नितिन नबीन की ताजपोसी: क्या नीतीश कुमार के सामने खींच दी गई है राजनीतिक लक्ष्मण रेखा?

 



नितिन नबीन की ताजपोसी: क्या नीतीश कुमार के सामने खींच दी गई है राजनीतिक लक्ष्मण रेखा?


                     ले o- अरुण कुणाल



जब दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस की ‘वोट-चोरी’ के ख़िलाफ़ आयोजित महा-रैली को राहुल गांधी संबोधित कर रहे थे, ठीक उसी समय 'नितिन नबीन कार्ड' खेल कर भाजपा ने मीडिया की हेडलाइन अपने पक्ष में मोड़ ली। सुबह तक न्यूज़रूम में सुपर एडिटर हिरेन जोशी की कमी खलती दिखी, लेकिन शाम होते-होते हेडलाइन और नैरेटिव दोनों व्यवस्थित हो चुके थे।


भारतीय जनता पार्टी में नितिन नबीन की कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में ताजपोसी को महज़ एक संगठनात्मक बदलाव समझना राजनीतिक भूल होगी। यह नियुक्ति दरअसल बिहार से लेकर दिल्ली तक सत्ता-संतुलन को नए सिरे से परिभाषित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। मोदी–शाह की जोड़ी ने जेपी नड्डा की जगह नितिन नबीन को आगे बढ़ाकर एक साथ कई राजनीतिक समीकरण साधने का प्रयास किया है।


सबसे पहला और स्पष्ट संदेश यही है कि अब निर्णयों का केंद्र ‘मगध’ नहीं, बल्कि ‘इंद्रप्रस्थ’ होगा। नीतीश कुमार पहले ही गृहमंत्रालय और विधानसभा अध्यक्ष जैसे अहम पदों से वंचित किए जा चुके हैं। अब दिल्ली में एक प्रभावशाली कायस्थ चेहरे को स्थापित कर उनके कद के सामने एक लंबी राजनीतिक रेखा खींच दी गई है, जिसका अर्थ है सीमाएँ तय करना।


यह संयोग नहीं है कि यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब बीजेपी अयोध्या हार चुकी है और उत्तर प्रदेश में आगामी चुनाव से पहले उसे नए सियासी संतुलन की ज़रूरत है। मगध, यानी बिहार, अब बीजेपी की रणनीति का केंद्र बनता दिख रहा है। वर्षों से संजोया गया ‘मगध फतह’ का सपना अब निर्णायक मोड़ पर है।


नितिन नबीन की पृष्ठभूमि इस रणनीति को और स्पष्ट करती है। एबीवीपी से राजनीतिक पारी शुरू करने वाले नबीन, युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री रह चुके हैं। संगठनात्मक राजनीति की उन्हें गहरी समझ है और संघ से उनका रिश्ता किसी से छिपा नहीं। ऐसे में उन्हें ‘संघ नंदन’ कहा जाना अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक यथार्थ का बयान है। उनकी ताजपोसी के साथ ही पार्टी अध्यक्ष पद को लेकर संघ और शीर्ष नेतृत्व के बीच मौजूद मतभेदों को भी कुछ समय के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।


इस नियुक्ति का एक अहम सामाजिक पहलू भी है। कायस्थ समुदाय लंबे समय से बीजेपी का कोर वोटबैंक रहा है। नितिन नबीन को शीर्ष संगठनात्मक जिम्मेदारी देकर बीजेपी ने अपने परंपरागत वोटर को यह संदेश दिया है कि सत्ता-संरचना में उनका प्रतिनिधित्व सुरक्षित है। यह दांव सिर्फ़ बिहार तक सीमित नहीं है बल्कि पश्चिम बंगाल में भी कायस्थ वोटों को साधने की रणनीति साफ़ झलकती है।


बिहार की राजनीति में इसका सीधा असर नीतीश कुमार पर पड़ता है। जिस तरह से उनके अधिकार क्षेत्र को धीरे-धीरे सीमित किया गया है, उससे यह संकेत मिलता है कि उन्हें सहयोगी से अधिक ‘मैनेज्ड एलाय’ की भूमिका में धकेला जा रहा है। जो काम पिछले विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान नहीं कर पाए थे, वह इस बार औवैसी और प्रशांत किशोर ने कर दिखाया, विपक्षी वोटों के बिखराव ने नीतीश कुमार की 'पलटी मार रणनीति' को पहले कमजोर कर दिया है। अब संगठनात्मक स्तर पर नितिन नबीन को आगे लाकर उनके संभावित ‘शिंदेकरण’ की पटकथा तैयार होती दिख रही है।


राष्ट्रीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह चाल सिर्फ़ बिहार तक सीमित नहीं है। चंद्रबाबू नायडू भी एनडीए में पूरी तरह संतुष्ट नज़र नहीं आते। विशेष पैकेज के वादे पूरे न होने से उनका असंतोष बढ़ रहा है और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ किसी से कम नहीं। ऐसे में सत्ता-संतुलन बनाए रखने के लिए बीजेपी नेतृत्व को किसी एक सहयोगी को उदाहरण बनाना पड़ सकता है और इस समय नीतीश कुमार सबसे आसान लक्ष्य प्रतीत होते हैं।


नितिन नबीन की ताजपोसी इस बात का संकेत है कि बीजेपी अब सहयोगी दलों के साथ ‘समानता’ नहीं, बल्कि ‘शर्तों’ पर राजनीति करना चाहती है। यह नई राजनीतिक रेखा है, जिसे पार करने की अनुमति शायद किसी को नहीं होगी। सवाल सिर्फ़ इतना है कि नीतीश कुमार इस रेखा को स्वीकार करेंगे या इसके खिलाफ़ कोई नई चाल चलेंगे? बिहार की राजनीति आने वाले महीनों में इसी सवाल का जवाब देगी।




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