सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी एक्ट-26 की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’: दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय!
सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी एक्ट-26 की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’: दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय!
लेखक – अरुण कुणाल
यूजीसी द्वारा लाए गए ‘इक्विटी रेगुलेशन 2026’ पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक महज़ एक कानूनी हस्तक्षेप नहीं है, बल्कि यह सरकार की राजनीतिक रणनीति पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने न केवल नियमों की अस्पष्टता की ओर इशारा किया, बल्कि केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की असामान्य चुप्पी भी कई संकेत छोड़ गई।
अगर मंशा सचमुच नीतिगत सुधार की होती, तो यूजीसी एक्ट के संदर्भ में भी अध्यादेश का रास्ता अपनाया जा सकता था, जैसा कि पहले कई बार किया गया है। ट्रिब्यूनल अध्यादेश, 2021 और दिल्ली सेवा अध्यादेश, 2023 इसके ठोस उदाहरण हैं, जहाँ सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट फैसलों के बावजूद कार्यपालिका ने अध्यादेश के ज़रिए स्थिति को पलटने की कोशिश की थी। अगर सरकार यूजीसी एक्ट पर अध्यादेश नहीं लाई, तो सवाल यह नहीं है कि कर सकती थी या नहीं? सवाल यह है कि उसने ऐसा क्यों नहीं किया? क्या इस बार जोखिम ज़्यादा दिखाई दे रहा था?
यूजीसी के ‘समता विनियम 2026’ पर सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक केवल एक कानूनी आदेश नहीं है, बल्कि यह मोदी सरकार की सामाजिक न्याय की राजनीति पर एक तीखा राजनीतिक अभियोग है। यह रोक उस जल्दबाज़ी, आत्मविश्वास और चुनावी गणित का परिणाम है, जिसमें सत्ता ने अपने कोर वोटर्स को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ मानते हुए एक ऐसा दांव खेल दिया, जो उलटा पड़ गया।
नतीजा यह हुआ कि महज़ कुछ ही दिनों में यह असंतोष ‘मंडल विरोधी आंदोलन’ जैसी शक्ल लेने लगा। शायद यही वजह है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, कोई भी एक बड़े और संगठित वोट बैंक को नाराज़ करने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं दिखा। राज्य स्तर पर विरोध की आवाज़ें ज़रूर सुनाई दीं, कुछ नेताओं ने असहज सवाल भी उठाए, लेकिन केंद्रीय स्तर पर हैरतअंगेज़ चुप्पी छाई रही। न संसद में तीखी बहस हुई, न किसी राष्ट्रीय नेता ने खुलकर सवाल खड़े किए। यह चुप्पी इस बात का सबूत है कि विचारधाराएँ चाहे जितनी भी अलग हों, चुनावी अंकगणित के सामने सत्ता और विपक्ष, दोनों की रीढ़ एक जैसी ही झुक जाती है।
जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत का सबसे अहम संकेत केंद्र सरकार की ओर से आया मौन था। सरकार का पक्ष रखने आए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो आमतौर पर अदालत में सरकार की ढाल बनकर खड़े रहते हैं, इस बार सवालों के सामने असहज दिखे। जब कोर्ट ने पूछा कि मौजूदा कानूनों में ‘भेदभाव’ की परिभाषा पहले से ही सभी तरह के भेदभाव को कवर करती है, तो फिर ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को अलग से परिभाषित करने की ज़रूरत क्यों पड़ी? इस बुनियादी सवाल का सरकार के पक्षकार तुषार मेहता के पास कोई ठोस जवाब नहीं था।
सच तो यह है कि महज़ दो हफ्ते पहले ही उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव समाप्त करने के उद्देश्य से लाए गए इन नियमों को लेकर मोदी सरकार चौतरफ़ा विवादों में घिर गई थी। यूजीसी के नए प्रावधानों के खिलाफ़ भाजपा के कोर वोटर्स सड़कों पर उतर आए। बदलते राजनीतिक ‘मौसम’ को भांपते हुए सरकार ने टकराव की बजाय ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ को तरजीह दी और सुप्रीम कोर्ट की रोक ने उसे एक सुविधाजनक रास्ता दे दिया।
