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Showing posts from November, 2025

राहुल गांधी, जनता और राजनीति का शाश्वत सच: आंदोलन हमेशा जनता से जन्म लेते हैं!

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राहुल गांधी, जनता और राजनीति का शाश्वत सच: आंदोलन हमेशा जनता से जन्म लेते हैं!                   ले o- अरुण कुणाल इतिहास गवाह है कि चे ग्वेरा को एक चरवाहे की गद्दारी ने पकड़वाया था। जब सैनिक ने पूछा—“तुमने उस इंसान को कैसे धोखा दिया जो तुम्हारे अधिकारों के लिए लड़ता रहा?” चरवाहे का जवाब था—“उसकी लड़ाई ने मेरी भेड़ों को डरा दिया।” यह जवाब सिर्फ लैटिन अमेरिका की एक पुरानी कहानी नहीं, बल्कि आज के भारत का भी आईना है, जहां आम जनता पांच किलो मुफ्त राशन के लिए चुप्पी ओढ़े रखी है!  SIR में जिनका नाम कट जाएगा, वे तो किस्मत वाले है! असली परीक्षा तो उनका इंतज़ार कर रही है जिनका नाम बच जाएगा! क्योंकि इतिहास के छात्र उनसे जरूर पूछेंगे -"तब आप चुप क्यों थे?” चे ग्वेराकी तरह मिस्र के महान सेनानायक मोहम्मद करीम की गिरफ़्तारी की कहानी भी काफी रोचक है, जिन्होंने नेपोलियन की पूरी सैन्य मशीनरी को चुनौती दी! जब उन्हें पकड़ा गया, तो अदालत ने उन्हें मृत्युदंड की सज़ा सुनाई! सजा से पहले नेपोलियन ने उन्हें बुलाया और कहा: "मुझे अफ़सोस है कि मुझे उस व्यक्ति को मार...

राहुल गांधी की चुनौती और विपक्षमुक्त रूसी मॉडल की प्रतिध्वनि!

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राहुल गांधी की चुनौती और विपक्षमुक्त रूसी मॉडल की प्रतिध्वनि!                      ले o- अरुण कुणाल बिहार की हार के बाद तेजस्वी यादव से ज्यादा राहुल गांधी को निशाना बनाया जा रहा है। बीजेपी का पूरा इकोसिस्टम मोदी जी को दी गई 'अबतक सौ गाली' को भूल कर राहुल गांधी की ‘हार का शतक’ पूरा कराने में लगा हुआ है। क्या इतना भर काफी नहीं था कि देश के 272  हस्तियों ने एकजुट होकर पत्र लिख दें कि राहुल गांधी चुनाव आयोग को “झूठ-मूठ” बदनाम कर रहे हैं। इन 272 में 16 जज, 14 राजदूत, 123 रिटायर्ड ब्यूरोक्रैट्स और 133 पूर्व सैन्य अधिकारी शामिल हैं! लेकिन असली दिलचस्पी इन पदों में नहीं, बल्कि इस जादुई 272 संख्या में है, जो लोकसभा में ‘बहुमत’ का आंकड़ा है। 272 हस्तियों के साथ-साथ भारत के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, जिन्हें SIR और दस हजार रुपय की चुनावी रिश्वत पर सवाल उठाने चाहिए थे, वे सत्ता का टूलकिट बनकर उल्टा राहुल गांधी पर सवाल उठा रहे है, क्योंकि राजनीति में सबसे आसान काम है वास्तविक चुनौती देने वाले नेता को टार्गेट करना। राहुल गांधी सिर्फ़ बीजेपी से...

बिहार मेनडेट का यक्षप्रश्न : नीतीश कुमार का अगला पड़ाव—पटना, दिल्ली या विपक्ष का ताज?

