झारखंड में कौन घुसपैठ कर रहा है - बांग्लादेशी या गुजरात ईस्ट इंडिया कंपनी?
झारखंड में कौन घुसपैठ कर रहा है - बांग्लादेशी या गुजरात ईस्ट इंडिया कंपनी?
- अरुण कुणाल
कही झारखण्ड में बांग्लादेशी घुसपैठ का मामला मोदी सरकार के गले की हड्डी न बन जाए? क्योंकि सवाल तो केंद्र सरकार से भी होगा! अगर घुसपैठिए देश में घुसकर रोटी, बेटी, माटी छीन रहे हैं तो घुसपैठ रोकने में विफल गृहमंत्री से इस्तीफा क्यों नहीं मांगा जा रहा है? बांग्लादेशी घुसपैठ की बात करने वाली बीजेपी को झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में अक्सर "बाहरी" पार्टी के रूप में देखा जाता है। अब संघ और बीजेपी मंडल मुर्मू जैसे आदिवासी नेता के सहारे पार्टी की छवि को बदलने की कोशिश कर रही है लेकिन मोदी -शाह की बीजेपी को "स्थानीय समर्थक पार्टी" के रूप में स्थापित करने के लिए अभी लंबी दूरी तय करनी है! केवल आदिवासियों नेताओ को मुखौटा बनाने से झारखण्ड में घुसपैठ कर पाना मुश्किल है!
अमित शाह और नरेंद्र मोदी आदिवासियों के साथ हिन्दू वोटर की तरह बर्ताव कर रहे है जो उनके खिलाफ जा सकता है! आदिवासियों के बीच बांग्लादेशी घुसपैठ से बड़ा मुद्दा "बाहरी -भितरी" का है! गैर आदिवासी और अडानी के खिलाफ उनमें ज्यादा असंतोष है! आदिवासियों को लगता है कि उनकी बदहाली के लिए बाहरी पूँजीपति और बाहरी लोग जिम्मेदार है! इसलिए वेस्ट बंगाल और असम में 'बांग्लादेशी घुसपैठ' का जो कार्ड चल गया, उसका इस्तेमाल झारखण्ड में करना एक सियासी भूल होगी! वे कही हिन्दुओं को जगाने के चक्कर में आदिवासियों को न सुला दें! इस तरह की रणनीति झारखंड में आदिवासियों और हिन्दू वोटर्स के बीच एक फासला बढ़ा सकती है, जिससे स्थानीय नेतृत्व और विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ अपना आधार मजबूत करने का मौका मिल सकता है।
बीजेपी झारखंड में आदिवासी बहुल सीटों पर अपनी पैठ बढ़ाने का प्रयास कर रही है, लेकिन अभी तक उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। सीता सोरेन और चंपई सोरेन जैसे प्रभावशाली आदिवासी नेताओं की मौजूदगी के बावजूद बीजेपी घुसपैठ नहीं कर पा रही है। इस कड़ी में मंडल मुर्मू का नाम भी जुड़ गया है, जो सिदो-कान्हू के वंशज हैं और हेमंत सोरेन के प्रमुख प्रस्तावक भी रहे हैं!
हालाँकि, यह कदम बीजेपी के लिए पूरी तरह से आसान नहीं होगा। बीजेपी की नीतियों को आदिवासी समुदायों में अक्सर बड़े व्यवसायों और बाहरी प्रभावों के समर्थक के रूप में देखा गया है। मंडल मुर्मू जैसे नेता का बीजेपी में शामिल होना तब तक प्रभावी नहीं हो सकता जब तक बीजेपी अपनी नीतियों में स्थानीय मुद्दों और जनजातीय अधिकारों के प्रति स्पष्ट रूप से प्रतिबद्धता नहीं दिखाती।
राहुल गांधी अक्सर कहते है कि ये मोदी सरकार नहीं बल्कि अडानी -अंबानी की सरकार है! अडानी समूह का झारखण्ड के गोड्डा में इंट्री के बाद "बाहरी और भितरी" का मुद्दा बड़ा हो गया है! जिस तरह टाटा समूह ने झारखण्ड के लोगों के सरोकार के साथ खुद को जोड़ा, वैसा जुड़ाव अडानी के साथ स्थानीय लोग महसूस नहीं कर पा रहे है!
