मीडिया का न्यू इयर्स रेज़ोल्यूशन: मोदी–शाह को छूना नहीं, बाकी किसी को छोड़ना नहीं!




मीडिया का न्यू इयर्स रेज़ोल्यूशन: मोदी–शाह को छूना नहीं, बाकी किसी को छोड़ना नहीं!


                           ले o— अरुण कुणाल



नए साल की शुरुआत के साथ जिस तरह से मेन स्ट्रीम मीडिया में बदली हुई आवाज़ सुनाई दे रही है, उससे पहली नज़र में ऐसा लगता है कि शायद वे अब जनता की नब्ज़ को समझने लगे हैं। वह चाहे अवैध कोयला खनन हो, अरावली का मुद्दा हो, कुलदीप सेंगर केस हो, मध्य प्रदेश का जहरीला पानी और कैलाश विजयवर्गीय का मामला हो या दिल्ली का वायु प्रदूषण जैसी जमीनी समस्याएँ, लंबे समय बाद पहली बार राष्ट्रीय मीडिया में भाजपा शासित राज्यों से जुड़े जन-सरोकारों की चर्चा दिखाई दे रही है। यह बदलाव मामूली नहीं है और न ही पूरी तरह अनदेखा किया जा सकता है।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यह जागृति अधूरी है, नियंत्रित है और सुरक्षित सीमाओं में कैद है। क्योंकि जिन मुद्दों को उठाया जा रहा है, वे स्थानीय प्रशासन, निचले स्तर की व्यवस्था या “सिस्टम फेल्योर” तक सीमित रखे जा रहे हैं। जिम्मेदारी की सुई सत्ता के शीर्ष तक नहीं पहुंचती। सवाल वहीं रुक जाते हैं, जहां से असली जवाब शुरू होने चाहिए। सवाल अब भी वही है—क्या यह बदलाव टिकाऊ है या सिर्फ़ नया साल, नया पैकेजिंग? क्या यह साहस सत्ता की दहलीज़ तक पहुंचेगा या फिर हमेशा की तरह शीर्ष नेतृत्व के दरवाज़े पर आकर ठहर जाएगा?

मोदी–शाह से जुड़े सवाल आज भी अछूते हैं, जैसे कोई अदृश्य लक्ष्मण रेखा खींच दी गई हो। बेरोज़गारी, महंगाई, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता, चुनावी फंडिंग, मीडिया पर दबाव, या फिर पर्यावरणीय विनाश की नीतिगत ज़िम्मेदारी, इन पर सीधा सवाल पूछने की हिम्मत आज भी मुख्यधारा का मीडिया नहीं जुटा पा रहा है। आलोचना का दायरा इतना तय है कि सत्ता को असहज न होना पड़े और मीडिया को “संतुलित” कहलाने का प्रमाण भी मिल जाए।

आज के समय में भारतीय पत्रकार भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और कर्ण की तरह हैं, सब कुछ जानते हुए भी विवश है। भीष्म की प्रतिज्ञा उन्हें जकड़ चुकी है, द्रोण की आजीविका दांव पर है, कृपाचार्य का मौन ‘मर्यादा’ के नाम पर ढक दिया गया है और कर्ण अपनी कृतज्ञता के बोझ तले सच का साथ देने का साहस नहीं जुटा पा रहा। यह विवशता व्यक्तिगत नहीं, संस्थागत है। यह डर किसी एक पत्रकार का नहीं, पूरे मीडिया ढांचे का है।

धृतराष्ट्र की सभा में कभी-कभी गंधारी की आवाज़ सुनाई तो देती है, लेकिन न्याय के लिए उठी वह आवाज़ आज सोशल मीडिया की चौखट से आगे नहीं बढ़ पाती। सत्ता के अंधे दरबार में यह आवाज़ बस औपचारिक प्रतिरोध बनकर रह गई है—सुनी जाती है, समझी नहीं जाती। दूसरी ओर, द्रौपदी रूपी जनता का चीरहरण हो रहा है। रोज़गार छीने जा रहे हैं, अधिकार सिमट रहे हैं, सवालों को अपराध बनाया जा रहा है लेकिन सभा में बैठे ज्ञानी जन मौन हैं। कोई यह कहने को तैयार नहीं कि यह अन्याय है। अब कोई कृष्ण नहीं आता, क्योंकि कृष्ण का आह्वान सत्ता से नहीं, साहस से होता है।

विडंबना यह है कि आज धर्म की व्याख्या सबसे ज़्यादा अधर्म को ढकने के लिए की जा रही है। राष्ट्रवाद की आड़ में अन्याय को सही ठहराया जा रहा है और भक्ति के शोर में विवेक की आवाज़ दबा दी गई है। इतिहास गवाह है, जब धृतराष्ट्र की सभा में न्याय के पक्ष में खड़े होने वाले भीष्म मौन हो जाते हैं, तब महाभारत अनिवार्य हो जाती है। आज का प्रश्न यह नहीं है कि गंधारी क्यों नहीं बोल रही, प्रश्न यह है कि सभा में बैठे लोग सुनना क्यों नहीं चाहते। और सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब जनता का चीरहरण हो रहा हो, तब भीष्म, द्रोण और कर्ण की चुप्पी को क्या कभी क्षमा किया जा सकेगा?

भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तम्भ कहा गया है, लेकिन वर्तमान समय में यह स्तम्भ सहारा देने के बजाय सत्ता की छाया में सिमटता दिखाई देता है। जिस तरह राजनीतिक भक्ति सार्वजनिक जीवन में सामान्यीकृत की जा चुकी है, उसी तरह मीडिया की भक्ति भी अब किसी विसंगति की तरह नहीं, बल्कि एक स्वीकृत यथार्थ की तरह पेश की जा रही है। सवाल पूछना देशद्रोह और सत्ता से सहमति राष्ट्रभक्ति मानी जाने लगी है। ऐसे में मीडिया की भूमिका सूचना देने वाले प्रहरी की नहीं, बल्कि सत्ता के प्रवक्ता की बनती जा रही है।

आज मीडिया सत्ता के इर्द-गिर्द इस तरह बैठा है, जैसे उसका मुख्य दायित्व सरकार से सवाल पूछना नहीं, बल्कि उसके हर फैसले को सही ठहराना हो। प्रधानमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस बिना सवालों के हो या चुनिंदा सवालों के साथ, मीडिया का बड़ा हिस्सा इसे लोकतांत्रिक अपवाद मानने के बजाय उपलब्धि की तरह प्रस्तुत करता है। जब सत्ता सवालों से भागती है और मीडिया चुप रहता है, तब यह चुप्पी महज़ मौन नहीं रहती, बल्कि सहमति में बदल जाती है।

मेन स्ट्रीम मीडिया की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह मुद्दों का चयन सत्ता की सुविधा के अनुसार करता है। वोट चोरी, चुनाव आयोग की भूमिका, बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सवाल या तो हाशिए पर डाल दिए जाते हैं या फिर उन्हें “राजनीति से प्रेरित” बताकर खारिज कर दिया जाता है। इसके विपरीत, धर्म, राष्ट्रवाद, भावनात्मक उभार और प्रतीकात्मक घटनाओं को दिन-रात परोसा जाता है। बहसें समाधान के लिए नहीं, ध्रुवीकरण के लिए आयोजित की जाती हैं।

यह स्थिति अचानक नहीं बनी। मीडिया का कॉरपोरेटकरण, विज्ञापनों पर बढ़ती निर्भरता और राजनीतिक सत्ता से निकटता ने इसकी स्वतंत्रता को धीरे-धीरे खोखला किया है। जब मीडिया घरानों की आर्थिक सेहत सरकार की नीतियों, लाइसेंस, ठेकों और विज्ञापनों पर निर्भर हो जाए, तब संपादकीय स्वतंत्रता एक आदर्श भर रह जाती है। ऐसे में पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल करना नहीं, बल्कि सत्ता के पक्ष में कथा गढ़ना बन जाता है।

भारतीय मीडिया का दूसरा बड़ा संकट यह है कि उसने आलोचना को अपराध बना दिया है। सरकार से असहमति रखने वाला हर व्यक्ति “टुकड़े-टुकड़े गैंग”, “अर्बन नक्सल” या “देश-विरोधी” की श्रेणी में डाल दिया जाता है। यह भाषा सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि मीडिया की भी हो चुकी है। बहस के मंच पर तथ्य और तर्क की जगह आरोप और नारे लेते जा रहे हैं। एंकर अब पत्रकार नहीं, अभियोजक की भूमिका में नजर आते हैं।

सोशल मीडिया के दौर में यह प्रवृत्ति और भी खतरनाक हो गई है। मीडिया टीवी स्क्रीन से निकलकर व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी और ट्रेंडिंग हैशटैग्स के ज़रिये जनमत गढ़ रहा है। आधी-अधूरी सूचनाएं, चयनित वीडियो क्लिप और भावनात्मक हेडलाइंस सच से ज़्यादा असरदार साबित हो रही हैं। सत्य की जटिलता को सरल झूठ से ढक दिया गया है।

इतिहास यह बताता है कि जब भी मीडिया सत्ता का औज़ार बनता है, लोकतंत्र कमजोर होता है। नाज़ी जर्मनी में गोएबेल्स का प्रचार तंत्र हो या आपातकाल के दौरान भारतीय मीडिया का एक हिस्सा, या आज का मीडिया, हर दौर ने यही सिखाया है कि भक्ति और भय से संचालित मीडिया अंततः समाज को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर करता है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज यह सब “छद्म राष्ट्रवाद” के नाम पर हो रहा है।


फिर भी, पूरी मीडिया को एक ही रंग में रंग देना ईमानदारी नहीं होगी। आज भी कुछ स्वतंत्र पत्रकार, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और छोटे समाचार संस्थान हैं, जो जोखिम उठाकर सत्ता से सवाल पूछ रहे हैं। दुर्भाग्यवश, उनकी आवाज़ मुख्यधारा के शोर में दबा दी जाती है। सत्ता-समर्थक मीडिया उन्हें अपवाद बताकर खारिज कर देता है। इन सबके बावजूद, जिला और राज्य स्तर के छोटे मीडिया संस्थानों के प्रति जनता का भरोसा लगातार बढ़ा है। यही सच्चाई नेशनल मीडिया को सबसे ज़्यादा चुभ रही है। नतीजतन, अपनी गिरती TRP और विश्वसनीयता को बचाने के लिए दिल्ली की मीडिया अब ‘नेट प्रैक्टिस’ में जुटी दिखाई दे रही है।

वर्तमान में मीडिया की भूमिका लोकतंत्र के लिए चेतावनी की तरह है। यदि मीडिया सत्ता का आईना बनने के बजाय उसका मुखौटा बन जाए, तो जनता अंधेरे में धकेल दी जाती है। सवाल यह नहीं है कि मीडिया किसका समर्थन करता है, सवाल यह है कि क्या वह जनता के सवालों को सत्ता तक पहुंचा रहा है या सत्ता के जवाबों को ही सवाल बनाकर जनता के सामने परोस रहा है?

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