नेहरू के जन्मदिन पर बिहार का फिनाले : संयोग या प्रयोग?
नेहरू के जन्मदिन पर बिहार का फिनाले : संयोग या प्रयोग?
लेo - अरुण कुणाल
'14 नवंबर' एक ऐसी तारीख जिसे भारत दशकों से बाल दिवस के रूप में मनाता आया है। यह दिन भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की जन्मतिथि का प्रतीक है! वही नेहरू, जिनकी राजनीतिक दृष्टि और लोकतांत्रिक सोच ने आधुनिक भारत की नींव रखी। लेकिन इस बार, यह दिन सिर्फ बच्चों की मुस्कान या गुलाब की खुशबू तक सीमित नहीं है। इस तारीख को बिहार विधानसभा चुनाव का फाइनल मैच होना है, जो नेहरू के लोकतंत्र और मोदी के वोटतंत्र का भविष्य तय करेगा!
भारतीय राजनीति में तारीखों और प्रतीकों की अपनी शक्ति होती है। गांधी जयंती, अंबेडकर जयंती, सरदार पटेल जयंती — ये सिर्फ दिन नहीं, बल्कि भावनात्मक स्मृतियाँ हैं जो मतदाता के मन में गूंजती हैं। ऐसे में, जब नेहरू जयंती के दिन बिहार का चुनावी फिनाले तय है, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इस तारीख को जानबूझकर चुना गया?
यह सही है कि चुनाव आयोग तारीखें तय करता है पर राजनीति में संयोग अक्सर संकेत बन जाते हैं। कहने को यह महज़ कैलेंडर की गणना है, लेकिन क्या सच में ऐसा है? जब कोई ऐसा व्यक्ति, जो खुद को नेहरू से बड़ा नहीं तो कम भी नहीं समझता हो,जो मीडिया मैनेजमेंट का गुरु माना जाता है, वह अगर बिहार जैसी क्रांति की धरती के मतगणना दिवस को नेहरू जयंती के दिन रखवाता है, तो यह मान लेना कठिन है कि यह सब अनजाने में हुआ होगा।
वह व्यक्ति है जिसने राजनीति को इवेंट बना दिया है और प्रतीक को प्रचार में बदल दिया है। ऐसे में यह सोचना गलत नहीं होगा कि नेहरू जयंती की तिथि को बिहार के जनादेश के दिन के रूप में चुना जाना एक राजनीतिक प्रयोग था, एक ऐसा प्रयोग जो इतिहास से टकराकर वर्तमान की वैधता तलाशना चाहता है।
महिला मतदाता और नेहरू की लोकतांत्रिक दृष्टि
बिहार चुनाव 2025 की सबसे बड़ी कहानी यह है कि 70% से अधिक महिलाओं ने मतदान किया! यह सिर्फ आँकड़ा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नब्ज़ की धड़कन है। कई राजनीतिक विश्लेषक इस उत्साह का श्रेय महिलाओं के बैंक खाते में आए दस हज़ार रुपये को दे रहे हैं। लेकिन ऐसा कहना, उस लोकतांत्रिक चेतना का अपमान होगा जिसकी नींव पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी।
ऐसा मान लेना कि महिला वोटर्स में 10% की वृद्धि अपने आप में नीतीश कुमार की जीत की गारंटी है,यह चुनाव विश्लेषकों की भारी भूल साबित हो सकती है। यह नहीं भूलना चाहिए कि 2020 के चुनाव में भी लगभग 60% महिलाओं ने वोट किया था, फिर भी नीतीश कुमार मात्र 43 सीटों पर सिमट गए थे। इसलिए महिला मतदाता को सिर्फ लाभार्थी वर्ग मानना, उसकी राजनीतिक चेतना का अपमान है।
नेहरू ने पुरुषों और महिलाओं दोनों को एक समान वोट देने का अधिकार देकर आधी आबादी को मताधिकार का अधिकार दिया!यह वही दौर था जब यूरोप के कई “लोकतांत्रिक” देशों में भी महिलाओं को वोट देने की अनुमति नहीं थी। यह कोई साधारण निर्णय नहीं था, क्योंकि अमरीका को अपनी महिलाओं को समान वोटिंग अधिकार देने में 144 साल लगे थे और ब्रिटेन को लगभग एक सदी लग गई थी महिलाओं को यह अधिकार देने में। लेकिन नेहरू ने तमाम विरोधों और सामाजिक संकोच के बावजूद भारतीय महिलाओं को वोट देने का अधिकार उसी दिन दे दिया, जिस दिन भारत का जन्म हुआ!
