राहुल गांधी की चुनौती और विपक्षमुक्त रूसी मॉडल की प्रतिध्वनि!





राहुल गांधी की चुनौती और विपक्षमुक्त रूसी मॉडल की प्रतिध्वनि!



                     ले o- अरुण कुणाल


बिहार की हार के बाद तेजस्वी यादव से ज्यादा राहुल गांधी को निशाना बनाया जा रहा है। बीजेपी का पूरा इकोसिस्टम मोदी जी को दी गई 'अबतक सौ गाली' को भूल कर राहुल गांधी की ‘हार का शतक’ पूरा कराने में लगा हुआ है। क्या इतना भर काफी नहीं था कि देश के 272  हस्तियों ने एकजुट होकर पत्र लिख दें कि राहुल गांधी चुनाव आयोग को “झूठ-मूठ” बदनाम कर रहे हैं। इन 272 में 16 जज, 14 राजदूत, 123 रिटायर्ड ब्यूरोक्रैट्स और 133 पूर्व सैन्य अधिकारी शामिल हैं! लेकिन असली दिलचस्पी इन पदों में नहीं, बल्कि इस जादुई 272 संख्या में है, जो लोकसभा में ‘बहुमत’ का आंकड़ा है।


272 हस्तियों के साथ-साथ भारत के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, जिन्हें SIR और दस हजार रुपय की चुनावी रिश्वत पर सवाल उठाने चाहिए थे, वे सत्ता का टूलकिट बनकर उल्टा राहुल गांधी पर सवाल उठा रहे है, क्योंकि राजनीति में सबसे आसान काम है वास्तविक चुनौती देने वाले नेता को टार्गेट करना।


राहुल गांधी सिर्फ़ बीजेपी से नहीं लड़ रहे, वे संघ, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, ED–CBI और पूरी मीडिया मशीनरी से अकेले लड़ाई लड़ रहे हैं। कभी मीडिया विपक्ष की आवाज़ हुआ करती थी, आज मीडिया मोदी सत्ता से नहीं, बल्कि विपक्ष के नेता से सवाल करती है। यह स्थिति किसी भी पूर्व विपक्षी नेता के सामने नहीं आई थी।


यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि सरदार पटेल के बाद संघ को सबसे सीधी और सबसे कठोर चुनौती राहुल गांधी ने ही दी है। पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के पास अवसर था, पर उन्होंने संघ को उस प्रकार प्रत्यक्ष चुनौती नहीं दी, जैसी राहुल गांधी आज दे रहे हैं। अगर संघर्ष केवल बीजेपी तक सीमित होता, तो राहुल गांधी आज के अटल बिहारी वाजपेयी होते। आज हालात यह हैं कि हर संस्थान में ऊपर से नीचे तक संघ की वैचारिक पकड़ मजबूत हो चुकी है।

जहाँ तक भारत में विपक्षी नेताओं की स्थिति का सवाल है तो "इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा" के दौर में भी अटल बिहारी वाजपेयी की हालत आज के मुकाबले कहीं बेहतर थी। उनके सामने सत्ता का इतना असंतुलित दबाव नहीं था और न ही संवैधानिक संस्थाओं पर इतना केंद्रीकरण। आज विपक्ष को सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि पूरा तंत्र से एक साथ लड़ना पड़ रहा है।


          अलेक्सी नवलनी बनाम राहुल गांधी


बिहार चुनाव में सस्ता मोबाइल डाटा खूब चर्चा में रहा था, लेकिन दिन के डेढ़ जीबी डाटा खपाने वाले शायद रूस के विपक्षी नेता एलेक्सी नवलनी का नाम तक न सुने हों, जिसकी हत्या “फादर ऑफ़ डेमोक्रेसी” कहे जाने वाले रूस की जेल में हो गई थी। एलेक्सी नवलनी के जाने के बाद रूस पूरी तरह विपक्ष-मुक्त हो चुका है। अब वहाँ पुतिन की तानाशाही को चुनौती देने वाला एक भी नेता नहीं बचा है। नवलनी की लड़ाई इस बात का प्रमाण है कि तानाशाही से टकराना केवल राजनीतिक नहीं,कभी-कभी अस्तित्व का संघर्ष बन जाता है।


