बाघमारा कल आज और कल : एक सियासी सफर!
बाघमारा कल आज और कल : एक सियासी सफर!
ले0- अरुण कुणाल
बाघमारा का सियासी सफर वास्तव में एक गहरी और दिलचस्प कहानी है। ये क्षेत्र कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था! 1967 में विधानसभा क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में आने के बाद से लेकर झारखण्ड के रूप में अलग राज्य बनने तक बाघमारा कांग्रेस का एक अभेद्य किला था, उस किले को भेद पाने का कारनामा जलेश्वर महतो ने किया था! यह राजनीति की दुनिया में समय और परिस्थिति का खेल ही है कि कैसे वक़्त का पहिया घूमता है। आज जलेश्वर महतो के कंधे पर कांग्रेस की जिम्मेदारी आन पड़ी है! आज जलेश्वर महतो के सामने सवाल सिर्फ पार्टी प्रतिष्ठा का नहीं है, बल्कि जनता के बीच विश्वास और लोकप्रियता को फिर से हासिल करने और कांग्रेस को उसकी पुरानी ऊंचाइयों पर पहुंचाने की चुनौती भी हैं।
मैं 'बाघमारा के लाल' के दौर का गवाह रहा हूं! कांग्रेस विधायक ओ पी लाल से पहले के दौर के बारे में लोगों से सुना हैं और पढ़ा हैं! इसलिए कल आज और कल का सफर लाल साहब से ही शुरुआत कर रहा हूं! उस समय, बाघमारा की राजनीति का स्वरूप एकतरफा था। जनता का समर्थन कांग्रेस के पक्ष में पूरी तरह झुका हुआ था।
खासकर, शंकर दयाल सिंह और ओ पी लाल के दौर में बाघमारा में कांग्रेस पार्टी की पकड़ इतनी मजबूत थी कि इसे चुनौती देना लगभग असंभव माना जाता था। यह वह दौर था जब व्यक्तिगत छवि और पार्टी का संयुक्त प्रभाव सबसे अधिक मायने रखता था। इन नेताओं की प्रभावशाली उपस्थिति ने बाघमारा को कांग्रेस के लिए न केवल एक राजनीतिक शक्ति केंद्र बनाया, बल्कि पूरे क्षेत्र में कांग्रेस की विचारधारा को स्थापित किया। हालांकि, समय के साथ मंडल-कमंडल की राजनीति और जातिगत समीकरणों के बदलने से कांग्रेस का यह गढ़ धीरे-धीरे कमजोर होने लगा, लेकिन इस स्वर्णिम युग की छाप आज भी बाघमारा की राजनीतिक संस्कृति में महसूस की जा सकती है।
स्वर्गीय ओ पी लाल से मैं दो बार मिला था, एक बार क्रिकेट ग्राउंड के विवाद को लेकर और दूसरी बार स्पोर्ट्समैन मीट के अवसर पर, जहां उनके हाथों से अवार्ड लिया था! दो मुलाकातों में ही मुझे लग गया कि लाला जी के लिए कोई मुद्दा छोटा या बड़ा नही था और हर एक मुद्दे में वे सियासत खोज लेते थे! रानी बाजार के जिस मैदान के सामने महिला कॉलेज होने के कारण उन्होंने हमारे खेलने पर रोक लगा दिया था, एक महीना बाद जब स्पोर्ट्समैन मीट में हमारी टीम के 4 लड़कों को अवार्ड मिला तो भाषण देते वक़्त खास तौर से हमारा जिक्र किया और कहा कि "अगर खेलने के लिए मैदान नहीं है तो मेरा छाती हाजिर है. आप लोग मेरी छाती पर विकेट गाड़ कर खेल सकते हो." तब हमारी राजनीति समझ उतनी नहीं थी और न हम में से कोई 18 साल का था, जो उनको वोट दे सकें पर लाला जी हमारे साथ सियासी खेल खेलने से नहीं चूके!
