बीजेपी के चाणक्य को नहीं मिल रहा कल्पना सोरेन के 'ट्रंप कार्ड' की काट!



 बीजेपी के चाणक्य को नहीं मिल रहा कल्पना सोरेन के 'ट्रंप कार्ड' की काट!

                     ले0 - अरुण कुणाल 

हेमंत सोरेन को जेल भेजने की कार्रवाई बीजेपी के लिए एक अप्रत्याशित और उलटा दांव पड़ने वाली साबित हो रही है। लगता है कि "डबल इंजन" सरकार से "डबल गलती" हो गई! बीजेपी की इस रणनीति का उद्देश्य हेमंत सोरेन को कमजोर करना और झारखंड में अपनी स्थिति मजबूत करना था, लेकिन  कल्पना सोरेन का उदय एक नई चुनौती के रूप में सामने आ गया है, जिसका अनुमान शायद बीजेपी ने नहीं लगाया था। 

बीजेपी ने झारखंड में अपनी रणनीति हेमंत सोरेन पर केंद्रित की हुई है, मानो उन्होंने हेमंत सोरेन को रोकने के लिए एक मजबूत "फिल्डिंग" लगा रखी हो। बीजेपी का पूरा ध्यान उनके खिलाफ मामलों और राजनीतिक चुनौतियों को बढ़ाने पर है, लेकिन इसी दौरान कल्पना सोरेन साइड से लगातार "गोल" किए जा रही हैं! कल्पना सोरेन की यह "साइड अटैक" बीजेपी के लिए एक नई चुनौती बनकर उभर रही है। वह लगातार बीजेपी के खिलाफ "गोल" करती जा रही हैं। उनकी बढ़ती लोकप्रियता और बीजेपी की कल्पना सोरेन के लिए कोई ठोस रणनीति न होना, झारखंड की राजनीति में एक नई दिशा का संकेत दे रहा है।


हेमंत सोरेन के जेल में होने के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व को कल्पना सोरेन ने जिस दृढ़ता से संभाला है, उसने न केवल पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह भर दिया, बल्कि जनता के बीच भी उनकी लोकप्रियता को बढ़ा दिया। जनता में यह भावना प्रबल हो रही है कि हेमंत सोरेन के साथ अन्याय हुआ है, और कल्पना सोरेन उसी जनआक्रोश का लाभ उठाकर बीजेपी के खिलाफ एक नई ताकत के रूप में उभर रही हैं।


बीजेपी ने हेमंत सोरेन को निशाना बनाकर सोचा होगा कि उनकी गैरमौजूदगी से झामुमो कमजोर पड़ेगा, लेकिन कल्पना सोरेन का नेतृत्व न केवल पार्टी को एकजुट रखा, बल्कि उनकी सादगी, जमीन से जुड़ी हुई छवि, और लोगों से संवाद की क्षमता ने उन्हें झारखंड में एक नई शक्ति बना दिया है।


अब हेमंत सोरेन को जेल भेजना बीजेपी के लिए डबल गलती साबित हो रही है—पहली गलती, क्योंकि इससे झारखंड के लोगों में सहानुभूति की लहर पैदा हुई, और दूसरी गलती, क्योंकि इससे कल्पना सोरेन के रूप में एक और अधिक सशक्त प्रतिद्वंद्वी का उदय हो गया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी इस नई चुनौती का सामना कैसे करती है? अगर 23 तारीख को मामला उल्टा पड़ा तो फिर भविष्य में बीजेपी तीसरी गलती नहीं करेगी!


कल्पना सोरेन और सुनीता केजरीवाल ने लगभग एक ही समय में राजनीति में कदम रखा, परंतु दोनों की राजनीतिक यात्रा का प्रभाव और दिशा अलग-अलग रहा। कल्पना सोरेन ने झारखंड में अपने शुरुआती दिनों से ही जनता से जुड़ने की, उनके मुद्दों को समझने की और खुद को एक समर्पित नेता के रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता दिखलाई है। उनकी समझ, जमीनी पकड़, और जोश ने उन्हें झामुमो के लिए एक मजबूत प्रचारक और संभावित भविष्य नेता के रूप में स्थापित किया है। उनके राजनीतिक करियर में यह शुरुआती उछाल और समर्थन उन्हें लंबी रेस का घोड़ा बनाता है।


वहीं दूसरी ओर, सुनीता केजरीवाल की भूमिका सीमित और अपने पति के प्रचार तक ही केंद्रित रही। वह अरविन्द केजरीवाल का 'चिठ्ठी वाचक' बनकर रह गई! वह एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नेता के रूप में पहचान बनाने में सफल नहीं हो पाईं, और जनता के साथ संवाद स्थापित करने में कमी के कारण उनका राजनीतिक करियर को टेक ऑफ नहीं कर पाया। 


सुनीता केजरीवाल के राजनीति में प्रवेश के समय यह उम्मीद की जा रही थी कि वह अरविंद केजरीवाल की अनुपस्थिति में आम आदमी पार्टी को एक नया नेतृत्व और मार्गदर्शन दे सकेंगी। पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों में यह विश्वास था कि सुनीता जी पार्टी के सिद्धांतों को आगे ले जाने और अरविंद केजरीवाल के कार्यभार को साझा करने में सक्षम होंगी। लेकिन, धीरे-धीरे यह स्पष्ट हो गया कि उनकी भूमिका और राजनीतिक उपस्थिति स्थायी नेतृत्व की बजाय एक अस्थायी समर्थन तक ही सीमित रही। जिस प्रकार क्रिकेट में नाईट वॉचमैन का काम केवल कुछ ओवर खेलने तक ही होता है और लंबी पारी खेलना उसका उद्देश्य नहीं होता, उसी तरह सुनीता केजरीवाल का राजनीतिक योगदान भी सीमित और अस्थायी रहा। उनकी सक्रियता का असर व्यापक स्तर पर नहीं दिखा और वह एक सशक्त नेता के रूप में उभरने में असमर्थ रहीं।


