किसका बूथ सबसे मजबूत?
किसका बूथ सबसे मजबूत?
चुनाव मैदान में नहीं, बूथ पर जीते जाते हैं!
ले0 - अरुण कुणाल
चुनाव प्रचार के थमने और मतदान के बीच के 36 घंटे किसी भी चुनाव में निर्णायक समय होते हैं। यह वह अवधि है जब उम्मीदवार और उनके समर्थक प्रत्यक्ष प्रचार नहीं कर सकते, लेकिन इस दौरान की रणनीति और प्रबंधन पूरी चुनावी बाजी पलट सकता है! अब जब प्रचार थम चुका है, तो चुनावी रणभूमि बूथ मैनेजमेंट पर केंद्रित हो गई है। जिस उम्मीदवार या पार्टी का बूथ मैनेजमेंट मजबूत होगा और जो ग्राउंड लेवल पर बेहतर टीम वर्क दिखाएगी, वही इस चुनावी बाजी को जीतने में कामयाब होगी। बाघमारा जैसे क्षेत्रों में, जहां हर वोट मायने रखता है, बूथ की मजबूत पकड़ ही जीत की कुंजी बनेगी। इस लिहाज से अगला 36 घंटा काफी अहम हो जाता है!
अगर इन 36 घंटों में किसी उम्मीदवार की योजना कमजोर पड़ गई, तो उसके लिए काउंटिंग का दिन "सांप-सीढ़ी" जैसा जोखिम भरा खेल बन सकता है। जहां एक तरफ मजबूत प्रबंधन वाले उम्मीदवार अपनी स्थिति मजबूत कर सकते हैं, वहीं चूक करने वाले को नतीजे में अप्रत्याशित झटके झेलने पड़ सकते हैं। यह समय शांति का दिखावा और रणनीति की सक्रियता दोनों का मेल है। जो इन 36 घंटों को समझदारी से संभालेगा, वही काउंटिंग के दिन जीत की सीढ़ी चढ़ेगा।
बाघमारा में मौजूद 355 मतदान केंद्र अब इस लड़ाई के असली मोर्चे हैं। यहां पर हर पार्टी और प्रत्याशी की कोशिश होगी कि अपने बूथों को मजबूत बनाकर ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं को अपने पक्ष में मतदान के लिए प्रेरित करें! अब तक बाघमारा में बूथ स्तर पर बीजेपी मजबूत मानी जाती थी! बीजेपी और आरएसएस का संगठन बल और धन बल के कारण पिछली बार हारी हुई बाजी जीत पाने में ढुल्लू महतो सफल रहे थे! इस बार राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है, पिछले चुनाव के परिणाम के कारण जलेश्वर महतो के प्रति सहानुभूति और रोहित यादव की मजबूत दस्तक के कारण बीजेपी के सबसे सेफ सीट से बाघमारा से शत्रुधन महतो को नंबर दो पर बने रहने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है!