पहली घटना, जब उन्होंने महिला कॉलेज के सामने खेलने पर रोक लगाई, और दूसरी, जब स्पोर्ट्समैन मीट में अवार्ड देते वक्त मेरी क्रिकेट टीम की सराहना करते हुए कहना -"मेरा छाती हाज़िर है, आप लोग मेरी छाती पर विकेट गाड़ कर खेल सकते हो," यह दर्शाता है कि लाला जी किस तरह से छोटे-छोटे मुद्दों को अपनी सियासी छवि को गढ़ने के लिए इस्तेमाल करते थे। वे जानते थे कि युवा, भले ही वोट देने की उम्र में न हों, लेकिन वे भविष्य के नागरिक हैं और उनकी राय लंबे समय में मायने रखेगी।
लाला जी का सियासी गुण काफी हद तक ढुल्लू महतो में है! लाला जी के कारण रानीबाजार का स्कूल ग्राउंड राजनीती का शिकार हो गया था और ढुल्लू महतो के कारण स्कूल में सियासी खेल चल रहा है! कतरास के जिस डी ए वी स्कूल से ढुल्लू महतो पढ़े है, आज वह स्कूल राजनीति का अड्डा बन गया है! धनबाद से सांसद बनने के बाद भी ढुल्लू महतो से बाघमारा का मोह छूट नहीं रहा है! वह डी ए वी स्कूल पर कब्ज़ा करने की कोशिश में आर्य समाज के नियमों को ताक पे रखकर अध्यक्ष पद पर बने रहना चाहते है, जबकि कतरास का डी ए वी स्कूल धनबाद क्षेत्र में नहीं आता है! धनबाद से सांसद बनने के बाद आर्य समाज ने ढुल्लू महतो को स्कूल कमेटी से हटा दिया था, जिसके कारण सांसद महोदय ने अपनी एक अलग कमेटी बना ली है, दो -दो स्कूल कमेटी के कारण बैंक खाते बंद पड़े है! शिक्षकों को वेतन न मिल पा रहा है और न स्कूल की बुनियादी जरूरतों पर खर्च हो पा रहा है! विद्यार्थियों का भविष्य सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है, इसके बावजूद ढुल्लू महतो ने स्कूल की कमेटी को नाक का सवाल बना लिया है!
मंडल -कमंडल की राजनीति और छात्र आंदोलन
बाघमारा का राजनीतिक सफर समय के साथ बेहद परिवर्तनशील और घटनापूर्ण रहा है। ओ पी लाल के युग में कांग्रेस का जो प्रभुत्व था, वह सख्त और एकछत्र था। उस दौर में बाघमारा की राजनीति का आरंभ और अंत ओ पी लाल से ही होता था, जिनके व्यक्तित्व और नेतृत्व ने कांग्रेस को यहाँ मजबूत किया। लेकिन मंडल और कमंडल की राजनीति के आगमन के साथ ही यह समीकरण तेजी से बदलने लगा।
मंडल आयोग की सिफारिशों और सामाजिक न्याय की राजनीति ने जातिगत समीकरणों को पुनः परिभाषित किया, जिसका फायदा जलेश्वर महतो जैसे नेताओं को मिला। वहीं, विजय झा का "कमंडल" यानी कि उनकी हिंदूवादी छवि इन नए समीकरणों में फिट नहीं बैठ सकी। ईमानदार छवि होने के बावजूद, विजय झा के लिए राजनीति में सफलता मुश्किल हो गई, जबकि जलेश्वर महतो इन बदलावों का लाभ उठाते हुए बाघमारा के लिए अधिक अनुकूल साबित हुए। जब झारखंड राज्य का निर्माण हुआ, तब ओ पी लाल और उनकी विरासत बाघमारा के राजनीतिक इतिहास का हिस्सा बन गई ।
मैं कतरास 1987 में आया था! वह दौर 'बाघमारा के लाल' ओ पी लाल का था। बाघमारा में आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन ने नए युग का सूत्रपात किया। इस आंदोलन का नेतृत्व कतरास के युवा छात्र नेता प्रभात मिश्रा ने किया था। प्रभात मिश्रा की गिरफ्तारी से उत्पन्न आक्रोश के कारण आंदोलन उग्र हो गया, और इसके दौरान पुलिस व छात्रों के बीच झड़पें भी हुईं थी। स्वतंत्रता सेनानी रामानंद खेतान का यह कहना कि ऐसा आंदोलन कतरास में 1942 के बाद नहीं हुआ था, इस घटना की ऐतिहासिकता को और गहराई से दर्शाता है। यही वह दौर था जब बाघमारा के युवाओं में राजनीतिक चेतना का उदय हुआ।
उस वक़्त मैं, प्रिंस शर्मा और ढुल्लू महतो कतरास डी ए वी स्कूल में पढ़ते थे! ढुल्लू महतो हम से जूनियर थे! प्रभात मिश्रा के नेतृत्व में आरक्षण विरोधी आंदोलन में हम सब ने भाग लिया था! छात्र आंदोलन में हम साथ थे पर एक दुशरे को जानते नहीं थे! ढुल्लू महतो से मेरी पहली मुलाक़ात उनके विधायक बनने के बाद हुई थी! छात्र आंदोलन के बाद में हम सबके रास्ते अगल हो गए थे! आगे चलकर ढुल्लू महतो ने जलेश्वर महतो का हाथ थाम लिया! कोयला के धंदे में कमाई के बाद जब खुद की राजनीतिक महत्वकांछा जागी तो वे जलेश्वर महतो से अलग हो गए और बाबूलाल मरांडी की पार्टी से पहली बार चुनाव लड़ा!
