ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहला बजट: रक्षा बजट को लेकर डिफेंस सेक्टर का जोश हाई!
ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहला बजट: रक्षा बजट को लेकर डिफेंस सेक्टर का जोश हाई!
लेखक: अरुण कुणाल
आगामी आम बजट को लेकर आर्थिक विशेषज्ञों और शुरुआती रिपोर्टों का अनुमान है कि सरकार इस बार रक्षा और बुनियादी ढांचे पर सबसे अधिक ध्यान केंद्रित करेगी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह पहला बजट होगा, ऐसे में रक्षा मंत्रालय के बजट में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। हालांकि इस बढ़ोतरी का लाभ तीनों सेनाओं को मिलेगा, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी वायु सेना के साथ चीनी एयर डिफेंस सिस्टम की जुगलबंदी को देखते हुए भारतीय वायु सेना (IAF) के प्रति ज्यादा जोश दिखाने की जरुरत है। वरना “हमारी सीमा में न कोई घुसा था, न घुसा है” और “पापा ने वॉर रुकवा दी” जैसे जुमलों की जुगलबंदी से काम चलाना पड़ेगा!
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय जेट विमानों के नुकसान को लेकर भले ही परस्पर विरोधी दावे सामने आए हों, लेकिन किसी भी प्रकार के नुकसान से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और भारतीय वायु सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के बयानों के बीच से यही निष्कर्ष निकलता है कि संघर्ष में भारत को भी क्षति उठानी पड़ी थी।
भारतीय वायु सेना इस समय फाइटर स्क्वाड्रन और ट्रेनर एयरक्राफ्ट की भारी कमी से जूझ रही है, जो 1965 के बाद से अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। स्वीकृत 42 स्क्वाड्रनों के मुकाबले वर्तमान में केवल 30–31 सक्रिय स्क्वाड्रन बचे हैं। MiG-21 विमानों के रिटायरमेंट के बाद यह संख्या और घटने की आशंका है।
पिछले साल 2025-26 के केंद्रीय बजट में रक्षा मंत्रालय के लिए ₹6,81,210.27 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 4.79% अधिक है और कुल जीडीपी का लगभग 1.9% है। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए माना जा रहा है कि इस बार रक्षा बजट में डबल-डिजिट यानी 10% या उससे अधिक की बढ़ोतरी की जा सकती है। हथियारों की खरीद के लिए आवंटित कैपिटल बजट में भी समान बढ़ोतरी की योजना है। यदि ऐसा होता है, तो कुल रक्षा बजट 7 लाख करोड़ रुपये से ऊपर और कैपिटल बजट 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच सकता है, जो अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा होगा।
डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता की दिशा में अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस एक प्रमुख निजी खिलाड़ी के रूप में उभरा है, जो 2026 तक रक्षा निर्माण में ₹1.8 लाख करोड़ के निवेश की योजना बना रहा है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि बीते दस वर्षों में रक्षा बजट ढाई गुना बढ़ने के बावजूद सुखोई विमानों से लेकर T-90 टैंकों तक के लिए भारत आज भी स्पेयर पार्ट्स और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी के मामले में रूस, फ्रांस और पश्चिमी देशों पर निर्भर है।
फाइटर जेट की पीढ़ीगत दौड़ में भारत लगभग एक दशक पीछे छूट चुका है। जहां कई देशों के पास पहले से 5वीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट मौजूद हैं, वहीं भारत ने हाल ही में 5वीं पीढ़ी के फाइटर एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) पर काम शुरू किया है। AMCA प्रोग्राम में हुई देरी ने IAF को रणनीतिक रूप से कमजोर किया है। 4.5 जेनरेशन फाइटर जेट्स पर लंबे समय तक अत्यधिक निर्भरता के कारण कई देश स्टेल्थ तकनीक में बहुत आगे निकल चुके हैं, जबकि भारत अभी तैयारी के चरण में है।
