कोलकाता से रांची तक ‘ED राज’ का संकट : फेडरल स्ट्रक्चर पर लग सकता है प्रश्नचिह्न?
कोलकाता से रांची तक ‘ED राज’ का संकट : फेडरल स्ट्रक्चर पर लग सकता है प्रश्नचिह्न?
ले o - अरुण कुणाल
भारतीय संविधान ने देश को एक संघीय लोकतंत्र (फेडरल डेमोक्रेसी) के रूप में परिकल्पित किया है, जहाँ केंद्र और राज्य दोनों की शक्तियाँ स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में जिस तरह से केंद्रीय एजेंसियों, विशेषकर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की सक्रियता बढ़ी है, उसने इस संघीय ढांचे पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। कोलकाता से लेकर रांची तक की घटनाएँ इस बात का संकेत हैं कि देश एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है, जहाँ संवैधानिक संतुलन की जगह एजेंसी आधारित शासन की छाया गहराती जा रही है।
ईडी बनाम आई-पैक मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप तकनीकी रूप से भले ही कानूनी अधिकार के दायरे में आता हो, लेकिन टाइमिंग ने राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं। जब मामला कोलकाता हाईकोर्ट में लंबित था, तब सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुँचना इस आशंका को जन्म देता है कि केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियाँ फोरम शॉपिंग के रास्ते संवेदनशील मामलों में त्वरित राहत चाहती हैं।
जैसा कि अनुमान था, सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को बड़ा झटका देते हुए ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 3 फरवरी की तारीख तय की है। साथ ही पश्चिम बंगाल सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब करते हुए यह स्पष्ट किया कि केंद्रीय एजेंसी द्वारा लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं।
आई-पैक केस का वर्षों से लंबित रहना और पश्चिम बंगाल चुनाव से ठीक पहले अचानक उसकी सक्रियता, राजनीतिक संयोग से कहीं ज़्यादा राजनीतिक संकेत देता है। चुनाव से पहले इस तरह की कार्रवाई का गलत संदेश जा रहा है! ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जब आईपैक केस लंबे समय से पेंडिंग है तो वेस्ट बंगाल चुनाव से ठीक पहले कुम्भकरणी नींद से उठने की केंद्र सरकार को क्या जरुरत है?
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार के साथ केंद्र की टकराव की राजनीति कोई नई बात नहीं है। लेकिन ED की कार्रवाईयों ने इस टकराव को संवैधानिक संकट के स्तर तक पहुँचा दिया है। राज्य सरकार का आरोप है कि बिना पर्याप्त सबूतों के, बार-बार नोटिस और छापेमारी के ज़रिए प्रशासन को पंगु बनाने की कोशिश की जा रही है। सवाल यह है कि जब किसी राज्य की कानून-व्यवस्था, प्रशासन और वित्तीय मामलों पर सीधे केंद्रीय एजेंसियाँ हावी होने लगें, तो राज्य सरकार की स्वायत्तता कहाँ बचती है?
ममता बनर्जी के पैटर्न पर हेमंत सोरेन भी ED के साथ दो -दो हाथ करने का मन बना चुके है! रांची पेयजल विभाग के कर्मचारी व मनी लॉन्ड्रिंग केस के आरोपी संतोष कुमार द्वारा ईडी अधिकारियों पर मारपीट का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज कराना और उसके बाद झारखंड पुलिस का सीधे ईडी कार्यालय पहुँचना, यह घटनाक्रम असाधारण है। सामान्यतः केंद्रीय एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई में राज्य सरकारें अतिरिक्त सतर्कता बरतती हैं, क्योंकि इससे संवैधानिक टकराव पैदा होता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब झारखंड में तीन साल बाद चुनाव हैं, तो हेमंत सरकार को इतनी जल्दी क्या थी? क्या बंगाल और झारखंड को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक धुरी के रूप में देखा जाना चाहिए? क्या ममता और हेमंत सरकार दोनों मिलकर केंद्र को यह संदेश दे रहे हैं कि अगर केंद्रीय एजेंसियाँ राज्य सरकारों की सीमाएँ लांघेंगी, तो राज्य भी जवाबी कदम उठाने से नहीं हिचकेंगे।
पहले ममता, फिर हेमंत और अब क्या स्टालिन भी ईडी के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे? राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल तो पहले से ही केंद्रीय एजेंसियों को लेकर खुला युद्ध छेड़े हुए हैं। ऐसे में सवाल यह नहीं रह गया कि विपक्ष विरोध करेगा या नहीं, बल्कि यह है कि विपक्ष शासित राज्यों की एक साझा रणनीति आकार ले रही है या नहीं। अगर दक्षिण से स्टालिन भी इस मोर्चे में शामिल होते हैं, तो विपक्ष के पास पहली बार उत्तर–दक्षिण और पूर्व–पश्चिम को जोड़ने वाला नैरेटिव तैयार हो सकता है।