छात्र आंदोलन के दौरान ढुल्लू महतो कोई खास पहचान नहीं मिली। लेकिन, उनकी पहचान तब उभरी जब 2005 में पहली बार चुनाव लड़ा और 25,000 से ज्यादा वोट हासिल किए। ओ पी लाल की हार और जलेश्वर महतो की जीत में ढुल्लू महतो का अहम योगदान था। राजनीति में उनकी प्रभावशाली शुरुआत ने सबका ध्यान खींचा और धीरे-धीरे वे बाघमारा की राजनीति का केंद्र बनते चले गए।
उस वक़्त मैं दिल्ली में जर्नलिस्ट था! ढुल्लू महतो के बारे में जानकर सरप्राइज था! मैं अपने दोस्त रंजीत पांडे को फोन कर जानकारी हासिल की! रंजीत पांडे ने बताया कि चुनाव से पहले ढुल्लू महतो उससे मिलने आया था और जिस कदर वह अपनी जीत का दावा कर रहा था, रंजीत को विश्वास नहीं हुआ! रंजीत पांडे उस समय बाघमारा के विधायक जलेश्वर महतो के खास आदमी थे और ढुल्लू महतो ने उनको तोड़ने की भरसक कोशिश की थी! उसके बाद अगले तीन चुनाव में जो हुआ, वह इतिहास बन गया!
ढुल्लू महतो से धनबाद जेल में मुलाक़ात
मेरी पहली मुलाकात ढुल्लू महतो से धनबाद जेल में हुई, जहाँ उनका रुतबा और दबदबा देखकर मैं चकित रह गया। जेल एक पार्टी कार्यालय जैसी लग रही थी, जहाँ ढुल्लू महतो का नियंत्रण स्पष्ट दिख रहा था। मुझे आज भी याद है, रात का समय था, धनबाद जेल एक फ़िल्मी दरबार लग रहा था! वह जेल कम, ढुल्लू महतो का पार्टी दफ्तर ज्यादा लग रहा था! वहां कई जाने -पहचाने चेहरे भी दिखें, उनमें से कुछ मेरे साथ पढ़े थे तो कुछ साथ में क्रिकेट खेले थे! जब मैं अंदर गया तो जेल के एक अधिकारी भी ढुल्लू महतो के साथ बैठे थे! जब उनको पता चला कि मैं एक पत्रकार हूं तो वे वहां से उठ कर चल दिए! कोयला उद्योग में उनके प्रभुत्व और राजनीतिक प्रभाव की छवि यह मुलाकात बेहद दिलचस्प और संकेतपूर्ण थी।
बाद में, दिल्ली में उनके मंत्री बनने की आकांक्षा को लेकर दो बार मुलाकात हुई! वह मुलाकात भी एक दिलचस्प अनुभव था, जो उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और धनबल की भूमिका को बखूबी उजागर करती है। ढुल्लू महतो से दूसरी मुलाक़ात मेरे दिल्ली आवास पर हुई थी! वे प्रभात मिश्रा और शत्रुघ्न महतो के साथ दिल्ली आए थे! दूसरी बार बीजेपी के टिकट से चुनाव जीतने के बाद मंत्री बनने की चाह उन्हें दिल्ली खींच लाई थी! वे दो पेज का हिंदी में लिखा बायोडाटा लेकर आए थे! जब बायोडाटा मुझे पसंद नहीं आया तो उन्होंने मुझसे अनुरोध किया कि बायोडाटा ठीक कर दूं! दो घंटे साथ लगकर बायोडाटा ठीक किया और बीजेपी के शीर्ष नेताओं के साथ मीटिंग भी अर्रेंज की थी! बाद में पता चला कि ढुल्लू महतो के बारे में बीजेपी की लाइजीनिंग करने वाले एक दर्जन लोगों को पता था! उन लोगों की नज़र में ढुल्लु महतो धनबाद का एक नामी कोल माफिया और एक मोटा बकरा थे! हफ्ता- दस दिन कोशिश करने के बाद वे वापस चले गए! उसके बाद पुलिस केस और जेल यात्रा के चलते विधायक की कुर्सी बचाने के चक्कर में ढुल्लू महतो को लम्बा संघर्ष करना पड़ा!
