ़त मिल सकती है।


बीजेपी को झारखंड में संतुलित रणनीति अपनानी होगी, जिसमें वे सांप्रदायिक नारों से परे स्थानीय मुद्दों, आदिवासी अधिकारों, और सामाजिक कल्याण पर ध्यान दें। ऐसा करने से वे इंडिया गठबंधन द्वारा उठाए गए मुद्दों को संतुलित कर सकते हैं और आदिवासी एवं मुस्लिम समुदायों के वोट को अपने पक्ष में बनाए रखने की कोशिश कर सकते हैं।


अगर चुनाव "बाहरी-भीतरी" और "स्थानीय अधिकारों" जैसे मुद्दों पर केंद्रित होता है, तो JMM और कांग्रेस इसे पश्चिम बंगाल के चुनाव जैसा बना सकते हैं, जहाँ स्थानीय पहचान और अस्मिता का मुद्दा बीजेपी के सांप्रदायिक एजेंडे से ज्यादा प्रभावी साबित हुआ था। ऐसे में बीजेपी को झारखंड में बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है, क्योंकि स्थानीय मतदाता सांप्रदायिकता की बजाय अपनी अस्मिता और अधिकारों को प्राथमिकता दे सकते हैं।


#JharkhandElection 

#MaharashtraElection 



















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