संसद का शीतकाल : 15 दिन का सत्र, 50 दिन की जवाबदेही और महाभियोग की आहट!
संसद का शीतकाल :15 दिन का सत्र, 50 दिन की जवाबदेही और महाभियोग की आहट!
ले o- अरुण कुणाल
संसद का शीतकालीन सत्र सिर्फ़ 19 दिन का रखा गया है, जो अब तक का सबसे छोटा शीतकालीन सत्र माना जा रहा है! ऐसे में सवाल यह है कि क्या हमारा लोकतंत्र अब सिर्फ़ चुनावों के दम पर चलेगा? न प्रेस कॉन्फ़्रेंस, न संसद में जवाबदेही — लगता है 'गुजरात मॉडल' अब राष्ट्रीय मॉडल की तरह पूरी तरह लागू कर दिया गया है!
संसद का नया सत्र ऐसे वक्त में शुरू हुआ है, जब सुप्रीम कोर्ट में SIR पर बहस के बीच बिहार में चुनाव कराए जा चुके हैं और पश्चिम बंगाल समेत देश के 12 राज्यों में SIR की प्रक्रिया जारी है। इसी बीच वोट-चोरी और SIR के विरोध में कांग्रेस रामलीला मैदान में बड़ा धरना-प्रदर्शन करने की तैयारी में है। साफ है कि इस बार कांग्रेस संसद से लेकर सड़क तक लड़ाई लड़ने के मूड में दिखाई दे रही है।
संसद का शीतकालीन सत्र 19 दिसंबर तक चलेगा और इस दौरान सदन की केवल 15 बैठकें होंगी। इसी वजह से इसे सामान्य सत्रों की तुलना में काफी छोटा माना जा रहा है। विपक्ष सत्र को छोटा रखने के लिए मोदी सरकार पर निशाना साध रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार जानबूझकर संसद की लोकतांत्रिक परंपराओं को "पटरी से उतारना" चाहती है, ताकि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा न हो।
इस सत्र में सरकार ने लगभग 13–14 अहम विधेयकों को सूचीबद्ध किया है, जिनमें परमाणु ऊर्जा, उच्च शिक्षा, कॉर्पोरेट कानून और शेयर बाज़ार सुधार से जुड़े बिल शामिल हैं। सरकार और विपक्ष दोनों शांतिपूर्ण सत्र संचालन के लिए सहयोग की बात कर रहे हैं, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में आम सहमति बन पाना मुश्किल ही दिखता है।
शीतकालीन सत्र शुरू होते ही संसद का माहौल एक बार फिर राजनीतिक टकराव से गरम हो गया है। टकराव की सबसे बड़ी वजह SIR है, जबकि दिल्ली ब्लास्ट और प्रदूषण भी विपक्ष के प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं। सरकार पहले ही साफ कर चुकी है कि SIR पर चर्चा का “कोई सवाल ही नहीं” उठता, ऐसे में सत्र की शुरुआत से ही टकराव तय दिख रहा है।
SIR जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए विपक्ष तो पहले से ही सत्र शुरू होने का इंतज़ार कर रहा था, लेकिन गांधी परिवार के खिलाफ नेशनल हेराल्ड केस में दिल्ली पुलिस की एफआईआर ने विपक्ष को एक नया हथियार थमा दिया है। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने तो साफ कह दिया है कि SIR पर बहस नहीं हुई तो संसद चलने ही नहीं देंगे। इसके साथ ही दिल्ली ब्लास्ट और राजधानी की बिगड़ती प्रदूषण स्थिति भी विपक्षी दलों के हंगामे की फेहरिस्त में शामिल हैं।
विपक्ष SIR का मुद्दा उठाना चाहता है, और सरकार चोर दरवाज़े से महत्वपूर्ण बिल बिना बहस के पास कराने पर तुली है! ऐसा लगता है कि लोकतंत्र के नए मॉडल में सहमति और असहमति—दोनों के लिए ही अब कोई जगह नहीं बची है। बीएलओ की आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाओं ने SIR के मुद्दे को और भी गर्म कर दिया है। माहौल ऐसा है कि विपक्ष बिना SIR पर चर्चा कराए संसद को चलने देने के मूड में बिल्कुल नहीं दिख रहा है।
सूत्रों के अनुसार, विपक्ष शीतकालीन सत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाने की तैयारी भी कर रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाने की तैयारी विपक्ष मॉनसून सत्र के दौरान ही कर चुका था। 18 अगस्त को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर इंडिया ब्लॉक की बैठक भी इसी मुद्दे पर हुई थी, जहाँ विपक्षी दलों ने आगे की रणनीति पर चर्चा की थी।
बीजेपी नेता अरुण जेटली ने कहा था—“संसद चलाना सरकार का काम है, विपक्ष का नहीं... ऐसे मौके आते हैं जब संसद में बाधा डालने से देश को ज़्यादा फ़ायदा होता है। हमारी रणनीति हमें सरकार को बिना जवाबदेह ठहराए संसद का इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं देती।” आज जेटली साहब का यही बयान उनकी अपनी पार्टी के सामने यक्षप्रश्न बनकर खड़ा है!
संसद सत्र शुरू होने से ठीक पहले दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ नई FIR दर्ज की है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि ED की चार्जशीट दायर, संज्ञान लंबित, और ठीक उसी दौरान दिल्ली पुलिस की EOW की अचानक नई FIR क्यों?
क्या नेशनल हेराल्ड केस के जरिये राहुल गांधी को बैकफुट पर धकेलने की कोशिश हो रही है? लेकिन राहुल गांधी स्वभाव से फ्रंटफुट के खिलाड़ी हैं। ऐसे में ED और EOW की “फील्डिंग” लगाकर उन्हें पीछे धकेलने की रणनीति कितनी कारगर होगी—यह शीतकालीन सत्र के दौरान ही साफ़ हो जाएगा।
ऐसे में सवाल उठता है कि लोकतंत्र क्या केवल चुनाव से चलेगा? न प्रेस कांफ्रेंस, न संसद में जवाबदेही - क्या देश में गुजरात मॉडल पुरी तरह से लागू हो गया है! अंत में जैसा कि पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा -"मौसम का मजा लीजिए", उसके जवाब में तो यही कहा जा सकता है कि लोकतंत्र के भ्रम का मजा लीजिए...!
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