ढुल्लू महतो का तीन बार विधायक और सांसद बनना उनकी ताकत, संसाधनों और समय की अनुकूलता का परिणाम था। अगर विनोद सिंह की हत्या न हुई होती या सिंह मेन्शन और वासेपुर का दबदबा कायम रहता, तो शायद ढुल्लू महतो का कोयला उद्योग में एकाधिकार स्थापित न हो पाता और धनबाद के तीन बार के सांसद पी एन सिंह राजनीती से रिटायर्ड नहीं हुए होते तो ढुल्लू महतो को बीजेपी का तीन दशक से सेफ सीट रहा, धनबाद से टिकट मिल पाना भी मुश्किल था!
जलेश्वर महतो : लाल साहब से शत्रुघ्न महतो तक
हालांकि, ओ पी लाल के बाद बाघमारा का सियासी मिजाज धीरे-धीरे बदलने लगा। कांग्रेस का प्रभाव धीरे-धीरे घटने लगा, और क्षेत्र में नई राजनीतिक ताकतें उभरने लगीं। जैसे-जैसे समय बीतता गया, बाघमारा ने कई अन्य राजनीतिक पार्टियों का प्रभाव भी देखा। जेएमएम, समता पार्टी, जदयू, और भाजपा जैसी पार्टियों ने यहाँ अपनी जड़ें जमाने की कोशिश की और जनता का समर्थन जुटाने में कामयाब रहीं। आज कांग्रेस को फिर से स्थापित करने की जिम्मेदारी समता पार्टी और जदयू विधायक रहे जलेश्वर महतो के कंधो पर है!
जलेश्वर महतो बाघमारा की राजनीति में एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने समय और परिस्थिति के बावजूद अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखी है। ओ. पी. लाल जैसे प्रभावशाली नेता के दौर से लेकर ढुल्लू महतो के दबदबे तक, जलेश्वर महतो ने हमेशा अपने कौशल और संघर्ष से खुद को राजनीतिक मंच पर मजबूती से स्थापित किया है। उनकी 35 वर्षों की चुनावी यात्रा उनकी धैर्य और जमीनी पकड़ का प्रमाण है। यह दिखाता है कि वे बदलते वक्त के साथ खुद को बदलने में माहिर हैं।
जलेश्वर महतो के साथ मेरी मुलाक़ात हाय - हैलो तक ही रही है!इस बार पहली बार उनसे लंबी मुलाक़ात हुई थी! औपचारिकता से भरी मुलाक़ात मे भी वे चुनावी मोड़ मे नजर आए, जो एक कुशल नेता का प्रमाण है. बातों बातों में उन्होंने कहा कि "आप मेरा पिछले चार बार का चुनावी हलफनामा देख लीजिए, एक ओर जहां ढुल्लू महतो की सम्पति हर पांच साल में कई गुनी बढ़ी है, वहीं मेरी सम्पति घटी है!"
