राहुल–अडानी की गुप्त मीटिंग: संयोग, संकेत या सियासी बदलाव की नई पटकथा?
राहुल–अडानी की गुप्त मीटिंग: संयोग, संकेत या सियासी बदलाव की नई पटकथा?
ले o - अरुण कुणाल
आजकल ‘हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाबी खो जाए’ की तर्ज़ पर राहुल गांधी और गौतम अडानी की मुलाक़ात की पटकथा किसने लिखी—इस पर ज़्यादा चर्चा है। सियासी गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या इस कहानी के असली निर्देशक शरद पवार हैं, जिनकी रणनीति 'एपस्टीन फाइल्स' से भी ज़्यादा रहस्यमय मानी जा रही है। बात इतनी सी होती तो और बात थी, 'राहुल -अडानी मीट' और एपस्टीन फ़ाइल्स की डेडलाइन के बीच NDA ने अपने सभी सांसदों के लिए व्हिप जारी कर दिया है। सवाल यही है कि चर्चा किस पर और चुप्पी किस पर होगी ?
शरद पवार के जन्मदिन पर आयोजित एक डिनर पार्टी इन दिनों राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में है। वजह न तो पार्टी का मेन्यू है और न ही मेहमानों की संख्या, बल्कि एक ही कमरे में मौजूद दो ऐसे नाम हैं जिनके बीच पिछले एक दशक से टकराव की राजनीति चलती रही है—राहुल गांधी और गौतम अडानी!
हालांकि दोनों की मुलाक़ात की कोई तस्वीर सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन राजनीति में कई बार तस्वीरों से ज़्यादा अहम मौजूदगी और समय होता है। यही कारण है कि सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक इस घटनाक्रम को लेकर शायरी कर रहा है - बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब', कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है !
यह डिनर पार्टी शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले द्वारा आयोजित की गई थी। इसमें सत्ता और विपक्ष के बड़े नेताओं के साथ देश के प्रमुख उद्योगपति भी शामिल थे। राहुल गांधी इस कार्यक्रम में अपनी बहन प्रियंका गांधी के साथ पहुंचे थे। ऐसे आयोजन में यह मानना कठिन है कि राहुल गांधी को गौतम अडानी की मौजूदगी की जानकारी न रही हो। इसलिए इस आमने-सामने को महज़ संयोग कहना राजनीतिक भोलेपन से अधिक कुछ नहीं होगा।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब 19 दिसंबर को जेफरी एपस्टीन केस से जुड़ी फाइलों के सार्वजनिक होने की चर्चा ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा रखी है। एपस्टीन पर नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क चलाने के गंभीर आरोप रहे हैं। उसके नेटवर्क में दुनिया भर के प्रभावशाली लोगों के नाम आने की आशंका जताई जाती रही है। ऐसे में भारत भी इस चर्चा से अछूता नहीं है। दिल्ली की सर्दी में जब सियासी माहौल पहले से ही गर्म है, तब राहुल गांधी और गौतम अडानी की यह मौजूदगी कई नए सवाल खड़े करती है।
गौर करने वाली बात यह है कि 2019 में भी गौतम अडानी ने राहुल गांधी से मिलने का प्रयास किया था, लेकिन तब यह कोशिश सफल नहीं हो सकी थी। इसके उलट, राहुल गांधी का अब तक का राजनीतिक रिकॉर्ड बताता है कि उन्होंने बड़े उद्योगपतियों से सार्वजनिक दूरी बनाए रखी है। यहां तक कि मुकेश अंबानी के बेटे की शादी का निमंत्रण भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया। ऐसे में अडानी के साथ एक ही कमरे में होना अपने आप में एक असामान्य राजनीतिक क्षण है।
राजनीतिक विश्लेषक इस घटनाक्रम को कई कोणों से देख रहे हैं। कुछ इसे एपस्टीन फाइल्स के बाद संभावित वैश्विक और घरेलू राजनीतिक बदलाव से जोड़कर देख रहे हैं, तो कुछ लोग इसे एनडीए के भीतर नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसे सहयोगियों की अनिश्चितता से उपजे नए समीकरणों से जोड़ रहे हैं। एक धारणा यह भी है कि 2027 तक देश की राजनीति में बड़ा बदलाव लगभग तय है, चाहे वह भाजपा के भीतर से आए या विपक्ष की व्यापक एकजुटता के ज़रिये।
बीजेपी और संघ के बीच चल रही अंतर्विरोधी राजनीति के बीच सत्ता परिवर्तन को लंबे समय तक टाल पाना आसान नहीं दिखता। ऐसे में अगर गौतम अडानी अपने कारोबारी भविष्य को लेकर नए राजनीतिक संतुलन की तलाश में हैं, तो यह स्वाभाविक माना जा सकता है। मुकेश अंबानी की तरह सत्ता-संतुलन साधने की कला अडानी अब सीखते नज़र आ रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अंबानी ने यह संतुलन शुरुआत से बनाए रखा, जबकि अडानी ने पिछले एक दशक में विकास की रफ्तार में शायद इसे नज़रअंदाज़ कर दिया।
2014 में नरेंद्र मोदी का अदानी के निजी जेट से गुजरात से दिल्ली आना, यह मित्रता का एक खुला प्रदर्शन था जो सत्ता में उनके एक साथ उदय का प्रतीक था। जब बीजेपी के गोवा बैठक के बाद लगभग तय हो चुका था कि मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे, गौतम अडानी अपनी बढ़ती प्रभाव और महत्व को भांपते हुए, उस समय अपनी जीवनी प्रकाशित करवाने के लिए कई नामी लेखकों से संपर्क किया था! लेकिन आज अपनी जिजीविषा के लिए उन्हें राहुल गांधी की जरूरत पड़ रही है!