रूस में अलेक्सी नवलनी न सिर्फ विपक्ष की एकमात्र आवाज थे, वे सत्ता के लिए ‘अस्वीकार्य सच’ का प्रतीक बन गए थे। भारत में राहुल गांधी उस जगह खड़े हैं जहाँ सत्ता और विपक्ष की लड़ाई अभी राजनीतिक है, अस्तित्वगत नहीं। लेकिन अगर लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर होती गईं, तो भारत को भी रूस-जैसी ‘विपक्षमुक्त राजनीति’ की ओर धकेलने वाले संकेत नज़र आने लगेंगे।


राहुल गांधी जिस तरह अलेक्सी नवलनी की राह पर अकेले आगे बढ़ रहे हैं, वे सत्ता की आंखों में स्पष्ट तौर पर चुभने लगे हैं। जब बीजेपी मुख्यालय से बिहार विजय पर पीएम मोदी कांग्रेस को तोड़ने की अप्रत्यक्ष चेतावनी देते हैं, तो इसे मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी कैसे कहा जाए? शिवसेना और NCP के साथ क्या हुआ, देश की राजनीति ने साफ़-साफ़ देखा है। 


भारत का लोकतंत्र अभी ‘भ्रम’ नहीं तो ‘सीमित-स्पेस वाली हकीकत’ ज़रूर है। राहुल गांधी इसलिए आज़ाद हैं क्योंकि यह स्पेस अभी बचा हुआ है वरना रूस के विपक्षी नेता का हश्र हम देख ही चुके हैं। नवलनी रूस को जागृत कर न सके, पर क्या भारत अपनी लोकतांत्रिक नींद से जाग पाएगा या हम भी ‘विपक्षमुक्त भारत’ की ओर बढ़ रहे हैं?


असल समस्या तब शुरू होती है, जब मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी की जगह फादर ऑफ़ डेमोक्रेसी ले लेता है। फिर न तो 5 किलो मुफ्त राशन वालों की परवाह की जाती है, और न ही विपक्ष की आवाज सुनाई देती है! रूस इसका जीता-जागता उदाहरण है! जहाँ विपक्ष को सिर्फ हराया नहीं जाता, उसे मिटा दिया जाता है। रूसी नेता अलेक्सी नवलनी इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं।


 यह कहना गलत न होगा कि नवलनी अलेक्सी रूस में विपक्ष की आख़िरी आवाज़ थे जबकि राहुल गांधी भारत में विपक्ष की सबसे बड़ी और सबसे स्पष्ट आवाज़ हैं। राहुल गांधी आजाद हैं क्योंकि भारत में न्यायपालिका अभी भी एक हद तक स्वतंत्र है। रूस में विपक्ष खत्म हो चुका है। भारत में विपक्ष कमजोर है लेकिन अब भी जिंदा है, और उसकी धड़कन राहुल गांधी के रूप में सुनाई देती है! इसलिए भारत में 'लोकतंत्र का भ्रम’ बना रहे तो अच्छा है!


अब्राहम लिंकन और राहुल गांधी : पराजय से उपजी नेतृत्व की कहानी!


अब्राहम लिंकन को भी कभी ‘अभागा’ और ‘असफल’ कहा गया था। लेकिन 28 वर्षों की हारों के बाद वह अमेरिका के राष्ट्रपति बने।नेता वह नहीं जो हर चुनाव जीत ले, नेता वह है जो हार के बाद भी जनता का साथ न छोड़े।  अगर अब्राहम लिंकन को भी राहुल गांधी की तरह 'लेवल प्लेइंग फील्ड ' नहीं मिलता, तो शायद व्हाइट हाउस का रास्ता और भी लंबा और कठिन हो जाता। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस मामले में लिंकन, राहुल गांधी से ज्यादा भाग्यशाली थे।


राहुल गांधी की हार की असल वजह यह नहीं है कि वे कमजोर नेता हैं, बल्कि उनकी राजनीति करने की शैली धर्म आधारित राजनीति के अनुकूल नहीं है। आजकल राजनीति की गाड़ी ध्रुवीकरण और प्रोपेगेंडा पर चलता है! जबकि राहुल गांधी की राजनीति संवाद, सहानुभूति और लोकतांत्रिक शालीनता पर खड़ी है। अगर राहुल गांधी अमेरिका या यूरोप के किसी देश में होते, तो वे वहाँ शीर्ष स्तर के नेता होते है। क्योंकि वहाँ की राजनीति में तर्क, विचार और संस्थागत संतुलन की कद्र है, जिन पर राहुल गांधी की पूरी राजनीति आधारित है।