ममता बनर्जी ने बंगाल में ईडी के खिलाफ पुलिस कार्रवाई कर सीधा संदेश दिया, हेमंत सोरेन ने रांची में उसी ‘बंगाल मॉडल’ को दोहराया। अब निगाहें तमिलनाडु पर हैं, जहां एम.के. स्टालिन पहले ही केंद्र के हिंदुत्व और संघीय हस्तक्षेप के खिलाफ मुखर रहे हैं। अगर स्टालिन भी ईडी को लेकर सख्त स्टैंड लेते हैं, तो यह टकराव महज़ राजनीतिक नहीं रहेगा, बल्कि संघीय बनाम केंद्रीय सत्ता की निर्णायक लड़ाई बन जाएगा। अगर ऐसा हुआ, तो आने वाले महीनों में लड़ाई चुनावी नहीं, संवैधानिक होगी।
पिछले कुछ सालों में कई विपक्ष शासित राज्यों ने पहले ही CBI को ‘जनरल कंसेंट’ देने से इनकार कर दिया है। यानी बिना राज्य की अनुमति CBI वहाँ कार्रवाई नहीं कर सकती। अब वही बहस धीरे-धीरे ED तक पहुँच रही है। हालाँकि कानूनी रूप से ED को CBI की तरह रोका नहीं जा सकता, क्योंकि वह PMLA जैसे केंद्रीय कानून के तहत काम करती है। लेकिन राजनीतिक स्तर पर यह मांग ज़ोर पकड़ रही है कि ED की शक्तियों की समीक्षा हो! मसलन गिरफ्तारी और छापेमारी पर स्पष्ट गाइडलाइंस हों और राज्य सरकारों को पूरी तरह दरकिनार न किया जाए पर केंद्र सरकार इन मुद्दों पर मौन है! अगर यह टकराव बढ़ता है, तो आने वाले समय में “ED राज बनाम संघीय अधिकार” सबसे बड़ा संवैधानिक मुद्दा बन सकता है।
कोलकाता और रांची के घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि विपक्ष एक सामूहिक प्रतिरोध मॉडल तैयार कर रहा है। संदेश साफ है-अगर केंद्र एजेंसियों के ज़रिये राजनीति करेगा, तो राज्य सरकारें प्रशासनिक और कानूनी ताकत से जवाब देंगी। यह टकराव लोकतंत्र के लिए खतरनाक भी है, क्योंकि इसमें एजेंसियाँ राजनीतिक विवाद का केंद्र बन रही हैं और अदालतें बार-बार हस्तक्षेप को मजबूर है!
ED मूल रूप से एक आर्थिक जांच एजेंसी है, जिसका दायित्व मनी लॉन्ड्रिंग और विदेशी मुद्रा उल्लंघन जैसे अपराधों की जांच करना है। लेकिन आज यह एजेंसी केवल आर्थिक अपराधों तक सीमित नहीं दिखती। विपक्ष शासित राज्यों में ED की कार्रवाईयों की संख्या, समय और राजनीतिक संदर्भ यह सवाल उठाने को मजबूर करते हैं कि क्या यह एजेंसी अब कानून के तहत काम कर रही है या सत्ता के इशारों पर।
जब शासन का चेहरा संसद या विधानसभा की जगह जांच एजेंसियाँ बन जाएँ, तो इसे लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र में जवाबदेही जनता के प्रति होती है, जबकि एजेंसियाँ केवल कार्यपालिका के प्रति जवाबदेह होती हैं। यही वजह है कि ‘ED राज’, एक ऐसा तंत्र, जहाँ भय, जांच और गिरफ्तारी राजनीतिक असहमति को कुचलने का औजार बनता जा रहा हैं।
इस पूरे संकट में न्यायपालिका की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। कई मामलों में अदालतों ने ED को राहत दी है, तो कई मामलों में सख्त टिप्पणियाँ भी की हैं। लेकिन एक स्पष्ट और सुसंगत संवैधानिक मार्गदर्शन का अभाव दिखता है। यदि न्यायपालिका समय रहते संघीय ढांचे की रक्षा में निर्णायक भूमिका नहीं निभाती, तो आने वाले समय में यह संकट और गहराएगा।
यह बहस केवल भाजपा बनाम विपक्ष की नहीं है। आज ED जिन राज्यों में सक्रिय है, कल वही स्थिति किसी और के साथ भी हो सकती है। सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसे भारत की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ राज्यों की पहचान केवल प्रशासनिक इकाइयों तक सीमित रह जाएगी? क्या केंद्र की ताकत इतनी निरंकुश हो जाएगी कि संघीय ढांचा केवल किताबों में रह जाएगा?
ED बनाम राज्य सरकारों की यह लड़ाई केवल कानून की नहीं, बल्कि सत्ता की परिभाषा की लड़ाई है। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप फिलहाल केंद्र के पक्ष में गया है, लेकिन इससे सवाल खत्म नहीं हुए बल्कि और गहरे हो गए हैं। अगर यही ट्रेंड जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा होगा जहां या तो संघीय ढांचे को नए सिरे से परिभाषित करना पड़ेगा या फिर “एजेंसी-आधारित शासन” को लोकतांत्रिक स्वीकृति देनी होगी, दोनों ही रास्ते आसान नहीं हैं। लेकिन इतना तय है कि कोलकाता और रांची केवल घटनास्थल नहीं, आने वाले संवैधानिक संघर्ष के संकेतक हैं।
कोलकाता से रांची तक फैला ‘ED राज’ का संकट भारतीय संघीय व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक हथियार के रूप में होता रहा, तो यह न केवल राज्यों की स्वायत्तता को खत्म करेगा, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को भी कमजोर करेगा। अब समय आ गया है कि इस मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि संवैधानिक संकट के रूप में देखा जाए। संघीय ढांचे की रक्षा केवल राज्यों की नहीं, बल्कि पूरे देश की जिम्मेदारी है! क्योंकि जब संघ कमजोर होता है, तो अंततः लोकतंत्र भी कमजोर पड़ता है।


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