अमेरिकी अदालत का अडानी को समन: 14 महीने की लुका-छुपी का अंत!

 


अमेरिकी अदालत का अडानी को समन: 14 महीने की लुका-छुपी का अंत!

                           लेखक-अरुण कुणाल


“लुका-छुपी बहुत हुई, सामने आ जा ना…”अगर गाने की यह पंक्ति तारीख़ पे तारीख़ वाली भारतीय अदालतों के गलियारों में गूंजे, तो शायद किसी को हैरानी न हो। लेकिन जब वही ‘लुका-छुपी’ की गूंज अमेरिकी अदालत में हो, तो वह सिर्फ़ कानूनी घटना नहीं रहती, वह वैश्विक चर्चा का विषय बन जाती है। अमेरिकी समन को लेकर पिछले 14 महीनों से चली आ रही कानूनी और कूटनीतिक लुका-छुपी अब समाप्त हो चुकी है। समन स्वीकार करते ही अडानी का मामला टालमटोल से निकलकर औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में आ गया है। अब यह खेल देरी और तकनीकी आपत्तियों का नहीं, बल्कि सबूतों, दस्तावेज़ों और जवाबदेही का है, वह भी ऐसी अदालत में, जहां “तारीख़ पे तारीख़” नहीं होती हैं।

गौतम अडानी और सागर अडानी द्वारा अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के समन को स्वीकार करना केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उस लंबे राजनीतिक–कॉरपोरेट अध्याय का निर्णायक मोड़ है, जो पिछले डेढ़ दशक से भारत की सत्ता और पूंजी के गठजोड़ का प्रतीक माना जाता रहा है। लगभग 14–15 महीनों तक तकनीकी, कूटनीतिक और कानूनी कारणों से टलता रहा यह समन अब स्वीकार कर लिया गया है। औपचारिक भाषा में इसे “प्रोसीजरल स्टेप” कहा जा सकता है, लेकिन वास्तविक राजनीति में यह फुल सरेंडर से कम नहीं है।

यह कानूनी लड़ाई अब केवल अडानी समूह तक सीमित नहीं रही है, बल्कि भारत के पूरे कॉरपोरेट जगत के लिए एक बड़ी और निर्णायक चुनौती बन चुकी है, जिसका सामना अब घरेलू मंचों पर नहीं, बल्कि अमेरिकी अदालतों में करना होगा। अब तक अमेरिका यात्रा से दूरी बनाए रख रहे गौतम अडानी के संदर्भ में यह मामला सिर्फ़ एक कारोबारी संकट नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक क्षमता और उसकी वैश्विक साख की भी परीक्षा बनता जा रहा है।

चौदह महीने से अधिक समय तक चली कानूनी टालमटोल के बाद अंततः अडानी के वकील अमेरिकी अदालत में उपस्थित हुए और उनके खिलाफ जारी समन को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। अडानी ग्रीन एनर्जी ने इसे एक प्रक्रियात्मक कदम बताते हुए साफ़ किया है कि इसका अर्थ आरोपों को स्वीकार करना नहीं है। कंपनी ने कथित भ्रष्टाचार और निवेशकों को गुमराह करने के सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि वह कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पूरा बचाव करेगी।

अडानी ग्रुप का दावा है कि यह मामला सिविल प्रकृति का है, न कि आपराधिक, और इसका उसके दैनिक संचालन या कारोबारी गतिविधियों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। अडानी ग्रीन एनर्जी के मुताबिक, समूह का व्यवसाय पूर्ववत सामान्य रूप से चलता रहेगा और कानूनी चुनौती का सामना संस्थागत ढांचे के भीतर रहकर किया जाएगा।

दरअसल SEC और अमेरिकी अभियोजकों का आरोप है कि अडानी समूह, विशेषकर अडानी ग्रीन एनर्जी, ने भारत में सोलर पावर कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने के लिए लगभग 265 मिलियन डॉलर (करीब ₹2000 करोड़) की रिश्वत देने की साजिश रची। साथ ही, अमेरिकी निवेशकों से फंड जुटाते समय गलत और भ्रामक जानकारियां दी गईं।

