ट्रंप का न्यू वर्ल्ड ऑर्डर : तीसरे विश्व युद्ध की आहट और भारत की दुविधा
ट्रंप का न्यू वर्ल्ड ऑर्डर : तीसरे विश्व युद्ध की आहट और भारत की दुविधा!
ले o- अरुण कुणाल
न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के नाम पर डोनाल्ड ट्रम्प जिस T20 क्रिकेट के शॉर्ट फ़ॉर्मेट की राजनीति खेल रहे हैं, उसकी हर गेंद दुनिया की अर्थव्यवस्था और वैश्विक शांति को चोट पहुँचा रही है। आशंका यह है कि यह तेज़-तर्रार मैच कहीं तीसरे विश्व युद्ध के लंबे और विनाशकारी क्रिकेट का टेस्ट मैच फ़ॉर्मेट में तब्दील न हो जाए। यदि ऐसा हुआ, तो आज का भारत स्वयं को इस ‘वर्ल्ड वॉर’ रूपी टेस्ट मैच से अलग नहीं रख पाएगा! क्योंकि नरेंद्र मोदी का न्यू इंडिया जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति को पीछे छोड़ चुका है!
रूस–यूक्रेन और इज़राइल–फिलिस्तीन युद्ध से उपजा अंतरराष्ट्रीय तनाव अभी पूरी तरह थमा भी नहीं था कि अमेरिका का सीरिया पर एयर स्ट्राइक, वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई और अटलांटिक महासागर में रूसी तेल टैंकर को जब्त कर आग में पेट्रोल डालने का काम किया है। इस बीच 'ग्रीनलैंड और ईरान' में किसी बड़े घटनाक्रम की अटकलें भी तेज़ हैं! भारत और ऑस्ट्रेलिया ने ईरान में रह रहे अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी कर दी है, वहीं रूस ने अपने नागरिकों से इज़राइल छोड़ने की अपील की है।
ऑपरेशन ग्रीनलैंड के अफवाहों के बीच अमेरिकी आसमान में ‘फ्लाइंग पेंटागन’ के नाम से कुख्यात 'डूम्सडे प्लेन' की मौजूदगी ने हलचल मचा दी है। लॉस एंजेलिस एयरपोर्ट पर इस रहस्यमयी विमान को देखे जाने के बाद सोशल मीडिया पर अटकलों का बाजार गर्म है। यह वही विमान है जिसे परमाणु युद्ध जैसी सर्वनाशकारी आपात स्थितियों में उड़ते हुए कमांड और कंट्रोल सेंटर के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
यह कोई साधारण हवाई जहाज़ नहीं है, बल्कि आसमान में तैरता हुआ अमेरिका का ‘व्हाइट हाउस’ है। इसे यूंही अमेरिका का ‘उड़ता हुआ पेंटागन’ नहीं कहा जाता। अगर ज़मीन पर मौजूद तमाम कमांड सेंटर तबाह हो जाए तो अमेरिकी राष्ट्रपति, रक्षा मंत्री और शीर्ष सैन्य अधिकारी इसी विमान से पूरी दुनिया में फैली अमेरिकी सेना और परमाणु हथियारों की कमान संभाल सकते हैं। लगभग 51 साल बाद इस विमान की उड़ान से वैश्विक सुरक्षा और संभावित संकट को लेकर चिंताओं को गहरा कर दिया है।
यह सब घटनाएं अब किसी साधारण सैन्य या कूटनीतिक कार्रवाई के दायरे में नहीं रही, बल्कि इसे वैश्विक शक्ति-संतुलन से जुड़े एक गंभीर संकट के रूप में देखा जा रहा है। इस कदम ने अमेरिका और रूस दोनों परमाणु संपन्न महाशक्तियों के बीच तनाव को एक खतरनाक और अनिश्चित मोड़ पर पहुँचा दिया है, जहाँ एक गलत आकलन पूरी दुनिया को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकता है।
बीते कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय नियमों, संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रियाओं और कूटनीतिक शिष्टाचार को दरकिनार कर अमेरिका जिस तरह एक के बाद एक सैन्य हस्तक्षेप कर रहा है, उससे वैश्विक व्यवस्था की नींव हिलती दिखाई दे रही है। वेनेजुएला के बाद ‘ऑपरेशन ईरान’ की खुली धमकियाँ और उसके जवाब में रूस तथा चीन की तेज़ होती सैन्य और कूटनीतिक लामबंदी इस बात की ओर इशारा करती है कि तीसरे विश्व युद्ध की आशंका अब केवल विश्लेषकों की कल्पना नहीं रह गई है।
इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि भारत जैसे उभरते शक्ति के केंद्र की भूमिका क्या होगी? राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक, एकतरफा और व्यापार-केंद्रित विदेश नीति ने न केवल विरोधी देशों को, बल्कि मित्र राष्ट्रों को भी असहज स्थिति में डाल दिया है। वेनेजुएला ट्रम्प की ‘हिटलरशाही’ का सबसे प्रत्यक्ष शिकार है, लेकिन उनकी टैरिफ़ नीति का असर भारत पर भी साफ़ दिखाई दे रहा है।
ट्रम्प की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार की जा रही बयानबाज़ी ने भारत-अमेरिका संबंधों की चमक को फीका कर दिया है। पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति में अमेरिका की ओर स्पष्ट झुकाव देखा गया, जिसे रणनीतिक साझेदारी और आर्थिक अवसरों के नाम पर उचित ठहराया गया। लेकिन अब वही झुकाव भारत की कूटनीतिक स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर रहा है।
