अब रेगिस्तान दूर नहीं : 'एक पेड़ माँ के नाम’ और अरावली का मौन विनाश!
*100 मीटर नहीं, 100 पीढ़ियों का सवाल है अरावली*
ले o - अरुण कुणाल
देश में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जब भी सरकार की मंशा पर सवाल उठते हैं, तब ‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसे भावनात्मक नारे सामने रख दिए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या पर्यावरण केवल प्रतीकों और अभियानों से बचाया जा सकता है? यदि ऐसा होता, तो आज भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला अरावली अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई नहीं लड़ रही होती।
अरावली पर्वतमाला लगभग 692 किलोमीटर तक गुजरात के पालनपुर से लेकर दिल्ली-एनसीआर तक फैली हुई है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार यह पर्वत श्रृंखला लगभग तीन अरब वर्ष पुरानी है और विश्व की सबसे प्राचीन वलित पर्वतमालाओं में गिनी जाती है। इसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान से होकर गुजरता है, जहाँ यह न केवल भौगोलिक पहचान है बल्कि जीवन रेखा भी है। राजस्थान की अधिकांश नदियाँ अरावली से ही निकलती हैं, इसलिए इसे राज्य की लाइफ लाइन कहना अतिशयोक्ति नहीं है।
अरावली का महत्व केवल इतिहास या भूगोल तक सीमित नहीं है। यह पर्वतमाला थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। पश्चिम से आने वाली भीषण लू, धूल भरी आँधियाँ और मरुस्थलीकरण को रोकने में इसकी भूमिका निर्णायक है। साथ ही, यह मानसून की दिशा और वर्षा के वितरण को प्रभावित करती है। दिल्ली-एनसीआर जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र के लिए अरावली ‘ग्रीन लंग’ यानी फेफड़ों की तरह काम करती है।
विडंबना यह है कि अरावली को बचाने के उद्देश्य से शुरू हुई सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, केंद्र सरकार की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए एक ऐसे मोड़ पर पहुँच गई है, जो इसके अस्तित्व के लिए घातक साबित हो सकता है। नई परिभाषा के तहत अब केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली पर्वतमाला का हिस्सा माना जाएगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएगा।
भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की रिपोर्ट इस खतरे को और स्पष्ट करती है। रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान के 15 जिलों में फैले 12,081 अरावली पहाड़, जो 20 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई के हैं, उनमें से केवल 1,048 पहाड़ (यानी मात्र 8.7 प्रतिशत) ही 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचे हैं। नई परिभाषा लागू होते ही शेष पहाड़ियाँ अवैध खनन और रियल एस्टेट माफिया के लिए लगभग खुला निमंत्रण बन जाएँगी। यह स्थिति पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि अवैध खनन के लिए ‘रेड कार्पेट’ बिछाने जैसी है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी केवल ऊँचाई के आधार पर किसी पर्वतमाला की पहचान करना पूरी तरह तर्कहीन है। किसी पहाड़ की पहचान उसकी ऊँचाई से नहीं, बल्कि उसकी भूगर्भीय संरचना और टेक्टोनिक प्लेट से होती है। एक 20 या 30 मीटर ऊँची चट्टान भी उसी अरावली पर्वतमाला का हिस्सा होती है, जिस पर 1,727 मीटर ऊँचा गुरु शिखर स्थित है। ऊँचाई को मापदंड बनाकर अरावली को बाँटना न केवल अवैज्ञानिक है, बल्कि प्रकृति की मूल समझ के खिलाफ भी है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि 10 से 30 मीटर ऊँची छोटी पहाड़ियाँ और टीले भी धूल भरी आँधियों को रोकने और तापमान संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा अरावली की चट्टानी संरचना वर्षा के पानी को रोककर धीरे-धीरे जमीन के भीतर पहुँचाती है, जिससे भूजल रिचार्ज होता है। उत्तर-पश्चिम भारत, जो पहले ही गंभीर जल संकट से जूझ रहा है, उसके लिए अरावली जल सुरक्षा की रीढ़ है। इन पहाड़ियों का विनाश सूखे को और गहरा करेगा।
