संचार साथी ऐप : नाम में ‘साथी’, काम में निगरानी!




संचार साथी ऐप : नाम में ‘साथी’, काम में चौकीदारी!


        ले o- अरुण कुणाल


दिल्ली तो कब से मुंह से सांस लेने की अभ्यस्त हो चुकी है! अब पूरे देश को भी मुंह से ही सांस लेने पर मजबूर करने के लिए सरकार ‘संचार साथी ऐप’ लेकर आ रही है! इस ऐप के नाम में ‘साथी’ है पर काम निगरानी का है! सरकार की नज़र में आपका फोन, आपका ऐप, आपकी चैट, आपकी लोकेशन सब ‘राष्ट्रीय संसाधन’ हैं। पहले निगरानी की कहानी फुसफुसाहट में चलती थी,अब उसे कानून की मोहर के साथ खुलकर वैधता प्रदान कर दी गई है।


केंद्र सरकार ने स्मार्टफोन कंपनियों को आदेश दिया है कि वे अपने सभी नए स्मार्टफोन्स में सरकारी साइबर सेफ्टी ऐप को पहले से इंस्टॉल करके बेचें। इस आदेश में एपल, सैमसंग, वीवो, ओप्पो और शाओमी जैसी कंपनियों को 90 दिन की समय-सीमा दी गई है।पुराने फोनों में यह ऐप सॉफ्टवेयर अपडेट (OTA) के माध्यम से जबरन इंस्टॉल किया जाएगा। 


दिलचस्प बात यह है कि यह आदेश अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, इसे चुनिंदा मोबाइल कंपनियों को निजी तौर पर भेजा गया है। इसके बावजूद मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के साथ -साथ लगभग सभी स्मार्टफोन निर्माता कंपनियाँ भी सरकार के संचार साथी ऐप को जबरन प्री-इंस्टॉल करने के फैसले से नाराज़ हैं। इन कंपनियों का कहना है कि ऐसा आदेश उनकी ग्लोबल पॉलिसी के खिलाफ है।


कभी पेगसस का मुद्दा खूब उठा था! विपक्ष के नेता, जज, पत्रकार और अफ़्सरशाही तक की जासूसी के आरोप लगे थे। इजरायली पेगसस से जासूसी महंगी पड़ रही थी, इसलिए आम जनता को उस समय ‘कृपा’ कर उससे अलग रखा गया था। लेकिन श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश के जन विरोध के बाद सरकार सर्विलांस स्टेट का रास्ता अपनाने का मन बना चुकी है! 


भारत से पहले रूस ने भी यही किया था! सभी मोबाइल फोन में MAX नाम का एक सरकारी मैसेजिंग/मैनेजमेंट ऐप अनिवार्य कर दिया गया। रूस में पुतिन की सत्ता निरंकुश है, वहाँ विरोध की आवाज़ें वैसे भी कब की दब चुकी हैं। रूसी विपक्ष के नेता एलेक्सी नवलनी की संदिग्ध मौत के बाद तो जनता ने लगभग सामूहिक मौन-व्रत ही धारण कर लिया है। लेकिन भारत में अभी भी कुछ लोग निजता के अधिकार को लेकर आवाज़ उठा रहे हैं! क्योंकि यहाँ सवाल सिर्फ हवा में ज़हर का नहीं है, डेटा की हवा में भी कुछ गड़बड़ होने लगी है।


मोदी सरकार का ‘डेटा राज’ आज नहीं शुरू हुआ बल्कि पर्दे के पीछे खेला तो सितंबर 2019 में ही सेट हो गया था। उसी समय अमित शाह ने NATGRID की समीक्षा की थी। NATGRID यानी भारत का वह महाबलशाली डेटाबेस, जहाँ आपका सोशल मीडिया, आपकी यात्राएँ, आपका लोकेशन इतिहास,आपकी खरीदारी,और यहाँ तक कि आप किससे, कब, कितनी देर बात करते हैं ,सब कुछ एक ही स्क्रीन पर मौजूद रहता है।


पहले यह निगरानी साइलेंट मोड में पीछे से चलती थी! अब सरकार उसी प्लेबुक को लाउडस्पीकर पर बजाकर सामने आ रही है। संचार साथी ऐप उसी लंबे अध्याय का नया पन्ना है! बस फ़र्क इतना है कि अब जासूसी ‘अनुमान’ नहीं, फीचर कहलाएगी।


सिर्फ संचार साथी या NATGRID ही नहीं, दो हफ्ते पहले मोदी सरकार ने DPDP एक्ट में भी संशोधन कर दिया। इस संशोधन के नियम 23 के तहत अब राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार किसी भी सेवा प्रदाता से आपका पूरा डेटा मांग सकती है—बिना आपकी जानकारी, बिना आपकी सहमति और बिना किसी पारदर्शी ऑडिट के। यानी अब डेटा सिर्फ़ “आपका” नहीं रहा!