इस बार बाघमारा में बूथ मैनेजमेंट का समीकरण काफी दिलचस्प हो गया है। पिछली बार जहां जलेश्वर महतो का बूथ मैनेजमेंट कमजोर पड़ गया था, इस बार रोहित यादव की एंट्री ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया है। अगर रोहित यादव और जलेश्वर महतो के बूथ मैनेजमेंट को जोड़ दें तो बीजेपी के लिए मुश्किलें बढ़ रही है। बूथ स्तर पर दो -दो मोर्चे पर लड़ाई, भाजपा की पकड़ को कमजोर करता हुआ प्रतीत हो रहा है। दूसरी ओर, कांग्रेस को इससे लाभ हो सकता है, क्योंकि रोहित यादव के मजबूत मैनेजमेंट से बीजेपी का वोट बंटने की संभावना है।
रोहित यादव, जो निर्दलीय उम्मीदवार हैं, अपने बूथ मैनेजमेंट के कारण इस बार बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। रोहित यादव के पास बीजेपी से आए अनुभवी लोगों की टीम है, जिनके पास 6-7 चुनाव का अनुभव है! जिसके कारण उनके बूथों पर कांग्रेस और बीजेपी की तुलना में अधिक संगठित और विस्तृत तैयारी नजर आ रही है। कांग्रेस और बीजेपी प्रत्येक बूथ पर 5 सदस्यों की टीम तैनात कर रही हैं, वहीं रोहित यादव ने हर बूथ पर 15 सदस्यों की टीम लगाई है। इससे स्पष्ट है कि उनकी रणनीति न केवल विस्तृत है, बल्कि ज़मीनी स्तर पर प्रभावी भी हो सकती है।
बूथ मैनेजमेंट का मतलब है - सही रणनीति, अनुभवी कार्यकर्ताओं की तैनाती, मतदाताओं की सुविधा का ध्यान रखना, और हर बूथ पर वोटरों को अपने पक्ष में लाने की पूरी तैयारी, इस लिहाज रोहित यादव बेहतर नज़र आ रहे है! क्योंकि रोहित यादव पहले दिन से वे बूथ स्तर पर संगठन बनाने का काम कर रहे है! दूसरे दल जहां चुनावी प्रचार पर जोर दें रहे है, वहीं रोहित यादव चुनाव के बीच संघठन पर जोर दें रहे है! कुल मिलाकर, रोहित यादव का मजबूत और व्यापक बूथ मैनेजमेंट इस बार चुनावी समीकरण को पूरी तरह बदल सकता है, और "मेरा बूथ सबसे मजबूत" का नारा देने वाली बीजेपी को नई रणनीति अपनाने पर मजबूर कर सकता है।
बूथ मैनेजमेंट ही इस बार के चुनाव का टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। सही मायनों में, जिसका बूथ सबसे मजबूत होगा, वही चुनाव जीतेगा। इस बार बाघमारा में बूथ पर तैनात टीमों का मुकाबला ही असली लड़ाई होगी। बेहतर रणनीति, कुशल कार्यकर्ताओं की नियुक्ति और मतदाताओं के साथ सीधा संपर्क ही जीत की राह बनाएगा। क्योंकि "चुनाव मैदान में नहीं, बूथ पर जीते जाते हैं" यह बात इस बार और भी सटीक साबित हो रही है।
बूथ स्तर पर प्रभावी प्रबंधन का मतलब है:
मतदान प्रतिशत बढ़ाना: अपने समर्थकों को अधिक से अधिक संख्या में मतदान केंद्र तक लाना।
ग्राउंड लेवल पर पकड़: हर वोटर तक व्यक्तिगत रूप से पहुंचना और उन्हें प्रेरित करना।
प्रतियोगी की रणनीति को कमजोर करना: उनके वोटर बेस को प्रभावित करना या बंटवारा करना।
कल का दिन चुनावी रणभूमि में निर्णायक साबित होगा। प्रत्याशी के लिए पूरे विधानसभा क्षेत्र में एक ही दिन में डोर-टू-डोर संपर्क करना लगभग असंभव है। ऐसे में अंतिम समय पर स्थानीय बूथ कमेटी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।
बूथ कार्यकर्ताओं का महत्व अंतिम दिन क्यों बढ़ जाता है?
