लोकतंत्र बबुआ धीरे-धीरे जाई …!
लोकतंत्र बबुआ धीरे-धीरे जाई …!
लेo - अरुण कुणाल
संसद में इलेक्ट्रोरल रिफ़ॉर्म पर विपक्ष सवाल उठाता रहा और सत्ता पक्ष चुनाव आयोग का प्रवक्ता बनकर वही पुरानी लाइन दोहराता रहा—“चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चांदनी चौक में चांदी की चम्मच से चटनी चटाई”। सत्ता पक्ष की तरफ से टंग-ट्विस्टर की इतनी एक्सरसाइज़ के बाद भी टंग तो फिसली और टंग इतनी फिसली की मुंह से गाली तक निकल गया! इन सब के बावजूद ‘कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?’ इसका रहस्य किसी को नहीं पता चला! शायद उसके लिए संसद के अगले सत्र का इंतजार करना पड़ेगा।
अगर SIR पर बहस की मांग को बदलकर चुनाव-सुधार के नाम पर ड्रामा ही करना था, तो फिर पिछला पूरा सत्र बर्बाद क्यों किया गया?
क्या सिर्फ़ इसलिए कि इस सत्र में 'वंदे मातरम्' पर बहस हो सके?
या फिर इतने साल बाद पहली बार मोदी सत्ता विपक्ष के सामने झुकी—या यूँ कहें, घुटने टेकने का नाटक किया? क्योंकि वेस्ट बंगाल में चुनाव है?
संसद के शीतकालीन सत्र में 'वन्दे मातरम्' पर बहस की शुरुआत कर पीएम नरेंद्र मोदी गायब हो गए! न मोदी के भाषण में राहुल गांधी दिखे और न राहुल के भाषण में मोदी दिखाई दिए! ऊपर से अमित शाह के भाषण के बीच विपक्ष सदन से वाकआउट कर गया! लगता है संसद नहीं, इंटायर पॉलिटिकल साइंस की क्लास चल रही है, जहाँ सबके सब अपने-अपने टाइमटेबल के हिसाब से अटेंडेंस लगा रहे हैं!
संसद के भीतर SIR पर बहस चलती रही और बाहर BLO ज़िंदगी से हारते रहे! 40 BLO की आत्महत्या के बाद चुनाव आयोग ने अब जाकर 6 राज्यों में SIR की डेडलाइन बढ़ाई—अब क्या फ़ायदा? समय रहते बढ़ा देते तो शायद कुछ ज़िंदगियाँ बच जातीं!
ऐसे में सवाल उठता है कि लोकतंत्र भ्रम के सहारे आखिर कब तक चलेगा? न जनता के प्रति जवाबदेही, न प्रेस कॉन्फ़्रेंस का साहस और न ही लोकतंत्र के मंदिर संसद के प्रति कोई आदर! सदन में जब विपक्ष के नेता बोलें तो कैमरा हटा देना, माइक बंद कर देना और बार-बार टोका टोकी करना, आखिर ये पर्दे के पीछे से चल रहा ‘कठपुतली का खेल’ कब तक चलेगा? लोकतंत्र अगर ऐसा ही रहना था, तो फिर लोकतंत्र का नाटक ही क्यों करना, सीधे कठपुतली संचालक ही चुन लें!
जो लोग कल तक राहुल गांधी की वोट-चोरी पर की गई 3 प्रेस कॉन्फ़्रेंस और बिहार वोटर्स अधिकार यात्रा पर तंज कस रहे थे—“इससे क्या मिल गया?” “क्या हासिल हुआ?” आज वही लोग उसकी गूंज की गूंज संसद में सुन रहे हैं! वोट-चोरी के खिलाफ उठी आवाज़ अब सिर्फ़ राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रही, वह संसद के फर्श तक पहुँच गई है। यही विपक्ष की असली जीत है। अब जब संसद में खुली बहस हो चुकी है, तो कोई ये बहाना नहीं मार पाएगा कि “संवैधानिक संस्था पर सवाल क्यों उठा रहे हो?” चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर सवाल उठ चुका है और संसद के रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है।
एक ओर जहां संसद का शीतकालीन सत्र तो सांसदों की टंग-ट्विस्टर एक्सरसाइज बनकर रह गया! टेक्सपेयर का करोड़ों रुपया सिर्फ़ इस तरह की एक्सरसाइज पर बर्बाद करने की आखिर क्या ज़रूरत है? शायद उसका जवाब भी पंडित नेहरू को देना पड़ेगा! वहीं दूसरी तरफ BJP समर्थक भी कन्फ्यूज़ हैं कि 'जय श्री राम' बोलें या 'वन्दे मातरम्'? अब देखना है कि 'वन्दे मातरम्' का नारा सिर्फ़ बंगाल चुनाव तक गूंजेगा या यूपी चुनाव आते ही पार्टी फिर अपने पुराने नारे पर घर वापसी कर लेगी!