इस केस में दो स्तरों पर कानूनी संकट है- पहला SEC का सिविल फ्रॉड केस और दूसरा अमेरिकी प्रॉसिक्यूटर्स का क्रिमिनल केस, जिसमें तीन गुना तक जुर्माने (लगभग 750 मिलियन डॉलर) का प्रावधान है। यही कारण है कि यह कहना कि “मामला सिर्फ सिविल नेचर का है” आधा सच है। असली खतरा क्रिमिनल ट्रैक पर छिपा है। 

शायद यही कारण है भारत सरकार अबतक अमेरिकी समन को टाल रही थी! पिछले 14 महीनों से यह समन अडानी समूह तक इसलिए नहीं पहुंच पा रहा था क्योंकि भारत सरकार ने हेग कन्वेंशन के तहत समन तामील करने के दो अनुरोधों को अस्वीकार कर दिया था। SEC को कोर्ट से यह कहना पड़ा कि “अडानी भारत में हैं और उन तक नोटिस नहीं पहुंच पा रहा है!" जब समन ई-मेल के ज़रिये तामील कराने की बात सामने आई, तो अडानी के पास ‘लुका-छुपी’ जारी रखने का विकल्प खत्म हो गया। इसके बाद अदालत से बचने की रणनीति छोड़कर उन्हें औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया का रास्ता स्वीकार करना पड़ा।

अमेरिकी न्याय प्रणाली में 'ईमेल, मैसेज, ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड, इंटरनल कम्युनिकेशन' ये सबूत अक्सर कन्फेशन से ज्यादा ताकतवर होते हैं। यही वजह है कि अडानी समूह ने अब टकराव की जगह लीगल डिफेंस को चुना है और वॉल स्ट्रीट के दिग्गज वकील रॉबर्ट जिउफ्फ्रा जूनियर को मैदान में उतारा है। अब जब अडानी के वकीलों ने स्वयं समन स्वीकार कर लिया है, तो यह स्पष्ट है कि टालने की रणनीति की सीमा खत्म हो चुकी थी। अगर डिजिटल सबूत इतने मजबूत न होते, तो यह ‘सरेंडर’ शायद अभी भी टल सकता था।

दिलचस्प तथ्य यह है कि इतने बड़े आरोपों और अंतरराष्ट्रीय विवादों के बावजूद अडानी समूह का कारोबार रुका नहीं, सब सामान्य रूप से चलते रहे है। लेकिन एक मूक बदलाव यह दिखा है कि पहले जहां अडानी समूह विदेशी बाजारों से कर्ज ले रहा था, अब वह घरेलू बैंकों पर ज्यादा निर्भर हो गया है।

हिंडनबर्ग रिसर्च भले ही अब औपचारिक रूप से बंद हो चुकी हो, लेकिन उसने अडानी समूह के इर्द-गिर्द जो कानूनी और नैतिक भूचाल खड़ा किया था, उसकी गूंज आज भी अंतरराष्ट्रीय अदालतों और वित्तीय नियामकों में साफ़ सुनाई दे रही है। यदि यह मामला कोर्ट के भीतर किसी सेटलमेंट पर समाप्त नहीं होता और पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ता है, तो कुल मिलाकर यह लगभग एक वर्ष का न्यायिक सफ़र होगा, जिसका अंतिम फैसला अधिकतम दिसंबर 2026 तक आने की संभावना है।

इस पूरे प्रकरण को अमेरिकी अदालत की दहलीज़ तक पहुँचाने में हिंडनबर्ग रिसर्च की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उसी रिपोर्ट ने पहली बार अडानी समूह के कारोबारी ढांचे, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और फंडिंग पैटर्न को वैश्विक जांच के दायरे में खड़ा किया। यदि अदालत का फैसला हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों की दिशा में जाता है, तो यह केवल अडानी समूह के लिए एक बड़ा झटका नहीं होगा, बल्कि शॉर्ट-सेलर के रूप में हिंडनबर्ग रिसर्च की विश्वसनीयता, वैधानिकता और प्रभावशीलता की निर्णायक जीत मानी जाएगी।

