बाघमारा में "जयराम फैक्टर" : वोट बटेगा तो किसका कटेगा?
बाघमारा में "जयराम फैक्टर" : वोट बटेगा तो किसका कटेगा?
- अरुण कुणाल
गिरिडीह लोकसभा चुनाव की तरह बाघमारा विधानसभा में "जयराम फैक्टर" का प्रभाव निश्चित रूप से पिछली बार की विजेता पार्टी बीजेपी के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। यहां, जयराम फैक्टर से तात्पर्य किसी एक उम्मीदवार से नहीं, बल्कि उन सभी स्थानीय नेताओं और "वोट कटवा" उम्मीदवारों से है जो भले ही खुद सीट न जीत पाएं, लेकिन प्रमुख दलों के वोट बैंक को कमजोर करने की क्षमता रखते हैं। वह चाहे रोहित यादव हो , सूरज महतो हो या दीपक रवानी जैसे उम्मीदवार हो, उनकी भूमिका बाघमारा के लिए 'जयराम फैक्टर' साबित हो सकती है।
2005 के बाघमारा विधानसभा चुनाव में ओम प्रकाश लाल की हार में ढुलू महतो ने 'जयराम फैक्टर' का काम किया था! ओ पी लाल को 43,955 वोट मिले थे और ढुल्लू महतो ने 25,132 वोट प्राप्त किए। इस चुनाव में जेडीयू उम्मीदवार जलेश्वर महतो ने 54,206 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी। इसके साथ ही बाघमारा के लाल, ओ पी लाल के साम्राज्य का अंत हो गया! इस संदर्भ में, यह देखना दिलचस्प होगा कि 2005 की तरह इस बार 'जयराम फैक्टर' जलेश्वर महतो के लिए फायदेमंद साबित होता है या नहीं?
जयराम फैक्टर का असर:
वोट विभाजन: रोहित यादव, सूरज महतो और दीपक रवानी जैसे उम्मीदवार विभिन्न समुदायों और वर्गों में अपनी स्थानीय पकड़ रखते हैं। अगर ये उम्मीदवार चुनाव में अच्छा करते हैं, तो कांग्रेस और बीजेपी के मतदाताओं का एक हिस्सा इनकी ओर खिंच सकता है, जिससे वोटों का विभाजन होगा। इससे मुख्य दलों के लिए जीत का अंतर कम हो सकता है।
2. स्थानीय मुद्दों को भुनाने की कोशिश: ये उम्मीदवार स्थानीय मुद्दों और समुदाय विशेष की समस्याओं को उठाते हैं, जो प्रमुख दलों के आम चुनावी मुद्दों से अलग होते हैं। इन स्थानीय मुद्दों पर जोर देकर वे क्षेत्र के मतदाताओं का समर्थन प्राप्त कर सकते हैं और कांग्रेस या बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।
3. असंतुष्ट वोटरों का आकर्षण: जयराम फैक्टर वाले ये उम्मीदवार उन मतदाताओं को आकर्षित कर सकते हैं, जो कांग्रेस या बीजेपी से संतुष्ट नहीं हैं। ऐसे मतदाताओं का समर्थन पाने से ये उम्मीदवार चुनाव को बहु-कोणीय बना सकते हैं, जिससे दोनों प्रमुख पार्टियों के लिए चुनौती बढ़ जाएगी।
4. जातीय पहचान की राजनीति: जयराम महतो और उनकी पार्टी जेकेएलएम कुड़मी जाति की पहचान और अधिकारों को प्रमुखता दे रहे हैं। उनका अभियान कुड़मी समुदाय के अधिकारों, प्रतिनिधित्व, और आर्थिक उत्थान पर केंद्रित है। इससे उन्हें कुड़मी मतदाताओं में एक स्थायी समर्थन हासिल हो सकता है, जो बीजेपी और कांग्रेस के जातिगत समीकरणों को चुनौती देगा।
ऐसे में अगर ये उम्मीदवार प्रमुख दलों से बड़ी संख्या में वोट खींचने में सफल होते हैं, तो चुनाव परिणाम अप्रत्याशित हो सकता हैँ! इसलिए, बाघमारा में जयराम फैक्टर कांग्रेस और बीजेपी, दोनों के लिए चिंता का कारण बन सकता है, और इस चुनाव में मुकाबला अधिक दिलचस्प हो सकता है।
जयराम फैक्टर के चलते पहली बार चुनाव लड़ रहे बीजेपी उमीदवार शत्रुघ्न महतो के लिए यह चुनाव और कठिन हो सकता है। जबकि जलेश्वर महतो का बाघमारा की राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान है। जब ओ पी लाल की प्रभावशीलता अपने चरम पर थी, तब भी जलेश्वर महतो ने अपनी पहचान बनाए रखी। चाहे वह लाल साहब का समय हो या ढुल्लू महतो का, जलेश्वर महतो ने हमेशा अपने राजनीतिक कौशल और प्रभाव के कारण प्रासंगिकता बनाए रखी। पिछले चुनाव में उनका प्रदर्शन उनकी रणनीतिक सोच और क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ को दर्शाता है।
इसके अलावा बाघमारा की जनता के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि अगर कांग्रेस के उम्मीदवार जलेश्वर महतो जीतते हैं, तो उनके मंत्री बनने की संभावना अधिक है, जो क्षेत्र के विकास और कल्याण के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। वहीं, तीन बार के विधायक होने के बावजूद ढुल्लू महतो को मंत्री पद नहीं मिलने से उनके भाई शत्रुघ्न महतो के मंत्री बनने की संभावना भी लगभग शून्य है। जनता के मन में यह विश्वास बन रहा है कि एक ऐसा उम्मीदवार चुनना अधिक उचित होगा, जो सिर्फ विधायक नहीं बल्कि मंत्री पद के योग्य भी हो, ताकि बाघमारा के हितों को बड़े स्तर पर साधा जा सके। इस मनोवैज्ञानिक पहलू का जलेश्वर महतो को लाभ मिल सकता है और यह उनके पक्ष में एक बड़ा प्लस पॉइंट साबित हो सकता है।
इस चुनाव में जलेश्वर महतो और शत्रुघ्न महतो के बीच की प्रतिस्पर्धा ने राजनीतिक समीकरणों को और भी दिलचस्प बना दिया है। पिछले चुनाव में छोटे -छोटे दलों के 14 उम्मीदवारों ने मिलकर 20,000 वोट हासिल किए थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस बार जयराम फैक्टर या वोट कटवा उम्मीदवार की मौजूदगी के कारण स्थिति और भी जटिल हो जाएगी। इस बार 13 प्रत्याशी मैदान में हैँ! रोहित यादव, सूरज महतो, दीपक रवानी और दुशरे निर्दलीय उमीदवार 30 से 35 हजार वोट काट सकते हैँ!
इसलिए कांग्रेस और बीजेपी को इस बार चुनावी रणनीति केवल वोट प्रतिशत बढ़ाने पर नहीं बल्कि पिछले वोटों को बचाने पर केंद्रित होनी चाहिए। जो उम्मीदवार अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखेगा, वही जीत की दौड़ में आगे रहेगा। इसलिए, जलेश्वर महतो और शत्रुघ्न महतो के लिए यह आवश्यक होगा कि वे एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगाने के बजाय अपनी-अपनी ताकत को मजबूत करें। इस चुनाव में सावधानी और रणनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी, और जो भी उम्मीदवार अपनी स्थिति को बेहतर ढंग से संभालेगा, वही बाघमारा का विजेता बनेगा।

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