दिल्ली दरबार रांची शिफ्ट : दिल्ली को "सिफ्टिंग सुल्तान" का इंतजार!
दिल्ली दरबार रांची शिफ्ट : दिल्ली को "सिफ्टिंग सुल्तान" का इंतजार!
ले0 - अरुण कुणाल
आम लोगों के लिए तो दिवाली की सफाई और रंगाई-पुताई ही अपने आप में एक बड़ा काम होता है, और घर बदलने की बात करें तो हाथ-पांव फूल जाते है। परन्तु, दिल्ली के "सुल्तान" के लिए राजधानी बदलना मानो रूटीन का हिस्सा बन गया है। जब देखो 'हाथी घोड़ा पालकी' लेकर निकल पड़ते है! दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि दिल्ली का न मौसम अपना है, न पानी दिल्ली का है और न लोग दिल्ली के है! अब इसमें एक लाईन जुड़ जाएगा 'न सुल्तान दिल्ली का है!'
आम जनता जो अपने घर की छोटी-छोटी बातों में उलझी होती है, उसे यह सब देख कर निस्संदेह यह लगता है कि नेताओं के लिए सत्ता के इस खेल में शहर बदलना भी कितना सरल हो जाता है। यह स्थिति वाकई हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि देश की आम जनता के मुद्दे और समस्याएं, जिनके लिए हल करना कठिन होता है, उनके लिए राजधानी बदलना कितना आसान होता है!
तुगलक ने दिल्ली से दौलताबाद एक बार राजधानी सिफ्ट किया था, पर मोदी जी हर पांच साल में अपना राजधानी दिल्ली से रांची "सिफ्ट" करते रहते है! जबतक 'एक देश एक चुनाव' नहीं होता, दिल्ली को अपने सुल्तान का इंतजार करना पड़ेगा! गुजरात वालों को तो आदत पड़ गई है, कुछ दिन बाद दिल्ली को भी इस बात का अहसास नहीं होगा कि उनका प्रधानमंत्री रांची में है या अमेरिका में है!
इन दिनों राजा -रानी, मंत्री -संत्री, ED-CBI, यहां तक कि एक राज्य के राज्यपाल भी रांची दरबार की शोभा बड़ा रहे है! जिस तरह से रांची में राजनीतिक हस्तियों का मेला लगा हुआ है, वह किसी देश की राजधानी जैसा ही आभास दे रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो लोग यह न कहने लगें कि दिल्ली देश की अस्थाई राजधानी है!
केंद्रीय मंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल भी झारखंड चुनाव में व्यस्त नजर आ रहे हैं! अगर महाराष्ट्र और यूपी में उप चुनाव नहीं होता तो इन नेताओं के कारण गरीबों को मिलने वाले 5 किलो मुफ्त राशन का गोदाम तक खाली पड़ जाता! रांची दरबार देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि उनके अपने राज्यों के प्रशासनिक कार्य फिलहाल प्राथमिकता में नहीं हैं। यह स्थिति देश की राजनीति का एक असामान्य पहलू उजागर करती है, जहाँ नेतागण अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों को छोड़कर चुनाव प्रचार में संलग्न हो जाते हैं।
देश के कृषि मंत्री, असम के मुख्यमंत्री, और ओडिशा के राज्यपाल जैसे पदों का महत्व अपने मंत्रालय और राज्यों में है, लेकिन चुनावों के दौरान वे सबकुछ भूलकर रांची में समाधि लगाए बैठे है। यह एक ऐसी स्थिति है, जो देश की राजनीति पर गहरा सवाल खड़ा करती है—क्या जनता के हित सर्वोपरि हैं या सत्ता का खेल?
शिवराज सिंह चौहान को लंबे समय तक माध्यप्रदेश में "संघ की खेती"करने के बाद VRS दे दिया गया है! ऐसा लग रहा था कि समय से पहले उन्हें मार्गदर्शक मंडल में भेजा जाएगा! लेकिन कुछ समय बाद उन्हें "चुनावी क़ृषि मंत्री" बना दिया गया है! मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का अचानक सक्रिय राजनीति से किनारा करना और फिर "चुनावी कृषि मंत्री" बनाना, यह वाकई राजनीतिक पटल पर एक अलग ही खेल दर्शाता है। आजकल वे "संघ की खेती" और "नफरत की खेती" को MSP देने में व्यस्त है! यह राजनीति की उस सोच को दर्शाता है जहां सत्ता और प्रचार की खेती ही कृषि मंत्री का एक मात्र कार्य रह गया हो!
जहां शिवराज सिंह चौहान "राजनीतिक खेती" में निपुण माने जाते हैं, वहीं हेमंत बिस्वा सरमा "नफरत की खेती" के माहिर खिलाड़ी है! अपने इस कार्य के लिए वे क़ृषि मंत्री से MSP भी नहीं मांगते है। यह वाकई विचारणीय है कि जनता के मुद्दों को एक तरफ रखकर, राजनीति इस तरह की चुनावी "खेती" में व्यस्त हो चुकी है। उम्मीद करता हूं कि असम की जनता अपने सीएम को मिस नहीं कर रही होगी!
असम के सीएम हेमंत बिस्वा सरमा की तरह ओड़िसा के राज्यपाल रघुवर दास भी झारखण्ड में डेरा डाले बैठे है! ऐसा लगता है कि न तो असम को सीएम की जरुरत है और न ओड़िसा को राज्यपाल चाहिए! शायद झारखण्ड के पूर्व सीएम रघुवर दास टाइम मशीन के जरिए पांच साल पीछे जा चूके है!
यदि एक राज्यपाल किसी चुनावी अभियान में भाग लेते हैं, तो यह न केवल पद की मर्यादा के खिलाफ है, बल्कि संविधान की भावना को भी प्रभावित कर सकता है। इस तरह की स्थिति से सत्ता के दुरुपयोग का आभास हो सकता है और इससे जनता के बीच निष्पक्षता को लेकर संदेह उत्पन्न हो सकता है।
महाराष्ट्र में भी सबकुछ दाव पर लगा हुआ है, लेकिन मोदी एंड शाह कंपनी का मुख्य ध्यान झारखंड पर केंद्रित नजर आता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अडानी जी को 'गोड्डा' पसंद है! इसलिए बीजेपी धन-बल के साथ झारखण्ड में जुटी हुई है! यहां तक कि झारखंड का किला जीतने के लिए उत्तर प्रदेश के उपचुनाव की तारीख तक आगे बढ़ा दिया गया! यह डर क्या कहलाता है? क्या इस बार चुनाव का मोटो है - "अंबानी के हाथ से मुंबई जाए पर अडानी के हाथ से 'गोड्डा' नहीं जाना चाहिए!"


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