बिहार मेनडेट का यक्षप्रश्न : नीतीश कुमार का अगला पड़ाव—पटना, दिल्ली या विपक्ष का ताज?



बिहार मेनडेट का यक्षप्रश्न: नीतीश कुमार का अगला पड़ाव—पटना, दिल्ली या विपक्ष का ताज?

               ले o- अरुण कुणाल

बिहार के मेनडेट को देखकर एक ही सवाल गूंज रहा है— “ये कौन चित्रकार है… ये कौन चित्रकार है?” चुनावी अंकगणित ऐसा सेट किया गया है कि बीजेपी चाहे तो नीतीश कुमार के बिना भी सरकार बना सकती है, लेकिन नीतीश कुमार चाहकर भी बीजेपी को छोड़ नहीं सकते। महागठबंधन के पास इतना नंबर ही नहीं है कि ‘चाचा–भतीजा’ की सरकार बन सके। यानी, अब चाहे या न चाहे, पलटू चाचा को मन मारकर NDA में ही रहना होगा। और इसका फायदा उठाने में बीजेपी ज़रा भी देर नहीं करेगी, ये बात अब साफ़ दिख रही है।


बीजेपी का वर्षों पुराना ‘मगध फतह’ का सपना आखिरकार पूरा हो गया! जो काम पिछले चुनाव में चिराग पासवान नहीं कर पाए थे, वह इस बार प्रशांत किशोर ने कर दिखाया। बीजेपी का चुनाव से पहले CM चेहरा घोषित न करना ही इस बात का संकेत था कि इस बार मुख्यमंत्री बीजेपी का ही होगा। ऐसे में नीतीश कुमार के सामने अब सिर्फ दो विकल्प बचे हैं—कुछ समय के लिए बिहार के CM पद पर बने रहना या मोदी सरकार में डिप्टी PM बनकर अपना राजनीतिक ‘फेयरवेल’ लेना। 


सच कहा जाए तो मोदी -शाह से नीतीश बाबू के लिए इससे बेहतर विदाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। अगर नीतीश कुमार ने दबाव की राजनीति जारी रखी और वे मानने को तैयार न हुए, तो बीजेपी उन्हें सिर्फ पश्चिम बंगाल चुनाव तक ही बर्दाश्त करेगी। वेस्ट बंगाल के चुनाव निपटते ही नीतीश बाबू का ‘शिंदेकरण’ लगभग तय है।


वेस्ट बंगाल का बाहरी वोटर्स मुख्य रूप से बिहार और झारखंड से आते है और यही बीजेपी की सबसे मजबूत पकड़ वाला वोटर्स बेस है। बीजेपी किसी भी सूरत में एक ही समय में दो मोर्चों पर लड़ाई नहीं खोलना चाहेगी। जब तक बंगाल में ममता दीदी से सीधी टक्कर चल रही होगी, तब तक बिहार में कोई “खेला” होने की संभावना बेहद कम है। लेकिन वेस्ट बंगाल चुनाव का नतीजा चाहे जो हो, चुनाव खत्म होते ही बिहार में तख़्तापलट लगभग पक्का है। उसके बाद नीतीश कुमार के लिए सिर्फ दो रास्ते बचेंगे- इज्ज़त के साथ विदाई या शिवसेना और NCP की तर्ज पर JDU का दो फाड़।


नीतीश कुमार को अब ‘मगध’ त्यागकर ‘इंद्रप्रस्थ’ की ओर प्रस्थान कर देना चाहिए वरना अगला पड़ाव ‘वन-आश्रम’ ही होगा! राजनीति की आख़िरी पारी खेल रहे नीतीश कुमार के पास अभी भी एक आख़िरी “तीर” बचा हुआ है —बगावत कर विपक्ष का PM कैंडिडेट बनने का रास्ता हैं! अगर नीतीश कुमार पर राहुल गांधी जुआ खेलने को तैयार हो जाएँ, तो भारतीय राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। नीतीश कुमार ने कभी खुले तौर पर स्वीकार नहीं किया पर PM बनने का सपना उनका पुराना है।


