राहुल गांधी, जनता और राजनीति का शाश्वत सच: आंदोलन हमेशा जनता से जन्म लेते हैं!




राहुल गांधी, जनता और राजनीति का शाश्वत सच: आंदोलन हमेशा जनता से जन्म लेते हैं!


                  ले o- अरुण कुणाल


इतिहास गवाह है कि चे ग्वेरा को एक चरवाहे की गद्दारी ने पकड़वाया था। जब सैनिक ने पूछा—“तुमने उस इंसान को कैसे धोखा दिया जो तुम्हारे अधिकारों के लिए लड़ता रहा?” चरवाहे का जवाब था—“उसकी लड़ाई ने मेरी भेड़ों को डरा दिया।” यह जवाब सिर्फ लैटिन अमेरिका की एक पुरानी कहानी नहीं, बल्कि आज के भारत का भी आईना है, जहां आम जनता पांच किलो मुफ्त राशन के लिए चुप्पी ओढ़े रखी है!  SIR में जिनका नाम कट जाएगा, वे तो किस्मत वाले है! असली परीक्षा तो उनका इंतज़ार कर रही है जिनका नाम बच जाएगा! क्योंकि इतिहास के छात्र उनसे जरूर पूछेंगे -"तब आप चुप क्यों थे?”


चे ग्वेराकी तरह मिस्र के महान सेनानायक मोहम्मद करीम की गिरफ़्तारी की कहानी भी काफी रोचक है, जिन्होंने नेपोलियन की पूरी सैन्य मशीनरी को चुनौती दी! जब उन्हें पकड़ा गया, तो अदालत ने उन्हें मृत्युदंड की सज़ा सुनाई! सजा से पहले नेपोलियन ने उन्हें बुलाया और कहा: "मुझे अफ़सोस है कि मुझे उस व्यक्ति को मारना पड़ रहा है जिसने साहसपूर्वक अपने देश की रक्षा की। मैं नहीं चाहता कि इतिहास मुझे एक वीर के हत्यारे के रूप में याद रखे। यदि तुम मेरी सेना को हुए नुकसान की भरपाई के लिए दस हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ चुका दो, तो मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा।"


मोहम्मद करीम हँस पड़े और बोले: "मेरे पास इतना धन नहीं है, लेकिन व्यापारियों पर मुझ पर सौ हज़ार से अधिक स्वर्ण मुद्राओं का कर्ज़ है।" करीम को व्यापारियों से मिलाने के लिए बाज़ार में ले जाया गया! बेड़ियों में जकड़ा हुआ, सैनिकों से घिरा हुआ महान सेनानायक इस आशा में गया कि जिन लोगों के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगाई, वे उनकी मदद करेंगे, लेकिन कोई व्यापारी आगे नहीं आया। उल्टे उन्होंने उन पर इलज़ाम लगाया कि "वे अलेक्ज़ेंड्रिया की तबाही और उनकी आर्थिक संकट के ज़िम्मेदार हैं।"

निराश और टूटे मन से करीम वापस नेपोलियन के पास लौटे। तब नेपोलियन ने कहा: “मैं तुम्हें इसलिए नहीं मारूँगा कि तुमने हमसे लड़ाई की, बल्कि इसलिए कि तुमने अपना जीवन उन लोगों पर खर्च किया जो स्वतंत्रता से अधिक व्यापार को महत्व देते हैं।”


यह कहानी आज की भारतीय राजनीति में राहुल गांधी पर फिट बैठती है! भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर बढ़ते दबाव, संस्थाओं के क्षरण, मीडिया की दासता, कॉरपोरेट-सत्ता गठजोड़ और विपक्ष के लगातार कमजोर पड़ते स्वर, इन सबके खिलाफ राहुल गांधी लगातार संघर्ष कर रहे हैं। उनकी जन यात्राएँ, उनके भाषण, उनके संसद में सवाल, सब एक लंबी लड़ाई का हिस्सा हैं। लेकिन समस्या विपक्ष की कम और जनता की ज़्यादा है। आज की जनता नागरिक नहीं रह गई बल्कि प्रजा बन चुकी है। उसे सरकार से सवाल नहीं, सिर्फ नतीजे चाहिए। उसे अधिकारों से ज्यादा मनोरंजन चाहिए। उसे लोकतंत्र से ज्यादा “स्थिरता” चाहिए, चाहे वह स्थिरता उसकी ही आवाज़ छीन ले।