इससे यह स्पष्ट होता है कि राजनीति में केवल एक सीएम या पीएम का धर्मपत्नी होने से ही जनता का विश्वास और समर्थन नहीं मिलता; इसके लिए व्यक्तिगत नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास और जनता से जुड़े मुद्दों को समझने का जज़्बा भी आवश्यक होता है, जैसा कि कल्पना सोरेन ने दिखाया है।


कल्पना सोरेन का उभार झारखंड की राजनीति में एक बड़ी घटना है, और इसमें कोई संदेह नहीं कि वह झारखंड में ममता बनर्जी की तरह ही उभर रही हैं। जिस प्रकार ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में अपनी पहचान और प्रभाव से विपक्ष को चुनौती दी और सत्ता में अपना मजबूत पकड़ बनाई, उसी तरह कल्पना सोरेन भी झारखंड में अपने दम पर झामुमो के एक सशक्त नेता के रूप में उभर रही हैं। उनकी लोकप्रियता, जमीनी पकड़, और जनता के मुद्दों पर उनकी समझ ने उन्हें जनता के बीच एक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित किया है।


बीजेपी, जो कि झारखंड में एक प्रमुख विपक्षी ताकत है, अभी तक कल्पना सोरेन के लिए एक मजबूत विकल्प खोजने में विफल रही है। उनकी रणनीतियों का प्रभाव सीमित साबित हो रहा है क्योंकि कल्पना सोरेन का जनता से जुड़ाव और उन पर भरोसा इतना गहरा है कि उनके प्रभाव को काटने का कोई स्पष्ट तरीका बीजेपी के पास नहीं दिख रहा है। झारखंड के जनमानस में उनकी स्वीकार्यता और उनका सहज नेतृत्व बीजेपी के लिए एक चुनौती बन गया है।


कल्पना सोरेन का तेजी से बढ़ता राजनीतिक कद और उनकी बढ़ती लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने झारखंड की राजनीति में अपने लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। उनका नाम अब क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहा; वह राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गई हैं। यह उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि है कि अब वे कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय पार्टी के प्रमुख नेताओं राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के साथ मंच साझा कर रही हैं।


यह मंच साझा करना सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है; यह बताता है कि विपक्षी दलों में उन्हें एक सशक्त नेता के रूप में देखा जा रहा है, जो झारखंड में बीजेपी के खिलाफ एक प्रभावी चेहरा बन सकती हैं। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के साथ मंच पर उनकी मौजूदगी यह भी संकेत देती है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव बढ़ रहा है और उनकी आवाज को गंभीरता से लिया जा रहा है।


इससे झामुमो को भी एक नया आत्मविश्वास मिला है कि कल्पना सोरेन राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का प्रतिनिधित्व कर सकती हैं और अन्य विपक्षी नेताओं के साथ मिलकर एक व्यापक गठबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। कल्पना सोरेन का इस तरह उभरना झारखंड में ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी उनके बढ़ते प्रभाव का संकेत है। 


कल्पना सोरेन न केवल झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के लिए, बल्कि पूरे इंडिया गठबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण और सशक्त  ट्रंप कार्ड के रूप में उभर रही हैं। झारखण्ड में बीजेपी का मजबूत जनाधार होने के बावजूद, कल्पना सोरेन की बढ़ती लोकप्रियता और उनकी जनता से सीधा संवाद स्थापित करने की क्षमता ने इंडिया गठबंधन में एक नया आत्मविश्वास भर दिया है। वह जिस प्रकार स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर ला रही हैं, उससे उनके नेतृत्व में इंडिया गठबंधन को न केवल झारखंड, बल्कि पूरे देश में क्षेत्रीय दलों की ताकत को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।


कल्पना सोरेन की उपस्थिति से इंडिया गठबंधन को एक ऐसा चेहरा मिला है जो सत्ता की नीतियों को सीधे चुनौती दे सकता है। उनका उभरना यह भी दर्शाता है कि क्षेत्रीय नेताओं का महत्व इस गठबंधन में बढ़ रहा है, और भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए एक व्यापक और समावेशी राजनीति को आगे बढ़ाया जा सकता है।


कल्पना सोरेन ने अपने सादगी और जनसंपर्क के बल पर झारखंड की राजनीति में वह स्थान प्राप्त किया है जो उन्हें एक लंबी पारी खेलने के योग्य बनाता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे आने वाले समय में बीजेपी किस तरह से इस चुनौती का सामना करती है और क्या वह कल्पना सोरेन की तरह का कोई प्रभावी विकल्प पेश कर पाती है या नहीं। बीजेपी के लिए यह एक नई चुनौती बन रही है, क्योंकि कल्पना सोरेन का करिश्माई व्यक्तित्व और झारखंड के लोगों में उनके प्रति सहानुभूति के चलते, इंडिया गठबंधन को एक ऐसा नेता मिला है जो वास्तव में "ट्रंप कार्ड" साबित हो सकता है।



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