एग्जिट पोल में हेमंत की सरकार/ "कोल्हान टाइगर" का रिंग मास्टर फेल

 



एग्जिट पोल में हेमंत की सरकार/ "कोल्हान टाइगर" का रिंग मास्टर फेल 


                           ले 0- अरुण कुणाल 


झारखंड चुनाव के एग्जिट पोल में एक बार फिर से हेमंत सोरेन की सरकार की वापसी का अनुमान लगाया गया हैँ! ऐसे में "कोल्हान टाइगर" चंपई सोरेन के रिंग मास्टर अमित शाह की भूमिका पर सवाल उठ सकते हैँ! हेमंत सोरेन को जेल भेजना और उनके करीबी चेहरे चंपई सोरेन, जिन्हें "कोल्हान टाइगर" कहा जाता है, पर सबकुछ दांव पर लगाने के बावजूद सत्ता से दूरी बीजेपी के चाणक्य की व्यक्तिगत हार होगी! अगर एंटी-इंकंबेंसी के बाद भी कोल्हान में JMM अपेक्षित प्रदर्शन कर पाती, तो इसे क्षेत्रीय प्रभाव और मूल वोट बैंक पर चंपई सोरेन और बीजेपी की पकड़ कमजोर होने के संकेत के रूप में देखा जाएगा।


अंततः, 23 नवंबर को चुनाव परिणाम बताएंगे कि कोल्हान टाइगर और हेमंत सोरेन की राजनीतिक रणनीति कितनी प्रभावी रही। अगर एग्जिट पोल सही साबित होते हैं और हेमंत सोरेन की सरकार बनती है, तो यह झारखंड की राजनीति में एक बड़ा बदलाव होगा। क्योंकि झारखंड का राजनीतिक इतिहास बताता है कि राज्य में हर पांच साल बाद सत्ता परिवर्तन होता रहा है। यह प्रवृत्ति राज्य की राजनीति में एक सत्ता-विरोधी लहर की ओर इशारा करती है।


झारखंड का गठन 15 नवंबर 2000 को हुआ। पहली सरकार भारतीय जनता पार्टी की बनी और बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री बने। 2005 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और सहयोगी दलों ने बढ़त बनाई पर निर्दलीय उमीदवार मधु कोडा के नेतृत्व में बीजेपी गठबंधन ने सरकार बनाई! इस अवधि में राजनीतिक अस्थिरता देखी गई। 2009 में JMM के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी। शिबू सोरेन पहली बार सीएम बने पर राजनीतिक अस्थिरता जारी रही और कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन भी लगा।


2014 में फिर से बीजेपी ने सत्ता हासिल की और रघुवर दास मुख्यमंत्री बने। यह पहली बार था जब झारखंड में किसी मुख्यमंत्री ने कार्यकाल पूरा किया। 2019 में JMM-कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन ने बहुमत हासिल किया। हेमंत सोरेन के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी, चंपई सोरेन के छह माह का कार्यकाल को छोड़ दें तो हेमंत सरकार भी स्थिर सरकार साबित हुई! अब 2024 के चुनाव के बाद एक बार फिर से सत्ता परिवर्तन की परंपरा जारी रहने की संभावना जताई जा रही है। अगर इस को तोड़ पाने में हेमंत सोरेन सफल होते हैँ तो यह कल्पना सोरेन के सियासी पारी के लिए मिल का पत्थर साबित होगा! 


झारखंड की राजनीति में संथाल परगना और कोल्हान प्रमंडल का खास महत्व है, क्योंकि ये क्षेत्र झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के मजबूत गढ़ माने जाते हैं। 2019 के विधानसभा चुनावों में, संथाल परगना की 18 सीटों में से भाजपा सिर्फ 3 सीटें जीत पाई थी, जबकि कोल्हान प्रमंडल की 14 सीटों पर उसका खाता तक नहीं खुला था।


