नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी: ग्रीनलैंड से ईरान तक ट्रम्प का अल्टीमेटम, भारत "तीन में या तेरह में".... ?
नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी: ग्रीनलैंड से ईरान तक ट्रम्प का अल्टीमेटम !
भारत "तीन में या तेरह में"....?
लेखक: अरुण कुणाल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान में सीधे दखल देने की चेतावनी को बार-बार दोहराना, खुद को वेनेजुएला का 'एक्टिंग प्रेसिडेंट' घोषित करना और ग्रीनलैंड को लेकर 20 दिन का अल्टीमेटम देना, कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर 20 दिन बाद क्या होगा? क्या वेनेज़ुएला से शुरू हुई सैन्य आक्रामकता ईरान, क्यूबा और कोलंबिया तक फैलते हुए तीसरे विश्व युद्ध की चिंगारी बन सकती है? यही वजह है कि तीसरे वर्ल्ड वॉर को लेकर 16वीं सदी का फ़्रान्स भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियों पर एक बार फिर वैश्विक बहस तेज़ हो गई है।
जब - जब दुनिया युद्ध, महामारी या वैश्विक संकट से गुजरती है, तो नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियां चर्चा के केंद्र में आ जाती हैं। नास्त्रेदमस के अलावा 9/11 और कोविड-19 जैसी घटनाओं की चेतावनी देने वाली बुल्गारियाई ज्योतिष बाबा वांगा ने भी 2026 में तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत की भविष्यवाणी की है। विश्व युद्ध के अफवाहों के बीच अमेरिकी आसमान में ‘फ्लाइंग पेंटागन’ के नाम से कुख्यात 'डूम्सडे प्लेन' की मौजूदगी ने हलचल मचा दी है। लगभग 51 साल बाद इस विमान की उड़ान से वैश्विक सुरक्षा और संभावित संकट को लेकर चिंताओं को गहरा कर दिया है। डूम्सडे प्लेन का इस्तेमाल परमाणु युद्ध जैसी आपात स्थितियों में कंट्रोल सेंटर के तौर पर किया जाता है।
रूस–यूक्रेन और इज़राइल–फिलिस्तीन युद्ध से उपजा अन्तर्राष्ट्रीय तनाव अभी पूरी तरह थमा भी नहीं था कि अमेरिका द्वारा सीरिया पर एयर स्ट्राइक, वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप और अटलांटिक महासागर में रूसी तेल टैंकर की जब्ती ने हालात में आग में पेट्रोल डालने का काम किया है। इसी बीच ग्रीनलैंड और ईरान को लेकर किसी बड़े घटनाक्रम की अटकलें तेज़ हो गई हैं। सोशल मीडिया पर डोनाल्ड ट्रम्प ने एक पोस्ट में ईरान के लोगों से अपील करते हुए लिखा- “ईरानी देशभक्तों, विरोध जारी रखो। अपनी संस्थाओं पर क़ब्ज़ा करो। क़ातिलों और अत्याचारियों के नाम सुरक्षित रखो। उन्हें इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी… मदद रास्ते में है।”
भारत और ऑस्ट्रेलिया ने ईरान में रह रहे अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी कर दी है, वहीं रूस ने अपने नागरिकों से इज़राइल छोड़ने की अपील की है, जो इस बात का संकेत है कि संकट अब केवल कूटनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा। ट्रम्प द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ़ के बाद भारत का चीन और रूस की ओर बढ़ता झुकाव अमेरिकी रणनीतिक हलकों में गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। यही वजह है कि ट्रम्प पर भारत को साधने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ‘ऑपरेशन ईरान’ से पहले अमेरिका की सबसे बड़ी कोशिश भारत को अपने पक्ष में करने की दिखाई दे रही है।
भारत केवल एक उभरती आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि एशिया में सामरिक संतुलन का एक अहम स्तंभ है। रूस और चीन के साथ गहरे संबंधों के साथ-साथ भारत के ईरान से भी ऐतिहासिक, कूटनीतिक और ऊर्जा आधारित रिश्ते रहे हैं। भारत के साथ-साथ ईरान भी ब्रिक्स देशों का सदस्य है। ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों में भारत तीसरे स्थान पर है, जबकि रूस पहले और चीन दूसरे नंबर पर हैं। ऐसे में ‘ईरान को आज़ादी दिलाने’ के नाम पर युद्ध थोपने से पहले अमेरिका जानता है कि भारत की भूमिका निर्णायक हो सकती है!