राहुल गांधी पिछले कई वर्षों से अडानी समूह पर लगातार हमलावर रहे हैं। संसद से लेकर सड़कों तक उन्होंने अडानी को “क्रोनी कैपिटलिज़्म” का प्रतीक बताया। लेकिन दिलचस्प तथ्य यह है कि कांग्रेस के पुराने नेताओं में से बहुत कम लोग इस आक्रामक रुख के साथ खड़े दिखाई दिए। हाल के दिनों में कांग्रेस का रुख अडानी को लेकर कुछ नरम होता दिख रहा है। शरद पवार की इस डिनर पार्टी में कांग्रेस शासित तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की मौजूदगी और राज्य में अडानी का निवेश इस बदलाव की ओर इशारा करता है।हालांकि तेलंगाना में यंग इंडिया स्किल्स यूनिवर्सिटी के लिए अडानी ग्रुप की 100 करोड़ रुपये की पेशकश पर कांग्रेस सरकार को सफाई देनी पड़ी थी और अंततः इसे ठुकरा दिया गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर अब भी असहजता बनी हुई है।
राहुल गांधी की राजनीति पिछले एक दशक में 'लेफ्ट राइट सेंटर' से आगे बढ़कर एक सख्त वामपंथी नेता की छवि में बदल गई है। जहां कुछ वामपंथी नेताओं में व्यवहारिक लचीलापन दिखता है, वहीं राहुल गांधी “न झुकने” की राजनीति करते नज़र आते हैं। इसका असर कांग्रेस की फंडिंग और राज्यों में निवेश से जुड़े फैसलों पर भी पड़ा है। कई कांग्रेस शासित राज्यों में अडानी परियोजनाएं सरकारों के लिए “साँप-छछूंदर” जैसी स्थिति पैदा कर रही हैं।
इस पूरी कहानी में शरद पवार की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। अडानी के साथ उनके रिश्ते कभी छिपे नहीं रहे। हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद जब कांग्रेस जेपीसी की मांग कर रही थी, तब शरद पवार का यह कहना कि अडानी मामले में जेपीसी की ज़रूरत नहीं है, उनके व्यवहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। राजनीति और उद्योग के बीच संतुलन साधने की उनकी क्षमता सर्वविदित है। शायद यही कारण है कि अगर राहुल गांधी और गौतम अडानी के बीच की खाई को पाटने की कोशिश कोई कर सकता है, तो वह शरद पवार ही हैं।
गौतम अडानी भी अब अपने राजनीतिक रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करते दिख रहे हैं। राजीव गांधी, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह के दौर का उल्लेख कर वे यह संकेत दे रहे हैं कि उनका कारोबारी सफर किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रहा। गौतम अडानी ने नरेंद्र मोदी के साथ रिश्ते पर अपना बचाव करते हुए एक मीडिया इंटरव्यू में कहा था - " प्रधानमंत्री मोदी और मैं एक ही राज्य से हैं। इसी वजह से मैं इस तरह के निराधार आरोपों का आसान निशाना बन जाता हूं. कई लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह सब राजीव गांधी के कार्यकाल में शुरू हुआ, जब उन्होंने पहली बार निर्यात-आयात नीति को उदार बनाया! राजीव गांधी के बिना एक उद्यमी के रूप में मेरी यात्रा कभी शुरू नहीं हो पाती! "
आज गौतम अडानी विकास की जिस ऊचाई पर है, वहां पे बने रहना उनके लिए एक चुनौती है! जब से डोनाल्ड ट्रम्प सत्ता में आए है, नरेंद्र मोदी के साथ-साथ अडानी के लिए भी सबकुछ बदल गया है! अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में बढ़ते विरोध और वैश्विक सत्ता समीकरणों में बदलाव के बीच अडानी के लिए नए राजनीतिक मित्र खोजना मजबूरी भी हो सकती है।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी इस बदले हुए अडानी को स्वीकार करेंगे, या यह मुलाक़ात इतिहास में दर्ज एक औपचारिक संयोग बनकर रह जाएगी? जो व्यक्ति मुकेश अंबानी के बेटे की शादी के प्रस्ताव को ठुकरा देता है, वह अगर अडानी से मिलने को तैयार हो जाता है तो कुछ तो खास बात होगी! राजनीति में अक्सर जवाब तुरंत नहीं मिलते, लेकिन संकेत बहुत कुछ कह जाते हैं।

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