फिलहाल अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक यूजीसी के 2012 वाले पुराने नियम ही लागू रहेंगे। 17 सितंबर 2012 को यूजीसी ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता बढ़ाने और भेदभाव रोकने के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में इक्वल अपॉर्च्युनिटी सेल (EOC) बनाने का प्रावधान था, जो अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों की शिकायतों की सुनवाई करता था। 2026 के नए नियम में पहली बार ओबीसी छात्रों को भी इस दायरे में लाया गया।
जिस सुप्रीम कोर्ट ने आज 'यूजीसी -2026’ पर रोक लगाई है, वही अदालत रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मौत के बाद यूजीसी को निर्देश जारी किया था कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए ठोस और प्रभावी नियम बनाए जाएं। उसी न्यायिक दबाव में यूजीसी ने ‘समता विनियम 2026’ का मसौदा तैयार किया। लेकिन भेदभाव खत्म करने के नाम पर लाए गए इन नियमों में ‘फर्जी शिकायत पर सज़ा’ जैसे प्रावधान जोड़कर और सामान्य वर्ग के छात्रों को व्यवहारिक रूप से हाशिये पर धकेलने वाली संरचना खड़ी कर दी गई। नतीजा यह हुआ कि जो नियम न्याय दिलाने के लिए बनाए गए थे, वही सामाजिक टकराव का औज़ार बन गए और सत्ता ने एक बार फिर सुधार की जगह ध्रुवीकरण का रास्ता चुन लिया।
यूजीसी बिल को अंतिम रूप देने वाली संसदीय सर्वदलीय समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह ने इस पूरे प्रकरण में सरकार और यूजीसी की पोल खोल दी। उन्होंने साफ़ कहा कि समिति ने न तो ‘फर्जी शिकायत पर सज़ा’ वाले प्रावधान को हटाने की सिफारिश की थी और न ही सामान्य वर्ग के छात्रों को नियमों से बाहर रखने की। ये दोनों फैसले यूजीसी ने अपनी मर्जी से लिए। यानी सरकार अब न समिति के पीछे छुप सकती है, न अदालत के।
राहुल गांधी की ‘जातिगत जनगणना’ की मांग से भाजपा पहले ही असहज थी। उसके जवाब में सत्ता ने सोचा कि ‘यूजीसी कार्ड’ खेलकर मंडल राजनीति को अपने तरीके से साध लिया जाएगा। लेकिन सत्ता के रणनीतिकार यह समझने में चूक गए कि मंडल सिर्फ़ आंकड़ों का खेल नहीं, सामाजिक स्मृति का सवाल है। जो वर्ग सत्ता की रीढ़ माना जा रहा था, वही सड़कों पर उतर आया और कुछ ही दिनों में यह असंतोष ‘मंडल विरोधी आंदोलन’ जैसी शक्ल लेने लगा।
मोदी सरकार के माथे पर बार-बार यू-टर्न लेने के आरोप पहले ही दर्ज हैं। ऐसे में खुलकर नियम वापस लेना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता था। सुप्रीम कोर्ट की रोक सरकार के लिए एक ‘सम्मानजनक बहाना’ बन गई, जिसके सहारे उसने यूजीसी एक्ट को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया।
सवाल अब यह नहीं है कि यूजीसी के नियम सही थे या गलत? असली सवाल यह है कि क्या सरकार सामाजिक न्याय जैसे संवेदनशील मुद्दों को केवल चुनावी प्रयोगशाला में टेस्ट करती रहेगी? क्या हर बड़े सामाजिक फैसले से पहले ‘कोर वोटर’ और ‘इलेक्टोरल रिटर्न’ का हिसाब लगाया जाएगा?
सुप्रीम कोर्ट की यह रोक सिर्फ़ यूजीसी के नियमों पर नहीं, बल्कि उस राजनीति पर भी है, जो समाज को सुधारने के नाम पर उसे और गहराई से बाँटने की कोशिश करती है। आने वाली सुनवाइयों में फैसला चाहे जो हो, लेकिन इतना तय है कि मंडल की राजनीति ने एक बार फिर दरवाज़ा खटखटा दिया है, जो अदालतों की तारीख-दर-तारीख में उलझा रहे तो बेहतर है!


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