संथाल परगना का JMM के लिए विशेष महत्व है क्योंकि यह क्षेत्र हेमंत सोरेन और उनके परिवार का पारंपरिक आधार रहा है। वहीं, कोल्हान प्रमंडल में झारखंड आंदोलन के दौरान शिबू सोरेन के करीबी सहयोगी रहे चंपई सोरेन का बड़ा प्रभाव रहा है, जिन्हें "कोल्हान टाइगर" के नाम से जाना जाता है। इन 32 सीटों पर इस बार भी सबकी नजरें हैं, क्योंकि यहां का प्रदर्शन किसी भी पार्टी की जीत-हार में अहम भूमिका निभाएगा। ये क्षेत्र झारखंड की राजनीतिक दिशा तय करने में निर्णायक साबित होते हैं।


अगर इंडिया गठबंधन के "बिग ब्रदर" कांग्रेस की बात करें तो हरियाणा चुनाव के बाद झारखण्ड और महाराष्ट्र में उसका सबकुछ दांव पर लगा हुआ हैँ! कांग्रेस दोनों राज्यों में गठबंधन के साथियों के सहयोग से लड़ रही हैँ! झारखण्ड में 30 सीटों पर लड़ रही कांग्रेस से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद हैँ! झारखंड चुनाव में JMM और कांग्रेस के गठबंधन की रणनीति में कांग्रेस का उन सीटों पर चुनाव लड़ना, जहां बीजेपी मजबूत है, एक दिलचस्प पहलू है। यह रणनीति गठबंधन की सीट-बंटवारे की समझ और स्थानीय राजनीतिक गणित पर आधारित है।


JMM का फोकस अपने परंपरागत गढ़ों, जैसे संथाल परगना और कोल्हान प्रमंडल, पर है, जबकि कांग्रेस को उन क्षेत्रों में लड़ने का मौका मिला है, जहां उसका संगठनात्मक ढांचा मौजूद है। यह रणनीति दोनों दलों को अपनी ताकत के हिसाब से चुनाव लड़ने का मौका देती है। यदि कांग्रेस ने बीजेपी के गढ़ों में कड़ा मुकाबला दिया और पिछली बार की तुलना में कुछ ज्यादा सीटें जीतने में सफल रही, तो यह एग्जिट पोल के अनुमानों को गलत साबित कर सकता है। अगर कांग्रेस ने बीजेपी के प्रभाव वाले क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया, तो यह न केवल गठबंधन को मजबूत बनाएगा बल्कि JMM और कांग्रेस के सीटों के तालमेल को भी सफल साबित करेगा। 23 नवंबर के नतीजे बताएंगे कि यह रणनीति कितनी प्रभावी रही।


अगर बीजेपी का गढ़ बाघमारा सीट की बात करें तो इस बार कांग्रेस की जीत पक्की नज़र आ रही हैँ! धनबाद जिले की बाघमारा सीट हमेशा से झारखंड की राजनीति में चर्चित रही है। इस बार यहां का मुकाबला बेहद रोचक और कांटे का है। बीजेपी, कांग्रेस, और निर्दलीय उम्मीदवार रोहित यादव के बीच त्रिकोणीय संघर्ष हो रहा है, और बढ़ा हुआ मतदान यह संकेत दे रहा है कि मतदाता बदलाव की मांग कर रहे हैं।


बाघमारा सीट को बीजेपी का गढ़ माना जाता है, और धनबाद के सांसद ढुल्लू महतो की साख यहां दांव पर लगी है! बढ़ा हुआ मतदान और स्थानीय असंतोष बीजेपी के लिए चुनौती पैदा कर रहा है। जलेश्वर महतो, जो कांग्रेस के उम्मीदवार हैं, इस बार अपने चौथे प्रयास में जीत के करीब दिख रहे हैं। इस बार उनका मंत्री बनने का संभावित अवसर मतदाताओं के लिए एक प्रेरक कारक साबित हुआ है। इसके अलावा स्थानीय मुद्दे, जैसे रोजगार, खनन माफिया का प्रभाव, और बुनियादी सुविधाओं की कमी, अहम भूमिका निभा रहे हैं।


अगर जलेश्वर महतो इस बार जीतते हैं, तो यह न केवल बाघमारा में बदलाव का संकेत होगा, बल्कि यह कांग्रेस के लिए एक बड़ी जीत होगी, जो बीजेपी के गढ़ को चुनौती दे रही है। इसके अलावा, जलेश्वर महतो का जीतना उनके राजनीतिक करियर का बड़ा मोड़ साबित हो सकता है, और मंत्री पद उन्हें स्थानीय राजनीति में और अधिक प्रभावी बना सकता है। अब तो 23 नवंबर का दिन बताएगा कि क्या बाघमारा में बदलाव की यह बयार सच्चाई में बदलती है या नहीं।