नेहरू मानते थे कि लोकतंत्र तब तक अधूरा है जब तक महिला उसमें सक्रिय भागीदारी न करे। आज जब बिहार की महिलाएँ घर की चौखट से निकलकर बूथ तक पहुँच रही हैं, तो यह सिर्फ वोटिंग नहीं, बल्कि नेहरू के सपनों का भारत की जीत है! एक ऐसा भारत जहाँ समानता, स्वाभिमान और सहभागिता लोकतंत्र की असली पहचान है।
नेहरू का लोकतंत्र बनाम मोदी का वोटतंत्र
हमारे गांव के एक मैथ टीचर की कहानी बहुत फेमस है! जब मैथ के फार्मूला से सवाल हल नहीं होते थे, तो वे दुबारा कोशिश करने की बजाय कुछ अंक जोड़ - घटाव कर उत्तर सही करने की सलाह देते थे! मसलन उत्तर 123 है और मास्टर जी के फार्मूला से 100आता है तो वे उसमें 23 जोड़ कर समस्या का हल कर लेते थे! मास्टर जी ने कभी यह सोचने की कोशिश नहीं की कि फार्मूला क्यों गलत है, बल्कि समस्या का तात्कालिक हल खोज लिया।
बिहार का एग्जिट पोल भी मास्टर जी के 'मैथ का फार्मूला' पर तैयार किया गया है! गांव के मास्टर जी की कहानी आपके लिए भले ही एक मजाकिया किस्सा हो, लेकिन यह ईवीएम या चुनावी प्रक्रियाओं के संदिग्ध व्यवहार की वास्तविकताओं को उजागर करने का बेहतरीन तरीका है। गांव के मास्टर जी के फॉर्मूले ने बच्चों के नंबर बढ़ाए, लेकिन ईवीएम वाले मास्टर जी का फॉर्मूला किसी के चुनावी भविष्य को बढ़ा देता है। फर्क इतना है कि गांव वाले मास्टर जी का खेल मासूम था, लेकिन ईवीएम का खेल लोकतंत्र को हिलाने वाला है।
मतदान खत्म होने के बाद वोट प्रतिशत का बदलाव केवल तकनीकी त्रुटि हो सकता है, लेकिन बार-बार ऐसा होना इसे संदिग्ध बनाता है। लोकसभा, महाराष्ट्र, हरियाणा जैसे चुनावों में भी यही पैटर्न दिखा है, जहां विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने ईवीएम और चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
जब रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग के बाद भी काउंटिंग वाले दिन “सांप-सीढ़ी” का खेल हो और विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव को प्रेस वार्ता कर चिंता जतानी पड़े तो फिर “लोकतंत्र की जय” नहीं, “वोटतंत्र की जाँच” होनी चाहिए! जनता ने अपने मत से व्यवस्था पर भरोसा जताया, लेकिन अगर नतीजे की सुबह वही भरोसा संदेह में बदल जाए तो सवाल सिर्फ़ परिणाम पर नहीं, पूरी प्रक्रिया पर उठता है।
इस बार 14 नवंबर इसलिए भी खास है क्योंकि यह नेहरू के भारत बनाम मोदी के भारत की दो अलग दृष्टियों के बीच एक वैचारिक मुकाबला बन सकता है। चाहे इसे संयोग मानिए या प्रयोग, 14 नवंबर 2025 बिहार की राजनीतिक इतिहास में दर्ज होगा, एक ऐसे दिन के रूप में जब अतीत की विरासत और भविष्य की दिशा एक ही मतपेटी में टकराईं। अगर जनता उस दिन बदलाव का फैसला करती है, तो इतिहास इसे “नेहरू के दिन लोकतंत्र की पुनर्स्थापना” कहेगा। और अगर सत्ता यथावत रहती है, तो यह कहा जाएगा संयोग था, प्रयोग नहीं! जनता यथास्थिति की आदी हो गई है, उसे बदलाव नहीं जुमला चाहिए। नेहरू का लोकतंत्र विचारशील मतदाता पर टिका था, जहाँ जनता भावनाओं से नहीं, विचारों से निर्णय लेती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजनीति ने जनता को आश्वासनों के नशे में डाल दिया है। ऐसी सोच वोटतंत्र के लिए तो ठीक है, पर लोकतंत्र के लिए नहीं!

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