2013 में जब आडवाणी जी की जगह नरेंद्र मोदी को NDA का चेहरा तय किया गया था, तब भी नीतीश चाहते थे कि उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया जाए। जब यह संभव नहीं हुआ तो उन्होंने अपनी सबसे बड़ी विचारधारात्मक लक्ष्मण रेखा पार करते हुए लालू यादव से हाथ मिला लिया, सिर्फ इसलिए कि मोदी के नेतृत्व वाली NDA के हिस्सा न रहना पड़े।


यह याद रखना ज़रूरी है कि INDIA महागठबंधन की नींव रखी ही नीतीश कुमार ने थी। लेकिन जब गठबंधन ने उन्हें चेहरा बनाने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने पलक झपकते ही पलटी मार दी। ये उनकी व्यवहारिक, कठोर और पूरी तरह सत्ता-केंद्रित शैली पुरानी है! आज वही कहानी नए संदर्भ में दोहराई जा सकती है। नीतीश की महत्वाकांक्षा और विपक्ष की मजबूरी—अगर दोनों एक बिंदु पर मिल जाएँ, तो 2029 का खेल पूरी तरह बदल सकता है।


नीतीश कुमार के साथ आने से राहुल गांधी की ‘वोट चोरी’ के खिलाफ लड़ाई को भी नई ताकत मिल सकती है। राहुल गांधी खुद समझ चुके हैं कि भारत का Gen Z ऊर्जा दे सकता है, आंदोलन खड़ा कर सकता है पर सिर्फ उन्हीं के भरोसे चुनाव जीते नहीं जाते।जब न चुनाव आयोग में सुनवाई हो और न न्यायपालिका में ठोस राहत मिले, तो फिर राजनीति में विकल्प सीमित ही बचते हैं।


ऐसे में यदि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता विपक्षी एकता की धुरी बनकर सत्ता परिवर्तन करा देते हैं, तो चुनाव आयोग की मनमानी और संस्थागत पक्षपात पर अंकुश लगाने की वास्तविक संभावना पैदा हो सकती है। भारतीय राजनीति में कभी–कभी एक समान असंतोष और एक समान महत्वाकांक्षान एक राजनीतिक धुरी बना देती है।


चंद्रबाबू नायडू भी NDA में रहकर उतने संतुष्ट नहीं हैं। मोदी सरकार द्वारा किया गया स्पेशल पैकेज का वादा पूरा न होना उनके भीतर असंतोष को लगातार बढ़ा रहा है। और यह भी सच है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ नायडू की भी किसी से कम नहीं। ऐसी स्थिति में सत्ता परिवर्तन की संभावना दिखे तो नीतीश कुमार और नायडू, दोनों एक साझा राजनीतिक प्लेटफॉर्म पर आ सकते हैं। कौन PM नायडू बने या नीतीश, यह बाद की बात है, पर राहुल गांधी का यह प्रयोग सफल हो सकता है!


कांग्रेस को अब “पास का नुकसान, दूर का फायदा” वाली राजनीति समझनी ही होगी। 2019 में अगर कांग्रेस ने नीतीश कुमार के नाम पर सहमति दे दी होती, तो शायद 2024 में मोदी सरकार दोबारा न बनती। आज वही अवसर दोबारा दरवाजे पर दस्तक दे रहा है! फैसला कांग्रेस को करना है कि क्या वह तत्काल असुविधा की कीमत पर दीर्घकालिक शक्ति हासिल करना चाहती है?


कांग्रेस के ओल्ड गार्ड्स भी लंबे सत्ता-संघर्ष से थक चुके हैं। ऐसे माहौल में राहुल गांधी की “दो कदम पीछे, एक कदम आगे” वाली रणनीति कांग्रेस के लिए न सिर्फ व्यावहारिक है, बल्कि दीर्घकालिक रूप से फायदेमंद भी साबित हो सकती है। कभी-कभी नेतृत्व को तात्कालिक महत्वाकांक्षा छोड़कर रणनीतिक धैर्य अपनाना पड़ता है! यही कांग्रेस के लिए नए रास्ते खोल सकता है।




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