अब्राहम लिंकन से राहुल गांधी की तुलना करना आज कुछ लोगों को “राहुल गाथा” जैसा लग सकता है, लेकिन 15–20 साल बाद यही तुलना उन्हें बिल्कुल सटीक और वास्तविक प्रतीत होगी। अगर राहुल गांधी के सामने भी समान और निष्पक्ष ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ होता, तो मैं उनकी हारों की तुलना अब्राहम लिंकन से करने की ज़रूरत ही महसूस नहीं करता। लिंकन की चुनौतियाँ थीं, पर राहुल गांधी जिन परिस्थितियों में राजनीति कर रहे हैं, वह कहीं अधिक जटिल, दबावपूर्ण और असंतुलित हैं। 


              राहुल गांधी वर्सेज कांग्रेस के ओल्ड गार्ड्स


आंदोलन की मिट्टी से बनी कांग्रेस के ओल्ड गार्ड्स ही राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' के खिलाफ थे! आज कांग्रेस और विपक्ष में राहुल गांधी ही अकेले नेता हैं जो मोदी सरकार की आँख में आँख डालकर सवाल करने का साहस रखते हैं। यह बात संसद के भीतर भी दिखती है और बाहर भी, जहाँ कई विपक्षी दल और यहाँ तक कि कांग्रेस के नरमपंथी नेता शशि थरूर, राजीव शुक्ला और मनीष तिवारी खुलकर बोलने से कतराते दिखते हैं। सच यही है कि कांग्रेस आज भी कहीं न कहीं गरम दल और नरम दल में बँटी हुई दिखाई देती है। और अगर मोदी सत्ता का दबाव और बढ़ा, तो यह हैरानी की बात नहीं होगी कि नरमपंथी खेमे पर दबाव डालकर कांग्रेस में विभाजन तक की कोशिश की जाए।


आज भारत की राजनीति में एक ही नेता है जो बिना डरे आम जनता की बात करता है, जो हाशिए के सबसे आख़िरी व्यक्ति के साथ खड़ा रहता है। लोकतंत्र के समर्थकों को इस बात का फख्र होना चाहिए कि तमाम पराजयों के बावजूद राहुल गांधी ने जनसरोकार से जुड़े मुद्दों को नहीं छोड़ा, न भाषा बदली, न किरदार।


आज जो लोग राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं,क्या वे सच में राहुल के बिना एक मजबूत विपक्ष की कल्पना कर सकते हैं? INDIA गठबंधन के दूसरे दलों को छोड़ भी दें, क्या खुद कांग्रेस में शशि थरूर या कोई दूसरा नेता है जो खुलेआम सत्ता को चुनौती देने का साहस रखता हो? शशि थरूर जैसे नेताओं को कांग्रेस की पूर्व सहयोगी और ‘बंगाल टाइगर’ कही जाने वाली ममता बनर्जी तथा शरद पवार से सबक लेना चाहिए। शरद पवार की राष्ट्रीय सियासत लगभग मिटा दी गई है, जबकि ममता दीदी अब भी लड़ती दिखाई देती हैं लेकिन मोदी सत्ता ने उन्हें बंगाल की सीमाओं में कैद कर देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।


ममता बनर्जी का दिल्ली की राजनीति में बड़ा रोल निभाने का  सपना था, पर ED–CBI की तलवार ने उन्हें इस तरह घेरा कि अब वे पश्चिम बंगाल से बाहर झाँकने तक से परहेज़ करती दिखती हैं। बिहार में तेजस्वी यादव के साथ राहुल गांधी और अखिलेश यादव जिस तरह कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखाई दिए, वैसी एकजुटता ममता दीदी के आसपास कहीं नज़र नहीं आती। ममता बनर्जी को राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर, बीजेपी का ‘मिशन बंगाल’ एक बार फिर गति पकड़ता दिख रहा है।


आज कांग्रेस शासित सिर्फ तीन राज्यों के अलावा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और जम्मू-कश्मीर ही ऐसे प्रदेश बचे हैं, जहाँ बीजेपी या उसके सहयोगी दलों की सरकार नहीं है। अगर महाराष्ट्र, हरियाणा और बिहार की तर्ज पर इसी तरह सत्ता-परिवर्तन का “मैनेजमेंट मॉडल” चलता रहा, तो मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी को फादर ऑफ़ डेमोक्रेसी बनने में ज़रा भी देर नहीं लगेगी!




#RahulGandhi

#AbrahamLincoln 

#AlexeiNavalny #Putin #Russia 

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