आरोग्य सेतु ऐप तो आपका डेटा कब का निचोड़कर प्राइवेट कंपनियों की थाली में परोस चुका है। अब इस डिजिटल युग में आपकी जेब में रखा फोन भी आपका नहीं, डेटा तो छोड़िए,आपका कुछ भी आपका नहीं रहा। और खबर ये है कि आपकी आज़ादी के सिर्फ 120 दिन बचे हैं। उसके बाद यह नया ऐप अनिवार्य कर दिया जाएगा, जैसे स्वतंत्र नागरिक नहीं, सरकारी सब्सक्रिप्शन वाला ‘डेटा-प्रोडक्ट’ बना दिया जाए।



हालांकि किसान बिल और नोटबंदी की तरह ही इस ऐप को भी जनता के “भले” के लिए बताया जा रहा है। डिपार्टमेंट ऑफ़ टेलीकम्युनिकेशन ने इसके इंस्टॉल करने को लेकर नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है। अगले कुछ दिनों में सभी मोबाइल कंपनियों को मजबूरन यह ऐप यूज़र्स के फोन में इंस्टॉल करना होगा। कंपनियों को इसे जनता तक पहुँचाने के लिए 120 दिन का समय दिया गया है। आप चाहें तो इसे अभी भी डाउनलोड कर सकते हैं लेकिन आने वाले समय में चाहें या न चाहें, हर नए फोन में यह ऐप प्री-इंस्टॉल्ड मिलेगा।


सरकार का दावा है कि इस ऐप की मदद से आप फ्रॉड रिपोर्ट कर सकेंगे, अपना खोया फोन ब्लॉक/अनब्लॉक कर सकेंगे और डिजिटल दुनिया में खुद को “सुरक्षित” रख सकेंगे। सुरक्षा का मतलब क्या है, यह अलग बहस है।


इतना ही नहीं—सरकार ने संचार साथी ऐप को फोन में प्री-इंस्टॉल करने के साथ-साथ WhatsApp और Telegram जैसे मैसेजिंग ऐप्स के लिए SIM Binding लागू करने का आदेश भी दे दिया है। यह नियम फरवरी 2026 से लागू होगा। इसका मतलब साफ़ है:अब आप बिना उस सिम कार्ड को फोन में रखे, जिससे आपका WhatsApp/Telegram अकाउंट बना है, इन मैसेजिंग ऐप्स को चला ही नहीं पाएंगे। यानी सिम निकाली, ऐप बंद। मोबाईल आपका पर आपकी मैसेजिंग ऐप्स सरकारी नियमों की बैटरी पर चलेंगी।


सभी मोबाइल फोनों में साइबर सिक्योरिटी ऐप ‘संचार साथी’ को प्री-इंस्टॉल करने के दूरसंचार विभाग के आदेश पर विवाद बढ़ने के बाद केंद्र सरकार को सफाई देनी पड़ रही है। केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बयान जारी कर कहा कि यह ऐप कंपलसरी नहीं है और यूज़र चाहें तो इसे डिलीट भी कर सकते हैं।


सरकार चाहे जो सफाई दें पर यह व्यवस्था तकनीक के नाम पर डेटा नियंत्रण की अगली परत है, जहाँ आपकी चैट भी आपके हाथ में नहीं, सीधे उस सिम के अधीन कर दी जाएगी जिसे सरकार “ट्रेस” कर सकती है। अगर इसे फिल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' की स्टाइल में कहें, तो अमरीश पुरी शायद आज यही बोलते—“जा सिमरन, जी ले अपनी ज़िंदगी…क्योंकि 120 दिन बाद तो ऐप तेरा पीछा नहीं छोड़ेगा!”









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