अरावली के क्षरण की कहानी नई नहीं है। इसका सिलसिला 1990 के दशक में शहरीकरण और तेज़ निर्माण गतिविधियों के साथ शुरू हुआ। दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान के शहरी इलाकों में बढ़ते निर्माण, सड़कों और रियल एस्टेट परियोजनाओं ने अरावली में अंधाधुंध खनन को जन्म दिया। पेड़ों की कटाई और प्राकृतिक आवरण के नष्ट होने से यह पर्वतमाला लगातार कमजोर होती चली गई।
आज स्थिति यह है कि यदि सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई नई परिभाषा पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो अरावली का बड़ा हिस्सा इतिहास बन जाएगा। इसके पर्यावरणीय परिणाम केवल राजस्थान या दिल्ली तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरे उत्तर भारत को प्रभावित करेंगे। मरुस्थलीकरण, जल संकट, प्रदूषण और तापमान में वृद्धि जैसी समस्याएँ और विकराल रूप लेंगी।
अब शायद जंगल और वन्यजीव देखने के लिए लोगों को अंबानी के ‘वनतारा जू’ में टिकट लेकर जाना पड़े, क्योंकि असली जंगल, असली पहाड़ और असली अरावली किताबों और तस्वीरों तक सीमित रह जाएँगे। सवाल यह नहीं है कि हम कितने पेड़ लगाते हैं, सवाल यह है कि हम अपनी प्राकृतिक विरासत को बचाने के लिए कितनी राजनीतिक और नीतिगत इच्छाशक्ति दिखाते हैं।
अरावली को लेकर नेशनल मीडिया अब दो फाड़ हो चुका है। कुछ गिने-चुने स्वर इसकी रक्षा में उठ रहे हैं, लेकिन अधिकांश टीवी पत्रकार अरावली के साथ ऐसा सलूक कर रहे हैं मानो वह कोई विपक्षी राजनीतिक दल हो। सवाल पूछने की जगह आरोप लगाए जा रहे हैं, और तथ्यों की जगह प्रोपेगैंडा परोसा जा रहा है।
विरोध का स्तर यहां तक गिर चुका है कि एक ‘ज्ञानवर्धक’ विश्लेषण में दिल्ली के प्रदूषण के लिए ही अरावली पर्वतमाला को जिम्मेदार ठहरा दिया गया। शायद अगला कदम यह होगा कि यमुना की गंदगी के लिए भी हिमालय को कटघरे में खड़ा कर दिया जाए।
हकीकत यह है कि अरावली पश्चिम से आने वाली गर्म, शुष्क हवाओं और धूल–रेत के तूफानों के सामने एक प्राकृतिक दीवार की तरह खड़ी रहती है। यही पर्वतमाला थार के रेगिस्तान को दिल्ली की देहरी तक पहुंचने से रोकती है। अरावली कमजोर होगी, तो प्रदूषण नहीं घटेगा, रेगिस्तान बढ़ेगा। लेकिन जब मीडिया सत्ता से सवाल पूछने की बजाय अरावली को अपराधी बनाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या अरावली में नहीं, नज़रिये में है।
कंक्रीट के जंगल में तब्दील होते शहरों के दौर में अरावली को बचाना केवल पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न नहीं रह गया है, यह सीधे-सीधे आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और अस्तित्व का सवाल है। दिल्ली में वातानुकूलित कमरों में बैठकर जो लोग अरावली के भाग्य का फैसला कर रहे हैं, उन्हें यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि इसके दुष्परिणाम उनसे दूर रहेंगे। यदि अरावली टूटी, तो उनके बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए रेगिस्तान कोई दूर की भौगोलिक अवधारणा नहीं रहेगा। रेगिस्तान का अनुभव करने के लिए उन्हें राजस्थान की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी बल्कि रेगिस्तान खुद चलकर दिल्ली आ जाएगा।
एक दिन जब धूल देश की राजधानी दिल्ली को निगल लेगी, जब पानी का संकट नारों से बड़ा हो जाएगा और जब पहाड़ों के गिरने की आवाज़ टीवी के डिबेट से तेज़ होगी, तब शायद पूछा जाएगा कि अरावली के वक़्त कलम का स्याही कम क्यों पड़ गया था? लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
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