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बिहार मेनडेट का यक्षप्रश्न: नीतीश कुमार का अगला पड़ाव—पटना, दिल्ली या विपक्ष का ताज?                ले o- अरुण कुणाल बिहार के मेनडेट को देखकर एक ही सवाल गूंज रहा है— “ये कौन चित्रकार है… ये कौन चित्रकार है?” चुनावी अंकगणित ऐसा सेट किया गया है कि बीजेपी चाहे तो नीतीश कुमार के बिना भी सरकार बना सकती है, लेकिन नीतीश कुमार चाहकर भी बीजेपी को छोड़ नहीं सकते। महागठबंधन के पास इतना नंबर ही नहीं है कि ‘चाचा–भतीजा’ की सरकार बन सके। यानी, अब चाहे या न चाहे, पलटू चाचा को मन मारकर NDA में ही रहना होगा। और इसका फायदा उठाने में बीजेपी ज़रा भी देर नहीं करेगी, ये बात अब साफ़ दिख रही है। बीजेपी का वर्षों पुराना ‘मगध फतह’ का सपना आखिरकार पूरा हो गया! जो काम पिछले चुनाव में चिराग पासवान नहीं कर पाए थे, वह इस बार प्रशांत किशोर ने कर दिखाया। बीजेपी का चुनाव से पहले CM चेहरा घोषित न करना ही इस बात का संकेत था कि इस बार मुख्यमंत्री बीजेपी का ही होगा। ऐसे में नीतीश कुमार के सामने अब सिर्फ दो विकल्प बचे हैं—कुछ समय के लिए बिहार के CM पद पर बने रहना या मोदी सरकार में डिप्ट...

नेहरू के जन्मदिन पर बिहार का फिनाले : संयोग या प्रयोग?

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नेहरू के जन्मदिन पर बिहार का फिनाले : संयोग या प्रयोग?                    लेo - अरुण कुणाल '14 नवंबर' एक ऐसी तारीख जिसे भारत दशकों से बाल दिवस के रूप में मनाता आया है। यह दिन भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की जन्मतिथि का प्रतीक है! वही नेहरू, जिनकी राजनीतिक दृष्टि और लोकतांत्रिक सोच ने आधुनिक भारत की नींव रखी। लेकिन इस बार, यह दिन सिर्फ बच्चों की मुस्कान या गुलाब की खुशबू तक सीमित नहीं है। इस तारीख को बिहार विधानसभा चुनाव का फाइनल मैच होना है, जो नेहरू के लोकतंत्र और मोदी के वोटतंत्र का भविष्य तय करेगा!  भारतीय राजनीति में तारीखों और प्रतीकों की अपनी शक्ति होती है। गांधी जयंती, अंबेडकर जयंती, सरदार पटेल जयंती — ये सिर्फ दिन नहीं, बल्कि भावनात्मक स्मृतियाँ हैं जो मतदाता के मन में गूंजती हैं। ऐसे में, जब नेहरू जयंती के दिन बिहार का चुनावी फिनाले तय है, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इस तारीख को जानबूझकर चुना गया? यह सही है कि चुनाव आयोग तारीखें तय करता है पर राजनीति में संयोग अक्सर संकेत बन जाते हैं। कहने को यह महज़...

बिहार चुनाव: राहुल का ‘Gen Z’ बनाम नीतीश का ‘महिला वोट बैंक’

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*बिहार चुनाव :  राहुल का ‘Gen Z’ बनाम नीतीश का ‘महिला वोट बैंक’              प्रो-इनकंबेंसी या एंटी-इनकंबेंसी                        ले o -अरुण कुणाल बिहार विधानसभा चुनाव 2025 दो चरणों में संपन्न हुआ! पहला चरण 6 नवंबर को और दूसरा चरण 11 नवंबर को। पहले चरण में रिकॉर्ड 64.66% मतदान दर्ज किया गया, जो राज्य के चुनावी इतिहास में अब तक का सर्वोच्च आंकड़ा रहा। जबकि दूसरे चरण में उत्साह और बढ़ा, जहाँ 68.79% वोटिंग हुई। दोनों चरणों को मिलाकर इस बार औसतन 66.90% मतदान हुआ, जो न सिर्फ़ बिहार की राजनीति में जनता की बढ़ती भागीदारी का संकेत देता है, बल्कि बदलते जनमूड की भी झलक दिखाता है। जेपी आंदोलन के बाद पहली बार बिहार में इस स्तर की जबरदस्त वोटिंग देखने को मिली है। 2020 में “तेजस्वी फेक्टर” और “नीतीश फेक्टर” दोनों मौजूद थे, लेकिन तब भी इतनी व्यापक जनभागीदारी नहीं दिखी थी। इस बार का असली श्रेय युवा मतदाताओं और महिला वोटर्स को जाता है, जिन्होंने लोकतंत्र को नई ऊर्जा दी है। बिहार चुनाव का दिलचस्प प...