यह बजट ऐसे समय में आ रहा है जब पूरी दुनिया अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। ट्रम्प की विस्तारवादी नीतियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नोबेल पीस प्राइज भी भविष्य के युद्धों की गारंटी नहीं बन सकता। ऐसे माहौल में रक्षा बजट बढ़ाना अब ज़रूरत नहीं, बल्कि मजबूरी बन चुका है।
चीन का रक्षा बजट लगभग 296 बिलियन डॉलर है, जो भारत से करीब तीन गुना अधिक है। स्पेस वॉरफेयर, साइबर हमलों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में चीन भारत से कहीं आगे है। वहीं शक्सगाम घाटी से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक चीन का आक्रामक इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार भारत के लिए गंभीर चुनौती है। चुनौती सिर्फ सीमाओं की रक्षा की नहीं, बल्कि हिंद महासागर में रणनीतिक पकड़ बनाए रखने की भी है।
भारत का रक्षा अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर खर्च अब भी बेहद सीमित है। जहां वैश्विक महाशक्तियां अपने रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा नई तकनीकों और खोजों में लगाती हैं, वहीं भारत इस मोर्चे पर पिछड़ा हुआ है। यही कारण है कि बजट के सही इस्तेमाल की ज़रूरत है और राफेल डील जैसे महंगे सौदों से बचने की समझदारी भी दिखानी पड़ेगी!
SIPRI की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक भारत आज अमेरिका, चीन और रूस के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश बन चुका है। लेकिन रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा पेंशन पर खर्च हो जाता है। इसी बोझ को कम करने के लिए 'अग्निवीर योजना' लाई गई, हालांकि इसके दीर्घकालिक प्रभाव और सेना की गुणवत्ता पर पड़ने वाले असर को लेकर सवाल बने हुए हैं।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कई मौकों पर चीन को लेकर सरकार को आगाह किया है। उनका यह कहना कि भारत के लिए पाकिस्तान से कहीं बड़ा रणनीतिक खतरा चीन है, पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यह साफ़ दिखा कि चुनौती केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं थी! चीन के एयर डिफेंस सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और रणनीतिक समर्थन ने इस संघर्ष को कहीं अधिक जटिल बना दिया।
पाकिस्तान भले ही फ्रंटलाइन पर दिखता हो, लेकिन बैक में चीन की भूमिका भारत के लिए दीर्घकालिक और गंभीर चुनौती बन चुकी है। चीन न केवल पाकिस्तान को आधुनिक हथियार और तकनीक मुहैया करा रहा है, बल्कि एलएसी से लेकर हिंद महासागर तक भारत पर बहुआयामी दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। ऐसे में राहुल गांधी की चेतावनी को केवल राजनीतिक बयान मानकर खारिज करना एक बड़ी रणनीतिक भूल हो सकती है।
मोदी सरकार के कार्यकाल में कुछ विवादित फैसलों के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि भारत ने रक्षा क्षेत्र में लंबी छलांग लगाई है। भारत अब सिर्फ हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि निर्माता बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन बदलती वैश्विक भू-राजनीति और चीन जैसे आक्रामक पड़ोसी के सामने यह काफ़ी नहीं है। जब तक भारत जेट इंजन और सेमीकंडक्टर जैसी कोर टेक्नोलॉजी खुद विकसित नहीं करता, तब तक रक्षा क्षेत्र में वास्तविक आत्मनिर्भरता एक अधूरा सपना ही रहेगी।
अडानी ग्रुप का रक्षा क्षेत्र में आना स्वागतयोग्य है, लेकिन विदेशी तकनीक पर केवल देशी लेबल चिपकाकर आत्मनिर्भरता का दावा नहीं किया जा सकता। साथ ही यह आशंका भी बनी हुई है कि इस बार का रक्षा बजट कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के बजाय किसी एक कॉरपोरेट समूह का ‘केयर फंड’ बनकर न रह जाए....?


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