टाटा नगर (जमशेदपुर) और गोड्डा में अडानी की परियोजनाओं के प्रति स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाओं में अंतर कई ऐतिहासिक, सामाजिक, और आर्थिक कारणों से है। टाटा नगर को टाटा समूह ने एक सुनियोजित और सामुदायिक विकास मॉडल के रूप में विकसित किया, जबकि अडानी की गोड्डा परियोजना के साथ ऐसा जुड़ाव नहीं बन पाया है। इस असमानता के पीछे कई मुख्य कारण हैं:
1. स्थानीय विकास मॉडल का अंतर: टाटा समूह ने जमशेदपुर (टाटा नगर) को एक औद्योगिक शहर के रूप में विकसित करते समय शिक्षा, स्वास्थ्य, और बुनियादी ढांचे के साथ-साथ आवासीय कॉलोनियाँ, स्कूल, अस्पताल, सड़कें और पेयजल जैसी सुविधाओं का विकास किया। इसके विपरीत, अडानी की गोड्डा परियोजना मुख्य रूप से एक पावर प्लांट है, जिसका स्थानीय लोगों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों पर सीधा सकारात्मक प्रभाव नहीं है।
2. स्थानीय समुदाय की भागीदारी का अभाव: टाटा ने अपने उद्योग में स्थानीय समुदाय की सहभागिता और उनके विकास को प्राथमिकता दी। टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा से लेकर अब तक कंपनी का रुख स्थानीय विकास के प्रति संवेदनशील रहा है। अडानी परियोजनाओं में स्थानीय समुदाय की भागीदारी और उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान के प्रति पर्याप्त संवेदनशीलता की कमी महसूस की गई है।
3. सीएसआर और सामुदायिक निवेश की कमी: टाटा समूह ने हमेशा अपने सीएसआर (CSR) के माध्यम से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार, स्वास्थ्य, और शिक्षा जैसी सुविधाओं में निवेश किया। इसके विपरीत, अडानी की परियोजनाओं में सीएसआर फंड का सही और पर्याप्त उपयोग नहीं दिखता है, जिससे आदिवासी समुदायों का उनके प्रति समर्थन नहीं बढ़ सका है।
4. पर्यावरणीय और भूमि मुद्दे: टाटा नगर में टाटा की परियोजनाओं ने भूमि और पर्यावरण पर जो असर डाला, उसके साथ टाटा ने सामुदायिक पुनर्वास और पर्यावरण संरक्षण के उपायों को भी लागू किया। अडानी की गोड्डा परियोजना में भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर स्थानीय लोगों में असंतोष है, क्योंकि परियोजना के कारण विस्थापन, वन कटाई और जल संकट जैसी समस्याएं उत्पन्न हुई हैं।
5. समाजसेवा और लोकहित के प्रति प्रतिबद्धता का अभाव: टाटा समूह का उद्देश्य लाभ कमाने के साथ-साथ समुदायों का समग्र कल्याण करना भी रहा है। वे स्थानीय समुदाय के प्रति दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाते हैं। दूसरी ओर, अडानी समूह का ध्यान मुख्य रूप से परियोजना से व्यापारिक लाभ कमाने पर केंद्रित दिखता है, जिसके कारण वे दीर्घकालिक रूप से आदिवासियों और स्थानीय लोगों की सहानुभूति प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं।
6. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव: टाटा समूह का झारखंड में एक पुराना इतिहास है, और उनकी उपस्थिति का स्थानीय समाज पर एक गहरा सांस्कृतिक प्रभाव है। टाटा ने झारखंड को औद्योगिक पहचान दी और स्थानीय लोगों के दिल में एक जगह बनाई। अडानी समूह की झारखंड में हाल की उपस्थिति और परियोजनाओं का दृष्टिकोण ऐसा सांस्कृतिक जुड़ाव नहीं बना सका है।
झारखंड एक खनिज-संपन्न राज्य है, जहां कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, यूरेनियम, सोना और अन्य खनिज प्रचुर मात्रा में हैं। मोदी राज में 'गुजरात ईस्ट इंडिया कंपनी' द्वारा खनिज संसाधनों का दोनों हाथों से दोहन किया जा रहा है पर कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) फंड का एक आना भी आदिवासियों पर खर्च नहीं किया जाता है! कॉर्पोरेट कंपनियों की यह ज़िम्मेदारी होती है कि वे जिन क्षेत्रों से संसाधन लेते हैं, वहां की स्थानीय आबादी के विकास और कल्याण के लिए योगदान दें। मगर, झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में CSR फंड का पैसा आदिवासी समुदायों पर खर्च नहीं किया जाता है। वह पैसा चंदा दो, धंधा लो पर खर्च किया जाता है!