1. स्थानीय पहचान और प्रभाव: बूथ कार्यकर्ता अपने क्षेत्र के मतदाताओं को बेहतर जानते हैं, जिससे अंतिम समय पर व्यक्तिगत संपर्क आसान हो जाता है।
2. समर्थकों को सक्रिय करना: वोटर्स को मतदान केंद्र तक लाने और उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी बूथ स्तर पर इन्हीं कार्यकर्ताओं की होती है।
3. आखिरी समय की रणनीति: प्रत्याशी के लिए हर क्षेत्र में मौजूद रहना संभव नहीं है, ऐसे में बूथ कार्यकर्ता ही प्रत्याशी का प्रतिनिधित्व करते हैं और मतदाताओं को प्रेरित करते हैं।
4. माहौल बनाने में भूमिका: मतदान से पहले आखिरी दिन का माहौल काफी अहम होता है। बूथ कार्यकर्ता मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की अंतिम कोशिश करते हैं।
आज शाम चुनाव प्रचार खत्म होते ही अब सभी पार्टियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक लाया जाए। यही वह चरण है, जहां से जीत या हार का फैसला होता है।
मतदान के दिन की रणनीति :
1. समर्थकों को संगठित करना: हर पार्टी अपने वोट बैंक को सक्रिय करने में जुटी है। व्यक्तिगत संपर्क और घर-घर पहुंचकर मतदाताओं को याद दिलाना कि वे वोट देने जाएं।
2. लॉजिस्टिक प्रबंधन: मतदान केंद्र तक समर्थकों को समय पर पहुंचाने के लिए वाहन व्यवस्था और हर क्षेत्र में ग्राउंड टीम की निगरानी।
3. मनोवैज्ञानिक दबाव: विरोधियों के समर्थकों को निष्क्रिय करने और अपने पक्ष के मतदाताओं का उत्साह बढ़ाने की कोशिश।
4. बूथ पर मजबूत उपस्थिति: अपने कार्यकर्ताओं की प्रभावी मौजूदगी से समर्थकों को विश्वास दिलाना और मतदान प्रक्रिया को सुचारु बनाए रखना।
जनता के बीच पार्टी उमीदवारों से नाराजगी और मतदान के प्रति असंतोष वोट प्रतिशत को कम कर सकता है इसलिए मतदान ज्यादा से ज्यादा हो, ये सुनिश्चित करना भी बूथ स्तर पर बेहद जरुरी है! इस बार की लड़ाई सिर्फ प्रचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जमीनी स्तर पर मतदान प्रतिशत बढ़ाने की होड़ है। जो पार्टी या प्रत्याशी यह सुनिश्चित करेगा कि उसका अधिकतम वोट बैंक मतदान करे, वही बाजी मार सकता है। अंतिम दिन का संपर्क और संगठन ही चुनावी समीकरण को तय करेगा। जिस प्रत्याशी की बूथ कमेटी मजबूत और सक्रिय होगी, वही मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंच पाएगा और बाजी मारने की संभावना बढ़ जाएगी।
इस बार के विधानसभा चुनावों में प्रचार का स्वरूप काफी बदलता हुआ नजर आया। आम सभाओं और रोड शो के साथ-साथ डिजिटल माध्यम, विशेष रूप से सोशल मीडिया, ने चुनाव प्रचार में अहम भूमिका निभाई। राष्ट्रीय पार्टियों जैसे भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का भरपूर उपयोग किया। उनके अभियान न केवल प्रचार-प्रसार तक सीमित थे, बल्कि उन्होंने मतदाताओं से सीधे जुड़ने के लिए इसे संवाद का माध्यम भी बनाया।
वहीं, पिछले चुनाव के मुकाबले निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी इस माध्यम का प्रभावी इस्तेमाल किया, जो उनके सीमित संसाधनों के बावजूद व्यापक पहुंच सुनिश्चित करने में सहायक रहा। सोशल मीडिया के जरिए लाइव वीडियो, ग्राफिक्स, मेम्स, और विज्ञापन कैंपेन चलाए गए। चुनाव प्रचार खत्म हो जाने के बावजूद, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चुनाव से जुड़ी चर्चाएं, विश्लेषण, और प्रतिक्रियाएं जारी हैं। यह इस बात का संकेत है कि अब डिजिटल प्रचार केवल माध्यम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग बन चुका है।
चुनाव में हार-जीत का महत्व अपनी जगह है, लेकिन लोकतंत्र की जीत सबसे अहम होती है। चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी और विश्वास का प्रतीक हैं। ऐसे में, यह सुनिश्चित करना कि चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी हों, चुनाव आयोग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन जाती है।
पिछले कुछ चुनावों से आलोचनाओं का सामना कर रहे चुनाव आयोग पर इस बार अपेक्षाएं और बढ़ गई हैं। लोकतंत्र में जनता का विश्वास बनाए रखना आयोग के लिए एक चुनौती है! लोकतंत्र में जनता का विश्वास सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है। चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर मतदाता का विश्वास इस प्रक्रिया में बना रहे। चुनाव की सफलता केवल मतदान और परिणाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने का अवसर भी है।

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