राहुल गांधी का संघर्ष इसी बदली हुई जनता से टकराता है। जब जनता प्रजा बन जाती है, तब सेनानायक अकेले रह जाते हैं! जो नेता लोकतंत्र के लिए लड़ते हैं, वे अक्सर उन्हीं लोगों की चुप्पी से हताश होते हैं जिनके लिए वे लड़ रहे होते हैं। राहुल गांधी की स्थिति भी वैसी ही लगती है! एक तरफ़ सत्ता की विशाल मशीनरी, दूसरी तरफ़ जनता का बढ़ता राजनीतिक उदासीनता और डर। जनता का बड़ा वर्ग विरोधी आवाज़ों से दूरी बनाकर लगातार सत्ता-समर्थित नैरेटिव को ही सच मानने लगता है। कई लोग यह मान बैठे हैं कि प्रश्न पूछना देशद्रोह है और असहमति खतरा है।


ऐसे में राहुल गांधी की लड़ाई चे ग्वेरा और मोहम्मद करीम जैसी हो जाती है, जहाँ सेनानायक लड़ रहा है, लेकिन जनता तमाशाई बनकर खड़ी है। असल सवाल राहुल गांधी पर नहीं, जनता पर है! आज का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि राहुल गांधी क्या कर रहे हैं? सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत की जनता लोकतंत्र बचाने के लिए खड़ी होगी या अपनी “भेड़ों” और “व्यापार” की सुरक्षा के लिए चुप्पी ओढ़े रहेगी?


"अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता”—यह कहावत भले जीवन में हमेशा सही न हो, लेकिन राजनीति में यह सौ फ़ीसदी सत्य है। इतिहास गवाह है कि कोई भी बड़ा आंदोलन सिर्फ़ किसी एक नेता की इच्छाशक्ति से नहीं चलता, बल्कि जनता की भागीदारी से जन्म लेता है। आंदोलन नेता नहीं शुरू करते, जनता शुरू करती है, नेता सिर्फ़ प्रतीक बन जाते हैं।


चंपारण सत्याग्रह का श्रेय गांधी जी को दिया जाता है, लेकिन चंपारण की लड़ाई जनता ने शुरू की थी! महात्मा गांधी वहाँ इसलिए पहुँचे क्योंकि किसानों ने उन्हें बुलाया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में गांधी, नेहरू, पटेल जैसे सभी नेता जेलों में थे, फिर भी आंदोलन चलता रहा, क्योंकि जनता तय कर चुकी थी कि आज़ादी चाहिए ही चाहिए। 1857 में बहादुर शाह ज़फर ने बगावत शुरू नहीं की थी बल्कि विद्रोहियों ने उन्हें अपना नेता चुना था। यही दृश्य जेपी आंदोलन में भी उभरा था! आंदोलन जनता से उठा, नेता जनता ने गढ़ा। इतिहास का सार्वभौमिक नियम यही है कि नेता से आंदोलन नहीं होता, आंदोलन से नेता होता हैं।


भगत सिंह से पहले अनेक क्रांतिकारियों ने अपनी शहादत देकर भारतीय क्रांति की वह धरती तैयार की थी, जिस पर आगे चलकर नई पीढ़ी के विचार अंकुरित हुए। भगत सिंह उसी नवयुग के क्रांतिकारियों में थे, जिनका दृष्टिकोण अपने पूर्ववर्तियों से कहीं अधिक व्यापक, वैचारिक और आधुनिक था और यही उनके संघर्ष को अलग पहचान देता है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यदि राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला ख़ान, चंद्रशेखर आज़ाद, करतार सिंह सराभा और अनेक अन्य क्रांतिकारी अपने बलिदान से रास्ता न बनाते, तो भगत सिंह का पथ भी इतना सुगम न होता।