2024 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या में हार और नरेंद्र मोदी की वाराणसी सीट फँस जाने के बाद बहुत कुछ बदल गया है। अब न चुनाव में लेवल प्लेइंग फील्ड बचा है और न ही संसद में! अब साफ़ दिख रहा है कि जहाँ सत्ता को ख़तरा महसूस होता है, वहीं विपक्ष के लिए गोलपोस्ट बदल दिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को पारदर्शी बनाने के लिए साफ़ आदेश दिया था—CJI, प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता वाली कमेटी ही चुनाव आयुक्त चुनेगी। लेकिन सरकार ने फौरन क़ानून बदलकर इस प्रक्रिया से चीफ जस्टिस की भूमिका ही खत्म कर दी। यानी पारदर्शिता के नाम पर आदेश आया था, और नतीजे में पारदर्शिता का आईना ही हटा दिया गया!
इतना ही नहीं—क़ानून में ऐसा बदलाव किया गया कि चुनाव आयुक्त को किसी भी क्रिमिनल या सिविल एक्शन से पूरी तरह इम्यूनिटी दे दी गई। अब चाहे वह कितना भी पक्षपात कर लें, ना उन पर उंगली उठ सकती है, ना ही कोई कानूनी कार्रवाई हो सकती है।यानी लोकतंत्र की रीढ़ कहे जाने वाले संस्थान पर ऐसा सुरक्षा कवच चढ़ा दिया गया है कि ज़िम्मेदारी खत्म और अधिकार अनलिमिटेड।
चुनाव आयोग कहता है—“हम न पक्ष में हैं, न विपक्ष में… हम तो निष्पक्ष हैं!” अब वह कितना निष्पक्ष है, उसका नमूना 2024 के चुनाव में साफ़ दिख गया। कैश में मिले सिर्फ़ 14 लाख रुपये के चंदे पर आयकर विभाग ने कांग्रेस पर 210 करोड़ रुपये की पेनल्टी ठोक दी! विडंबना देखिए कि कांग्रेस के खाते में कुल 135 करोड़ ही थे। यानी जुर्माना पैसों से बड़ा, और पार्टी का बैंक बैलेंस सरकार की नाराज़गी से छोटा! ऊपर से, आयकर विभाग ने कांग्रेस और यूथ कांग्रेस के चार बैंक अकाउंट फ्रीज़ कर पैसे निकाल लिए थे।
कांग्रेस पार्टी न्यायालय और चुनाव आयोग से गुहार लगाती रही पर चुनाव की तारीख तय होने तक कोई सुनवाई नहीं हुईं! जिस लोकतंत्र में 14 लाख का कैश “क्राइम” है और सत्ता पक्ष के खाते में 10,000 करोड़ का चुनावी फंड “नियमों के भीतर”, वहाँ लेवल प्लेइंग फील्ड पर चर्चा करना भी अपने-आप में एक राजनीतिक व्यंग्य बन जाता है।
डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था—“जब सड़क सूनी हो जाती है, तो संसद आवारा हो जाती है।”और आज की राजनीति को देखकर यह बात बिल्कुल सटीक बैठती है। संसद में बराबरी की लड़ाई कुचली जाए, बहस की दिशा बदल दी जाएँ और संस्थाएँ सवालों से बचने लगें तो फिर विपक्ष के सामने रास्ता साफ़ दिखता है?
14 दिसंबर को राहुल गांधी का रामलीला मैदान में ‘वोट चोरी’ के खिलाफ आंदोलन यही संकेत देता है कि जब संसद बहरी हो जाए, तो लोकतंत्र की लड़ाई सड़क पर ही लड़ी जाती है। अब विपक्ष के लिए सचमुच सड़कों पर लोकतंत्र ही बचा है! सड़क भी कबतक...? जबतक लोकतंत्र का भ्रम है तभी तक सड़क है! उसके बाद जेल से आंदोलन करना पड़ेगा!
अंत में, गोरख पाण्डेय की कविता “समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई” की तर्ज पर बस इतना ही कहना है —
लोकतंत्र बबुआ धीरे-धीरे जाई …
चुनाव से जाई,
संसद से जाई,
संस्थाओं से जाई,
संविधान से जाई
देश से जाई
लोकतंत्र बबुआ धीरे-धीरे जाई …🤭
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