चुनाव के बाद का यह दौर राजनीतिक उत्सुकता से भरा है। एग्जिट पोल और सट्टा बाजार के दावों की असल परीक्षा परिणाम के दिन ही होगी। अगर सट्टा बाजार की बात करें तो झारखंड में सट्टा बाजार का झुकाव अक्सर एग्जिट पोल्स से अलग हो सकता है, क्योंकि यह स्थानीय जमीनी गणित और पिछले चुनावी रुझानों को ध्यान में रखता है। सट्टा बाजार भी राजनीति में खासा रुचि रखता है और मतगणना से पहले ही संभावित विजेताओं पर दांव लगाया जा रहा है।


अगर झारखंड के इस पारंपरिक चुनावी पैटर्न पर भरोसा किया जाए, तो सत्ता परिवर्तन की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। हालांकि, इस बार का चुनाव परिणाम यह तय करेगा कि यह परंपरा जारी रहती है या टूटती है। क्योंकि एग्जिट पोल झारखंड की राजनीति को लेकर दिलचस्प संकेत दे रहे हैं। एक्सिस माइ इंडिया को छोड़कर सभी एग्जिट पोल्स में भाजपा (एनडीए) को झारखंड में बढ़त मिलती दिख रही है और उनकी सरकार बनने की संभावना जताई जा रही है।


झारखंड विधानसभा चुनाव का दो चरणों में संपन्न होना राज्य की राजनीति में एक अहम पड़ाव है। अब सभी की निगाहें 23 नवंबर को आने वाले परिणामों पर टिकी हैं। इस बीच, एग्जिट पोल्स और सट्टा बाजार में भविष्यवाणियों का दौर जोरों पर है।अधिकांश एग्जिट पोल्स ने झारखंड में एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच कांटे की टक्कर का अनुमान जताया है। कुछ पोल्स ने एनडीए को बढ़त दी है, जबकि कुछ ने हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन की सरकार बनने का दावा किया है।सी-वोटर और एक्सिस माय इंडिया जैसे पोल्स ने विरोधाभासी आंकड़े दिए हैं, जिससे असमंजस की स्थिति बन गई है।


हालांकि, "एक्सिस माइ इंडिया"  के एग्जिट पोल ने इस ट्रेंड से अलग आकलन किया है। इसने हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने का अनुमान लगाया है। इस पोल के अनुसार:


इंडिया गठबंधन (JMM-कांग्रेस-RJD) को 53 सीटें,

एनडीए (BJP) को 25 सीटें,

झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) को 2 सीटें, और अन्य को 1 सीट मिल सकती है।


जबकि सी-वोटर का एग्जिट पोल झारखंड की राजनीतिक तस्वीर को और रोमांचक बना रहा है। इस पोल ने 81 में से 20 कड़े मुकाबले वाली सीटों को अलग कर बाकी 61 सीटों का आकलन किया है। इसमें अनुमान है: एनडीए (BJP) को 34 सीटें, इंडिया गठबंधन (JMM-कांग्रेस-RJD) को 26 सीटें, और अन्य के खाते में 1 सीट।


कड़े मुकाबले वाली 20 सीटें निर्णायक भूमिका निभाएंगी। यदि एनडीए इन सीटों में बढ़त बनाती है, तो भाजपा झारखंड में सरकार बना सकती है। वहीं, अगर इंडिया गठबंधन ने बाजी मारी, तो हेमंत सोरेन सत्ता में वापसी कर सकते हैं। यह स्थिति झारखंड के जमीनी समीकरणों और क्षेत्रीय मुद्दों की जटिलता को दर्शाती है। कड़े मुकाबले की ये सीटें राजनीतिक दलों के प्रचार, स्थानीय नेताओं के प्रभाव, और जातीय समीकरणों पर निर्भर करेंगी। ऐसे में मतगणना का दिन बेहद दिलचस्प होने वाला है।










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