दूसरे शब्दों में, हिंडनबर्ग भले बंद हो गया हो, लेकिन अगर फैसला उसके आरोपों के अनुरूप आता है, तो इतिहास उसे एक बंद संस्था नहीं, बल्कि एक ट्रिगर पॉइंट के रूप में याद रखेगा, जिसने भारत के सबसे शक्तिशाली कॉरपोरेट साम्राज्य को वैश्विक कटघरे में खड़ा कर दिया।

ईमानदारी से कहें तो यह मुकदमा अपने आप में जितना बड़ा है, उससे ज्यादा दिलचस्प है इसका भू-राजनीतिक असर। इन दिनों “ट्रम्प - अडानी” और “मोदी - अडानी” के रिश्तों में जो बदलाव दिख रहा है, वही असली कहानी है। अडानी को यह भरोसा था कि मोदी की ताकत उन्हें वैश्विक स्तर पर ढाल बनकर बचा लेगी। लेकिन अमेरिका में यह भ्रम टूट चुका है।

अडानी को मोदी सरकार की कूटनीतिक ताक़त पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय मुकेश अंबानी का रास्ता अपनाना चाहिए था। यानी ट्रम्प से कोई टकराव नहीं, कोई अनावश्यक जोखिम नहीं, और वैश्विक सत्ता-संतुलन के प्रति अतिरिक्त सतर्कता। कॉरपोरेट साम्राज्य केवल घरेलू सत्ता के भरोसे नहीं चलते, खासकर तब जब कारोबार की जड़ें अमेरिका और वैश्विक वित्तीय बाजारों तक फैली हों।

यही वजह है कि ट्रम्प की विक्ट्री पार्टी में अंबानी मौजूद थे, अडानी नहीं। यह महज़ एक सामाजिक घटना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत था। मुकेश अंबानी ने वर्षों से एक संतुलित रणनीति अपनाई है-मोदी से भी संबंध, गांधी परिवार से भी संवाद, और वॉशिंगटन से भी टकराव से परहेज़। सत्ता बदलती है, लेकिन अंबानी का नेटवर्क बना रहता है।

इसके उलट अडानी ने अपनी पूरी राजनीतिक पूंजी एक ही ध्रुव में लगा दी। उन्होंने मान लिया कि मोदी की ताक़त उन्हें अंतरराष्ट्रीय जांच और अमेरिकी नियामकों की सख़्ती से बचा लेगी। यही उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई। भारत में सत्ता जितनी प्रभावशाली हो सकती है, अमेरिका में उतनी ही अप्रासंगिक। वहां दोस्ती नहीं, दस्तावेज़ और डिजिटल सबूत बोलते हैं।

आज स्थिति यह है कि अडानी अमेरिकी अदालत की ज़द में हैं और मोदी सरकार चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती। यह एहसास देर से आया, लेकिन अब साफ़ है कि वैश्विक पूंजीवाद में जीवित रहने के लिए घरेलू सत्ता नहीं, बहु-दिशात्मक संबंध ज़रूरी होते हैं। जिस संतुलन की राजनीति में अंबानी सफल रहे, उसी में अडानी चूक गए।

यही फ़र्क़ है एक पॉलिटिकली क्लोज़ कारोबारी और एक पॉलिटिकली स्मार्ट कारोबारी के बीच। अब अडानी के लिए एक चतुर बनिया बनने का वक्त निकल चुका है। अब दोस्ती, भरोसा और सत्ता, तीनों के मायने बदल चुके हैं। सवाल यह नहीं है कि अडानी दोषी साबित होंगे या नहीं? असली सवाल यह है कि - क्या यह मुकदमा भारत की राजनीति और कॉरपोरेट सत्ता के रिश्तों को बदल देगा? तो जवाब है हां या ना में देना मुश्किल है....!

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