ट्रम्प प्रशासन यह भी समझता है कि यदि भारत खुलकर ईरान-विरोधी मोर्चे में शामिल नहीं होता, तो ‘ऑपरेशन ईरान’ को वैश्विक वैधता मिलना मुश्किल होगा। ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई से पहले अमेरिका की सबसे बड़ी कूटनीतिक परीक्षा भारत है और ट्रम्प यह जोखिम नहीं उठा सकते कि भारत खुलकर रूस-चीन-ईरान धुरी के साथ खड़ा हो जाए।भा
ऐसे में, भारत को ग्रुप ऑफ सेवन (G7) के विकसित देशों के वित्त मंत्रियों की एक विशेष बैठक में आमंत्रित किया जाना सामान्य कूटनीतिक घटना नहीं है। यह आमंत्रण ऐसे समय आया है जब अमेरिका, चीन पर क्रिटिकल मिनरल्स की निर्भरता कम करने की रणनीति पर काम कर रहा है! औपचारिक रूप से इस बैठक का एजेंडा क्रिटिकल मिनरल्स पर चर्चा बताया जा रहा है, लेकिन जिस तरह अमेरिका की पहल पर भारत को यह न्योता मिला है, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है।
यह सब घटनाएं अब किसी साधारण सैन्य या कूटनीतिक कार्रवाई के दायरे में नहीं रही, बल्कि इसे वैश्विक शक्ति-संतुलन से जुड़े एक गंभीर संकट के रूप में देखा जा रहा है। इस कदम ने अमेरिका और रूस दोनों परमाणु संपन्न महाशक्तियों के बीच तनाव को एक खतरनाक और अनिश्चित मोड़ पर पहुँचा दिया है, जहाँ एक गलत आकलन पूरी दुनिया को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकता है।
बीते कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय नियमों, संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रियाओं और कूटनीतिक शिष्टाचार को दरकिनार कर अमेरिका जिस तरह एक के बाद एक सैन्य हस्तक्षेप कर रहा है, उससे वैश्विक व्यवस्था की नींव हिलती दिखाई दे रही है। वेनेजुएला के बाद ‘ऑपरेशन ईरान’ की खुली धमकियाँ और उसके जवाब में रूस तथा चीन की तेज़ होती सैन्य और कूटनीतिक लामबंदी इस बात की ओर इशारा करती है कि तीसरे विश्व युद्ध की आशंका अब केवल विश्लेषकों की कल्पना नहीं रह गई है।
इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि भारत जैसे उभरते शक्ति के केंद्र की भूमिका क्या होगी? राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक, एकतरफा और व्यापार-केंद्रित विदेश नीति ने न केवल विरोधी देशों को, बल्कि मित्र राष्ट्रों को भी असहज स्थिति में डाल दिया है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का ग्रीनलैंड को लेकर दिया गया बयान इसका उदाहरण है!
ट्रम्प की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार की जा रही बयानबाज़ी ने भारत-अमेरिका संबंधों की चमक को फीका कर दिया है। पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति में अमेरिका की ओर स्पष्ट झुकाव देखा गया, जिसे रणनीतिक साझेदारी और आर्थिक अवसरों के नाम पर उचित ठहराया गया। लेकिन अब वही झुकाव भारत की कूटनीतिक स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर रहा है।
इतिहास बताता है कि जब-जब बीजेपी सत्ता में रही है, तब भारत की विदेश नीति में अमेरिका के प्रति अतिरिक्त नरमी दिखाई दी है। पहले यह नरमी संतुलन के साथ चलती थी! रूस, यूरोप और विकासशील देशों के साथ रिश्ते भी समानांतर रूप से मजबूत रहते थे। लेकिन पिछले दस वर्षों में यह संतुलन बिगड़ता नजर आया है। प्रो-अमेरिकन रुख के चलते भारत–रूस संबंधों में आई ठंडक अब रणनीतिक चिंता का विषय बन चुकी है।
रूस लंबे समय से भारत का भरोसेमंद रणनीतिक और रक्षा साझेदार रहा है। शीत युद्ध के दौर से लेकर आज तक, रूस ने कई मौकों पर भारत का साथ दिया है। लेकिन अमेरिका के बढ़ते दबाव और प्रतिबंधों की राजनीति ने भारत को असहज स्थिति में डाल दिया है। रूस से तेल न खरीदने को लेकर अमेरिका का लगातार दबाव इसी रणनीति का हिस्सा है। यह घटना बताती है कि आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि सीधे बाज़ार और आम नागरिक की जेब तक पहुँच चुकी है।
ट्रम्प की नीतियों का प्रभाव आज किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। व्यापार युद्ध, प्रतिबंध, सैन्य धमकियाँ और कूटनीतिक दबाव ये सभी वैश्विक अस्थिरता को जन्म दे रहे हैं। यदि इन आक्रामक प्रवृत्तियों पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो तीसरे विश्व युद्ध की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। ऐसे में 2026 को लेकर नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियां डराने वाली प्रतीत होती हैं और मौजूदा हालात उन्हें सच के क़रीब ले जाते दिख रहे हैं।
इतिहास इस संदर्भ में एक कड़ी चेतावनी देता है। एडोल्फ हिटलर ने भी अपने विस्तारवादी अभियान की शुरुआत छोटे-छोटे कदमों से की थी। उस समय दुनिया ने इन्हें स्थानीय या सीमित घटनाएँ मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया। बाद में वही घटनाएँ मानव इतिहास के सबसे विनाशकारी युद्ध में बदल गईं, जिसकी कीमत आज भी विश्व चुका रहा है। इतिहास गवाह है कि हिटलर के उन्माद पर जो राष्ट्र चुप थे, वे आज ट्रम्प के विस्तारवाद पर भी वही खामोशी ओढ़े हुए हैं।
आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। सवाल यह नहीं है कि वैश्विक टकराव होगा या नहीं, बल्कि यह है कि उस स्थिति में भारत की रणनीति क्या होगी। क्या भारत जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति की ओर लौटेगा, जहाँ राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हों और किसी भी महाशक्ति का अंधानुकरण न किया जाए या फिर परिस्थितियों और दबावों के चलते किसी एक धड़े के साथ खड़ा होकर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को दांव पर लगाएगा?
तीसरे विश्व युद्ध की आशंका के इस दौर में भारत का निर्णय न केवल उसकी विदेश नीति की दिशा तय करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी प्रभावित करेगा। यही कारण है कि आज लिया गया हर कदम इतिहास के कठोर मूल्यांकन के दायरे में होगा। ट्रम्प ने जो खेल शुरू किया है, वह समय रहते नहीं रुका, तो यह विश्व राजनीति का सबसे लंबा और खूनी खेल हो सकता है....!


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