जलेश्वर महतो के साथ 30 मिनट की मुलाकात मुलाकात उनके व्यक्तित्व और राजनीति की शैली को करीब से समझने का एक अच्छा अवसर था । उनकी सहजता और चुनावी मोड में बने रहना दिखाता है कि वे राजनीति में हमेशा सतर्क और तैयार रहते हैं। यह उनके लंबे अनुभव और कुशलता का प्रमाण है। उनका चुनावी हलफनामे का संदर्भ देना उनकी साफ छवि और ईमानदारी पर जोर देने की एक कोशिश है। वहीं, ढुल्लू महतो की बढ़ती संपत्ति के संदर्भ में उनकी यह बात एक अप्रत्यक्ष आलोचना के रूप में देखी जा सकती है, जो चुनावी नैतिकता और पारदर्शिता पर ध्यान खींचने का प्रयास है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि जलेश्वर महतो आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने तीन दशक पहले थे! बात इस चुनाव की हो या 2029 की, रोहित यादव, शत्रुघ्न महतो और सूरज महतो जैसे युवा चेहरों के सामने जलेश्वर महतो मजबूती के साथ चुनौती पेश करने की मादा रखते हैं! यह चुनाव जलेश्वर महतो का आखिरी चुनाव माना जा रहा है पर उनको देख कर लगता नहीं है कि वे 2034 से पहले राजनीती से सन्यास लेंगे! शत्रुघ्न महतो और रोहित यादव को अगली बार भी जलेश्वर महतो का सामना करना पड़ सकता है!
शत्रुघ्न महतो, रोहित यादव, दीपक रवानी और सूरज महतो
ढुल्लू महतो ने अपने भाई शत्रुघ्न महतो को मैदान में उतारकर अपने 15 साल पुराने किले को बनाए रखने का प्रयास तो किया है पर जनता के बीच यह सवाल जरूर उठ रहा है कि क्या शत्रुघ्न महतो में वो काबिलियत है जो ढुल्लू महतो की सियासी विरासत को आगे बढ़ा सके? ढुल्लू महतो की यह रणनीति एक सोची-समझी राजनीतिक चाल लगती है, जहां उन्होंने अपने परिवार को सियासी फ्रंट पर आगे रखा है लेकिन खुद को किसी भी सीधी जिम्मेदारी से अलग रखा है। शत्रुघ्न महतो को मैदान में उतारना एक ऐसा कदम है जो ढुल्लू महतो की सियासी विरासत को सुरक्षित रखने का प्रयास भी है और हार के खतरे को खुद से दूर करने का उपाय भी। अपनी पत्नी सावित्री देवी को उम्मीदवार न बनाना दर्शाता है कि ढुल्लू महतो ने इस चुनाव में व्यक्तिगत दांव कम लगाए हैं। इस रणनीति से ढुल्लू महतो एक तरफ अपनी साख बचाने का प्रयास कर रहे हैं, तो दूसरी ओर अपने भाई को मौका देकर पारिवारिक राजनीतिक किले को मजबूत करना चाह रहे हैं।
हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि शत्रुघ्न महतो ढुल्लू महतो की राजनीतिक छवि और प्रभाव को कितना आगे बढ़ा पाएंगे। जनता के भरोसे और शत्रुघ्न की क्षमता पर निर्भर करेगा कि यह दांव सफल होगा या नहीं। वहीं, अगर नतीजे विपरीत आते हैं, तो यह ढुल्लू महतो की रणनीति पर भी बड़ा सवाल खड़ा करेगा लेकिन यह तय है कि आने वाला समय शत्रुघ्न महतो और रोहित यादव का होगा!