इतिहास बताता है कि जब-जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में रही है, तब भारत की विदेश नीति में अमेरिका के प्रति अतिरिक्त नरमी दिखाई दी है। पहले यह नरमी संतुलन के साथ चलती थी! रूस, यूरोप और विकासशील देशों के साथ रिश्ते भी समानांतर रूप से मजबूत रहते थे। लेकिन पिछले दस वर्षों में यह संतुलन बिगड़ता नजर आया है। प्रो-अमेरिकन रुख के चलते भारत–रूस संबंधों में आई ठंडक अब रणनीतिक चिंता का विषय बन चुकी है।
रूस लंबे समय से भारत का भरोसेमंद रणनीतिक और रक्षा साझेदार रहा है। शीत युद्ध के दौर से लेकर आज तक, रूस ने कई मौकों पर भारत का साथ दिया है। लेकिन अमेरिका के बढ़ते दबाव और प्रतिबंधों की राजनीति ने भारत को असहज स्थिति में डाल दिया है। रूस से तेल न खरीदने को लेकर अमेरिका का लगातार दबाव इसी रणनीति का हिस्सा है।
इस संदर्भ में ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट ने भू-राजनीतिक तनाव को और बढ़ा दिया। केप्लर के हवाले से आई इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि रूसी कच्चा तेल लेकर तीन जहाज दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी, जामनगर पहुंच रहे हैं। इसके तुरंत बाद राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा सार्वजनिक रूप से यह कहना कि भारत रूस से तेल नहीं खरीद रहा है, एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश था।
इस बयान का सीधा असर भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर पर पड़ा। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को आधी रात में सफाई जारी करनी पड़ी। हालांकि रिलायंस कंपनी ने ब्लूमबर्ग रिपोर्ट का खंडन किया, लेकिन बाज़ार ने इस स्थिति को राजनीतिक दबाव के रूप में देखा और इसके परिणामस्वरूप रिलायंस के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई। यह घटना बताती है कि आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि सीधे बाज़ार और आम नागरिक की जेब तक पहुँच चुकी है।
ट्रम्प की नीतियों का प्रभाव आज किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। व्यापार युद्ध, प्रतिबंध, सैन्य धमकियाँ और कूटनीतिक दबाव ये सभी वैश्विक अस्थिरता को जन्म दे रहे हैं। यदि इन आक्रामक प्रवृत्तियों पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो तीसरे विश्व युद्ध की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।
इतिहास इस संदर्भ में एक कड़ी चेतावनी देता है। एडोल्फ हिटलर ने भी अपने विस्तारवादी अभियान की शुरुआत छोटे-छोटे कदमों से की थी। उस समय दुनिया ने इन्हें स्थानीय या सीमित घटनाएँ मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया। बाद में वही घटनाएँ मानव इतिहास के सबसे विनाशकारी युद्ध में बदल गईं, जिसकी कीमत आज भी विश्व चुका रहा है।
आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। सवाल यह नहीं है कि वैश्विक टकराव होगा या नहीं, बल्कि यह है कि उस स्थिति में भारत की रणनीति क्या होगी। क्या भारत जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति की ओर लौटेगा, जहाँ राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हों और किसी भी महाशक्ति का अंधानुकरण न किया जाए या फिर परिस्थितियों और दबावों के चलते किसी एक धड़े के साथ खड़ा होकर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को दांव पर लगाएगा?
तीसरे विश्व युद्ध की आशंका के इस दौर में भारत का निर्णय न केवल उसकी विदेश नीति की दिशा तय करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी प्रभावित करेगा। यही कारण है कि आज लिया गया हर कदम इतिहास के कठोर मूल्यांकन के दायरे में होगा।ट्रम्प ने तेल को हथियार बनाकर जो T-20 क्रिकेट खेल शुरू किया है, वह समय रहते नहीं रुका, तो यह विश्व राजनीति का सबसे लंबा और खूनी टेस्ट मैच हो सकता है! जहां न कोई विजेता होगा, न कोई ट्रॉफी और हार किसी एक टीम की नहीं बल्कि पूरी मानव जाति की होगी। क्योंकि इस मैच में बॉल नहीं, सभ्यता स्विंग करेगी!


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