अगर इस नियम को आज के भारत में देखें तो राहुल गांधी का ‘भारत जोड़ो यात्रा’ उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। भारत जोड़ो यात्रा ने एक जन-यात्रा बनने की कोशिश की थी, पर सत्ता पक्ष और मीडिया का सुनियोजित नकारात्मक नैरेटिव के कारण राहुल की यात्रा और जनता के बीच एक बहुत बड़ा अवरोध खड़ा हो गया!  यात्रा को जनता से जोड़ने की बजाय “राहुल गांधी की निजी पदयात्रा” के रूप में पेश किया गया। जो यात्रा देश के विभाजनकारी राजनीतिक वातावरण पर एक सामूहिक प्रतिरोध बन सकती थी, वह धीरे-धीरे सिर्फ़ राहुल गांधी का ही संघर्ष बनकर रह गई। यह विडंबना है, पर राजनीति अक्सर विडंबनाओं से ही बनती है।


अगर जनता अभी सोई है, तो क्या नेता हाथ पर हाथ धरे बैठ जाए? जी नहीं। राजनीति में जनता को जगाना ही नेतृत्व की पहली परीक्षा है। महात्मा गांधी से पहले बाल गंगाधर तिलक दशकों तक हिंदुस्तान की राजनीतिक चेतना को तैयार करते रहे थे। तिलक जी ने भारतीयों में “स्वराज” की आकांक्षा बोई थी, गांधी ने उसी बीज को आंदोलन बनाया।


आज की कांग्रेस में वही जिम्मेदारी राहुल गांधी पर है। राहुल गांधी से पहले किसी भी कांग्रेसी नेता को इतना लंबा, कठोर और लगातार सत्ता-संरचित प्रतिरोध नहीं झेलना पड़ा। वे सिर्फ़ जनता से नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी की जड़ता, पुराने ढांचे और इतिहास की बोझिल अपेक्षाओं से भी लड़ रहे हैं। इस लिहाज़ से राहुल गांधी एक अनोखी स्थिति में खड़े हैं—वे छात्र भी हैं, और प्रोफेसर भी। वे सीख भी रहे हैं कि जनता को कैसे जगाया जाए, कैसे संवाद बनाया जाए, कैसे उम्मीद पैदा की जाए। और उन्हीं रास्तों पर चलते हुए वे कांग्रेस के ओल्ड गार्ड से लेकर युवा कार्यकर्ताओं तक, सभी के लिए मिसाल भी बन रहे हैं।


नेता वही है जो जनता के जागने से पहले हार नहीं मानता! राजनीति का सबसे कठोर सत्य यही है कि जनता जागती देर से है, पर जागने पर इतिहास पलट देती है। राहुल गांधी के सामने आज संघर्ष दोहरा है—सत्ता की दमनकारी ताकतों से लड़ाई और उस जनता को जगाने की कोशिश जिसे लगातार बताया जा रहा है कि सवाल पूछना अपराध है। लेकिन इतिहास यही कहता है कि कोई भी लोकतंत्र जनता के जागरण के बिना टिकता नहीं और कोई भी नेता जनता के सोने के कारण लड़ाई छोड़ नहीं देता।


केवल “कमज़ोर विपक्ष” का बहाना बनाकर नागरिक अपने कर्तव्य से बच नहीं सकते। लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई सिर्फ़ नेताओं की जिम्मेदारी नहीं होता, जनता की भी उतनी ही होती है। आने वाली पीढ़ियाँ विपक्ष से जितने सवाल पूछेंगी, उससे ज़्यादा सवाल उस जनता से पूछेंगी जो आज प्रजा की तरह चुप बैठी है। क्या हम सचमुच नागरिक हैं या सिर्फ़ सत्ता की गोद में बैठी हुई प्रजा? और अंततः इतिहास केवल यह नहीं दर्ज करेगा कि राहुल गांधी हिम्मत से लड़े या नहीं।इतिहास यह भी पूछेगा कि राहुल गांधी के दौर में क्या भारत के लोग उतने ही बहादुर थे जितनी बहादुरी वे अपने नेता से उम्मीद करते थे? एक जीवित लोकतंत्र में कायर जनता, बहादुर नेता की सबसे बड़ी हार होती है।



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