रोहित यादव ने जिस तेजी से बाघमारा की राजनीति में अपनी पहचान बनाई है, वह निश्चित रूप से उल्लेखनीय है। महज छह महीने के भीतर उन्होंने न केवल अपने समर्थकों की बड़ी फौज खड़ी की, बल्कि मीडिया और जनता के बीच भी अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। यह उनकी रणनीतिक क्षमता और जनसंपर्क कौशल का प्रमाण है।
ढुल्लू महतो जैसे अनुभवी नेता की तुलना में रोहित यादव का यह उदय यह दर्शाता है कि राजनीति में अब नए और ऊर्जावान नेताओं के लिए भी अवसर हैं, बशर्ते उनकी कार्यशैली और जुड़ाव प्रभावी हो। रोहित की लोकप्रियता उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों, जनता से सीधे संवाद, और उनके संगठित कार्यकर्ताओं की ताकत का परिणाम है।
कांग्रेस और बीजेपी के बीच पारंपरिक सीधा मुकाबला अब रोहित यादव की एंट्री के कारण त्रिकोणीय संघर्ष में बदल गया है। यह बाघमारा की राजनीति में बदलाव का संकेत है, जहां जनता राष्ट्रीय दलों की बजाए एक निर्दलीय उम्मीदवार के नेतृत्व पर भरोसा कर सकती है, जो अपने दम पर सत्ता समीकरण बदलने की क्षमता रखता है।
हालांकि, यह चुनाव कौन जीतेगा, यह कहना अभी मुश्किल है। लेकिन रोहित यादव ने यह साबित कर दिया है कि वे बाघमारा के भविष्य के नेता के रूप में देखे जा सकते हैं। पहले गिरिडीह सीट से लोकसभा चुनाव में जयराम महतो और अब रोहित यादव, उनकी इस तेजी से बढ़ती लोकप्रियता से न केवल विरोधियों को चुनौती दी है, बल्कि स्थानीय राजनीती को भी नया आयाम दिया है।
बाघमारा की राजनीति में दीपक रवानी और सूरज महतो का उदय एक नई उम्मीद और जमीनी राजनीति का प्रतीक है। एक ओर जहां, दीपक रवानी के साथ जयराम महतो का जादुई नेतृत्व और बाहरी -भीतरी का मुद्दा है, वहीं सूरज महतो का मात्र दो महीने में हर घर जाकर जनता से मिलना और उनके मुद्दों को समझना दिखाता है कि आज भी परंपरागत चुनावी प्रचार का दौर खत्म नहीं हुआ है! सूरज महतो का डोर-टू-डोर जनसंपर्क अभियान जनता से जुड़ने का एक सशक्त माध्यम साबित हुआ है। हालांकि, इस चुनाव में वे मजबूत दावेदारी पेश करने में सफल नहीं हो सके, लेकिन उनका प्रयास उनकी दूरदृष्टि और धैर्य को दर्शाता है। राजनीति में ऐसे कदम लंबी अवधि में परिणाम देते हैं, और सूरज महतो के लिए यह तैयारी भविष्य के लिए एक मजबूत आधार बन सकती है।
यदि बाघमारा के भविष्य को देखें, तो शत्रुघ्न महतो, रोहित यादव, दीपक रवानी और सूरज महतो ही ऐसे चेहरे हैं जो इस क्षेत्र की राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं। शत्रुघ्न महतो अपनी पारिवारिक विरासत और संगठनात्मक शक्ति के बल पर, रोहित यादव अपनी तेज रणनीति और लोकप्रियता के दम पर, दीपक रवानी के साथ जयराम फेक्टर है, तो सूरज महतो अपनी मेहनत और जनता से सीधा जुड़ाव बनाकर आने वाले समय में बाघमारा की राजनीति के केंद्र में रह सकते हैं। ख़ासकर, रोहित यादव, दीपक रवानी और सूरज महतो का त्रिकोणीय नेतृत्व क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा, जिससे विकास और जनता की समस्याओं के समाधान पर अधिक ध्यान केंद्रित होगा। इन तीनों का इस बार का प्रयास उनकी राजनीतिक यात्रा के लिए एक मजबूत नींव बन सकता है, जो अगले चुनावों में रंग ला सकता है।
आज का बाघमारा उन संघर्षों और बदलावों की गवाही देता है जो इस क्षेत्र ने पिछले कुछ दशकों में देखे हैं। कांग्रेस का वह गढ़ जो शंकर दयाल सिंह और ओ पी लाल के समय तक अडिग था, अब बीजेपी व कई स्थानीय पार्टियों के बीच बंट चुका है। आने वाला समय बाघमारा के सियासी भविष्य को किस दिशा में ले जाएगा, यह देखना दिलचस्प होगा। पर इतना जरूर है कि इस क्षेत्र का राजनीतिक सफर उन नेताओं की मेहनत, जनता के संघर्ष और सियासी उठापटक की कहानियों से भरा रहेगा।

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