मोदी सरकार का 'आउट दी वे सपोर्ट' के बावजूद अडानी समूह का गोड्डा प्रोजेक्ट को वैसी स्थानीय सहानुभूति नहीं मिल पाई जैसी टाटा ग्रुप को टाटा नगर में मिली है। शायद यही कारण है कि मोदी जी अपने मित्र को संथाल परगना में घुसपैठ तो करा दिए पर खुद घुसपैठ नहीं कर पा रहे है! अब चुनाव सिर पर है तो बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा उठा कर गुजरात ईस्ट इंडिया कंपनी की लूट से लोगों का ध्यान भटकाना चाहते है!
बीजेपी का चुनावी इतिहास यह दिखाता है कि वह धार्मिक ध्रुवीकरण के मुद्दों का फायदा उठाने की कोशिश करती है। "बांग्लादेशी घुसपैठ" का मुद्दा उठाकर वह हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच विभाजन पैदा कर सकती है, जिससे आदिवासी और अन्य हिंदू समुदायों का समर्थन उन्हें मिल सके।
मंडल मुर्मू, सीता सोरेन और चंपई सोरेन जैसे आदिवासी नेताओं की मौजूदगी के बावजूद बीजेपी द्वारा "बांग्लादेशी घुसपैठ" जैसा मुद्दा उठाने से ऐसा लगता है कि मोदी एंड शाह कंपनी को अपने आदिवासी नेताओं पर भरोसा नहीं है! झारखंड एक आदिवासी बहुल राज्य है, जहां जनजातीय समुदायों के अधिकार और पहचान की रक्षा एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन सकता है! उन मुद्दों के सहारे सोरेन सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा सकता था पर बीजेपी नेता मेहनत करने की बजाए “बंटेंगे तो कटेंगे” जैसे शॉर्ट कट मुद्दे उठा रहे है!
पश्चिम बंगाल और असम में बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे का प्रयोग भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से सफल रहा है, लेकिन झारखंड जैसे राज्यों में यह मुद्दा उतनी प्रासंगिकता नहीं रखता। झारखंड में बाहरी-भीतरी का प्रश्न आदिवासी समुदायों के लिए बहुत गहरा है, और यह उनके पहचान, अधिकार, और संसाधनों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।
अगर भाजपा इस मुद्दे को अनदेखा करके केवल हिन्दू एकता पर ध्यान केंद्रित करती है, तो आदिवासियों में असंतोष बढ़ सकता है। झारखंड में आदिवासी समुदाय का अपना सांस्कृतिक, धार्मिक, और सामाजिक ढांचा है, जिसे नजरअंदाज करना राजनीतिक दृष्टिकोण से खतरनाक हो सकता है। आदिवासियों को केवल हिन्दू वोटबैंक के हिस्से के रूप में देखने से उनकी विशेष पहचान को अनदेखा करने का खतरा बढ़ता है, जो भाजपा की संभावनाओं को कमजोर कर सकता है।
झारखण्ड के चुनावी रण में मोदी और शाह की इंट्री के साथ ही "बंटेंगे तो कटेंगे” और "बांग्लादेशी घुसपैठ" का मुद्दा छाने लगा है! अबतक बीजेपी स्थाननीय मुद्दों से ध्यान भटकाने में सफल रही है! राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती "बंटेंगे तो कटेंगे" के शॉपिंग मॉल के सामने "मोहब्बत की दुकान" खोलने की होगी! अब उम्मीद करते है कि राहुल गांधी के आने के बाद झारखण्ड के मन की बात होगी! खनिज-संपन्न राज्य के गरीब जनता की बात होगी! बेरोजगारी और महंगाई की बात होगी! जल जंगल जमीन की बात होगी! अडानी और अंबानी की बात होगी! इंडिया की बात होगी....

Comments
Post a Comment